By पं. अभिषेक शर्मा
भगवान दत्तात्रेय प्राकट्य, अन्नपूर्णा जयंती और त्रिदिवसीय स्नान विधि

| विवरण | तिथि एवं समय | संप्रदाय | मुख्य पूजन सामग्री | मुख्य नियम |
|---|---|---|---|---|
| मार्गशीर्ष पूर्णिमा | मार्गशीर्ष मास, पूर्णिमा तिथि | सनातन, दत्त एवं शाक्त | गंगाजल, खीर, पंचामृत, तुलसी दल | चंद्रोदय तक उपवास, सत्यनारायण कथा |
| मुख्य देव | भगवान दत्तात्रेय, माँ अन्नपूर्णा एवं चंद्र देव | समस्त | सफेद चंदन, अक्षत, मखाना, खीर | ब्रह्मचर्य, दान, त्रि-दिवसीय अमृत स्नान |
| पुण्य फल | अन्न-धन समृद्धि, ज्ञान प्राप्ति, पाप मुक्ति | सनातन | तिल, वस्त्र, अन्न एवं दूध दान | रात्रि जागरण, चंद्र अर्घ्य, परनिंदा त्याग |
मार्गशीर्ष मास का पावन समापन पूर्णिमा की अत्यंत दिव्य और पवित्र तिथि पर होता है। यह तिथि सनातन परंपरा में केवल एक पूर्णमासी का दिन नहीं है बल्कि स्वयं कई महान अवतरणों और पर्वों को अपने भीतर समेटे हुए है। इसी पावन तिथि पर त्रिदेवों अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु और महेश के संयुक्त स्वरूप भगवान दत्तात्रेय का प्राकट्य हुआ था। इसके साथ ही संपूर्ण सृष्टि पर छाया अन्न का गंभीर संकट दूर करने के लिए जगज्जननी माता पार्वती ने माँ अन्नपूर्णा का दिव्य रूप धारण करके काशी नगरी में भगवान शिव को भिक्षा प्रदान की थी। इस पावन रात्रि को चंद्रमा अपनी समस्त सोहळ कलाओं से परिपूर्ण होकर मृगशिरा नक्षत्र में विराजमान रहता है और संपूर्ण पृथ्वी पर अपनी शीतल तथा अमृतमयी रश्मियों की वर्षा करता है।
पौराणिक साहित्य के अनुसार महर्षि अत्रि और उनकी परम पतिव्रता पत्नी माता अनुसूया के निश्चल तपोबल की परीक्षा लेने के लिए त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश साधु वेश धारण करके उनके आश्रम पहुंचे। त्रिदेवों ने माता अनुसूया से बिना वस्त्र धारण किए भिक्षा प्रदान करने का दुराग्रह किया। माता अनुसूया ने अपने पतिव्रत धर्म और तपोबल के प्रभाव से तीनों देवताओं को अबोध शिशु बना दिया और उन्हें स्नेहपूर्वक अपना दुग्धपान कराया। जब देवताओं की पत्नियां अपने पतियों को खोजते हुए आश्रम पहुंचीं और माता अनुसूया से क्षमा याचना की तब त्रिदेवों ने प्रसन्न होकर माता अनुसूया के गर्भ से एक संयुक्त अवतार के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। इसी वरदान के फलस्वरूप मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन त्रिदेवों के एकाकार स्वरूप भगवान दत्तात्रेय का प्राकट्य हुआ।
इसी तिथि से जुड़ी दूसरी अलौकिक पौराणिक कथा माँ अन्नपूर्णा के अवतरण की है। एक समय जब पृथ्वी पर अकाल और भुखमरी का भयानक संकट उत्पन्न हो गया तथा मानव जाति अन्न की बूंद-बूंद को तरसने लगी तब काशी में भगवान शिव ने स्वयं भिक्षुक का रूप धारण किया। माता पार्वती ने समस्त जीवों के कल्याण और क्षुधा निवारण हेतु माँ अन्नपूर्णा का रूप धारण करके भगवान शिव की भिक्षा पात्र में दिव्य अन्न अर्पित किया। माँ अन्नपूर्णा के इस करुणावतार के कारण पृथ्वी पर पुनः हरियाली और अन्न धान्य की बहुलता हो गई। इसी कारण मार्गशीर्ष पूर्णिमा को अन्नपूर्णा जयंती के रूप में भी अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
वैदिक ज्योतिष में मार्गशीर्ष पूर्णिमा की तिथि को चंद्र देव और मन की शुद्धि के लिए अत्यंत दुर्लभ माना गया है। इस दिन चंद्रमा अपने संपूर्ण आकार में होकर मृगशिरा नक्षत्र के प्रभाव में रहता है जो सीधे रूप से साधक की चेतना और मानसिक स्थिरता से जुड़ा हुआ है। इस पावन रात्रि को चंद्रमा से बहने वाली शीतल किरणें औषधीय गुणों से युक्त होती हैं जो व्यक्ति के मानसिक तनाव और शारीरिक रोगों का शमन करती हैं।
| ग्रह / तत्व | आध्यात्मिक प्रभाव | ज्योतिषीय लाभ |
|---|---|---|
| चंद्रमा | मन, भावना और जल तत्व का नियंत्रण | मानसिक शांति, डिप्रेशन से मुक्ति और एकाग्रता |
| बृहस्पति | ज्ञान, धर्म और विवेक में वृद्धि | गुरु ग्रह के दोषों की शांति और मेधा शक्ति |
| अन्नपूर्णा तत्व | गृह में अन्न और धान्य की स्थिरता | दरिद्रता का नाश और गृह क्लेश से मुक्ति |
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से यदि किसी जातक की जन्म पत्रिका में चंद्रमा कमजोर है या राहु-केतु के प्रभाव से मन हमेशा आशंकित और भ्रमित रहता है तो मार्गशीर्ष पूर्णिमा का व्रत और चंद्र देव को कच्चे दूध का अर्घ्य देना अत्यंत लाभकारी होता है। इस दिन किए जाने वाले त्रि-दिवसीय अमृत स्नान से व्यक्ति के कायिक, वाचिक और मानसिक तीनों प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं।
इस पावन तिथि पर प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व किसी पवित्र नदी में स्नान करने का बहुत बड़ा महात्म्य है। यदि नदी स्नान संभव न हो तो घर पर ही नहाने के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करना चाहिए। स्नान के पश्चात स्वच्छ सफेद या पीले वस्त्र धारण करें और सत्यनारायण भगवान का ध्यान करके व्रत का संकल्प लें। घर के देवस्थान में चौकी स्थापित करके उस पर भगवान विष्णु और भगवान दत्तात्रेय का चित्र या प्रतिमा विराजमान करें।
पूजा के समय ॐ नमो भगवते वासुदेवाय और ॐ दत्तात्रेयाय नमः मंत्रों का निरंतर जप करना चाहिए। इस दिन किसी भूखे व्यक्ति को अन्न का दान करना और साधुओं को भोजन कराना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन किस-किस देवता का प्राकट्य पर्व मनाया जाता है? इस पावन तिथि पर त्रिदेवों के अवतार भगवान दत्तात्रेय का प्राकट्य हुआ था और माँ अन्नपूर्णा का अवतरण भी इसी दिन हुआ था।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर चंद्र अर्घ्य देने का क्या लाभ है? चंद्रमा को कच्चे दूध और जल का अर्घ्य देने से कुंडली में चंद्रमा मजबूत होता है और मानसिक तनाव तथा अनिद्रा से मुक्ति मिलती है।
अन्नपूर्णा जयंती के दिन रसोई घर में क्या विशेष करना चाहिए? इस दिन रसोई घर को पूरी तरह शुद्ध करके अन्न और चूल्हे की पूजा करनी चाहिए तथा अन्न का दान करना चाहिए।
त्रि-दिवसीय अमृत स्नान क्या होता है? चतुर्दशी, पूर्णिमा और प्रतिपदा के तीन दिनों में पवित्र नदियों में स्नान करने की परंपरा को त्रि-दिवसीय अमृत स्नान कहा जाता है।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन किस कथा का पाठ करना सबसे उत्तम माना गया है? इस दिन भगवान सत्यनारायण की कथा का पाठ करना और सुनना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।
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