By पं. नीलेश शर्मा
भगवान श्रीकृष्ण के पावन स्वरूप अगहन मास की कथा व्रत और ज्योतिषीय महिमा

सनातन धर्म की पंचांग गणना में नौवें मास मार्गशीर्ष को साक्षात योगेश्वर श्रीकृष्ण का स्वरूप माना गया है। जब प्रकृति में शरद ऋतु की विदाई और हेमंत ऋतु का आगमन होता है तब यह पावन महीना मानव चेतना को भौतिक आकर्षणों से मुक्त कर ईश्वरीय भक्ति की ओर उन्मुख करता है। इस माह में किए गए जप, तप, पवित्र नदी स्नान और दान का फल अन्य महीनों की तुलना में कई गुना अधिक प्राप्त होता है। शास्त्रों में इस माह की प्रत्येक तिथि और अनुष्ठान के लिए सुनिश्चित विधान निर्धारित किए गए हैं।
| साधना और पंचांग अंग | वैदिक विधान और अनुष्ठान निर्देश |
|---|---|
| पंचांग स्थिति | हिंदू वर्ष का 9वां मास, हेमंत ऋतु, नवंबर से दिसंबर के मध्य |
| अधिष्ठाता देवता | भगवान श्रीकृष्ण, श्रीहरि विष्णु, शंख देवता और चंद्र देव |
| पावन नदी स्नान | सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में यमुना अथवा गंगा स्नान |
| सिद्ध महामंत्र | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय अथवा हरे कृष्ण महामंत्र |
| पूजन सामग्री | तुलसी दल, श्वेत चंदन, दक्षिणावर्ती शंख, धूप, दीप, तिल और गुड़ |
| आध्यात्मिक फल | समस्त पापों की निवृत्ति, पितृ दोष शांति, आत्म शुद्धि और मोक्ष |
मार्गशीर्ष माह के दौरान प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर साधना आरंभ करने का नियम है। पवित्र नदियों अथवा घर में ही जल में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान करने से शरीर और चित्त दोनों निर्मल होते हैं। स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके भगवान सूर्य को जल अर्पित करें और फिर योगेश्वर श्रीकृष्ण और श्रीहरि विष्णु का पंचोपचार अथवा षोडशोपचार पूजन करें।
इस पावन साधना का निष्ठापूर्वक पालन करने से जीवन के जटिल संकट दूर होते हैं। वातावरण में व्याप्त सात्विक ऊर्जा साधक की मानसिक चंचलता को शांत कर उसे आंतरिक शांति प्रदान करती है। यह अनुष्ठान मनुष्य को कर्तव्य पथ पर अडिग रहने और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का मार्ग दिखाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता के 10वें अध्याय विभूति योग में जब गांडीवधारी अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से उनकी दिव्य विभूतियों के विषय में पूछा तब भगवान ने अपने परम ऐश्वर्य का वर्णन किया। उस प्रसंग में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की कि महीनों में मैं स्वयं मार्गशीर्ष हूं। यह कथन सिद्ध करता है कि यह मास किसी सामान्य देवता की उपासना का समय नहीं है बल्कि स्वयं परब्रह्म परमेश्वर का साक्षात स्वरूप है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार सतयुग का आरंभ भी इसी पावन मास की प्रथम तिथि से हुआ था। महर्षि कश्यप ने इसी कालखंड में कश्मीर भूमि की रचना की थी जो ध्यान और तपस्या का परम केंद्र बनी। इसी महीने में भगवान विष्णु ने वेदों की रक्षा करने और प्रलय के जल में सृष्टि के बीजों को सुरक्षित रखने के लिए अपना प्रथम मत्स्य अवतार धारण किया था।
प्रकृति के दृष्टिकोण से भी यह महीना अत्यंत मधुर और शांत होता है। इस समय न तो ग्रीष्म ऋतु का भीषण संताप होता है और न ही शिशिर ऋतु की हाड़ कंपाने वाली ठंड होती है। सूर्य की किरणें अत्यंत सुखद और जीवनदायिनी प्रतीत होती हैं। खेतों में नई फसलें पककर तैयार होती हैं और अन्नदाता के घर में अन्नपूर्णा का वास होता है। जब बाह्य वातावरण इतना संतुलित और शांत होता है तब मानव मन स्वतः ध्यान और ईश्वर चिंतन में लीन हो जाता है। इसी कारण भगवान ने इस महीने को अपना स्वरूप बताकर इसका गौरव बढ़ाया।
मार्गशीर्ष मास में सनातन परंपरा के कई अत्यंत प्रभावशाली और आध्यात्मिक पर्व संपन्न होते हैं। यह पूरा महीना उत्सव, त्याग और भक्ति के विविध रंगों से सजा रहता है।
मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मोक्षदा एकादशी कहा जाता है। द्वापर युग में कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि में जब अर्जुन मोह और विषाद से ग्रस्त हो गए थे तब इसी पावन तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता का अमर उपदेश दिया था। अतः इस दिन संपूर्ण विश्व में गीता जयंती का पावन पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और गीता का स्वाध्याय करने से जीवात्मा को जन्म मरण के बंधन से मुक्ति प्राप्त होती है।
मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को विवाह पंचमी का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन त्रेतायुग में भगवान श्रीराम और जनक नंदिनी माता सीता का पावन विवाह संपन्न हुआ था। यद्यपि इस तिथि पर वैवाहिक संबंधों का अनुष्ठान करने से कुछ परंपराओं में बचा जाता है किंतु सीताराम के युगल स्वरूप की पूजा करने से पारिवारिक जीवन में अटूट प्रेम और सामंजस्य स्थापित होता है।
इन सभी व्रतों और पर्वों का मूल उद्देश्य मनुष्य को उसके सांसारिक बंधनों से मुक्त कर उच्चतर आध्यात्मिक चेतना से जोड़ना है।
वैदिक ज्योतिष में महीनों के नाम पूर्णिमा तिथि के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्र में गोचर करता है उसी के आधार पर रखे गए हैं। मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को चंद्रमा मृगशिरा नक्षत्र में स्थित रहता है जिसके कारण इस मास का नाम मार्गशीर्ष पड़ा। लोकभाषा में इसे अगहन कहा जाता है जो संस्कृत शब्द अग्रहायण का अपभ्रंश है जिसका अर्थ होता है वर्ष का प्रथम अथवा सर्वश्रेष्ठ भाग।
| ज्योतिषीय तत्व | मार्गशीर्ष मास का प्रभाव और विशेषताएं |
|---|---|
| प्रधान नक्षत्र | मृगशिरा नक्षत्र (स्वामी मंगल देव और प्रतीक हिरण का सिर) |
| नक्षत्र देवता | चंद्र देव (शीतलता, मन और अमृत तत्व के स्वामी) |
| प्रधान ग्रह योग | बृहस्पति का सात्विक प्रभाव और सूर्य का धनु राशि में प्रवेश |
| सौर संक्रांति | धनु संक्रांति का आरंभ जिसे आध्यात्मिक साधना का काल माना जाता है |
| अनुकूल साधना | कुंडली में चंद्रमा, मंगल और गुरु को बलवान करने की पूजा |
मृगशिरा नक्षत्र का प्रतीक हिरण का सिर है। हिरण निरंतर कस्तूरी की खोज में चंचल होकर भटकता रहता है ठीक उसी प्रकार मानव मन भी सांसारिक विषयों में शांति खोजता है। मृगशिरा नक्षत्र की ऊर्जा मनुष्य को यह सिखाती है कि सच्चा आनंद बाहर की वस्तुओं में नहीं बल्कि उसकी अपनी अंतरात्मा के भीतर स्थित परमात्मा में है।
इस मास के उत्तरार्ध में सूर्य नारायण वृश्चिक राशि से निकलकर देवगुरु बृहस्पति की राशि धनु में प्रवेश करते हैं। इस खगोलीय घटना को धनु संक्रांति कहा जाता है। धनु संक्रांति के साथ ही मलमास अथवा खरमास का आरंभ होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस अवधि में सांसारिक मांगलिक कार्य जैसे विवाह अथवा गृह प्रवेश रोक दिए जाते हैं ताकि मनुष्य अपना संपूर्ण ध्यान आध्यात्मिक चिंतन, तीर्थाटन और ईश्वर भजन में लगा सके।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में चंद्रमा दुर्बल हो अथवा मन निरंतर अवसाद और भय से ग्रसित रहता हो तो मार्गशीर्ष मास में चंद्र देव और भगवान नारायण की संयुक्त पूजा करने से अद्भुत मानसिक शांति प्राप्त होती है। देवगुरु बृहस्पति की कृपा से बुद्धि में विवेक और ज्ञान का प्रकाश फैलता है।
सनातन धर्म के पर्व और महीने केवल धार्मिक मान्यताओं पर आधारित नहीं हैं बल्कि उनका गहरा वैज्ञानिक और चिकित्सीय आधार भी है। आयुर्वेद के अनुसार मार्गशीर्ष मास में हेमंत ऋतु का प्रभाव रहता है। इस समय बाहरी वातावरण में शीतलता बढ़ जाती है जिसके कारण मानव शरीर की आंतरिक जठराग्नि अत्यंत तीव्र और प्रदीप्त हो जाती है।
तीव्र जठराग्नि के कारण इस मौसम में शरीर को अधिक ऊर्जा और पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। यदि इस समय उचित और पौष्टिक आहार न लिया जाए तो शरीर की जठराग्नि धातुओं का क्षय करने लगती है। इसी कारण हमारे ऋषियों ने अगहन मास में खान पान के विशेष नियम बनाए।
ऋतुचर्या का यह वैदिक नियम शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और आने वाली कठोर शीत ऋतु के लिए शरीर को मजबूत बनाता है। जब शरीर स्वस्थ रहता है तभी मन भी एकाग्र होकर ईश्वर की आराधना में प्रवृत्त हो पाता है।
मार्गशीर्ष मास हमें सिखाता है कि बाहरी संसार की भागदौड़ के मध्य आत्मा का पोषण सबसे आवश्यक कार्य है। जिस प्रकार वृक्ष शीत ऋतु के आगमन पर अपने पुराने पत्तों को गिराकर नई ऊर्जा का संचय करते हैं उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने पुराने विकारों, कुंठाओं और अहंकार को त्यागकर अपनी आत्मा को निर्मल बनाना चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण का यह प्रिय महीना जीवन को उत्सव और साधना का संगम बनाने की प्रेरणा देता है। जब व्यक्ति प्रातःकाल के शांत वातावरण में यमुना जी के पावन तट का स्मरण करता है और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का उच्चारण करता है तब उसके भीतर का समस्त अंधकार मिट जाता है। यह मास हमें स्मरण कराता है कि जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल भौतिक संपदा का संग्रह करना नहीं है बल्कि उस परम चेतना में विलीन होना है जो समस्त सृजन का मूल आधार है। इस पावन मास में सादगी, परोपकार और भक्ति का दीप प्रज्वलित कर मनुष्य अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।
मार्गशीर्ष मास को अगहन क्यों कहा जाता है? मार्गशीर्ष को संस्कृत में अग्रहायण कहा जाता है जिसका अर्थ वर्ष का सर्वश्रेष्ठ भाग होता है और इसी अग्रहायण शब्द का लोक रूप अगहन है।
भगवान श्रीकृष्ण ने मार्गशीर्ष मास के विषय में गीता में क्या कहा है? श्रीमद्भगवद्गीता के 10वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि सब महीनों में मैं स्वयं मार्गशीर्ष मास हूं।
गीता जयंती का पावन पर्व किस दिन मनाया जाता है? गीता जयंती मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि अर्थात मोक्षदा एकादशी के दिन मनाई जाती है।
मार्गशीर्ष मास में किस नदी में स्नान करने का सर्वाधिक महत्व है? मार्गशीर्ष मास में भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय पावन यमुना नदी में प्रातःकाल स्नान करने का सर्वाधिक आध्यात्मिक फल शास्त्रों में बताया गया है।
अगहन मास में किन वस्तुओं का दान करना सबसे शुभ माना जाता है? इस माह में तिल, गुड़, गर्म वस्त्र, कंबल, अन्न, दक्षिणावर्ती शंख और शुद्ध घी का दान करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
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