By पं. संजीव शर्मा
श्रीहरि के शरीर से एकादशी देवी का प्राकट्य और मुर दैत्य वध कथा

सनातन वैदिक पंचांग के अनुसार संपूर्ण वर्ष में आने वाली 24 एकादशियों में मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी कहा जाता है। इस पावन तिथि को एकादशी व्रत के उद्भव का दिन माना जाता है। यदि कोई जातक अपने जीवन में पहली बार एकादशी व्रत का संकल्प लेना चाहता है तो शास्त्रों के अनुसार उसे इसी एकादशी से अपने व्रत का शुभारंभ करना चाहिए। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु और उनके शरीर से प्रकट हुई एकादशी देवी का विधिपूर्वक पूजन करने से जन्म जन्मांतर के पापों का क्षय होता है। इस व्रत की शास्त्रीय तिथियों, मुहूर्त और आवश्यक नियमों का विवरण इस प्रकार है।
| व्रत एवं साधना अंग | वैदिक नियम और शास्त्रोक्त निर्देश |
|---|---|
| पावन तिथि व मास | मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि |
| अधिष्ठाता परम देव | भगवान श्रीहरि विष्णु और साक्षात एकादशी देवी |
| व्रत का संकल्प काल | दशमी की संध्या से द्वादशी के प्रातः काल तक |
| पारण का पावन समय | द्वादशी तिथि के सूर्योदय के उपरांत और हरिवासर समाप्ति पर |
| पूजन सामग्री | तुलसी दल, पीला चंदन, पंचामृत, मौसमी फल, तिल और शुद्ध गोघृत |
| आध्यात्मिक एवं दैहिक फल | करोड़ों जन्मों के पापों का नाश, अश्वमेध यज्ञ तुल्य पुण्य और मोक्ष |
उत्पन्ना एकादशी के व्रत का नियम दशमी तिथि की संध्या से ही आरंभ हो जाता है। दशमी के दिन सूर्यास्त के पश्चात सात्विक और हल्का भोजन ग्रहण करना चाहिए तथा ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करना चाहिए।
इस संपूर्ण अनुष्ठान का श्रद्धापूर्वक पालन करने से साधक की चेतना समस्त मलों से मुक्त हो जाती है। यह व्रत केवल शारीरिक उपवास नहीं है बल्कि यह मन और आत्मा को शुद्ध कर ईश्वरीय प्रकाश में लीन करने का सर्वोत्तम वैदिक मार्ग है।
सत्ययुग के आरंभिक काल में तालजंघ नामक एक अत्यंत बलशाली दैत्य का पुत्र मुर उत्पन्न हुआ था। मुर ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या करके यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि कोई भी देवता, दानव, गंधर्व अथवा अस्त्र शस्त्र उसे युद्ध में पराजित न कर सके। इस अजेय वरदान के अहंकार में चूर होकर मुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचाना आरंभ कर दिया। उसने अमरावती पर आक्रमण कर देवराज इंद्र, अग्नि, यम, वरुण और वायु देव को उनके पदों से च्युत कर दिया।
स्वर्ग से निष्कासित होकर समस्त देवता भयभीत होकर पृथ्वी के जंगलों और कंदराओं में भटकने लगे। मुर दैत्य ने स्वयं को तीनों लोकों का एकमात्र अधिपति घोषित कर दिया और देवों के यज्ञ भाग को स्वयं ग्रहण करने लगा। अपनी दुर्दशा से अत्यंत व्यथित होकर देवराज इंद्र के नेतृत्व में समस्त देवता कैलाश पर्वत पर भगवान देवाधिदेव महादेव की शरण में पहुंचे।
इंद्र ने हाथ जोड़कर महादेव से प्रार्थना की कि हे त्रिलोकीनाथ, मुर नामक दैत्य ने हमारे संपूर्ण ऐश्वर्य और स्वर्ग को छीन लिया है। उसने धर्म की मर्यादा को नष्ट कर दिया है और समस्त देवगण भयभीत होकर मृत्यु लोक में भटक रहे हैं। कृपा कर इस महाबली असुर से हमारी रक्षा का कोई मार्ग प्रशस्त करें।
भगवान आशुतोष शिव ने देवताओं की करुण पुकार सुनकर अत्यंत शांत स्वर में कहा कि हे देवराज, उस महाबली असुर का संहार करने में केवल संपूर्ण जगत के पालनकर्ता भगवान श्रीहरि विष्णु ही समर्थ हैं। वे क्षीरसागर में योगनिद्रा में स्थित हैं। तुम सब मिलकर क्षीरसागर जाओ और उन जगदाधार प्रभु की स्तुति करो। शिवजी के वचनों को शिरोधार्य कर समस्त देवता क्षीरसागर के तट पर पहुंचे और हाथ जोड़कर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे।
देवताओं की भावपूर्ण स्तुति सुनकर भगवान श्रीहरि विष्णु ने अपने कमल नयन खोले। भगवान ने जब देवताओं के कष्टों को सुना तो उन्होंने उन्हें अभयदान दिया और मुर दैत्य का वध करने का वचन दिया। भगवान विष्णु अपने गरुड़ पर आरूढ़ होकर युद्ध भूमि में पहुंचे। वहां मुर दैत्य और उसकी विशाल असुर सेना के साथ भगवान का अत्यंत भयंकर संग्राम छिड़ गया।
भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र और बाणों से करोड़ों असुरों का संहार कर दिया। किंतु जब मुर दैत्य के साथ उनका द्वंद्व आरंभ हुआ तो वह असुर अपने वरदान के प्रभाव से अस्त्रों के प्रहार को भी निष्फल करने लगा। भगवान विष्णु और मुर दैत्य के मध्य लगातार दस हजार वर्षों तक निरंतर युद्ध चलता रहा। मुर का शरीर पर्वत के समान कठोर था और वह थकने का नाम नहीं ले रहा था।
अंततः भगवान विष्णु ने एक अद्भुत लीला रचने का विचार किया। वे युद्ध भूमि से हटकर बदरिकाश्रम की ओर चले गए। बदरिकाश्रम के शांत वातावरण में 12 योजन लंबी एक विशाल और अत्यंत सुंदर गुफा थी जिसे हेमावती गुफा कहा जाता था। भगवान विष्णु उस गुफा के भीतर प्रविष्ट हुए और योगनिद्रा का आश्रय लेकर एक शिला पर विश्राम करने लगे।
भगवान के पीछे पीछे मुर दैत्य भी अहंकार में अंधा होकर उस गुफा में पहुंच गया। उसने देखा कि तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु निद्रा में मग्न हैं। दुष्ट असुर के मन में कायरतापूर्ण विचार आया। उसने सोचा कि यह नारायण युद्ध से भयभीत होकर यहां सो रहा है, अतः सोते हुए ही इसका वध कर देना चाहिए। जैसे ही उसने भगवान पर प्रहार करने के लिए अपनी विशाल तलवार उठाई, वैसे ही एक ऐसी अलौकिक घटना घटी जिसने संपूर्ण ब्रह्मांड को स्तंभित कर दिया।
जिस क्षण मुर दैत्य ने भगवान विष्णु पर अपनी तलवार का प्रहार करना चाहा, उसी क्षण भगवान के दिव्य और तेजोमय शरीर से एक परम रूपवती, तेजस्वी और शस्त्रों से सुसज्जित कन्या प्रकट हुई। उस देवी का तेज मध्याह्न के सूर्य के समान प्रदीप्त था। उनके दोनों नेत्रों से प्रलयंकारी अग्नि की ज्वालाएं निकल रही थीं। उनके हाथों में चक्र, गदा, धनुष, त्रिशूल और तलवार जैसे अमोघ अस्त्र सुशोभित थे।
उस नव प्रकट कन्या ने मुर दैत्य को ललकारा। क्रोध से भरकर मुर ने देवी पर भयानक अस्त्रों से प्रहार किया, किंतु देवी ने अपनी एक ही हुंकार से उस असुर के समस्त अस्त्रों को भस्म कर दिया। दोनों के मध्य कुछ क्षणों तक भीषण युद्ध हुआ। अंततः उस तेजस्विनी देवी ने अपनी तलवार से उस पापी असुर का सिर काटकर धड़ से अलग कर दिया। मुर के मरते ही उसकी बची हुई सेना भयभीत होकर पाताल में भाग गई।
उसी समय भगवान श्रीहरि विष्णु योगनिद्रा से जागे। उन्होंने देखा कि जिस असुर से वे सहस्त्रों वर्षों से लड़ रहे थे वह पृथ्वी पर मृत पड़ा है और उसके सम्मुख एक अत्यंत तेजोमय कन्या करबद्ध होकर खड़ी है।
भगवान श्रीहरि ने तथास्तु कहते हुए वरदान दिया कि जो मनुष्य उत्पन्ना एकादशी से इस व्रत का शुभारंभ करेगा उसे अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक पुण्य प्राप्त होगा और अंत समय में वह मेरे परम धाम वैकुंठ को प्राप्त करेगा।
सनातन परंपरा में वर्ष भर में कुल 24 एकादशियां आती हैं और मलमास के वर्ष में इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। इन समस्त एकादशियों में मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की उत्पन्ना एकादशी को सभी एकादशियों की जननी अथवा आदि एकादशी माना गया है। यदि कोई साधक अपने जीवन में कभी भी एकादशी का व्रत आरंभ करना चाहता है तो उसके लिए उत्पन्ना एकादशी से उत्तम कोई दूसरा दिन नहीं हो सकता।
| तुलनात्मक पक्ष | सामान्य एकादशी व्रत | उत्पन्ना एकादशी का विशिष्ट महत्व |
|---|---|---|
| व्रत की प्रकृति | नियमित मासिक व्रत और फल प्राप्ति | एकादशी तिथि का प्राकट्य दिवस और व्रत का उद्गम |
| पाप मुक्ति का फल | वर्तमान जीवन के संचित पापों का शमन | करोड़ों जन्मों के घोर पापों का तत्काल भस्म होना |
| आध्यात्मिक शक्ति | मानसिक शांति और भक्ति की प्राप्ति | एकादशी देवी की साक्षात कृपा और व्रत की सिद्धि |
| व्रत का शुभारंभ | किसी भी मास से संकल्प लेना | शास्त्रों द्वारा व्रत आरंभ के लिए अधिकृत सर्वोत्तम तिथि |
उत्पन्ना एकादशी से व्रत प्रारंभ करने का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि इस दिन व्रत रखने से जीवात्मा को सीधे एकादशी देवी का मातृवत संरक्षण प्राप्त होता है। जिस प्रकार बीज बोए बिना वृक्ष की कल्पना नहीं की जा सकती उसी प्रकार उत्पन्ना एकादशी का संकल्प लिए बिना पूरे वर्ष की अन्य एकादशियों का पूर्ण आध्यात्मिक फल प्राप्त नहीं होता।
यह व्रत मनुष्य को यह सिखाता है कि आत्म संयम ही संसार की सबसे बड़ी शक्ति है। जब मनुष्य अपनी इंद्रियों को वश में करता है तब उसके भीतर से ही ईश्वरीय शक्ति प्रकट होकर उसके समस्त संकटों का निवारण कर देती है।
वैदिक ज्योतिष और योग दर्शन में एकादशी का संबंध मानव शरीर की 11 इंद्रियों और नवग्रहों के सूक्ष्म संतुलन से माना गया है। मनुष्य के शरीर में 5 ज्ञानेंद्रियां, 5 कर्मेंद्रियां और 11वां स्वयं मन होता है। जब तक यह मन इन दसों इंद्रियों का दास बना रहता है तब तक वह संसार के विषयों में भटकता रहता है। एकादशी तिथि पर उपवास करने का मूल अर्थ है कि इन 11 तत्वों को संसार से समेटकर केवल परमात्मा में एकाग्र कर देना।
| ज्योतिषीय तत्व | एकादशी साधना का संबंध | मानव चेतना पर पड़ने वाला प्रभाव |
|---|---|---|
| चंद्र देव | मन और जल तत्व के अधिपति ग्रह | चंद्रमा की आकर्षण शक्ति का शमन और चित्त की शांति |
| देवगुरु बृहस्पति | धर्म, ज्ञान और सात्विक बुद्धि के कारक | विवेक की जागृति और आध्यात्मिक ज्ञान का विस्तार |
| बुध ग्रह | तार्किक बुद्धि और वाणी के स्वामी | एकादशी उपवास से बुद्धि की शुद्धि और वाणी पर नियंत्रण |
| एकादशी तिथि | 11 इंद्रियों का दमन और योग साधना | काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार का पूर्ण विनाश |
चंद्रमा की गति के कारण एकादशी तिथि के दिन पृथ्वी के जल तत्व और मानव मस्तिष्क के रसायनों में विशेष हलचल होती है। इस दिन अन्न का सेवन करने से शरीर में जल की मात्रा बढ़ती है जिससे मन चंचल और भोगों की ओर आकृष्ट होता है। उपवास रखने से शरीर में हल्कापन रहता है और प्राण ऊर्जा उर्ध्वगामी होकर आज्ञा चक्र की ओर प्रवाहित होने लगती है।
ज्योतिष शास्त्र यह सिद्ध करता है कि एकादशी का व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है बल्कि यह खगोलीय गुरुत्वाकर्षण के दुष्प्रभावों से शरीर और मन की रक्षा करने का एक अद्वितीय विज्ञान है।
भगवान श्रीहरि विष्णु के शरीर से प्रकट हुई एकादशी देवी वास्तव में भक्ति और समर्पण की साक्षात मूर्ति हैं। मुर दैत्य का वध कोई साधारण घटना नहीं थी बल्कि वह इस बात का शाश्वत प्रमाण है कि जब भी धर्म पर संकट आता है तब परमात्मा की अपनी शक्ति ही रक्षा हेतु अवतरित होती है।
उत्पन्ना एकादशी का यह पावन पर्व हमें अपने भीतर झांकने और अपने अवगुणों का संहार करने की प्रेरणा देता है। हमारे भीतर का अहंकार, ईर्ष्या और प्रमाद ही वह मुर दैत्य है जो हमारी आध्यात्मिक प्रगति को रोक रहा है। जब हम श्रद्धा और निष्ठा के साथ इस व्रत को धारण करते हैं तब हमारे भीतर भी एकादशी रूपी सात्विक शक्ति का प्राकट्य होता है जो समस्त बुराइयों को भस्म कर देती है।
इस पावन अवसर पर अपने मन, वाणी और कर्म को शुद्ध रखकर भगवान विष्णु के चरणों में समर्पित हो जाना ही सच्ची साधना है। जो जीवात्मा इस मार्ग पर अग्रसर होती है वह इस लोक में समस्त सुख और ऐश्वर्य भोगकर अंत में उस परम पद को प्राप्त करती है जहां जाने के बाद कभी लौटना नहीं पड़ता।
उत्पन्ना एकादशी किस महीने और किस पक्ष में आती है? उत्पन्ना एकादशी प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को पूरी श्रद्धा के साथ मनाई जाती है।
एकादशी देवी का प्राकट्य किससे हुआ था? एकादशी देवी का प्राकट्य भगवान श्रीहरि विष्णु के दिव्य शरीर के तेज और योगशक्ति से हुआ था।
उत्पन्ना एकादशी पर किस दैत्य का वध हुआ था? इस पावन तिथि पर एकादशी देवी ने तीनों लोकों को सताने वाले महाबली मुर नामक असुर का संहार किया था।
पहली बार एकादशी व्रत किस दिन से शुरू करना चाहिए? यदि कोई जातक पहली बार एकादशी व्रत का संकल्प लेना चाहता है तो उसे मार्गशीर्ष मास की उत्पन्ना एकादशी से ही आरंभ करना चाहिए।
उत्पन्ना एकादशी के व्रत में किन चीजों का सेवन वर्जित है? इस व्रत में चावल, अन्न, दालें, प्याज, लहसुन, मांसाहार और किसी भी प्रकार के तामसिक भोजन का सेवन पूर्णतः वर्जित माना गया है।
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