अखुरथ संकष्टी चतुर्थी पर संकट नाश कैसे करें?

By पं. नरेंद्र शर्मा

अखुरथ स्वरूप का रहस्य, 21 दूर्वा अर्पण के नियम और चंद्र अर्घ्य विधान

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी व्रत विधि: संकट निवारण और दूर्वा के नियम

सनातन वैदिक पंचांग और काल गणना के अत्यंत गूढ़, गंभीर तथा सिद्ध तांत्रिक नियमों के अनुसार पौष मास के कृष्ण पक्ष की पावन चतुर्थी तिथि को 'अखुरथ संकष्टी चतुर्थी' के नाम से संबोधित किया जाता है। देववाणी संस्कृत के प्राचीन व्युत्पत्ति शास्त्र के अनुसार 'अखु' शब्द का अर्थ मूषक अर्थात चूहा होता है और 'रथ' का तात्पर्य उस दिव्य वाहन से है जिस पर आरूढ़ होकर कोई महाचेतना संपूर्ण ब्रह्मांड में संचरण करती है। इस प्रकार 'अखुरथ' का सीधा तात्विक अर्थ मूषक की सवारी करने वाले, संपूर्ण विघ्नों के संहारक और बुद्धि के परम प्रदाता भगवान श्री गणेश हैं। सनातन धर्म में प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष में संकष्टी चतुर्थी का व्रत आता है, परंतु पौष मास के इस विशिष्ट शीतकालीन संधिकाल में जब भुवन भास्कर सूर्य देव दक्षिणायन के अंतिम चरण में संचरण कर रहे होते हैं और प्रकृति में वायु तत्व, तमोगुण तथा भीषण ठंडक का चरम प्रकोप होता है तब भगवान अखुरथ का यह अनुष्ठान साधक की सुप्त मेधा, शिथिल स्नायु तंत्र और अवरुद्ध भाग्य को पुनः जाग्रत करने वाली अचूक दिव्य औषधि सिद्ध होता है।

इस पावन तिथि पर व्रत रखने वाले श्रद्धालु प्रातः काल अरुणोदय से लेकर रात्रि में चंद्रोदय होने तक पूर्ण निष्ठा, शारीरिक पवित्रता और मानसिक संयम के साथ उपवास का पालन करते हैं। पौष मास की घनी, शीतल और कोहरे से आच्छादित रात्रि में जब आकाश मंडल में चंद्र देव का प्राकट्य होता है तब तांबे अथवा चांदी के पात्र में शुद्ध जल, कच्चा गाय का दूध, रोली, अक्षत, हरी दूर्वा और काले तिल मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य समर्पित किया जाता है। इसके पश्चात ही भगवान श्री गणेश को शुद्ध देशी घी में भुने हुए काले तिल और पुराने गन्ने के गुड़ से बने मोदकों का भोग लगाकर व्रत का विधिवत पारण किया जाता है। शीत ऋतु के इन दिनों में जब मनुष्य के शरीर में स्वाभाविक रूप से कफ जनित जड़ता, रक्त संचार की मंदता और मानसिक सुस्ती बढ़ने लगती है तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में अचानक अकारण वित्तीय रुकावटें आने लगती हैं, उस समय अखुरथ स्वरूप का यह अनुष्ठान बुद्धि को असाधारण तीक्ष्णता प्रदान करता है और जन्म जन्मांतर के संचित संकटों को पल भर में भस्म कर देता है। इस पावन व्रत के समस्त अनिवार्य अंग, शास्त्रीय पूजन सामग्री, तिथि नियम और खगोलीय आधार का विस्तृत विवरण नीचे दी गई तालिका में सुव्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया गया है।

व्रत एवं साधना घटकशास्त्रीय नियम और आवश्यक पूजन सामग्रीज्योतिषीय और तांत्रिक महत्व
प्रमुख तिथि एवं पक्षपौष मास कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथिभगवान गणेश के अखुरथ स्वरूप का प्राकट्य काल
प्रधान अधिष्ठात्री सत्तामूषक वाहिनी बुद्धि प्रदाता भगवान श्री गणेशबुध और केतु के क्रूर दोषों का शमन करने वाली शक्ति
साधना की मुख्य दिशाउत्तर दिशा अथवा ईशान कोण (उत्तर पूर्व)कुबेर और देवगुरु बृहस्पति के शुभ प्रभावों का संगम
प्रमुख नैवेद्य द्रव्यकाले तिल व गुड़ के लड्डू, मोदक और पंचामृतजठराग्नि को बल, सूर्य तत्व की तृप्ति और शनि शांति
प्रधान अर्पण सामग्रीइक्कीस हरी दूर्वा की गांठें और लाल सिंदूरसहस्त्रार चक्र का शोधन और बौद्धिक प्रखरता
मुख्य रक्षा मंत्रॐ गं गणपतये नमः अथवा ॐ एकदंताय विद्महेसमस्त विघ्नों, अदालती संकटों और भय का समूल नाश
व्रत पारण विधानरात्रि में चंद्र दर्शन और अर्घ्य के पश्चातचंद्र दोष की शांति, मानसिक शीतलता और तृप्ति

अखुरथ स्वरूप और मूषक वाहन का दार्शनिक रहस्य क्या है?

भगवान श्री गणेश का प्रत्येक अंग, उनका प्रत्येक आयुध और उनका वाहन इस ब्रह्मांड के किसी न किसी गूढ़ दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक सत्य का साकार विग्रह है। एक साधारण सांसारिक दृष्टि से देखने पर यह अत्यंत विस्मयकारी और विरोधाभासी प्रतीत होता है कि विशालकाय गजानन शरीर वाले, ब्रह्मांड के प्रथम पूज्य परमात्मा एक अत्यंत क्षुद्र, दुर्बल और नन्हे से जीव मूषक को अपना स्थायी वाहन कैसे बना सकते हैं। प्राचीन मुद्रण ग्रंथों, गणेश पुराण और मुद्गल पुराण के अनुसार मूषक वास्तव में मनुष्य के अंतःकरण में छिपे हुए चंचल मन, अनियंत्रित वासनाओं, स्वार्थी वृत्तियों, अज्ञान और तर्कहीन कुतर्कों का प्रत्यक्ष प्रतीक माना गया है। चूहे का यह स्वाभाविक अवगुण होता है कि वह अंधकार में छिपकर रहता है, दूसरों के संचित अन्न को चुराता है और बिना किसी व्यावहारिक आवश्यकता के अत्यंत मूल्यवान वस्त्रों व वस्तुओं को भी अपने तीखे दांतों से कुतर कर नष्ट कर देता है। ठीक इसी प्रकार अज्ञानी मनुष्य का असंयमित मन भी निरंतर नकारात्मक विचारों, ईर्ष्या, चिंताओं और शंकाओं के अंधकार में रहकर जीवन की सुख शांति और आध्यात्मिक संपदा को भीतर ही भीतर कुतरता रहता है।

जब भगवान गणेश उस चंचल मूषक पर अंकुश लगाकर उसके ऊपर पूरे अधिकार और संतुलन के साथ विराजमान होते हैं, तो वे संपूर्ण संसार को यह अमर आध्यात्मिक संदेश देते हैं कि जब तक मनुष्य अपनी चंचल इंद्रियों, अनियंत्रित लालसाओं, भौतिक आकर्षणों और विनाशकारी कुतर्कों पर अपने विवेक, प्रज्ञा और दिव्य ज्ञान की लगाम नहीं कसेगा तब तक वह जीवन के आध्यात्मिक रथ को सन्मार्ग पर नहीं चला सकता। अखुरथ गणेश की यह दिव्य छवि यह सिद्ध करती है कि विशालकाय बुद्धि, धैर्य और आत्मसंयम के सम्मुख संसार की सबसे चंचल और कुतरने वाली नकारात्मक वृत्तियां भी स्वतः नतमस्तक हो जाती हैं। पौष मास की घनी ठंड में जब मनुष्य का चित्त बाह्य वातावरण के प्रभाव से सुस्त और एकाग्रता विहीन होने लगता है, उस समय अखुरथ स्वरूप का ध्यान साधक की चेतना को अंतर्मुखी करके एक बिंदु पर स्थिर कर देता है जिससे उसकी कार्यकुशलता, स्मरण शक्ति और निर्णय क्षमता में अभूतपूर्व निखार आ जाता है।

पौष मास की ठंड में गणेश उपासना से बुद्धि कैसे सक्रिय होती है?

वैदिक ज्योतिष और प्राचीन भारतीय आयुर्वेद विज्ञान का यह अकाट्य नियम है कि मानव शरीर का संपूर्ण तंत्रिका तंत्र और मस्तिष्क का प्रमस्तिष्क भाग सीधे तौर पर बुध और चंद्रमा की आकाशीय रश्मियों से संचालित होता है। पौष मास की कड़ाके की ठंड में जब बाह्य तापमान शून्य की ओर अग्रसर होता है तब शरीर की परिधीय रक्त वाहिकाओं के संकुचित होने से मस्तिष्क की ओर प्रवाहित होने वाली प्राणवायु और रक्त की गति स्वाभाविक रूप से धीमी पड़ जाती है। इसके प्रत्यक्ष परिणामस्वरूप मनुष्य को अत्यधिक शारीरिक सुस्ती, विस्मरण, अनिर्णय की स्थिति, अवसाद और मानसिक भारीपन घेरने लगता है। ज्योतिष शास्त्र में भगवान श्री गणेश को नवग्रहों में बुद्धि, वाणी, तर्क, सांख्यिकी और व्यापार के स्वामी बुध ग्रह तथा समस्त मोक्ष, वैराग्य, गुप्त ज्ञान और अंतर्ज्ञान के कारक छाया ग्रह केतु का एकमात्र परम अधिष्ठाता स्वीकार किया गया है।

जब कोई साधक पौष कृष्ण चतुर्थी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गणेश जी का षोडशोपचार पूजन करता है, तो उसके भीतर का सुषुप्त आज्ञा चक्र और मेधा नाड़ी तत्काल जाग्रत हो जाती है। अथर्ववेद के अंतर्गत आने वाले श्री गणपति अथर्वशीर्ष के सस्वर पाठ से उत्पन्न होने वाली उच्च आवृत्ति की ध्वनि तरंगें मस्तिष्क के न्यूरॉन्स और निष्क्रिय कोशिकाओं को झकझोर कर सक्रिय कर देती हैं। इसके साथ ही इस दिन उपवास रखने से आमाशय और आंतों को पूर्ण विश्राम प्राप्त होता है जिससे शरीर की ऊर्जा का एक बड़ा भाग नीचे के चक्रों से ऊपर उठकर मस्तिष्क के उच्च केंद्रों को पोषण देने लगता है। यह साधना व्यापार में आने वाले उन अचानक वित्तीय अवरोधों, साझेदारों के आपसी अविश्वास और पूंजी के फंसने जैसे भयंकर योगों को जड़ से समाप्त कर देती है जो जन्म कुंडली में बुध के नीच, अस्त अथवा केतु के क्रूर प्रभाव के कारण उत्पन्न होते हैं।

भगवान गणेश को इक्कीस दूर्वा अर्पित करने का शास्त्रीय नियम क्या है?

भगवान श्री गणेश की संपूर्ण तांत्रिक और वैदिक पूजा में दूर्वा अर्थात हरी दूब घास को सर्वाधिक अनिवार्य, पवित्र और प्रिय द्रव्य माना गया है। शास्त्रों में बहुत स्पष्ट कहा गया है कि सोने, चांदी, हीरे, मणिक और मोतियों से युक्त नाना प्रकार के बहुमूल्य आभूषण भी गणेश जी को उतने प्रिय नहीं हैं जितनी कि शुद्ध भाव से समर्पित की गई हरी दूर्वा की एक छोटी सी पत्ती है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार प्राचीन काल में जब अनलासुर नामक एक भयंकर अग्नि दैत्य ने संपूर्ण पृथ्वी पर त्राहि त्राहि मचाते हुए ऋषि मुनियों और देवताओं को जीवित ही निगलना प्रारंभ कर दिया तब समस्त देवताओं की प्रार्थना पर भगवान गणेश ने संपूर्ण ब्रह्मांड की रक्षा हेतु उस दैत्य को अपने विशाल उदर में निगल लिया था। उस प्रचंड दैत्य के पेट में पहुंचते ही गणेश जी के शरीर में भयंकर आंतरिक दाह, जलन और अग्नि का प्रकोप उत्पन्न हो गया। उस समय समस्त औषधियां और शीतल जल उनके ताप को शांत करने में असमर्थ रहे। तब महर्षि कश्यप ने 21 दूर्वा की कोमल गांठें बनाकर गणेश जी के मस्तक पर रखी थीं, जिसके स्पर्श मात्र से उनके संपूर्ण शरीर की वह असहनीय जलन तत्क्षण शांत हो गई थी।

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी पर दूर्वा अर्पित करने का एक अत्यंत वैज्ञानिक और शास्त्रीय विधान निर्धारित है जिसका पालन करना अनिवार्य होता है। कभी भी किसी गंदे स्थान, सड़क के किनारे, धूल धूसरित अथवा सूखी और बासी दूर्वा का चयन नहीं करना चाहिए। किसी स्वच्छ उपवन, नदी के तट अथवा बगीचे से ताजा दूर्वा उखाड़ें जिसके शीर्ष पर तीन अथवा पांच कोमल पत्तियां हों। ऐसी दूर्वा को निर्मल जल से धोकर पवित्र करें और दो दो दूर्वा को एक साथ जोड़कर कलावे अथवा सफेद धागे से बांधकर कुल 10 जोड़े तैयार करें और 1 दूर्वा अलग रखें, इस प्रकार कुल 21 दूर्वा की एक सुंदर गड्डी बनाएं। प्रत्येक दूर्वा का जोड़ा अर्पित करते समय भगवान गणेश के इन दस दिव्य नामों का अत्यंत शांत चित्त से उच्चारण करना चाहिए: ॐ गणाधिपाय नमः, ॐ उमापुत्राय नमः, ॐ विघ्ननाशनाय नमः, ॐ विनायकाय नमः, ॐ ईशपुत्राय नमः, ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नमः, ॐ एकदन्ताय नमः, ॐ इभवक्त्राय नमः, ॐ मूषकवाहनाय नमः और ॐ कुमारगुरवे नमः। अंत में इक्कीसवीं दूर्वा "ॐ अखुरथाय नमः" बोलते हुए गणेश जी के चरणों में नहीं बल्कि उनके दोनों कानों के मध्य मस्तक पर समर्पित करनी चाहिए। यह प्रयोग साधक के मस्तिष्क में जमे हुए समस्त मानसिक तनाव, क्रोध, अनिद्रा और चिंताओं को क्षण भर में सोखकर उसे परम शांति प्रदान करता है।

अखुरथ चतुर्थी की संपूर्ण पूजन और चंद्र अर्घ्य विधि क्या है?

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी के दिन साधक को प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व शैया का त्याग कर देना चाहिए। शौच और दंत धावन से निवृत्त होकर शुद्ध ताजे जल में दो बूंद गंगाजल और काले तिल डालकर स्नान करें। इसके उपरांत स्वच्छ पीले अथवा लाल रेशमी वस्त्र धारण करें और तांबे के पात्र से भगवान भुवन भास्कर को अर्घ्य समर्पित करने के पश्चात हाथ में जल, अक्षत, सुपारी और पुष्प लेकर व्रत का निष्ठापूर्वक संकल्प करें कि हे अखुरथ भगवान गणेश, मैं अपने जीवन के समस्त विघ्नों के निवारण और बुद्धि की प्रखरता हेतु आपके इस पावन संकष्टी व्रत का पालन कर रहा हूं, मुझे निर्विघ्न सफलता प्रदान करें।

घर के पूजा स्थल में उत्तर अथवा पूर्व दिशा की ओर मुख करके एक शुद्ध लकड़ी की चौकी स्थापित करें और उस पर पीला रेशमी वस्त्र बिछाएं। चौकी के ऊपर तांबे, पीतल, चांदी अथवा अष्टधातु की गणेश प्रतिमा स्थापित करें अथवा शुद्ध चिकनी मिट्टी से स्वयं गणेश जी का निर्माण करें। प्रतिमा के सम्मुख शुद्ध गाय के देशी घी का एक दीपक प्रज्वलित करें। सर्वप्रथम गणेश जी को पंचामृत अर्थात गाय के दूध, दही, घी, शहद और शर्करा से भक्तिपूर्वक स्नान कराएं और फिर शुद्ध गंगाजल से अभिषेक करके उन्हें स्वच्छ वस्त्र से पोंछकर चौकी पर विराजमान करें। भगवान को शुद्ध अष्टगंध चंदन, रक्त सिंदूर, अक्षत, लाल गुड़हल के पुष्प और सुगंधित इत्र अर्पित करें। इसके पश्चात उन्हें ऊपर बताए गए शास्त्रीय नियम से 21 दूर्वा की गांठें समर्पित करें। नैवेद्य के रूप में भुने हुए काले तिल और शुद्ध गन्ने के गुड़ से बने हुए कम से कम 11 अथवा 21 लड्डुओं का भोग लगाएं। इसके साथ ही भगवान को ऋतु फल और मोदक अर्पित करें।

पूजन के उपरांत शुद्ध ऊनी आसन पर बैठकर रुद्राक्ष अथवा लाल चंदन की माला से इस सिद्ध बीज मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें: "ॐ गं गणपतये नमः"। दिन भर पूर्ण निराहार रहें अथवा शारीरिक दुर्बलता की स्थिति में केवल गुनगुना जल, दूध और मखाने का फलाहार ग्रहण करें। रात्रि में जब आकाश में चंद्र देव का उदय हो तब एक तांबे अथवा चांदी के लोटे में शुद्ध जल भरें, उसमें थोड़ा सा कच्चा दूध, रोली, अक्षत, काले तिल और एक दूर्वा डालें। अपने दोनों हाथों को सिर से ऊपर उठाकर चंद्रमा की ओर मुख करके जल की एक पतली unbroken धारा प्रवाहित करते हुए अर्घ्य समर्पित करें और इस मंत्र का तीन बार उच्चारण करें: "ॐ सोमाय नमः, ॐ चं चंद्रमसाय नमः, ॐ विष्णुरूपाय नमः"। चंद्र दर्शन और अर्घ्य समर्पण के पश्चात ही भगवान गणेश की कर्पूर से आरती करें और तिल के लड्डुओं का प्रसाद ग्रहण करके अपना व्रत पूर्ण करें।

संकट निवारण और व्यापार वृद्धि के 5 अचूक उपाय कौन से हैं?

पौष मास की इस अखुरथ संकष्टी चतुर्थी पर साधक के जीवन से समस्त दरिद्रता, पारिवारिक अशांति और व्यापारिक गतिरोध को समूल नष्ट करने हेतु शास्त्रों में पांच प्रमुख उपाय अत्यंत अचूक बताए गए हैं।

  1. तिल और गुड़ के लड्डुओं का गुप्त महादान: पूजा में भगवान गणेश को अर्पित किए गए तिल और गुड़ के लड्डुओं में से कुछ लड्डू घर के सभी परिजनों में प्रसाद रूप में बांटें और शेष लड्डुओं को किसी निर्धन, असहाय, भूखे व्यक्ति अथवा किसी मंदिर के ब्राह्मण को पूरे आदर के साथ दान करें। काले तिल और गुड़ का यह दान सूर्य और शनि के समस्त विरोधी दोषों को एक साथ शांत कर देता है और साधक के घर में अन्न व धन के भंडारों को कभी खाली नहीं होने देता।

  2. व्यापारिक गल्ले अथवा तिजोरी में सिद्ध दूर्वा की स्थापना: पूजा के समय भगवान गणेश के मस्तक पर चढ़ाई गई 21 दूर्वा में से पांच पवित्र दूर्वा उठा लें। उन पर थोड़ा सा शुद्ध सिंदूर और इत्र लगाएं और एक पीले रेशमी कपड़े में लपेटकर अपने व्यापार के कैश बॉक्स, तिजोरी अथवा बहीखातों के मध्य रख दें। यह प्रयोग व्यापार में अचानक होने वाली धन हानि को रोकता है, ग्राहकों के आकर्षण को बढ़ाता है और डूबी हुई पूंजी को पुनः वापस लाने में सहायता करता है।

  3. शमी पत्र द्वारा शनि और केतु के मारक दोषों का शमन: यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या अथवा केतु के कारण नौकरी छूटने का खतरा मंडरा रहा हो या व्यापार ठप हो गया हो, तो इस दिन गणेश जी को 11 शमी के पत्ते "ॐ सुमुखाय नमः" मंत्र बोलते हुए अर्पित करें। शमी के पत्ते गणेश जी को चढ़ाने से कुंडली के सभी क्रूर ग्रह तत्काल शांत होकर शुभ फल देने लगते हैं।

  4. संकटनाशन गणेश स्तोत्र के 11 अखंड पाठ: नारद पुराण में वर्णित 'संकटनाशन गणेश स्तोत्र' संकटों से मुक्ति पाने का सबसे अचूक और सिद्ध पाठ है। इस दिन संध्या समय दीपक जलाकर इस स्तोत्र का 11 बार स्पष्ट स्वर में पाठ करने से बड़े से बड़ा अदालती मुकदमा, भूमि विवाद और पारिवारिक कलह बिना किसी विघ्न के अत्यंत शांतिपूर्ण ढंग से सुलझ जाता है।

  5. गौमाता को गुड़ और हरी घास का वात्सल्य अर्पण: पूजा संपन्न होने के उपरांत किसी स्थानीय गोशाला में जाकर देशी गाय को अपने हाथों से ताजा हरा चारा, थोड़ा सा गुड़ और काले तिल खिलाएं और गोमाता के मस्तक पर हाथ फेरकर उनका आशीर्वाद लें। गोमाता में तैंतीस कोटि देवताओं का वास माना गया है और उनकी सेवा से भगवान गणेश अत्यंत शीघ्र प्रसन्न होकर साधक के समस्त विघ्नों को हर लेते हैं।

पारिवारिक सौहार्द और मानसिक शांति का क्या संदेश है?

भगवान श्री गणेश का संपूर्ण परिवार इस चराचर जगत में विरोधी स्वभाव वाले तत्वों के मध्य भी परम शांति, संतुलन और सामंजस्य बनाए रखने का सबसे बड़ा वैश्विक आदर्श प्रस्तुत करता है। भगवान शिव का वाहन नंदी बैल है तो माता पार्वती का वाहन सिंह है, शिव जी के गले में वासुकि नाग सुशोभित हैं तो कार्तिकेय का वाहन मयूर है और स्वयं गणेश जी का वाहन मूषक है जो सर्प का स्वाभाविक आहार होता है। इसके उपरांत भी शिव परिवार में कभी कोई संघर्ष, ईर्ष्या अथवा वैमनस्य नहीं होता, वहां केवल और केवल असीम प्रेम, परस्पर आदर और अखंड शांति का वास रहता है।

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी हमें यह महान पारिवारिक संदेश देती है कि एक ही छत के नीचे रहने वाले विभिन्न सदस्यों के विचार, स्वभाव, रुचियां और आदतें एक दूसरे से पूरी तरह भिन्न हो सकती हैं, परंतु यदि परिवार के केंद्र में प्रेम, त्याग, बड़ों का सम्मान और भगवान गणेश जैसा विशाल विवेकशील हृदय हो, तो वह परिवार संसार के किसी भी तूफान में कभी बिखर नहीं सकता। इस दिन जब परिवार के सभी सदस्य साथ बैठकर गणेश जी की आराधना करते हैं और रात्रि में चंद्र देव को अर्घ्य देते हैं, तो उनके अंतःकरण से अहंकार, क्रोध और कलह की भावना पूरी तरह समाप्त हो जाती है और घर में सुख, शांति और समृद्धि का अखंड साम्राज्य स्थापित हो जाता है।

गणेश शरणागति और आत्मिक विवेक का शाश्वत संदेश क्या है?

सनातन अध्यात्म का अंतिम लक्ष्य केवल सांसारिक विपत्तियों से बचना अथवा भौतिक सुख संपदा प्राप्त करना मात्र नहीं है बल्कि मनुष्य की जीवात्मा को उसके मूल स्वरूप अर्थात सच्चिदानंद परमात्मा में लीन करना है। भगवान अखुरथ की यह पावन संकष्टी हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन में आने वाले संकट वास्तव में हमें नष्ट करने नहीं आते बल्कि वे हमें अपनी दुर्बलताओं को सुधारने और परमात्मा के सम्मुख पूर्ण रूप से समर्पित होने का अवसर देने आते हैं। जब तक मनुष्य अपने बौद्धिक अहंकार के बल पर जीवन की समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करता है तब तक वह नए नए बंधनों और चिंताओं में उलझता चला जाता है।

परंतु जैसे ही कोई साधक अपने मिथ्या अहंकार का विसर्जन करके एक अबोध बालक की भांति भगवान गणेश के चरणों में नतमस्तक हो जाता है, उसके जीवन की संपूर्ण बागडोर स्वयं विघ्नहर्ता अपने हाथों में ले लेते हैं। पौष मास की यह पावन चतुर्थी हमें अपनी समस्त चिंताओं, अपनी दुर्बलताओं और अपने भविष्य के भय को भगवान अखुरथ के चरणों में समर्पित कर देने की प्रेरणा देती है। जब मनुष्य पूर्ण निष्काम भाव से गणेश जी की शरण में जाता है, तो उसे केवल संकटों से मुक्ति ही नहीं मिलती बल्कि उसे वह दिव्य प्रज्ञा और अविचल आत्मिक शांति प्राप्त होती है जो उसे इस नश्वर संसार के समस्त बंधनों से मुक्त करके मोक्ष के परम धाम तक पहुंचा देती है।

FAQ

अखुरथ संकष्टी चतुर्थी पर चंद्र दर्शन और अर्घ्य देना क्यों अनिवार्य माना गया है? पौष संकष्टी चतुर्थी पर चंद्रमा की पूजा अनिवार्य मानी गई है क्योंकि चंद्रमा मानव के मन और भावनाओं का कारक ग्रह है। भगवान गणेश ने चंद्रमा के घमंड को चूर करके उन्हें अपने मस्तक पर धारण किया था, अतः रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य दिए बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है और अर्घ्य देने से मानसिक तनाव व चंद्र दोष पूरी तरह समाप्त होते हैं।

भगवान गणेश को तुलसी पत्र अर्पित करना शास्त्रों में वर्जित क्यों है? पौराणिक आख्यानों के अनुसार देवी तुलसी ने भगवान गणेश के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा था जिसे गणेश जी ने ब्रह्मचर्य का पालन करने हेतु अस्वीकार कर दिया था। इस पर रुष्ट होकर तुलसी जी ने उन्हें दो विवाह का शाप दिया और गणेश जी ने उन्हें वृक्ष बनने का शाप दिया, तभी से गणेश जी की पूजा में तुलसी पत्र अर्पित करना पूर्णतः निषिद्ध माना गया है।

यदि किसी कारणवश रात्रि में कोहरे के कारण चंद्रमा दिखाई न दे तो व्रत का पारण कैसे करें? पौष मास में अत्यधिक घने कोहरे के कारण यदि आकाश में चंद्रमा स्पष्ट दिखाई न दे, तो पंचांग में दिए गए उस दिन के चंद्रोदय के निश्चित समय पर भगवान शिव के मस्तक पर स्थित बालचंद्र का ध्यान करके अथवा पूर्व या उत्तर पूर्व दिशा की ओर मुख करके भूमि पर जल का अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जा सकता है।

संकष्टी चतुर्थी का व्रत किन लोगों को अनिवार्य रूप से करना चाहिए? जिन जातकों की जन्म कुंडली में बुध अथवा केतु की अशुभ दशा चल रही हो, जो जातक लंबे समय से किसी जटिल कानूनी विवाद, कर्ज अथवा आजीविका के संकट से जूझ रहे हों तथा जिन विद्यार्थियों का मन पढ़ाई में एकाग्र नहीं हो पाता, उन्हें यह व्रत पूरी निष्ठा से अवश्य करना चाहिए।

गणेश जी को भोग लगाने के लिए काले तिल के लड्डुओं का ही प्रयोग क्यों किया जाता है? पौष मास शीत ऋतु का चरम समय होता है जब शरीर में वात और कफ दोष बढ़ जाता है। तिल की तासीर गर्म और स्निग्ध होती है तथा यह शनि और सूर्य के तत्वों को संतुलित करता है, अतः आयुर्वेद और तंत्र दोनों के अनुसार तिल व गुड़ के लड्डू का भोग लगाने से गणेश जी प्रसन्न होते हैं और साधक को आरोग्य प्राप्त होता है।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

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