By पं. अमिताभ शर्मा
पौष मास में ताम्र जल, उषापान, सूर्य अर्घ्य और त्रिदोष शामक विज्ञान

सनातन काल गणना के वैदिक पंचांग के अनुसार पौष मास संपूर्ण वर्ष का सर्वाधिक शीतल, शुष्क और ऊर्जा-संवेदी कालखंड माना जाता है। शिशिर ऋतु के आगमन के साथ जब तापमान में भारी गिरावट आती है तब संपूर्ण प्रकृति एक मौन संधिकाल से गुजरती है। धर्मशास्त्रों, आयुर्वेद और वैदिक ज्योतिष के प्रामाणिक ग्रंथों में इस विशेष ऋतु में 'ताम्र पात्र' (तांबे के बर्तन) के जल का सेवन तथा सूर्य देव को तांबे के लोटे से अर्घ्य समर्पण अमृत तुल्य घोषित किया गया है। तांबा धातु को वैदिक काल से ही समस्त धातुओं में सर्वाधिक पवित्र, सात्विक और प्राणवान माना गया है।
ज्योतिष शास्त्र में तांबे को ग्रहों के राजा भुवन भास्कर सूर्य नारायण तथा साहस के अधिष्ठाता मंगल देव का प्रत्यक्ष धातु स्वीकार किया गया है। पौष मास में जब सूर्य देव अपने 'भग' स्वरूप में तपते हैं तब तांबे के पात्र के माध्यम से किया गया कोई भी धार्मिक अथवा चिकित्सकीय उपक्रम कई गुना अधिक प्रभावी हो जाता है। यह धातु केवल पूजा की थाली का साधन नहीं है बल्कि यह मानव शरीर, चेतना और त्रिदोषों को संतुलित करने वाली एक अद्वितीय जैव-भौतिकीय महा-औषधि है।
| शास्त्रीय व पोषण आयाम | पारंपरिक स्वरूप एवं विवरण | खगोलीय व दैहिक प्रभाव |
|---|---|---|
| प्रधान धातु | शुद्ध रक्त ताम्र (Red Copper) | सूर्य और मंगल की तात्विक ऊर्जा का सीधा अवशोषण |
| मुख्य कालखंड | संपूर्ण पौष मास, विशेषकर ब्रह्म मुहूर्त व सूर्योदय | शीत जनित वात-कफ शमन और जठराग्नि प्रदीप्ति |
| प्रधान जल विधान | रात्रि भर ताम्र पात्र में संचित जल (उषापान) | आंतों का सूक्ष्म शोधन, जीवाणुनाश और विषाक्तता मुक्ति |
| सौर अर्घ्य क्रिया | सिर से ऊपर तांबे का लोटा उठाकर पतली जलधारा | गिरती जलधारा से किरणों का सप्तवर्णीय स्पेक्ट्रम विखंडन |
| मुख्य अधिष्ठाता देव | भुवन भास्कर सूर्य नारायण व मंगल देव | आत्मबल संवर्धन, रक्त शुद्धि और मेधा शक्ति वृद्धि |
| शारीरिक दोष शमन | कफ दोष का संहार और वात दोष का संतुलन | जोड़ों में अकड़न, सायनोवियल द्रव सुरक्षा और स्फूर्ति |
| मानसिक स्वास्थ्य लाभ | मस्तिष्क के न्यूरोट्रांसमीटर व पीनियल ग्रंथि जागरण | मौसमी अवसाद (SAD), सुस्ती और अनिद्रा का निवारण |
कड़ाके की ठंड के दिनों में जब शरीर की सूक्ष्म रक्त वाहिकाएं संकुचित हो जाती हैं और पाचन अग्नि को अतिरिक्त बल की आवश्यकता होती है तब तांबे के लोटे का जल शरीर के भीतर एक आंतरिक ऊष्मा कवच का निर्माण करता है।
आयुर्वेद के आदि ग्रंथ चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और भावप्रकाश निघंटु में ताम्र पात्र में रखे जल को 'ताम्र जल' अथवा 'उषापान जल' कहा गया है। महर्षि चरक के अनुसार तांबा स्वभाव से कषाय, तिक्त, मधुर, उष्ण वीर्य और लेखन (अनावश्यक वसा व कफ को खुरचने वाला) गुण से युक्त होता है।
पौष मास की कड़ाके की ठंड में मानव शरीर की त्वचा के छिद्र बंद हो जाते हैं, जिससे आंतरिक ऊष्मा उदर में सिमट जाती है, परंतु वातावरण की अत्यधिक शुष्कता के कारण शरीर में वात और कफ का प्रकोप चरम पर होता है। तांबे का जल इन दोनों दोषों को एक साथ शांत करने की क्षमता रखता है:
आधुनिक सूक्ष्म जीव विज्ञान (Microbiology) और जैव-रसायन विज्ञान के अनुसार तांबे में एक अत्यंत विशिष्ट गुण पाया जाता है जिसे 'ओलिगोडायनामिक प्रभाव' (Oligodynamic Effect) कहा जाता है। यह धातुओं की वह प्राकृतिक क्षमता है जिसके संपर्क में आते ही हानिकारक सूक्ष्म जीवाणु, बैक्टीरिया और वायरस कुछ ही घंटों में निष्क्रिय होकर नष्ट हो जाते हैं।
जब सामान्य पेयजल को शुद्ध तांबे के लोटे अथवा जग में 8 से 12 घंटे के लिए रखा जाता है, तो तांबे के सूक्ष्म कण (Copper Ions) अत्यंत अल्प और सुरक्षित मात्रा में जल के भीतर घुल जाते हैं। यह प्रक्रिया जल का प्राकृतिक आयनीकरण (Ionization) कर देती है।
| वैज्ञानिक मानक | सामान्य प्लास्टिक/स्टील का जल | 8 घंटे ताम्र पात्र में रखा जल |
|---|---|---|
| जीवाणु स्थिति (E. Coli, Salmonella) | 24 घंटे तक जीवित व सक्रिय | 8 से 10 घंटे के भीतर 99.9% नष्ट |
| जल का स्वभाव (pH Level) | सामान्य अम्लीय अथवा उदासीन (6.5 - 7.0) | प्राकृतिक क्षारीय जल (7.8 - 8.5 pH) |
| एंटी-ऑक्सीडेंट गुण | शून्य अथवा अत्यंत अल्प | प्रचुर मात्रा में मुक्त कण (Free Radicals) नाशक |
| तांबे की सांद्रता (Copper Content) | शून्य | 0.05 से 0.10 ppm (मानव शरीर हेतु पूर्ण सुरक्षित) |
यह तांबा युक्त जल शरीर में जाकर मेलानिन (त्वचा और बालों का रंग निर्धारित करने वाला वर्णक) के निर्माण को तेज करता है, घावों को शीघ्र भरता है और थाइरॉइड ग्रंथि के स्राव को नियंत्रित करता है। यह शरीर की कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाकर समय से पूर्व आने वाले बुढ़ापे को रोकता है।
पौष मास में प्रातःकाल उठकर किया जाने वाला 'उषापान' (सूर्योदय से पूर्व बासी मुंह जल का सेवन) एक कायाकल्पकारी साधना है। शीत ऋतु में इस जल को ग्रहण करने का एक विशेष आयुर्वेदिक नियम है:
रात के समय शुद्ध तांबे के लोटे को भली-भांति धोकर उसमें स्वच्छ पेयजल भरें और उसे लकड़ी के पाटे पर ढंककर रख दें। प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में शय्या त्यागने के तुरंत बाद, बिना कुल्ला किए अथवा बिना ब्रश किए, उस जल को किसी स्टील या मिट्टी के बर्तन में हल्का गुनगुना करें। ध्यान रहे कि तांबे के बर्तन को कभी भी सीधे अग्नि पर गर्म नहीं करना चाहिए; जल को दूसरे बर्तन में पलटकर ही गुनगुना किया जाता है।
पौष मास में तांबे के लोटे से सूर्य को जल अर्पित करने का विधान केवल एक पौराणिक कर्मकांड नहीं है बल्कि यह भौतिक प्रकाशिकी (Optics), शरीर क्रिया विज्ञान और स्नायु विज्ञान (Neurology) का एक अत्यंत परिष्कृत संगम है। तांबा विद्युत और सौर ऊर्जा का सर्वश्रेष्ठ प्राकृतिक संवाहक (Conductor) माना गया है।
जब साधक दोनों हाथों से तांबे के लोटे को सिर से आठ से दस इंच ऊपर उठाकर पूर्व दिशा में उदित हो रहे सूर्य की ओर जल की एक पतली, अविरल धार छोड़ता है, तो एक अलौकिक भौतिक प्रक्रिया घटित होती है:
वैदिक ज्योतिष के महर्षि पराशर सिद्धांत के अनुसार तांबा धातु पर सूर्य और मंगल दोनों ग्रहों का संयुक्त स्वामित्व होता है। सूर्य आत्मा, पिता, मान-सम्मान, नेतृत्व और स्वास्थ्य का कारक है, जबकि मंगल रक्त, पराक्रम, अस्थि मज्जा और साहस का स्वामी है।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में सूर्य तुला राशि में नीच का हो, राहु-केतु द्वारा ग्रहण दोष से पीड़ित हो, अथवा मंगल छठे, आठवें या बारहवें भाव में बैठकर रक्त विकार अथवा आत्मविश्वास की कमी उत्पन्न कर रहा हो, तो पौष मास में तांबे के लोटे का यह प्रयोग एक अमोघ ज्योतिषीय रत्न के समान कार्य करता है।
| ग्रह स्थिति | जीवन पर अशुभ प्रभाव | तांबे के प्रयोग द्वारा ज्योतिषीय सुधार |
|---|---|---|
| नीच अथवा पीड़ित सूर्य | हीनभावना, पिता से विवाद, समाज में अपयश | ताम्र लोटे से नित्य अर्घ्य देने से सूर्य को उच्चवत बल |
| निर्बल अथवा पीड़ित मंगल | रक्त की कमी (एनीमिया), आलस्य, डर, संपत्ति विवाद | तांबे का जल पीने से हीमोग्लोबिन वृद्धि व साहस का उदय |
| सूर्य-शनि का दृष्टि संबंध | हड्डियों में कमजोरी, सरकारी कार्यों में अड़चन | तांबे के लोटे में गुड़-तिल डालकर अर्घ्य देने से दोष मुक्ति |
| राहु की महादशा / अंतर्दशा | मानसिक भ्रम, अज्ञात भय, अनिद्रा, षड्यंत्र | रातभर तांबे में रखा जल पीने से राहु का विषैला प्रभाव शांत |
तांबा धारण करने अथवा इसके जल का प्रयोग करने से जातक के आभा मंडल (Aura) में एक तेजस्वी स्वर्णिम-रक्त आभा का निर्माण होता है, जिससे नकारात्मक शक्तियां और नजर दोष उसके निकट नहीं आ पाते।
यद्यपि तांबे का जल अत्यंत गुणकारी है, परंतु अज्ञानता अथवा असावधानीवश इसका गलत प्रयोग शरीर के लिए गंभीर विष का कारण भी बन सकता है। तांबे के प्रयोग से पूर्व निम्नलिखित नियमों को समझना अनिवार्य है:
पौष मास में तांबे के लोटे से सूर्य को अर्घ्य देने का पूर्ण फल तभी मिलता है जब उसे विधिपूर्वक संपन्न किया जाए:
तांबे के लोटे में ताजा शुद्ध जल भरें और उसमें निम्नलिखित सात वस्तुएं श्रद्धापूर्वक मिलाएं:
खुले आकाश के नीचे पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा के आसन पर खड़े हों। दोनों हाथों से लोटे को मस्तक से आठ से दस इंच ऊपर उठाएं। लोटे को धीरे-धीरे झुकाते हुए जल की एक पतली और अटूट धारा प्रवाहित करें। तीन बार में जल अर्पित करें। गिरती जलधारा के मध्य से सूर्य के लाल बिंब का दर्शन करें और निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करें:
ॐ भगाय नमः। ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणाय मनोवांछित फलम् देहि देहि स्वाहा॥
अर्घ्य का जल पैरों में न लगे, इसके लिए नीचे तांबे अथवा कांसे का एक बड़ा थाल रख लें। पूजा के उपरांत थाल के जल को किसी पवित्र पौधे (तुलसी, शमी अथवा केले) की जड़ में विसर्जित कर दें।
पौष मास में तांबे के लोटे का यह दोहरा उपयोग-भीतर से उषापान द्वारा देह का शोधन और बाहर से अर्घ्य द्वारा ब्रह्मांडीय सौर ऊर्जा का अवशोषण-मानव जीवन को एक नई आभा प्रदान करता है। यह हमें सिखाता है कि किस प्रकार हमारे पूर्वजों ने धातु विज्ञान, खगोल शास्त्र और शरीर क्रिया विज्ञान को धर्म के साथ जोड़कर एक अत्यंत सहज और व्यावहारिक जीवन शैली का निर्माण किया था।
जब मनुष्य अपनी दैनिक दिनचर्या में तांबे के इस अमृतमय प्रयोग को सम्मिलित करता है, तो उसका शरीर व्याधियों से मुक्त हो जाता है, उसकी बुद्धि कुशाग्र होती है और उसका अंतःकरण सूर्य के समान तेजस्वी बन जाता है। आइए, हम सब इस पौष मास में प्लास्टिक और कांच के बर्तनों का त्याग करके अपनी प्राचीन सनातन परंपरा की ओर लौटें, तांबे के पात्र के जल को अपनाएं और अपने जीवन को आरोग्य, ओज तथा अखंड आत्मबल से आलोकित करें।
पौष मास में तांबे के बर्तन में रखा जल हल्का गुनगुना करके पीना क्यों आवश्यक है? शीत ऋतु में ठंडा जल जठराग्नि को मंद करता है; तांबे के जल को दूसरे बर्तन में हल्का गुनगुना करके पीने से कफ और वात तुरंत शांत होते हैं और पाचन तेज होता है।
तांबे के लोटे से सूर्य को अर्घ्य देते समय जलधारा के बीच से सूर्य को क्यों देखा जाता है? गिरती हुई जलधारा एक प्राकृतिक प्रिज्म की भांति कार्य करती है जो सूर्य की किरणों को सात रंगों में बांटती है, जिससे आंखों के न्यूरॉन्स और पीनियल ग्रंथि सक्रिय होते हैं।
क्या तांबे के बर्तन में नींबू पानी अथवा छाछ रखकर पी सकते हैं? कदापि नहीं; तांबा अम्लीय और खट्टे पदार्थों के साथ रासायनिक क्रिया करके कॉपर साइट्रेट नामक विषैला यौगिक बनाता है, जो भोजन विषाक्तता (Food Poisoning) ला सकता है।
ज्योतिष के अनुसार तांबे का लोटा किन दो मुख्य ग्रहों का प्रतिनिधित्व करता है? तांबा साक्षात ग्रहों के राजा भुवन भास्कर सूर्य और पराक्रम के अधिष्ठाता मंगल देव का प्रतिनिधित्व करता है; इसके प्रयोग से आत्मबल और रक्त बढ़ता है।
तांबे के बर्तन में रखे जल को कितने घंटे बाद पीना सर्वोत्तम माना जाता है? पानी को तांबे के बर्तन में कम से कम 8 से 12 घंटे (रातभर) रखना चाहिए, जिससे तांबे के सूक्ष्म आयन्स जल में घुलकर उसे जीवाणुरहित और क्षारीय बना सकें।
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