By पं. अभिषेक शर्मा
पौष शुक्ल अष्टमी, शाकंभरी नवरात्रि और दुर्गा कवच का तांत्रिक विधान

पौष मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि सनातन तांत्रिक परंपरा और शाक्त साधना के गूढ़ इतिहास में बाणदाष्टमी के पावन नाम से प्रतिष्ठित मानी जाती है। वैदिक काल गणना और आगम संहिताओं के अनुसार यह वही परम तेजस्वी तिथि है जो प्रत्यक्ष रूप से जगज्जननी भगवती आद्याशक्ति दुर्गा के संहारक, रक्षक और अपराजित अस्त्र स्वरूपों की आराधना के लिए समर्पित की गई है। इसी दिव्य तिथि से नौ दिवसीय शाकंभरी नवरात्रि का भी शुभारंभ होता है जो पौष शुक्ल अष्टमी से आरंभ होकर पौष पूर्णिमा के परम पावन संधिकाल तक निरंतर चलती है। जब संपूर्ण चराचर जगत में सूर्य देव दक्षिणायन के चरम छोर पर स्थित होते हैं और बाह्य प्रकृति में शीत का प्रकोप अपने शिखर पर पहुंचकर वायुमंडल को गंभीर और निस्तब्ध बना देता है तब उस समय अंतरिक्षीय ऊर्जाएं अत्यंत संवेदनशील और अंतर्मुखी हो जाती हैं। तंत्र शास्त्र के गोपनीय ग्रंथों का यह अकाट्य मत है कि पौष शुक्ल अष्टमी की रात्रि में तामसिक और आसुरी वृत्तियों का शमन करने वाली पराशक्ति की संहारक किरणें इस भूमंडल पर सर्वाधिक सक्रिय रहती हैं।
प्राचीन पौराणिक आख्यानों और देवी भागवत महापुराण के अनुसार जब दुर्गम नामक महादैत्य ने संपूर्ण वेदों का हरण कर लिया था और भूलोक पर सौ वर्षों तक वर्षा न होने के कारण भीषण अकाल व त्राहि त्राहि मच गई थी तब भक्तों के आर्तनाद को सुनकर मां भवानी ने अपने नयनों से अश्रुजल की सहस्रों धाराएं प्रवाहित की थीं और अपने हाथों में दिव्य बाण तथा धनुष धारण करके संपूर्ण आसुरी सेना को एक ही क्षण में छिन्न भिन्न कर दिया था। मां भगवती का बाण रूप उनके उस अचूक संकल्प और लक्ष्य भेदन की शक्ति का साक्षात प्रतीक है जो साधक के जीवन में आने वाले ज्ञात और अज्ञात संकटों को उनके उद्गम स्थल पर ही भस्म करने का अद्वितीय सामर्थ्य रखता है। जो साधक अपने जीवन में निरंतर अदृश्य शत्रुओं के कुचक्रों, झूठे अदालती मुकदमों, व्यावसायिक ईर्ष्या, तंत्र बाधाओं और तीव्र नजर दोष से त्रस्त रहते हैं, उनके लिए बाणदाष्टमी की निशीथ कालीन साधना एक ऐसा अभेद्य वज्र कवच निर्मित कर देती है जिसे संसार की कोई भी नकारात्मक शक्ति भेदने में सर्वथा असमर्थ रहती है। इस पावन गुप्त तांत्रिक पर्व के समस्त अनिवार्य अंग, पूजा सामग्री, विशिष्ट दिशा और ज्योतिषीय तत्वों का प्रामाणिक विवरण नीचे प्रस्तुत तालिका में सुव्यवस्थित रूप से दिया गया है।
| साधना एवं व्रत घटक | शास्त्रीय नियम और आवश्यक पूजन सामग्री | ज्योतिषीय आधार और तांत्रिक महत्व |
|---|---|---|
| प्रमुख तिथि एवं पक्ष | पौष मास शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि | शाकंभरी नवरात्रि का शुभारंभ और अष्टम सिद्धि काल |
| प्रधान अधिष्ठात्री शक्ति | बाणधारिणी मां दुर्गा और मां शाकंभरी | मंगल और राहु के क्रूर दोषों का शमन करने वाली पराशक्ति |
| साधना की मुख्य दिशा | दक्षिण दिशा अथवा उत्तर पूर्व (ईशान कोण) | यम दिशा के दोषों का संहार और ईश्वरीय रक्षा का संगम |
| प्रमुख नैवेद्य | अनार के दाने, हलवा, चने और उड़द के बड़े | तामसिक विघ्नों का नाश और भगवती की परम तृप्ति |
| प्रधान रक्षा स्तोत्र | दुर्गा सप्तशती अंतर्गत देव्याः कवचम् और कीलकम् | साधक के चारों ओर अभेद्य सुरक्षा घेरे का तांत्रिक निर्माण |
| मुख्य रक्षा मंत्र | ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमः | नवार्ण मंत्र द्वारा षट्कर्मों और शत्रुओं से आत्मरक्षा |
| धारण हेतु वस्त्र | शुद्ध लाल अथवा गहरे पीले रंग के रेशमी वस्त्र | मूलाधार चक्र की जागृति और सकारात्मक विद्युत चुंबकीय आवरण |
शाक्त संप्रदाय के आगम ग्रंथों में पौष मास की इस गुप्त अष्टमी को अष्टम सिद्धि की प्रदायिनी स्वीकार किया गया है। जहां चैत्र और आश्विन मास की नवरात्रियां संपूर्ण जनमानस द्वारा प्रकट रूप से मनाई जाती हैं, वहीं पौष मास की शाकंभरी नवरात्रि और उसकी प्रथम तिथि बाणदाष्टमी को सिद्ध संतों और उच्च कोटि के साधकों द्वारा गुप्त रूप से संपन्न किया जाता है। तंत्र शास्त्र के अनुसार अष्टमी तिथि स्वयं जया तिथियों की श्रेणी में आती है जिसका अर्थ ही विजय प्रदान करने वाली तिथि होता है। जब यह तिथि पौष मास के शुक्ल पक्ष में प्रकट होती है, तो यह चंद्रमा के शुक्ल पक्षीय प्रकाश और सूर्य के गंभीर धनु संक्रांति के संधिकाल का एक अत्यंत शक्तिशाली योग निर्मित करती है।
इस पावन दिन मां दुर्गा को 'बाणदा' कहा गया है जिसका शाब्दिक अर्थ है अपने भक्तों को रक्षा रूपी अमोघ बाण प्रदान करने वाली देवी। देवी के हाथ में स्थित बाण वास्तव में शुद्ध चेतना और अचल एकाग्रता का प्रतीक है। जिस प्रकार एक बार धनुष की प्रत्यंचा से छूटा हुआ दिव्य बाण अपने निर्धारित लक्ष्य को भेदकर ही शांत होता है, ठीक उसी प्रकार इस दिन की गई देवी की आराधना साधक की संपूर्ण मानसिक दुर्बलताओं, अंतःकरण के भय और बाह्य उपद्रवों को जड़ से समाप्त करके ही विराम लेती है। इस नवरात्रि के दौरान देवी ने शाक अर्थात वनस्पतियों और कंदमूलों के माध्यम से संपूर्ण पृथ्वी के जीवों का पोषण किया था, अतः इस दिन की साधना भौतिक कष्टों और रोगों से मुक्ति दिलाकर जीवन में अन्न और धन के भंडारों को भी परिपूर्ण बनाती है।
वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब किसी जातक की जन्म पत्रिका में छठवां भाव जो रोग, ऋण और शत्रु का कारक होता है, अत्यधिक दूषित हो जाए अथवा उस पर राहु, केतु या मंगल की वक्र दृष्टि पड़ रही हो तब वह जातक जीवन भर अदृश्य शत्रुओं और अंतहीन मुकदमों के जाल में फंसा रहता है। इसी प्रकार जब जन्म कुंडली में अष्टम भाव पीड़ित होता है तो जातक को अचानक आने वाले संकटों, षड्यंत्रों और नजर दोष का सामना करना पड़ता है। मंगल ग्रह को जहां साहस और पराक्रम का अधिष्ठाता माना गया है, वहीं राहु गुप्त छल कपट और षड्यंत्र का मुख्य ग्रह है।
बाणदाष्टमी का पावन दिन इन दोनों क्रूर ग्रहों के अशुभ प्रभावों को पूर्णतः निष्प्रभावी करने का ब्रह्मांडीय अवसर होता है। मां दुर्गा स्वयं महिसासुरमर्दिनी होकर समस्त आसुरी और कपटी शक्तियों का संहार करने वाली हैं। जब कोई पीड़ित साधक पौष शुक्ल अष्टमी की गहन रात्रि में भगवती के चरणों में शरण लेता है, तो कुंडली के छठवें और आठवें भाव से उत्पन्न होने वाले समस्त मारक दोष तत्काल शांत हो जाते हैं। झूठी गवाहियों पर आधारित अदालती मुकदमों में विरोधी पक्ष का प्रभाव क्षीण होने लगता है और साधक को न्याय की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही व्यापारिक क्षेत्र में प्रतिद्वंद्वियों द्वारा किए गए गुप्त तांत्रिक अभिचार भी देवी के त्रिशूल और बाण के तेज से भस्म होकर स्वयं उन विरोधियों की ओर ही वापस लौट जाते हैं।
बाणदाष्टमी की रात्रि में की जाने वाली साधना का सर्वाधिक फलदायी समय निशीथ काल माना गया है जो सामान्यतः रात्रि 11 बजकर 15 मिनट से लेकर रात्रि 12 बजकर 45 मिनट के मध्य रहता है। साधना प्रारंभ करने से पूर्व साधक को स्नान करके शुद्ध लाल अथवा पीले रेशमी वस्त्र धारण करने चाहिए। अपने पूजा कक्ष को स्वच्छ करके वहां उत्तर अथवा पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा अथवा लाल कंबल का आसन बिछाएं। लकड़ी की एक शुद्ध चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर मां दुर्गा का चित्र अथवा श्री दुर्गा यंत्र स्थापित करें। देवी के सम्मुख चमेली के तेल अथवा शुद्ध तिल के तेल का एक बड़ा दीपक प्रज्वलित करें।
साधना के आरंभ में हाथ में जल, अक्षत और तांबे का सिक्का लेकर अपना नाम, गोत्र और संकट निवारण का संकल्प बोलें और जल को भूमि पर छोड़ दें। इसके उपरांत सर्वप्रथम भगवान गणेश का स्मरण करें और फिर अपने गुरुदेव का ध्यान करें। अब तांबे की एक थाली में कुमकुम से त्रिकोण बनाएं और उस पर एक सुपारी स्थापित करके भैरव जी का ध्यान करें क्योंकि भैरव के बिना शक्ति साधना पूर्ण नहीं मानी जाती। इसके पश्चात मार्कंडेय पुराणोक्त श्री दुर्गा सप्तशती ग्रंथ को हाथ जोड़कर प्रणाम करें और सबसे पहले 'अथ देव्याः कवचम्' का अत्यंत स्पष्ट, धीमे और लयबद्ध स्वर में पाठ प्रारंभ करें।
कवच का पाठ करते समय अपने मन में यह भावना दृढ़ रखें कि भगवती के विभिन्न स्वरूप आपके सिर से लेकर पैर के अंगूठे तक के प्रत्येक अंग, नस और नाड़ी की रक्षा कर रहे हैं। कवच पाठ के समापन के तत्काल बाद 'अथ कीलक स्तोत्रम्' का पाठ करें। कीलक स्तोत्र वह तांत्रिक चाबी है जो दुर्गा सप्तशती के मंत्रों पर लगे हुए भगवान शिव के शाप रूपी कीलन को खोलती है। कीलक का पाठ करने से साधक की वाणी सिद्ध होने लगती है और उसके द्वारा की गई प्रार्थना सीधे भगवती के सिंहासन तक पहुंचती है। इन दोनों स्तोत्रों के तीन तीन पाठ पूर्ण करने के उपरांत लाल चंदन की माला से नवार्ण मंत्र "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" का कम से कम 108 बार शांत बैठकर जाप करें। जाप के उपरांत कपूर से भगवती की आरती करें और उनसे अपने समस्त संकटों को हरने की विनम्र याचना करें।
इस गुप्त तांत्रिक पर्व पर आचार्यों द्वारा प्रतिपादित पांच अत्यंत शक्तिशाली और गोपनीय उपाय साधक को समस्त प्रकार के भय और विनाशकारी ऊर्जाओं से आजीवन सुरक्षित रखने में समर्थ हैं।
अभिमंत्रित रक्षा सूत्र का निर्माण और कलाई पर बंधन: लाल रंग का शुद्ध सूती अथवा रेशमी रक्षा सूत्र लेकर उसे माता दुर्गा के चरणों में रखें। उस पर अष्टगंध और सिंदूर का लेपन करें। कवच पाठ के दौरान उस धागे पर 21 बार फूंक मारें। साधना समाप्त होने के पश्चात इस सिद्ध रक्षा सूत्र को अपने दाहिने हाथ की कलाई पर बांध लें। यह धागा एक अभेद्य ऊर्जा चक्र की भांति कार्य करता है जो किसी भी नकारात्मक शक्ति को आपके शरीर में प्रवेश नहीं करने देता।
लौंग और कर्पूर का नजर दोष निवारक तांत्रिक भस्म: सात साबुत फूल वाली लौंग और एक शुद्ध भीमसेनी कपूर का टुकड़ा लें। इसे अपने और अपने परिवार के सदस्यों के सिर से सात बार घड़ी की सुई की दिशा में उसारें। इसके उपरांत बाणदाष्टमी की मध्यरात्रि में इसे एक मिट्टी के सकोरे में रखकर अग्नि प्रज्वलित कर दें। जलने के पश्चात बची हुई भस्म को अपने घर के मुख्य द्वार की चौखट के दोनों ओर थोड़ा थोड़ा लगा दें। यह प्रयोग हर प्रकार के तांत्रिक बंधन और बुरी नजर को पल भर में भस्म कर देता है।
सरसों के दानों द्वारा गृह कीलित करने का विधान: एक मुट्ठी पीली सरसों लेकर उसे एक तांबे की कटोरी में रखें। दुर्गा कवच का पाठ करते हुए उस सरसों पर अपनी अनामिका उंगली से स्पर्श बनाए रखें। पाठ पूर्ण होने के बाद इस अभिमंत्रित पीली सरसों को अपने घर के चारों कोनों, छत और मुख्य द्वार पर थोड़ा थोड़ा फेंक दें। इसे तंत्र में 'गृह कीलन' कहा जाता है जिससे कोई भी दुष्ट आत्मा अथवा शत्रु जनित बाधा घर की परिधि के भीतर पैर नहीं रख सकती।
भैरव बाबा के निमित्त कड़वे तेल का दीपदान: बाणदाष्टमी की रात्रि में घर से बाहर किसी प्राचीन चौराहे अथवा किसी सुनसान स्थान पर जाकर सरसों के तेल का एक चौमुखा मिट्टी का दीपक प्रज्वलित करें। इस दीपक में दो लौंग और काले तिल के कुछ दाने डालें। हाथ जोड़कर बटुक भैरव से प्रार्थना करें कि वे आपके समस्त ज्ञात अज्ञात शत्रुओं के षड्यंत्रों को नष्ट करें। दीपक रखकर बिना पीछे मुड़े सीधे अपने घर वापस आ जाएं और हाथ पैर धो लें।
ताम्र त्रिशूल अथवा बाण का मुख्य द्वार पर प्रतिष्ठापन: इस पावन दिन तांबे अथवा पीतल से बना एक छोटा त्रिशूल या धातु का बाण लाकर उसका गंगाजल और पंचामृत से अभिषेक करें। उस पर सिंदूर लगाकर मां भवानी के चरणों में रखें और 108 बार नवार्ण मंत्र का जप करें। अगले दिन प्रातः काल इसे अपने घर अथवा व्यापारिक प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार के ठीक ऊपर अंदर की ओर लगा दें। यह अस्त्र रूपी यंत्र घर को सदैव दिव्य संरक्षण प्रदान करता रहता है।
बाणदाष्टमी का यह पावन अनुष्ठान केवल बाह्य शत्रुओं से ही रक्षा नहीं करता बल्कि यह परिवार के भीतर पनपने वाले आंतरिक कलह, मानसिक अवसाद और अज्ञात भय को भी समूल नष्ट कर देता है। कलियुग के इस अशांत काल में मनुष्य प्रायः अपने ही विचारों के द्वंद्व और असुरक्षा की भावना से सबसे अधिक पीड़ित रहता है। जब परिवार का कोई सदस्य निरंतर अकारण भयभीत रहता हो, रात्रि में अचानक चौंक कर उठ जाता हो अथवा किसी गंभीर असाध्य रोग से ग्रसित हो, तो बाणदाष्टमी के दिन किए गए कवच पाठ का जल उस व्यक्ति को पिलाना अत्यंत चमत्कारी प्रभाव दिखाता है।
इस दिन घर की स्त्रियों द्वारा मां दुर्गा की विधिवत आराधना करने से कुल में सुख और अखंड सौभाग्य की वृद्धि होती है। मां शाकंभरी का स्मरण करते हुए इस दिन हरी सब्जियों, ताजे फलों और विशेष रूप से अन्न का दान किसी अत्यंत निर्धन परिवार को करना चाहिए। जब किसी भूखे और असहाय जीव की आत्मा तृप्त होती है, तो उससे निकलने वाला शुभ आशीर्वाद साधक के पूरे परिवार को एक सुरक्षात्मक आभामंडल में लपेट लेता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जब तक हमारे जीवन में सत्य, धर्म और भगवती की कृपा का संबल है तब तक काल भी हमारा बाल बांका नहीं कर सकता।
वैदिक तंत्र कभी भी किसी का अहित करने की शिक्षा नहीं देता, उसका मूल उद्देश्य केवल आत्मरक्षा, समाज का कल्याण और साधक की चेतना का सर्वोच्च शिखर तक उत्थान करना है। बाणदाष्टमी हमें यह दिव्य संदेश देती है कि जब संसार में अन्याय, असत्य और नकारात्मकता की शक्ति अत्यधिक बढ़ जाए, तो एक साधक को मौन और दुर्बल होकर नहीं बैठना चाहिए बल्कि उसे अपनी आंतरिक शक्ति को समेटकर मां भवानी के बाण की भांति प्रखर और लक्ष्यभेदी बनना चाहिए। देवी का बाण किसी निर्दोष के संहार के लिए नहीं बल्कि अज्ञान के अंधकार को चीरकर ज्ञान का प्रकाश फैलाने के लिए उठा था। जो साधक इस पावन अष्टमी पर निष्काम भाव से, लोक कल्याण की कामना से और अपनी आंतरिक वृत्तियों को शुद्ध करने के उद्देश्य से भगवती की शरण में जाता है, उसे अष्ट सिद्धियों की स्वाभाविक अनुभूति होने लगती है। उसका मन समस्त प्रकार के भय, संशय और वासनाओं से मुक्त होकर परमानंद के उस अगाध सागर में लीन हो जाता है जहां केवल और केवल शाश्वत शांति, निर्भयता और दिव्य चेतना का वास होता है।
बाणदाष्टमी की पूजा किस समय करना शास्त्रों के अनुसार सबसे उत्तम माना गया है? बाणदाष्टमी की तांत्रिक साधना और दुर्गा सप्तशती का पाठ करने के लिए रात्रि का समय विशेष रूप से निशीथ काल अर्थात रात्रि 11 बजे से 1 बजे के मध्य सर्वोत्तम माना गया है। यदि किसी कारणवश रात्रि में साधना संभव न हो तो संध्या के समय गोधूलि वेला में भी यह पूजा पूर्ण श्रद्धा से संपन्न की जा सकती है।
क्या बाणदाष्टमी का व्रत सामान्य गृहस्थ लोग भी रख सकते हैं? हां, बाणदाष्टमी का व्रत और पूजन कोई भी सामान्य गृहस्थ पूरी श्रद्धा के साथ कर सकता है। गृहस्थ साधकों को केवल यह ध्यान रखना चाहिए कि वे सात्विक विधि से ही पूजा करें और किसी का अहित करने की दुर्भावना मन में न लाएं, केवल अपने परिवार की रक्षा और शांति की प्रार्थना करें।
दुर्गा कवच का पाठ करते समय किन विशेष सावधानियों का पालन करना चाहिए? दुर्गा कवच का पाठ करते समय उच्चारण पूर्णतः शुद्ध होना चाहिए और वाणी में किसी प्रकार की जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए। पाठ के दौरान अपना मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें, सामने शुद्ध घी अथवा तिल के तेल का दीपक निरंतर जलता रहे और पाठ के मध्य में किसी से बातचीत बिल्कुल न करें।
शत्रुओं के झूठे मुकदमों से राहत पाने के लिए इस दिन कौन सा उपाय सबसे शीघ्र फल देता है? मुकदमों से मुक्ति के लिए बाणदाष्टमी की रात्रि में एक साबुत भोजपत्र पर लाल चंदन से अपने विरोधियों के नाम लिखें और उस पर 21 बार कीलक स्तोत्र का पाठ करें। इसके पश्चात उस भोजपत्र को मां दुर्गा के चरणों में स्पर्श कराकर किसी सुनसान भूमि में एक हाथ गहरा गड्ढा खोदकर दबा दें, इससे विरोधियों की बुद्धि शांत हो जाती है।
शाकंभरी नवरात्रि के प्रथम दिन मां भगवती को किस विशेष वस्तु का भोग लगाना चाहिए? बाणदाष्टमी शाकंभरी नवरात्रि का पहला दिन होने के कारण इस दिन मां भगवती को ताजी हरी सब्जियों, अनार के लाल दानों, मखाने की खीर और हलवे का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस नैवेद्य को अर्पित करने से घर में कभी भी अन्न और धन की कमी नहीं होती।
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