पौष मास में देसी घी क्यों खाएं?

By पं. सुव्रत शर्मा

पूस में हड्डियों को फौलाद बनाने, वात शांति और 7 धातुओं के पोषण का रहस्य

पौष मास में देसी घी के फायदे: हड्डियों को मजबूत बनाने के उपाय

सनातन वैदिक संस्कृति, प्राचीन अष्टांग आयुर्वेद और महर्षि चरक द्वारा प्रणीत संहिताओं में भारतीय देशी गोवंश के दुग्ध से मथकर बनाए गए शुद्ध घृत अर्थात देसी घी को साक्षात भूलोक का अमृत, आयुवर्धक रसायन और सर्वश्रेष्ठ स्नेहन द्रव्य स्वीकार किया गया है। पौष मास की हाड़ कंपाने वाली भीषण ठंड, घने कुहासे और शुष्क बर्फीली शीतलहर के दिनों में जब बाह्य वातावरण का तापमान अत्यंत न्यूनतम स्तर तक गिर जाता है तब मानव शरीर की अस्थियां, मेरुदंड, संधियां और मांसपेशियां प्राकृतिक रूप से संकुचित होकर भारी जकड़न, दुर्बलता और असहनीय पीड़ा की शिकार होने लगती हैं। इस विशिष्ट खगोलीय और मौसमी संधिकाल में जब सूर्य नारायण दक्षिणायन के अंतिम चरण में संचरण करते हैं तब आहार के भीतर प्रतिदिन नियमित रूप से दो से तीन छोटे चम्मच शुद्ध देशी गाय के घी का शास्त्रीय विधि से सेवन करना शरीर के भीतर अनियंत्रित रूप से प्रकुपित होने वाले वात दोष को पूरी तरह शांत और नियंत्रित कर देता है। आयुर्वेद के प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार शुद्ध गोघृत मानव शरीर का निर्माण करने वाली सातों आधारभूत धातुओं अर्थात रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और अंत में जीवन के परम सार तत्व शुक्र का उत्तरोत्तर और गंभीर पोषण करता है तथा पित्त को रत्ती भर भी प्रकुपित किए बिना आमाशय के भीतर प्रदीप्त रहने वाली जठराग्नि को निरंतर प्रज्वलित बनाए रखता है।

आध्यात्मिक, तंत्र शास्त्रीय और वैदिक ज्योतिषीय दृष्टि से देशी गाय का घी प्रत्यक्ष रूप से भगवान भुवन भास्कर सूर्य देव के दिव्य ओज, प्राणिक ताप और देवताओं के परम पूज्य गुरु बृहस्पति के विशुद्ध सात्विक ज्ञान, मेधा और विवेक का साकार पार्थिव तेज माना गया है। पौष मास के इस निस्तब्ध और तपस्या प्रधान कालखंड में देवताओं को गाय के घी से बने सात्विक नैवेद्य अर्पित करने, अग्नि में घी की आहुतियां देने और स्वयं प्रतिदिन औषधि रूप में इसका सेवन करने से साधक के अंतःकरण में ओज, एकाग्रता, बुद्धि बल और आंतरिक आत्मिक तेज की असाधारण वृद्धि होती है। शीत ऋतु के इस चरम कालखंड में जब बाह्य शीतल वायु के प्रभाव से मानव शरीर की सूक्ष्म प्राण ऊर्जा भीतर की ओर संकुचित होने लगती है तब घी का यह शास्त्रीय और औषधीय सेवन अस्थियों को फौलाद जैसी अटूट सुदृढ़ता, स्नायु तंत्र को असीम शांति और त्वचा को एक अलौकिक स्वर्णिम आभा प्रदान करता है। इस पावन काल में घी के समस्त प्रमुख घटक, सेवन विधि, ज्योतिषीय संबंध, औषधीय योग और स्वास्थ्य लाभों का प्रामाणिक विवरण नीचे दी गई तालिका में सुव्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया गया है।

घृत घटकशास्त्रीय और औषधीय नियमज्योतिषीय आधार और तत्वमुख्य स्वास्थ्य एवं आध्यात्मिक लाभ
सेवन का प्रधान समयप्रातः काल खाली पेट अथवा दोपहर के भोजन मेंसूर्य देव (अग्नि तत्व) और गुरु (आकाश तत्व)सातों धातुओं का पोषण और जठराग्नि का संवर्धन
अनुशंसित दैनिक मात्रादो से तीन छोटे चम्मच (लगभग 10 से 15 मिली)शुक्र और चंद्र के शुभ प्रभावों का संतुलनअस्थि मज्जा की शुष्कता का नाश और जोड़ों की चिकनाई
सेवन की सर्वोत्तम विधिगुनगुने जल, गाय के दूध अथवा गर्म दाल के साथवात और पित्त का प्राकृतिक संतुलनआंतों का शोधन और ओज का निरंतर विस्तार
देव अर्पण विधानगाय के घी का अखंड दीपक और हवन आहुतिअग्नि देव और सूर्य नारायण की तृप्तिघर के वास्तु दोषों का शमन और सकारात्मक आभामंडल
प्रमुख औषधीय योगसोंठ, मेथी और गोंद के लड्डू में प्रयुक्त घीशनि जनित वात व्याधियों का शमनहड्डियों का घनत्व बढ़ना और कमर दर्द से मुक्ति
वर्जित स्थितियांअत्यधिक कफ, पुराना आमातिसार अथवा ज्वरराहु केतु के तमो दोषों की निवृत्ति हेतु संयमयकृत के भार से बचाव और अग्निमांद्य की रोकथाम

पौष मास की शीतलहर में अस्थियों पर क्या प्रभाव पड़ता है?

वैदिक काल गणना, चरक संहिता और सुश्रुत संहिता के गूढ़ श्लोकों के अनुसार पौष मास हेमंत और शिशिर ऋतुओं का वह अत्यंत संवेदनशील संधिकाल होता है जब आकाश मंडल में भगवान सूर्य देव की जीवनदायिनी किरणें पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध पर अत्यंत मंद, शीतल और तिरछी होकर गिरती हैं। इस मौसमी बदलाव के कारण संपूर्ण बाह्य वातावरण में एक चुभने वाला सूखापन, नमी का अभाव और अत्यधिक शीतल वायु का प्रवाह निरंतर बना रहता है जो सीधे तौर पर मानव शरीर के भीतर वात दोष के प्राकृतिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देता है। मानव शरीर रचना विज्ञान और आयुर्वेद के अनुसार जब शरीर में रुक्ष और शीतल वात का स्तर अत्यधिक बढ़ जाता है, तो वह सबसे पहले शरीर की अस्थियों अर्थात हड्डियों और उनके संधियों अर्थात जोड़ों में स्थित श्लेषक कफ को सुखाकर नष्ट करने लगता है। हड्डियों के जोड़ों के बीच पाई जाने वाली वह प्राकृतिक चिकनाई जिसे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में सायनोवियल फ्लूइड कहा जाता है, इस कड़ाके की ठंड में तेजी से गाढ़ी होकर जमने लगती है और धीरे धीरे सूखने लगती है।

इसके प्रत्यक्ष और कष्टकारी परिणाम स्वरूप मनुष्य को चलते फिरते, सीढ़ियां चढ़ते अथवा उठते बैठते समय घुटनों और टखनों में कट कट की ध्वनि स्पष्ट सुनाई देने लगती है, कमर, कंधों और गर्दन की मांसपेशियों में भयंकर अकड़न उत्पन्न हो जाती है तथा अतीत में लगी पुरानी चोटों का दर्द अचानक तीव्र होकर उभर आता है। विशेष रूप से जीवन के उत्तरार्ध में चल रहे वृद्धजनों, रजोनिवृत्ति के दौर से गुजर रही महिलाओं और कमजोर शारीरिक संरचना वाले व्यक्तियों में हड्डियों के भीतर का खनिज घनत्व तेजी से घटने लगता है जिसे आधुनिक चिकित्सा में ऑस्टियोपोरोसिस और अस्थि क्षय रोग कहा जाता है। जब इस शुष्क और ठंडी ऋतु में दैनिक आहार के माध्यम से शरीर को पर्याप्त आंतरिक चिकनाई, पोषण और स्नेहन प्राप्त नहीं होता, तो हड्डियों के भीतर स्थित अस्थि मज्जा सूखने लगती है जिससे पूरा कंकाल तंत्र भीतर से छिद्रित, खोखला, स्पंजी और अत्यंत दुर्बल होने लगता है। पौष मास की इस प्राण घातक शीतलहर से अपनी हड्डियों को सुरक्षित रखने का एकमात्र प्राकृतिक, सुरक्षित और अचूक वैदिक उपाय यही है कि शरीर को भीतर से शुद्ध गोघृत का निरंतर और संतुलित स्नेहन प्रदान किया जाए।

आयुर्वेद के अनुसार सातों धातुओं का पोषण घी कैसे करता है?

सनातन आयुर्वेद का आधारभूत सिद्धांत यह अकाट्य सत्य स्पष्ट करता है कि हमारा यह नश्वर भौतिक शरीर सात प्रमुख धातुओं के क्रमिक, सूक्ष्म और व्यवस्थित विकास से निर्मित हुआ है। जब हम कोई शुद्ध और सात्विक आहार ग्रहण करते हैं, तो वह सबसे पहले पाचन के उपरांत रस धातु में परिवर्तित होता है, रस से पांच दिनों में रक्त का निर्माण होता है, रक्त से मांस, मांस से मेद अर्थात वसा, मेद से अस्थि अर्थात हड्डियां, अस्थि से मज्जा अर्थात बोन मैरो और अंत में मज्जा के सार तत्व से शुक्र धातु अर्थात ओजस्वी जनन तत्व का निर्माण होता है। इन सातों शारीरिक धातुओं के परम शुद्ध, सूक्ष्म, दिव्य और निष्कलंक सार तत्व को ही आयुर्वेद में 'ओज' कहा जाता है जो वास्तव में मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता, जीवन शक्ति और चेहरे की आंतरिक चमक का आधार है। महर्षि सुश्रुत ने अपनी संहिता में स्पष्ट उद्घोष किया है कि देशी गाय का घी इस संपूर्ण ब्रह्मांड का वह एकमात्र दिव्य पदार्थ है जो बिना किसी पाचन अवरोध के इन सातों धातुओं में समान रूप से प्रविष्ट होकर उन्हें एक साथ तृप्त, पुष्ट और बलवान करने का अद्वितीय सामर्थ्य रखता है।

गाय का शुद्ध घी अपने मधुर रस, भारी विपाक और परम स्निग्ध गुणों के कारण आंतों से अवशोषित होकर सीधे अस्थि धातु तक गहराई से पहुंचता है और हड्डियों के उन सूक्ष्म छिद्रों को प्राकृतिक चिकनाई से भर देता है जहां वात ने अपना सूखापन जमा लिया था, जिससे हड्डियां टूटने से बचती हैं और फौलाद के समान अत्यंत मजबूत, लचीली और टिकाऊ बन जाती हैं। अस्थि धातु को पोषण देने के पश्चात यह घी तुरंत मज्जा धातु के भीतर प्रवेश करता है जिससे मस्तिष्क के न्यूरॉन्स, मेरुरज्जु की केंद्रीय तंत्रिकाएं और रीढ़ की नसें पूरी तरह शांत, पुष्ट और सक्रिय हो जाती हैं। अंत में यह शुक्र धातु का शोधन और संवर्धन करके संपूर्ण शरीर में ओज की एक अभेद्य ऊर्जा का निर्माण करता है। पौष मास के इस ठंडे मौसम में घी का यह गहरा कोशिकीय पोषण शरीर की एक एक मृतप्राय कोशिका को पुनर्जीवित कर देता है जिससे शीत ऋतु की भयंकर से भयंकर ठंड भी व्यक्ति के आंतरिक बल, पराक्रम और जीवन शक्ति को रत्ती भर भी क्षीण नहीं कर पाती।

ज्योतिषीय दृष्टि से घी का सूर्य और गुरु ग्रह से क्या संबंध है?

सनातन वैदिक ज्योतिष शास्त्र में इस चराचर जगत के प्रत्येक अन्न और खाद्य पदार्थ का संबंध किसी न किसी विशिष्ट ग्रह और ब्रह्मांडीय ऊर्जा तरंग से गहराई से जुड़ा हुआ स्वीकार किया गया है। देशी गाय के शुद्ध घी का स्वर्णिम पीला वर्ण, उसकी दिव्य स्निग्धता और उसकी सात्विक सुगंध सीधे तौर पर नवग्रह मंडल के अधिपति भगवान भुवन भास्कर सूर्य देव और देवताओं के परम ज्ञानी गुरु बृहस्पति का प्रतिनिधित्व करती है। सूर्य देव जहां कालपुरुष की कुंडली में आत्मा के कारक, शारीरिक तेज, कंकाल तंत्र अर्थात हड्डियों के स्वामी और जीवन की प्राण ऊर्जा के परम संचालक हैं, वहीं देवगुरु बृहस्पति उच्च बुद्धि, सात्विक ज्ञान, स्मृति शक्ति, यकृत अर्थात लिवर और शारीरिक वृद्धि के मुख्य अधिष्ठाता ग्रह माने गए हैं। इसके अतिरिक्त घी के भीतर उपस्थित वह प्राकृतिक चिकनाई और सौंदर्य सीधे तौर पर शुक्र ग्रह को बल प्रदान करती है जो मानव शरीर के तेज, सौंदर्य और ओज का मुख्य संचालक ग्रह है।

जब किसी जातक की जन्म कुंडली में सूर्य देव नीच राशि तुला में स्थित हों, राहु अथवा केतु के क्रूर ग्रहण दोष से पीड़ित हों, अथवा छठवें व आठवें भाव में स्थित होकर निर्बल हो रहे हों, तो उस व्यक्ति की हड्डियां बचपन से ही कमजोर रहती हैं, कैल्शियम की कमी बनी रहती है और उसे बारंबार नेत्र विकार, सिरदर्द तथा हृदय संबंधी दुर्बलता का सामना करना पड़ता है। इसी प्रकार जब किसी जातक की कुंडली में गुरु ग्रह कमजोर, अस्त अथवा शत्रु राशि में होता है, तो व्यक्ति का लिवर फैटी हो जाता है, ज्ञान और निर्णय क्षमता में भटकाव आता है, पाचन की खराबी बनी रहती है और संतानों के भाग्य में कष्ट उत्पन्न होते हैं। पौष मास में भगवान सूर्य नारायण जब धनु राशि में संचरण करते हैं, जो देवगुरु बृहस्पति की अपनी मूल त्रिकोण और अत्यंत प्रिय राशि है, उस पावन समय पर गाय के घी का नित्य सेवन करना और प्रातः व संध्या समय अग्नि में घी का दीपदान करना कुंडली के सूर्य और गुरु दोनों को एक साथ सर्वोच्च बल प्रदान करता है। इससे साधक के मस्तक और चेहरे पर एक अलौकिक आभा खिल उठती है, उसका आत्मविश्वास अडिग हो जाता है और उसकी बौद्धिक एकाग्रता कई गुना बढ़ जाती है।

पूस के महीने में देसी घी के 5 प्रमुख औषधीय नुस्खे कौन से हैं?

पौष मास की इस कड़ाके की ठंड में हड्डियों को फौलाद जैसी अटूट मजबूती देने, वात दोष को जड़ से मिटाने और संपूर्ण शरीर का प्राकृतिक कायाकल्प करने के लिए प्राचीन आचार्यों द्वारा अनुशंसित पांच प्रमुख औषधीय प्रयोग अत्यंत चमत्कारी परिणाम दर्शाते हैं।

  1. सोंठ, मेथी और बबूल के शुद्ध गोंद के औषधीय लड्डू: देशी गाय के शुद्ध घी में चक्की के पिसे मोटे गेहूं के आटे को मंद आंच पर सुनहरा भूनकर उसमें पीसी हुई सोंठ का चूर्ण, बारीक मेथी दाना चूर्ण, घी में फूलाया हुआ बबूल का कीमती गोंद, मखाने का पाउडर, बादाम की गिरी और शुद्ध गन्ने का पुराना गुड़ मिलाकर गोल लड्डू तैयार करें। प्रातः काल सूर्योदय के समय एक लड्डू खूब चबा चबाकर खाने के बाद ऊपर से एक गिलास हल्का गुनगुना गाय का दूध पीने से घुटनों, कमर, पिंडलियों और रीढ़ की हड्डी का पुराना से पुराना दर्द जड़ से समाप्त हो जाता है और अस्थियों का घनत्व आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाता है।

  2. प्रातः काल खाली पेट गुनगुने जल के साथ दिव्य घृतपान: नित्य प्रातः काल शैया त्यागने और शौच से निवृत्त होने के तत्काल बाद एक गिलास हल्के गर्म जल में एक बड़ा चम्मच शुद्ध देशी गाय का घी मिलाकर चम्मच से घोलें और धीरे धीरे घूंट घूंट करके चाय की भांति पिएं। यह शास्त्रीय प्रयोग आंतों की आंतरिक श्लेष्मा दीवारों पर चिपकी हुई महीनों पुरानी बासी गंदगी, मल और विषाक्त आमा को पिघलाकर शरीर से बाहर निकाल देता है, आंतों के घावों को भरता है, पुरानी से पुरानी कब्ज को सदा के लिए मिटाता है और पूरे शरीर की सूखी हड्डियों को स्वाभाविक चिकनाई प्रदान करता है।

  3. रात्रि में हल्दी और घी युक्त सिद्ध क्षीर पाक का सेवन: रात को सोने से ठीक आधा घंटा पूर्व एक गिलास शुद्ध गाय के दूध में आधा छोटा चम्मच शुद्ध पिसी हुई हल्दी, दो चुटकी दालचीनी का चूर्ण और एक बड़ा चम्मच गाय का देशी घी डालकर धीमी आंच पर तीन उबाल आने तक पकाएं। इस गुनगुने सिद्ध दूध का घूंट घूंट सेवन करने से शीतकाल में होने वाली अनिद्रा और मानसिक बेचैनी समाप्त होती है, फेफड़ों में जमा हुआ गाढ़ा कफ ढीला होकर बाहर निकल जाता है और शरीर को अत्यंत गहरी, शांतिदायक और ऊर्जावान नींद प्राप्त होती है।

  4. दोनों नासिका छिद्रों में नित्य प्रति नस्य कर्म विधान: प्रातः काल स्नान के उपरांत अथवा रात्रि में शयन से पूर्व समतल बिस्तर पर लेटकर अपनी दोनों नासिका छिद्रों में हल्का गुनगुना किया हुआ शुद्ध देशी गाय का घी दो दो बूंद टपकाएं और हल्के से गहरा श्वास ऊपर की ओर खींचें। आयुर्वेद में नासिका को संपूर्ण सिर और मस्तिष्क का प्रत्यक्ष द्वार कहा गया है। यह सरल सा दिखने वाला नस्य कर्म मस्तिष्क की उन समस्त सूक्ष्म नसों को गहरा पोषण देता है जो स्मरण शक्ति को संभालती हैं, माइग्रेन व सिरदर्द को मिटाता है, बालों को असमय सफेद होने से रोकता है तथा शीत ऋतु में होने वाले अवसाद से मन को बचाता है।

  5. पैरों के तलवों की घृत मालिश और कांसा पात्र घर्षण: रात्रि में विश्राम करने से पूर्व अपने दोनों पैरों के तलवों पर थोड़ा सा शुद्ध देशी गाय का घी लगाएं और किसी शुद्ध कांसे के पात्र अथवा कटोरी के पिछले गोल हिस्से से दस से पंद्रह मिनट तक हल्के हाथों से घर्षण करें। घर्षण करते करते जब तलवों की त्वचा से काला सा चिपचिपा द्रव्य बाहर निकलने लगे, तो यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि शरीर के भीतर छिपी हुई अतिरिक्त पित्त, तनाव और विषाक्त ऊष्मा बाहर निकल रही है। यह प्रयोग नेत्र ज्योति को दिव्य रूप से बढ़ाता है, पैरों की जलन को शांत करता है और पूरे स्नायु तंत्र को असीम शांति प्रदान करता है।

आध्यात्मिक साधना और देव पूजन में गोघृत का क्या महत्व है?

सनातन धर्म के समस्त वैदिक अनुष्ठानों, महायज्ञों, गृह शांति पाठों और नित्य देव आराधना में देशी गाय के शुद्ध घी के बिना कोई भी पूजा अथवा साधना पूर्ण नहीं मानी जाती। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त और पुरुष सूक्त के पावन मंत्रों में भगवान अग्नि देव को घृत की आहुति पाकर ही परम प्रदीप्त और तृप्त होने वाला साक्षात हव्यवाह कहा गया है। जब तांबे के चौकोर हवन कुंड में गाय के सूखे उपले पर भीमसेनी कपूर और शुद्ध गाय का घी समर्पित किया जाता है, तो उससे उत्पन्न होने वाला धुआं संपूर्ण वातावरण की वायु को शुद्ध कर देता है। आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों ने भी यह निर्विवाद रूप से स्वीकार किया है कि मात्र एक छोटा चम्मच गाय का घी जब धधकती हुई अग्नि में जलता है, तो वह वायुमंडल में उपस्थित हानिकारक रेडियोधर्मी विकिरणों को निष्प्रभावी करता है और कई मीट्रिक टन प्राणवायु अर्थात ऑक्सीजन के उत्पादन और वायु शोधन में असाधारण सहायता करता है।

पौष मास की घनी, शीतल और अंधकारमय संध्या वेला में घर के पूजा स्थल अथवा तुलसी के पादप के समीप शुद्ध गाय के घी का एक बड़ा दीपक प्रज्वलित करने से घर के भीतर जमा शीतकालीन तमोगुण, नकारात्मक स्पंदन, आलस्य और दरिद्रता तत्क्षण नष्ट हो जाती है। भगवान श्री हरि विष्णु और माता महालक्ष्मी को शुद्ध देशी घी में भुने हुए मखाने की खीर और केसरिया हलवे का भोग लगाने से उस गृहस्थ के भंडार कभी भी अन्न और धन से रिक्त नहीं होते। गोघृत का वह पावन दीपक केवल एक भौतिक ज्योति नहीं है बल्कि वह ज्ञान की उस अखंड दिव्य ज्योति का साकार प्रतीक है जो अज्ञान और अंधकार के घने पर्दों को चीरकर जीवात्मा को परमात्मा के परम साक्षात्कार की ओर निरंतर अग्रसर करती है।

आहार शुद्धि और आत्मिक तेज का शाश्वत संदेश क्या है?

सनातन ऋषि परंपरा का यह अमर उद्घोष रहा है कि जैसा खाए अन्न, वैसा होवे मन और जैसा पिए पानी, वैसी बोले बानी। हमारा मानसिक चिंतन, बौद्धिक विवेक, निर्णय क्षमता और आध्यात्मिक चेतना सीधे तौर पर उस आहार की शुद्धता और पवित्रता पर निर्भर करती है जिसे हम प्रतिदिन अपने शरीर के भीतर ग्रहण करते हैं। बाजार में बिकने वाले मिलावटी, रासायनिक रूप से रिफाइंड किए गए और अशुद्ध वनस्पति तेलों का निरंतर सेवन करके कोई भी साधक अपनी बुद्धि को स्थिर, सात्विक और एकाग्र कदापि नहीं रख सकता। देशी गाय का शुद्ध घी केवल एक भौतिक भोजन या कैलोरी का स्रोत मात्र नहीं है बल्कि वह भारतीय गोमाता के वात्सल्य, ममत्व, पृथ्वी के औषधीय तृणों और प्रकृति के परम सात्विक रस का साकार विग्रह है। पौष मास की यह कठोर, गंभीर और शीतल ऋतु हमें यह अमर प्रेरणा देती है कि हम अपने शरीर रूपी इस दिव्य देवालय को शुद्ध, पवित्र, सात्विक और पोषक आहार से सींचें ताकि यह साधन ईश्वर भक्ति, धर्म पालन और जनकल्याण के पावन पथ पर आजीवन अटूट बना रह सके। जब कोई मनुष्य पौष मास में गोघृत के इस दिव्य विज्ञान को अपने दैनिक आचरण में निष्ठापूर्वक अपना लेता है, तो उसकी हड्डियां फौलाद जैसी अटूट और मजबूत, उसका मन पूर्णिमा के चंद्रमा जैसा शांत और उसकी आत्मा भुवन भास्कर सूर्य जैसी देदीप्यमान और तेजस्वी बन जाती है।

FAQ

पौष मास में एक दिन में कितना देसी घी खाना स्वास्थ्य के लिए पूरी तरह सुरक्षित माना गया है? एक सामान्य स्वस्थ वयस्क व्यक्ति के लिए पौष मास की शीतल ऋतु में प्रतिदिन दो से तीन छोटे चम्मच अर्थात लगभग 10 से 15 मिलीलीटर शुद्ध देशी गाय का घी खाना पूरी तरह सुरक्षित और स्वास्थ्यवर्धक माना गया है, बशर्ते वह व्यक्ति प्रतिदिन थोड़ा बहुत शारीरिक श्रम अथवा कम से कम 30 मिनट तेज गति से पैदल चलने का अभ्यास अवश्य करता हो।

क्या वजन और कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के भय से सर्दियों में देसी घी खाने से बचना चाहिए? नहीं, यह एक बहुत बड़ा आधुनिक वैज्ञानिक भ्रम है। देशी गाय के शुद्ध घी में शॉर्ट चेन और मीडियम चेन फैटी एसिड्स पाए जाते हैं जो शरीर में वसा का संचय करने के स्थान पर पहले से जमी हुई अतिरिक्त चर्बी को पिघलाकर ऊर्जा में बदलते हैं। उचित मात्रा में हल्के गर्म रूप में खाया गया गाय का घी वजन घटाने, मेटाबॉलिज्म को तेज करने और अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में सहायता करता है।

हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए देसी घी का सेवन किस समय करना सर्वाधिक उत्तम माना गया है? अस्थियों और जोड़ों को फौलाद जैसी मजबूती देने के लिए प्रातः काल शौच के बाद खाली पेट एक गिलास गुनगुने जल में एक चम्मच घी मिलाकर पीना सर्वाधिक श्रेष्ठ माना गया है। इसके अतिरिक्त दोपहर के भोजन में ताजी बनी गर्म दाल और चपाती पर एक चम्मच घी डालकर खाना भी हड्डियों के पोषण के लिए अत्यंत लाभकारी होता है।

क्या कफ, जुकाम और खांसी की समस्या होने पर भी देसी घी खाया जा सकता है? यदि कफ के साथ तेज बुखार अथवा गंभीर अपच की समस्या हो, तो उस समय सीधे अधिक मात्रा में घी खाने से बचना चाहिए। यद्यपि सूखे कफ, सीने की जकड़न और गले की खराश में गाय के हल्के गर्म घी में भुनी हुई काली मिर्च का बारीक चूर्ण और थोड़ा सा सेंधा नमक मिलाकर चाटने से बलगम ढीला होकर बाहर निकल जाता है और फेफड़ों को तत्काल गहरा आराम मिलता है।

बाजार में मिलने वाले सामान्य पैकेट बंद घी और देशी गाय के वैदिक घी में क्या अंतर होता है? बाजार में मिलने वाला अधिकांश सामान्य घी जर्सी गायों, भैंसों के दूध की मलाई अथवा पाम ऑयल की मिलावट से सीधे क्रीम को गर्म करके बनाया जाता है जो शरीर में एलडीएल कोलेस्ट्रॉल और कफ दोष को बढ़ाता है। इसके विपरीत भारतीय देशी नस्ल की गिर या साहिवाल गाय के शुद्ध दूध को जमाकर दही बनाकर मथने के बाद वैदिक बिलोना पद्धति से बना घी साक्षात औषधि होता है जो शरीर को कभी नुकसान नहीं पहुंचाता।

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पं. सुव्रत शर्मा

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