मार्गशीर्ष नामकरण का क्या रहस्य है?

By पं. सुव्रत शर्मा

मृगशीर्ष नक्षत्र और चंद्रमा के दिव्य संबंध का ज्योतिषीय विश्लेषण

मार्गशीर्ष नामकरण मृगशीर्ष नक्षत्र और चंद्र रहस्य

चंद्र अर्घ्य और सोम साधना विधान

सनातन वैदिक परंपरा में मार्गशीर्ष पूर्णिमा को अमृत तत्व और मानसिक शांति की प्राप्ति के लिए अत्यंत पावन माना गया है। जब मनुष्य का चित्त अकारण अवसाद, मानसिक भटकाव, अनिद्रा अथवा अज्ञात भय से पीड़ित होता है तब मार्गशीर्ष मास में चंद्रमा और सोम देव की विधिवत उपासना समस्त मानसिक संतापों का शमन कर देती है। इस पावन अवसर पर आकाश में 16 कलाओं से युक्त पूर्ण चंद्रमा अपनी अमृतमयी किरणों से संपूर्ण पृथ्वी को आलोकित करता है। इस साधना को संपन्न करने के लिए निश्चित तिथियों, पवित्र सामग्रियों और शास्त्रोक्त नियमों का पालन करना अनिवार्य है।

साधना अंग वैदिक विधान और अनुष्ठान निर्देश
प्रधान तिथि काल मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि और प्रदोष काल में चंद्रोदय का समय
अधिष्ठाता देवता चंद्र देव, सोम देव और मृगशिरा नक्षत्र के स्वामी मंगल देव
सिद्ध चंद्र मंत्र ॐ सों सोमाय नमः अथवा ॐ चं चंद्रमसे नमः
पूजन सामग्री शुद्ध चांदी का पात्र, कच्चा गोदुग्ध, गंगाजल, श्वेत चंदन, अक्षत, बताशे और कपूर
आध्यात्मिक फल मानसिक अवसाद से मुक्ति, जल तत्व का संतुलन, मेधा शक्ति की वृद्धि और चित्त की एकाग्रता

इस साधना को प्रारंभ करने के लिए मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन सायंकाल सूर्यास्त के पश्चात स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण करें। जब पूर्व दिशा में पूर्ण चंद्रमा का उदय हो तब अपने भवन की छत अथवा खुले प्रांगण में पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।

  • चांदी के स्वच्छ पात्र में शुद्ध जल, थोड़ा कच्चा गाय का दूध, श्वेत चंदन, अक्षत और श्वेत पुष्प मिलाएं
  • दोनों हाथों से पात्र को मस्तक से ऊपर उठाकर गिरती हुई जलधारा के मध्य से चंद्र देव के बिंब का दर्शन करते हुए अर्घ्य अर्पित करें
  • अर्घ्य समर्पण के समय चंद्र गायत्री मंत्र अथवा ॐ सों सोमाय नमः का 11 बार शांत मन से उच्चारण करें
  • अर्घ्य के पश्चात श्वेत आसन पर बैठकर स्फटिक अथवा रुद्राक्ष की माला से सिद्ध चंद्र बीज मंत्र का 108 बार जप करें
  • जप समाप्त होने के उपरांत खीर अथवा मावे के मिष्ठान्न का भोग चंद्रमा को लगाएं और उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करें
  • इस पावन दिन तामसिक आहार, कटु वचन, क्रोध और रात्रि जागरण में व्यर्थ वार्तालाप से पूर्णतः दूर रहें

नियमित और श्रद्धापूर्वक इस अनुष्ठान का पालन करने से मस्तिष्क में स्थित स्नायु तंत्र को शीतलता प्राप्त होती है। जन्म कुंडली में उपस्थित चंद्र दोष शांत होने लगते हैं और मनुष्य के भीतर सकारात्मक विचारों का प्रवाह आरंभ होता है।

वैदिक पंचांग में नामकरण की खगोलीय व्यवस्था

सनातन पंचांग केवल तिथियों की सामान्य गणना नहीं है बल्कि यह आकाशमंडल में ग्रहों और नक्षत्रों की गति का अत्यंत सूक्ष्म खगोलीय विज्ञान है। वैदिक ऋषियों ने वर्ष के 12 महीनों का नामकरण अत्यंत वैज्ञानिक पद्धति से निर्धारित किया था। हिंदू पंचांग के प्रत्येक महीने का नाम उस विशिष्ट नक्षत्र के नाम पर रखा गया है जिसमें उस माह की पूर्णिमा के दिन चंद्रमा पूर्ण रूप से विराजमान होता है।

आकाशगंगा को 360 अंशों के चक्र में 27 बराबर भागों में विभाजित किया गया है जिन्हें 27 नक्षत्र कहा जाता है। प्रत्येक नक्षत्र 13 अंश और 20 कला का विस्तार रखता है। चंद्रमा अपनी 27.3 दिनों की परिक्रमा के दौरान प्रतिदिन एक नक्षत्र को पार करता है। जब सूर्य और चंद्रमा एक दूसरे से ठीक 180 अंश की दूरी पर आमने सामने आते हैं तब पूर्णिमा तिथि का निर्माण होता है।

चांद्र मास पूर्णिमा का नक्षत्र प्रमुख नक्षत्र स्वामी
चैत्र चित्रा नक्षत्र मंगल देव
वैशाख विशाखा नक्षत्र देवगुरु बृहस्पति
ज्येष्ठ ज्येष्ठा नक्षत्र बुध देव
आषाढ़ पूर्वाषाढ़ा अथवा उत्तराषाढ़ा शुक्र अथवा सूर्य देव
श्रावण श्रवण नक्षत्र चंद्र देव
भाद्रपद पूर्वाभाद्रपद अथवा उत्तराभाद्रपद गुरु अथवा शनि देव
आश्विन अश्विनी नक्षत्र केतु देव
कार्तिक कृत्तिका नक्षत्र सूर्य देव
मार्गशीर्ष मृगशिरा नक्षत्र मंगल देव
पौष पुष्य नक्षत्र शनि देव
माघ मघा नक्षत्र केतु देव
फाल्गुन पूर्वाफाल्गुनी अथवा उत्तराफाल्गुनी शुक्र अथवा सूर्य देव

इस खगोलीय तालिका से स्पष्ट होता है कि जब कार्तिक मास की पूर्णिमा कृत्तिका नक्षत्र में पूर्ण होती है, उसके उपरांत आने वाली पूर्णिमा अनिवार्य रूप से मृगशिरा नक्षत्र में घटित होती है। मृगशिरा नक्षत्र में पूर्णिमा के चंद्रमा का वास होने के कारण ही इस पवित्र महीने का वैदिक नाम मार्गशीर्ष पड़ा। यह नामकरण इस बात का प्रमाण है कि सनातन धर्म की प्रत्येक परंपरा खगोलीय वास्तविकता पर आधारित है।

मृगशिरा नक्षत्र का स्वरूप और मंगल का प्रभाव

भचक्र के 27 नक्षत्रों में 5वां स्थान मृगशिरा नक्षत्र को प्राप्त है। इस नक्षत्र का विस्तार वृषभ राशि के 23 अंश 20 कला से लेकर मिथुन राशि के 6 अंश 40 कला तक फैला हुआ है। इसका आधा भाग शुक्र की स्थिर पृथ्वी तत्व राशि वृषभ में आता है और आधा भाग बुध की द्विस्वभाव वायु तत्व राशि मिथुन में आता है।

मृगशिरा नक्षत्र के स्वामी ग्रह पराक्रम और ऊर्जा के कारक मंगल हैं, जबकि इसके अधिष्ठाता देवता साक्षात चंद्रमा अर्थात सोम देव हैं। यह एक अत्यंत दुर्लभ और विलक्षण संयोग है जहां ऊर्जा का स्वामी मंगल और शीतलता के स्वामी चंद्र देव एक साथ मिलकर इस नक्षत्र की ऊर्जा का संचालन करते हैं।

मृगशिरा का शाब्दिक अर्थ होता है हिरण का सिर। आकाश में इस नक्षत्र के तारों का विन्यास एक चौकन्ने और सुंदर मृग के मुख जैसा दिखाई देता है। हिरण चंचलता, गति, सतर्कता, कोमलता और निरंतर खोज का साक्षात प्रतीक है।

  • मृग अपनी नाभि में स्थित कस्तूरी की सुगंध से मोहित होकर संपूर्ण वन में उसकी खोज में भटकता रहता है
  • यह प्रतीक मनुष्य की उस आंतरिक जिज्ञासा को दर्शाता है जो सत्य और आत्मज्ञान की निरंतर खोज में लगी रहती है
  • मंगल का स्वामित्व इस नक्षत्र को तीव्र मानसिक स्फूर्ति, अन्वेषण क्षमता और ज्ञान पिपासा प्रदान करता है
  • चंद्रमा का देवत्व इस नक्षत्र में जन्मे अथवा प्रभावित जातकों को कोमल हृदय, उच्च संवेदनशीलता और कल्पनाशीलता देता है
  • जब मार्गशीर्ष मास में चंद्रमा इस नक्षत्र पर पूर्ण आभा के साथ आता है तब पृथ्वी पर आध्यात्मिक अनुसंधान की ऊर्जा तीव्र हो जाती है

यह नक्षत्र सिखाता है कि जिस प्रकार कस्तूरी मृग के भीतर ही सुगंध विद्यमान होती है, उसी प्रकार समस्त आनंद और शांति मनुष्य की अपनी आत्मा के भीतर ही स्थित है।

सोम तत्व जल मंडल और मानसिक संतुलन का विज्ञान

वैदिक दर्शन में चंद्रमा को सोम कहा गया है। सोम का अर्थ केवल अमृत नहीं है बल्कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड को शीतलता, रस, पोषण और जीवन रस प्रदान करने वाला मूल तत्व है। हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व यह उद्घोष किया था कि चंद्रमा मनसो जातः अर्थात चंद्रमा कालपुरुष के मन से उत्पन्न हुआ है और वही मानव मस्तिष्क की भावनाओं का नियंता है।

भौतिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि पृथ्वी के 70 प्रतिशत से अधिक भाग पर जल विद्यमान है और चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी के जलमंडल में ज्वार भाटा उत्पन्न करता है। मानव शरीर भी लगभग 70 प्रतिशत जल और तरल द्रव्यों से निर्मित है। जब आकाश में चंद्रमा पूर्ण होता है तब मानव मस्तिष्क के सेरेब्रोस्पाइनल द्रव और रक्त प्रवाह में एक सूक्ष्म स्पंदन उत्पन्न होता है।

यदि किसी व्यक्ति का चंद्रमा दुर्बल हो अथवा उस पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो तो पूर्णिमा के निकट उसका मानसिक संतुलन डगमगाने लगता है। चित्त में अनियंत्रित विचार, चिड़चिड़ापन, गहन अवसाद अथवा अत्यधिक भावुकता उत्पन्न होने लगती है।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन मृगशिरा नक्षत्र की उपस्थिति इस जल तत्व को एक अद्भुत संतुलन प्रदान करती है। मंगल की अग्नि और चंद्रमा का अमृत जब परस्पर मिलते हैं तब शरीर का जल तत्व दूषित होने से बच जाता है। यह खगोलीय संयोग रक्त के परिसंचरण को संतुलित करता है और मस्तिष्क के स्नायुओं को शांत करता है। इसी कारण इस माह में चंद्रमा का दर्शन और पूजन करने से मानसिक अवसाद और ग्रंथियां स्वतः पिघलने लगती हैं।

ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा और मंगल का दुर्लभ संयोग क्या है?

वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा और मंगल का संबंध अत्यंत विशिष्ट माना गया है। जब कुंडली में चंद्रमा और मंगल एक साथ बैठते हैं अथवा एक दूसरे पर दृष्टि डालते हैं तब लक्ष्मी योग अथवा चंद्र मंगल योग का निर्माण होता है। मार्गशीर्ष मास का संपूर्ण आधार ही चंद्रमा और मंगल की इस संयुक्त ऊर्जा पर टिका हुआ है।

ज्योतिषीय आयाम मार्गशीर्ष में चंद्र और मंगल का प्रभाव
नक्षत्र स्थिति मृगशिरा नक्षत्र (23 अंश 20 कला वृषभ से 6 अंश 40 कला मिथुन तक)
तत्व समन्वय पृथ्वी तत्व और वायु तत्व का अद्भुत संगम
मानसिक प्रभाव चंचलता का रूपांतरण रचनात्मक प्रतिभा और एकाग्रता में
शारीरिक प्रभाव रक्त की शुद्धि, पित्त और कफ के द्वंद्व का प्राकृतिक शमन
आध्यात्मिक साधना योग, ध्यान, प्राणायाम और मंत्र सिद्धि के लिए सर्वश्रेष्ठ समय

चंद्रमा मन की कल्पना शक्ति है और मंगल उस कल्पना को साकार करने वाला कर्म बल है। यदि केवल चंद्रमा बलवान हो और मंगल निर्बल हो तो मनुष्य केवल ख्याली पुलाव पकाता रहता है और कर्म नहीं कर पाता। इसके विपरीत यदि केवल मंगल बलवान हो और चंद्रमा दुर्बल हो तो मनुष्य क्रोधी, हिंसक और अविवेकी बन जाता है।

  • मृगशिरा नक्षत्र में चंद्रमा का गोचर मन और पौरुष के मध्य एक सेतु का निर्माण करता है
  • वृषभ राशि वाला भाग जातक को स्थिरता, कलात्मक दृष्टि और धैर्यवान आचरण प्रदान करता है
  • मिथुन राशि वाला भाग जातक को प्रखर वाकपटुता, तार्किक बुद्धि और नवीन विद्याएं सीखने की क्षमता देता है
  • जिन जातकों की जन्म कुंडली में चंद्रमा केतु अथवा राहु से पीड़ित होकर ग्रहण दोष बना रहा हो, उन्हें इस माह में साधना से विशेष लाभ होता है
  • मार्गशीर्ष मास में नियमित रूप से शिवलिंग पर कच्चा दूध अर्पित करने से चंद्र और मंगल दोनों ग्रह एक साथ प्रसन्न होते हैं

यह ग्रह संयोग मानव चेतना को भौतिक वासनाओं की चंचलता से निकालकर आत्म तत्व की स्थिरता की ओर मोड़ने का कार्य करता है।

चेतना की उर्ध्वगति और आत्मिक शांति का मार्ग

मार्गशीर्ष मास का नामकरण हमें यह बोध कराता है कि सनातन काल गणना केवल पन्नों का संकलन नहीं बल्कि जीवन जीने की एक परा विद्या है। जब हम आकाश में जगमगाते हुए मृगशिरा नक्षत्र और 16 कलाओं से युक्त पूर्ण चंद्रमा को देखते हैं, तब हमें अपनी लघुता और उस विराट ब्रह्मांडीय व्यवस्था की दिव्यता का साक्षात्कार होता है।

मृगशिरा नक्षत्र की हिरण जैसी चंचलता को जब साधना के अंकुश से साधा जाता है तब वही चंचलता प्रज्ञा और दिव्य मेधा में रूपांतरित हो जाती है। यह पावन मास हमें संदेश देता है कि हमें भी कस्तूरी मृग की भांति संसार के नश्वर भोगों में शांति खोजने के स्थान पर अपने अंतःकरण में विराजमान परमात्मा की खोज करनी चाहिए। मार्गशीर्ष की शीतल रात्रि में जब चंद्रमा की किरणें साधक के मस्तक को स्पर्श करती हैं तब उसके समस्त मानसिक द्वंद्व शांत हो जाते हैं और वह परम शांति के उस सागर में लीन हो जाता है जहां केवल आनंद और प्रकाश का साम्राज्य है।

FAQ

मार्गशीर्ष मास का नाम किस नक्षत्र पर आधारित है? मार्गशीर्ष मास का नाम आकाशगंगा के पांचवें नक्षत्र मृगशिरा पर आधारित है क्योंकि इस माह की पूर्णिमा को चंद्रमा मृगशिरा नक्षत्र में स्थित रहता है।

मृगशिरा नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह क्या है और उसका क्या अर्थ है? मृगशिरा नक्षत्र का प्रतीक हिरण का सिर है जो निरंतर ज्ञान की खोज, चंचलता, सतर्कता और आंतरिक सत्य के अन्वेषण का प्रतिनिधित्व करता है।

मृगशिरा नक्षत्र के स्वामी ग्रह और अधिष्ठाता देवता कौन हैं? मृगशिरा नक्षत्र के स्वामी ग्रह भूमिपुत्र मंगल हैं और इसके अधिष्ठाता देवता अमृत तथा शीतलता के स्वामी चंद्र देव अर्थात सोम हैं।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की पूजा करने से क्या लाभ होता है? इस दिन चंद्रमा की पूजा और अर्घ्य देने से शरीर का जल तत्व संतुलित होता है, मानसिक तनाव व अवसाद दूर होता है और चित्त में शांति आती है।

वैदिक पंचांग में महीनों के नाम तय करने का क्या नियम है? वैदिक पंचांग में जिस माह की पूर्णिमा तिथि को चंद्रमा जिस नक्षत्र में पूर्ण कलाओं के साथ गोचर करता है उसी नक्षत्र के नाम पर उस महीने का नामकरण होता है।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

पं. सुव्रत शर्मा (63)


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इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

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