क्या है विवाह पंचमी का पावन रहस्य?

By अपर्णा पाटनी

श्रीराम जानकी विवाह उत्सव पिनाक भंजन और दांपत्य सुख के उपाय

विवाह पंचमी कथा मुहूर्त पूजा विधि और दांपत्य उपाय

वैवाहिक विघ्न निवारण और विवाह पंचमी मुहूर्त विधान

सनातन वैदिक परंपरा में मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को विवाह पंचमी के पावन पर्व के रूप में मनाया जाता है। त्रेतायुग में इसी पुण्यमयी तिथि पर मिथिला की पावन धरा पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और जनकनंदिनी माता सीता का अलौकिक विवाह संपन्न हुआ था। शास्त्रों में इस तिथि को दांपत्य जीवन के समस्त दोषों के शमन, मनोनुकूल जीवनसाथी की प्राप्ति और वैवाहिक जीवन में आ रही समस्त अड़चनों को दूर करने के लिए कल्पवृक्ष के समान फलदायी माना गया है। जिन जातकों के विवाह में निरंतर विलंब हो रहा हो अथवा दांपत्य जीवन में कलह और अशांति बनी रहती हो, उनके लिए इस दिन किया गया अनुष्ठान संजीवनी के समान कार्य करता है।

साधना अंगवैदिक विधान और शास्त्रोक्त निर्देश
पावन तिथि व पक्षमार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि
अधिष्ठाता देव युगलमर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और माता जानकी
पूजन का श्रेष्ठ समयप्रातः सूर्योदय काल अथवा मध्याह्न अभिजीत मुहूर्त
सिद्ध युगल मंत्रॐ जानकीवल्लभाय नमः अथवा ॐ रां रामाय नमः
पावन पूजन सामग्रीपीला रेशमी वस्त्र, अक्षत, पीला चंदन, दूर्वा, मौली, सिंदूर, इत्र और सुगंधित पुष्पमाला
आध्यात्मिक और दांपत्य फलअखंड सौभाग्य की प्राप्ति, शीघ्र विवाह, दांपत्य प्रेम और पारिवारिक शांति

विवाह पंचमी के पावन दिन साधक को प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि नित्यकर्म संपन्न करने चाहिए। इसके उपरांत स्वच्छ पीले अथवा श्वेत वस्त्र धारण कर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें और वेदी का निर्माण करें।

  • लकड़ी की स्वच्छ चौकी पर पीला रेशमी वस्त्र बिछाकर भगवान श्रीराम और माता सीता की युगल प्रतिमा स्थापित करें
  • तांबे अथवा चांदी के पात्र में शुद्ध जल, गंगाजल, अक्षत और पीला चंदन मिलाकर भगवान को आचमन कराएं
  • भगवान श्रीराम को पीतांबर और माता सीता को लाल चुनरी तथा संपूर्ण सुहाग सामग्री श्रद्धापूर्वक अर्पित करें
  • पूजा वेदी के सम्मुख शुद्ध गोघृत का दीपक और सुगंधित धूप प्रज्वलित करें
  • दोनों विग्रहों को परस्पर सुगंधित पुष्पमालाएं पहनाकर दिव्य जयमाला का उत्सव भाव से स्मरण करें
  • तुलसी अथवा कमलगट्टे की माला से सिद्ध युगल मंत्र का 108 बार शांत चित्त से जप करें
  • जप के उपरांत गोस्वामी तुलसीदास कृत श्री रामचरितमानस के बालकांड अंतर्गत सीता स्वयंवर और विवाह प्रसंग का पाठ करें
  • भोग के रूप में शुद्ध दूध से बनी खीर अथवा पीले मिष्ठान्न भगवान को अर्पित करें और आरती संपन्न करें
  • पूजा के पश्चात पीले फल, वस्त्र, चने की दाल और गुड़ किसी सुपात्र ब्राह्मण अथवा निर्धन कन्या को दान करें
  • इस पावन दिन घर में कलह, असत्य भाषण, तामसिक भोजन, मदिरा और कटु वचनों का पूर्ण परित्याग करें

इस शास्त्रसम्मत अनुष्ठान का श्रद्धापूर्वक पालन करने से साधक के घर में सात्विक ऊर्जा का संचार होता है। विवाह योग्य जातकों के मार्ग में आने वाले समस्त ग्रह जनित अवरोध समाप्त हो जाते हैं और दांपत्य जीवन में अपार स्नेह और माधुर्य की प्रतिष्ठा होती है।

मिथिला का स्वयंवर और शिव के पिनाक धनुष का भंजन

त्रेतायुग में मिथिला के विदेह नरेश परम ज्ञानी राजा जनक के राज्य में अनावृष्टि के कारण भयंकर अकाल पड़ा था। ऋषियों के परामर्श पर जब राजा जनक ने स्वर्ण का हल चलाकर यज्ञ भूमि जोती, तब भूमि के भीतर से एक कलश में माता जानकी प्रकट हुईं। जनक की पुत्री होने के कारण वे जानकी और हल के अग्रभाग अर्थात सीत से प्रकट होने के कारण सीता कहलाईं।

बाल्यावस्था में माता सीता ने क्रीड़ा करते हुए भगवान शिव के उस दिव्य धनुष को एक हाथ से उठा लिया था, जिसे बड़े बड़े बलशाली योद्धा हिला भी नहीं पाते थे। उस धनुष का नाम पिनाक था, जो भगवान शिव ने प्राचीन काल में राजा जनक के पूर्वजों को धरोहर के रूप में सौंपा था। अपनी पुत्री के इस अलौकिक सामर्थ्य को देखकर राजा जनक ने प्रतिज्ञा की कि जो भी शूरवीर शिवजी के इस प्रचंड धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, उसी के साथ जानकी का विवाह संपन्न होगा।

जब माता सीता विवाह योग्य हुईं, तब राजा जनक ने एक भव्य स्वयंवर का आयोजन किया। उस स्वयंवर में संपूर्ण भूमंडल से पराक्रमी राजा, राजकुमार और महाबली योद्धा पधारे। लंकापति रावण और बाणासुर जैसे योद्धा भी उस धनुष के भार को देखकर विचलित हो गए। कोई भी वीर उस धनुष को अपने स्थान से तिल भर भी नहीं हिला सका। इस दृश्य को देखकर राजा जनक अत्यंत व्याकुल हो उठे और उन्होंने निराशा में भरकर कहा कि क्या यह पृथ्वी वीरों से शून्य हो चुकी है।

राजा जनक के इन वचनों को सुनकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण का क्षत्रिय तेज जाग्रत हो गया। तभी उनके गुरु महर्षि विश्वामित्र ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की ओर देखा और उन्हें आज्ञा दी कि उठो वत्स और जनक के संताप को दूर करो।

  • गुरु विश्वामित्र के चरणों का स्पर्श कर भगवान श्रीराम अत्यंत शांत और सौम्य भाव से मंच की ओर बढ़े
  • भगवान श्रीराम के स्वरूप में कोई दंभ अथवा अहंकार नहीं था, केवल गुरु आज्ञा और मर्यादा का भाव था
  • भगवान ने कमल के समान कोमल हाथों से शिवजी के उस भारी धनुष को अत्यंत सहजता से उठा लिया
  • जैसे ही प्रभु ने उस पर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया, वह दिव्य धनुष मध्य से टूटकर दो टुकड़ों में विभक्त हो गया
  • धनुष के टूटते ही संपूर्ण ब्रह्मांड में एक ऐसी प्रलयंकारी ध्वनि गूंज उठी जिसने आकाश और पाताल को हिला दिया

उस भयंकर नाद के शांत होने पर समस्त दिशाओं में आनंद की लहर दौड़ गई। आकाश से देवताओं ने पुष्प वर्षा की। सखियों के मध्य माता सीता ने आगे बढ़कर भगवान श्रीराम के गले में विजय और वरण की पावन जयमाला डाल दी। मिथिला का कण कण इस दिव्य मिलन का साक्षी बनकर धन्य हो गया।

जनकपुर से अयोध्या तक पावन वैवाहिक उत्सव परंपरा

भगवान श्रीराम द्वारा धनुष तोड़े जाने के पश्चात राजा जनक ने अयोध्या नरेश महाराज दशरथ को ससम्मान निमंत्रण पत्र भेजा। महाराज दशरथ अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ, भरत, शत्रुघ्न और विशाल चतुरंगिणी सेना के साथ बारात लेकर जनकपुर पहुंचे। मिथिला और अवध का यह संगम दो कुलों का नहीं अपितु भक्ति और ज्ञान का परम मिलन था।

मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी के पावन दिन जनकपुर में विवाह का भव्य मंडप सजाया गया। महर्षि वशिष्ठ और शतानंद जी के मार्गदर्शन में वैदिक ऋचाओं के सस्वर गान के मध्य भगवान श्रीराम और माता सीता का वैवाहिक संस्कार संपन्न हुआ। केवल श्रीराम और सीता ही नहीं, बल्कि उसी मंडप में राजा जनक के अनुज कुशध्वज की पुत्रियों के साथ अन्य तीनों भाइयों का विवाह भी संपन्न हुआ।

  • भगवान श्रीराम का विवाह जनकपुत्री माता सीता के साथ हुआ
  • आयुष्मान लक्ष्मण का विवाह जनक की दूसरी पुत्री देवी उर्मिला के साथ संपन्न हुआ
  • भरत जी का विवाह कुशध्वज की ज्येष्ठ पुत्री देवी मांडवी के साथ हुआ
  • शत्रुघ्न जी का विवाह कुशध्वज की कनिष्ठ पुत्री देवी श्रुतकीर्ति के साथ हुआ

चारों राजकुमारों और चारों राजकुमारियों का यह सामूहिक विवाह संपूर्ण आर्यावर्त के लिए धर्म और मर्यादा की नई स्थापना थी। आज भी नेपाल स्थित जनकपुर धाम में इस पावन तिथि पर प्रतिवर्ष विशाल वैवाहिक उत्सव मनाया जाता है। भारत के कोने कोने से लाखों श्रद्धालु इस दिन जनकपुर पहुंचकर राम सीता विवाह के साक्षी बनते हैं और अपने जीवन को कृतार्थ करते हैं।

जनमानस में वैवाहिक संशय और इसका दार्शनिक यथार्थ क्या है?

उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में एक लोक मान्यता प्रचलित है जिसके अनुसार विवाह पंचमी के दिन मनुष्य अपने पुत्र अथवा पुत्री का भौतिक विवाह करने से संकोच करते हैं। इस संशय के पीछे यह लोक तर्क दिया जाता है कि विवाह के कुछ समय पश्चात ही माता सीता को 14 वर्षों का वनवास भोगना पड़ा और बाद में उन्हें अग्नि परीक्षा तथा परित्याग जैसी असह्य वेदना से गुजरना पड़ा। जनमानस यह भय पालता है कि इस दिन विवाह करने से वैवाहिक जीवन में वियोग अथवा कष्ट आ सकता है।

किंतु वैदिक ज्योतिष और आध्यात्मिक तत्व दर्शन की दृष्टि से यह धारणा पूर्णतः भ्रामक और सतही है। माता सीता और भगवान श्रीराम का अवतार सांसारिक भोग विलास के लिए नहीं हुआ था। उनका प्राकट्य पृथ्वी से अधर्म और आसुरी शक्तियों के नाश तथा मानव जाति के समक्ष त्याग, कर्तव्य और मर्यादा का आदर्श स्थापित करने के लिए हुआ था।

उनका दांपत्य जीवन सांसारिक सुख दुख से परे एक दिव्य साधना था। माता सीता ने वनवास के संकट को स्वेच्छा से प्रभु श्रीराम के संग रहकर अपने पातिव्रत धर्म का आभूषण बनाया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि वास्तविक प्रेम महलों के वैभव पर नहीं अपितु आत्मा के समर्पण पर आधारित होता है।

विवाह पंचमी का दिन श्रीराम और सीता के साक्षात प्राकट्य और उनके एकीकरण का दिन है। जिस प्रकार भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह समस्त जगत का कल्याण करने वाला है, उसी प्रकार सीताराम का वैवाहिक संबंध संपूर्ण सृष्टि को धर्म का संबल प्रदान करता है। इसलिए इस दिन भगवान श्रीराम और जानकी की युगल पूजा करने से वैवाहिक जीवन के समस्त दोष, अलगाव के योग और क्लेश सदा के लिए शांत हो जाते हैं। यह दिन सांसारिक विवाह के लिए भले ही लोक परंपरा में टाला जाए, किंतु वैवाहिक रक्षा और दांपत्य शुद्धि के लिए यह वर्ष का सबसे शक्तिशाली दिन माना गया है।

ज्योतिष में सप्तम भाव और शीघ्र विवाह के अचूक उपाय

वैदिक ज्योतिष में जन्म कुंडली का सप्तम भाव वैवाहिक सुख, जीवनसाथी के स्वरूप, दांपत्य सामंजस्य और साझेदारी का प्रतिनिधि भाव माना गया है। पुरुषों की कुंडली में विवाह के नैसर्गिक कारक ग्रह दैत्यगुरु शुक्र हैं, जबकि स्त्रियों की कुंडली में पति और वैवाहिक सुख के कारक देवगुरु बृहस्पति हैं। इसके अतिरिक्त यदि कुंडली के लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में मंगल स्थित हो तो मांगलिक दोष का निर्माण होता है जो विवाह में विलंब और कलह का कारण बनता है।

विवाह पंचमी का पावन दिन इन सभी ग्रह दोषों के निवारण के लिए एक अचूक ज्योतिषीय अवसर है। इस दिन ग्रहों की स्थिति अत्यंत सात्विक और अनुकूल होती है जो जातक के भीतर वैवाहिक ऊर्जा को जाग्रत करती है।

ग्रह स्थिति एवं दोषवैवाहिक जीवन पर पड़ने वाला प्रभावविवाह पंचमी पर शास्त्रोक्त अचूक उपाय
सप्तम भाव में शनि या राहुविवाह में अकारण विलंब और बारंबार रिश्ते टूटनाराम जानकी को पीले वस्त्र और हल्दी की 7 गांठें अर्पित करें
गुरु ग्रह की निर्बलताकन्या के विवाह में बाधा और सुयोग्य वर का अभावचने की दाल और पीले मिष्ठान्न का दान करें तथा विष्णु सहस्रनाम पढ़ें
शुक्र ग्रह का पीड़ित होनादांपत्य जीवन में आकर्षण की कमी और मानसिक दूरीमाता सीता को इत्र, सुगंधित श्वेत पुष्प और चांदी का आभूषण चढ़ाएं
तीव्र मांगलिक दोषवैवाहिक कलह, उग्र वाणी और रक्त विकार जनित तनावभगवान श्रीराम को तुलसी पत्र अर्पित कर सुंदरकांड का पाठ करें
सूर्य केतु का पृथकतावादी योगसंबंधों में अविश्वास, वैचारिक मतभेद और विच्छेद भयजानकी स्तोत्र और राम रक्षा स्तोत्र का 11 बार पाठ संपन्न करें

जिन युवक युवतियों के विवाह में बाधाएं आ रही हों, उन्हें विवाह पंचमी के दिन एक विशेष उपाय अवश्य करना चाहिए। इस दिन एक स्वच्छ ताम्र पात्र में शुद्ध जल, थोड़ी हल्दी और केसर मिलाकर भगवान श्रीराम और जानकी का अभिषेक करें। इसके उपरांत माता जानकी के चरणों से सिंदूर लेकर अपने मस्तक पर लगाएं।

इस दिन रामचरितमानस के बालकांड में वर्णित विवाह प्रसंग का पाठ करने से मनवांछित जीवनसाथी की प्राप्ति होती है। यह अनुष्ठान कुंडली के सप्तमेश को बलवान बनाकर वैवाहिक मार्ग के समस्त अवरोधों को दूर कर देता है।

प्रकृति और पुरुष के मिलन का सनातन आलोक

विवाह पंचमी केवल दो ऐतिहासिक पात्रों के परिणय सूत्र में बंधने का दिन नहीं है, बल्कि यह साक्षात पराप्रकृति और परमपुरुष के शाश्वत एकीकरण का उत्सव है। सांख्य दर्शन और वेदांत में प्रकृति को संपूर्ण सृजन की माता और पुरुष को उसका साक्षी चेतना तत्व माना गया है। जब सीताराम का विवाह होता है, तब सृष्टि में ज्ञान और क्रिया का, शक्ति और शिव का, मर्यादा और प्रेम का दिव्य संतुलन स्थापित होता है।

भगवान श्रीराम का चरित्र हमें सिखाता है कि एक आदर्श पति का धर्म क्या है। उन्होंने एकपत्नीव्रत का ऐसा कठोर नियम निभाया कि राजसूय यज्ञ के समय माता सीता की अनुपस्थिति में उनकी स्वर्ण प्रतिमा बनाकर अपने वाम भाग में स्थापित किया, किंतु दूसरा विवाह नहीं किया। वहीं माता जानकी का चरित्र नारी शक्ति के उस अदम्य धैर्य और पवित्रता का प्रतीक है जो घोर संकट में भी अपने धर्म से विचलित नहीं होती।

आज के भौतिकवादी युग में जहां वैवाहिक संबंध अत्यंत क्षणभंगुर और स्वार्थ पर आधारित होते जा रहे हैं, वहां श्रीराम और सीता का वैवाहिक आदर्श संपूर्ण मानव समाज के लिए प्रकाश स्तंभ है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि वैवाहिक सुख बाह्य परिस्थितियों की अनुकूलता में नहीं, बल्कि परस्पर विश्वास, सम्मान और त्याग की भावना में निहित है। विवाह पंचमी के इस पावन पर्व पर हमें अपने भीतर के अहंकार को विसर्जित कर सीताराम के युगल स्वरूप का वंदन करना चाहिए, जिससे हमारे जीवन में प्रेम, धर्म और आध्यात्मिक शांति का शाश्वत सवेरा हो सके।

FAQ

विवाह पंचमी का पर्व किस दिन और किस महीने में मनाया जाता है? विवाह पंचमी का पावन पर्व प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को पूरे भारत और नेपाल में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।

भगवान श्रीराम ने सीता स्वयंवर में शिवजी के किस धनुष को तोड़ा था? भगवान श्रीराम ने सीता स्वयंवर के दौरान भगवान शिव के अत्यंत भारी और दिव्य पिनाक नामक धनुष को उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाते समय तोड़ा था।

विवाह पंचमी पर लोग अपने बच्चों का विवाह करने से क्यों संकोच करते हैं? लोक मान्यता के अनुसार विवाह के बाद माता सीता को वनवास और वियोग के कठिन कष्ट झेलने पड़े थे, इसलिए कुछ क्षेत्रों में इस दिन भौतिक विवाह करने से बचा जाता है।

शीघ्र विवाह के लिए विवाह पंचमी पर कौन सा उपाय करना चाहिए? विवाह पंचमी के दिन भगवान श्रीराम और माता सीता को पीले वस्त्र, हल्दी की गांठें अर्पित कर बालकांड के विवाह प्रसंग का पाठ करना अत्यंत फलदायी होता है।

विवाह पंचमी का मुख्य ऐतिहासिक उत्सव कहां आयोजित होता है? विवाह पंचमी का सबसे भव्य और ऐतिहासिक उत्सव नेपाल स्थित माता सीता के मायके जनकपुर धाम और अयोध्या में विशाल स्तर पर आयोजित किया जाता है।

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लेखक

अपर्णा पाटनी

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