पौष मास में क्या न खाएं?

By पं. संजीव शर्मा

मूली, बैंगन, दही और बासी भोजन निषेध: स्वास्थ्य और आयुर्वेद रहस्य

पौष मास में क्या न खाएं: मूली, बैंगन और दही के कड़े निषेध नियम

सामग्री तालिका

पौष मास की शास्त्रीय आहार वर्जनाएं और ऋतु संधिकाल

सनातन काल गणना और आयुर्वेद के मौलिक सिद्धांतों के अनुसार पौष मास (दिसंबर-जनवरी) शिशिर ऋतु के आगमन और हेमंत के समापन का अत्यंत संवेदनशील संधिकाल माना गया है। इस कालखंड में संपूर्ण बाह्य प्रकृति कड़ाके की ठंड, घने कोहरे और बर्फीली पछुआ हवाओं के प्रभाव में रहती है। जहां एक ओर इस ऋतु में प्रदीप्त जठराग्नि के पोषण हेतु स्निग्ध, उष्ण, भारी और बलवर्धक आहार का विधान किया गया है, वहीं दूसरी ओर कुछ विशिष्ट खाद्य पदार्थों का सेवन धर्मशास्त्रों और आयुर्वेद संहिताओं में अत्यंत कड़ाई से निषिद्ध माना गया है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण, पद्म पुराण तथा चरक संहिता में स्पष्ट निर्देश मिलता है कि ऋतु परिवर्तन के समय यदि मनुष्य अपनी जिह्वा के स्वाद पर नियंत्रण न रखकर वर्जित द्रव्यों का सेवन करता है, तो उसकी प्रदीप्त जठराग्नि दूषित हो जाती है। यह विकृत अग्नि शरीर में 'आम' (विषाक्त रस) का निर्माण करती है, जो रक्त वाहिकाओं में अवरोध उत्पन्न करके वात व्याधियों, पक्षाघात (लकवा), जोड़ों के गंभीर दर्द और पाचन तंत्र के रोगों को जन्म देती है।

वर्जित खाद्य श्रेणीमुख्य निषिद्ध आहार द्रव्यशास्त्रीय व आयुर्वेदिक कारणसंभावित शारीरिक दुष्प्रभाव
प्रधान शाक निषेधमूली (कच्ची व रात्रि में) तथा बैंगनवात प्रकोपक, रुक्ष, शीत वीर्य और तामसिक गुणउदर अफारा, जोड़ों में जकड़न, गैस व चर्म विकार
दुग्ध उत्पाद निषेधरात्रि में दही, कच्चा ठंडा दूध व छाछअभिष्यंदी गुण, स्रोतोरोधक और कफ वर्धकसायनोसाइटिस, श्वास नलिका अवरोध व मंदाग्नि
पक्व अन्न निषेधबासी अन्न, खुले में रखा ठंडा भोजनप्राण ऊर्जा विहीन, पचने में अत्यंत भारी, विषैलाआंतों का संक्रमण, मंद चयापचय व विषाक्तता
मसाला व स्वाद निषेधअत्यधिक जीरा, अत्यधिक तीखा व खट्टाअत्यधिक रुक्षता, पित्त वृद्धि व कफ जमावत्वचा का फटना, रक्त पित्त व नसों की शुष्कता
तामसिक द्रव्य निषेधमांस, मदिरा, बासी मछली, अंडारक्त दूषण, अंतःकरण मलिनता, तमोगुण वृद्धिरक्तचाप वृद्धि, यकृत विकार व साधना नाश
जीवनशैली निषेधदिवास्वाप (दिन में शयन) व ठंडा जल स्नानकफ और तमस की अत्यधिक वृद्धिपक्षाघात, शरीर का भारीपन व अग्नि मांद्य

शास्त्रों का यह अटल सिद्धांत है कि पथ्य (उचित आहार) का पालन किए बिना की गई कोई भी औषधि अथवा पूजा निष्फल हो जाती है। पौष मास में आहार की यह निषेध सूची केवल धार्मिक नियमों का पालन नहीं है बल्कि मानव शरीर को शीत ऋतु के गंभीर दुष्प्रभावों से बचाकर स्वस्थ और दीर्घायु बनाए रखने का एक परिष्कृत वैज्ञानिक सुरक्षा चक्र है।


ब्रह्मवैवर्त पुराण का मूली निषेध: सूक्ष्म वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक सत्य

धर्मशास्त्रों में, विशेष रूप से ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्म खंड में विभिन्न महीनों के लिए विशिष्ट शाकों के त्याग का स्पष्ट निर्देश दिया गया है। वहां कहा गया है कि पौष मास में मूली का सेवन सर्वथा त्याज्य है:

पौषे मूलकं वर्जयेत्।
(अर्थात् पौष के महीने में मूली का सेवन पूर्णतः त्याग देना चाहिए।)

सामान्यतः मूली को शीतकालीन सलाद के रूप में देखा जाता है, परंतु पौष मास के कड़ाके की ठंड वाले दिनों में इसके गुण धर्म में एक सूक्ष्म जैविक परिवर्तन घटित होता है। आयुर्वेद के अनुसार मूली स्वभाव से तीक्ष्ण, वात वर्धक, भारी और पाचन के उपरांत शरीर में अत्यधिक वायु उत्पन्न करने वाली होती है।

  • वात दोष का तीव्र प्रकोप: पौष के महीने में वातावरण में पहले से ही रुक्ष और ठंडी वायु का प्रकोप होता है। मूली का सेवन करने से आंतों में अपान वायु अत्यधिक बढ़ जाती है, जिससे पेट फूलना (अफारा), खट्टी डकारें, आंतों में मरोड़ और उदर शूल की समस्या उत्पन्न होती है।
  • जोड़ों के सायनोवियल द्रव की हानि: प्रकुपित वात जब रक्त के साथ मिलकर शरीर की संधियों (जोड़ों) में प्रवेश करता है, तो यह जोड़ों के बीच के प्राकृतिक चिकने द्रव को सुखा देता है। इसके परिणामस्वरूप गठिया, घुटनों का दर्द और सायटिका का दर्द असहनीय हो जाता है।
  • कच्ची मूली के चर्म रोग संबंधी दोष: आयुर्वेद के अनुसार इस ऋतु में कच्ची मूली खाने से रक्त धातु दूषित होती है, जिससे त्वचा पर पित्ती (Hives), दाद, खाज और शीत पित्त की समस्या अचानक बढ़ जाती है।
  • शास्त्रों में मदिरा तुल्य दोष: ब्रह्मवैवर्त पुराण में उल्लेख मिलता है कि जो व्यक्ति पौष मास में मूली का भक्षण करता है, उसे मदिरा पान के समान दोष लगता है और उसकी दैनिक पूजा व देव तर्पण निष्फल हो जाते हैं।

यदि किसी विशेष परिस्थिति में मूली का उपयोग करना ही पड़े, तो उसे कभी भी कच्चा अथवा रात्रि के समय नहीं खाना चाहिए। उसे शुद्ध गाय के घी में अजवाइन, हींग और सोंठ के साथ भली-भांति पकाकर ही अल्प मात्रा में ग्रहण करना चाहिए।


बैंगन निषेध का तात्विक और औषधीय रहस्य

सनातन भोजन परंपरा में बैंगन (वार्ताक) को कई विशेष मासों और तिथियों में वर्जित माना गया है। पौष मास में बैंगन का त्याग करने का विधान आयुर्वेद और धर्मशास्त्र दोनों में प्रमुखता से मिलता है। बैंगन का शाब्दिक अर्थ ही लोक भाषा में 'बिना गुण वाला' माना गया है, परंतु इसके पीछे गहरा वनस्पति विज्ञान छिपा हुआ है।

  • वात और पित्त का दोहरा असंतुलन: बैंगन स्वभाव से उष्ण और भारी होता है, परंतु यह शरीर के भीतर रक्त पित्त को उत्तेजित करता है। शीत ऋतु में जब त्वचा पहले से ही शुष्क होती है, बैंगन का सेवन शरीर में आंतरिक दाह और खुजली पैदा करता है।
  • सूक्ष्म कीटों का संचय: पूस की ठंड और पाले के दिनों में बैंगन के भीतर सूक्ष्म कीट और उनके अंडे प्राकृतिक रूप से पनपते हैं, जो कई बार नग्न आंखों से दिखाई नहीं देते। ऐसा दूषित बैंगन खाने से आंतों में कृमि रोग और पेट के गंभीर संक्रमण हो जाते हैं।
  • जोड़ों की सूजन और यूरिक एसिड: आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है कि नाइटशेड (Nightshade) परिवार की सब्जी होने के कारण बैंगन में सोलेनाइन नामक तत्व पाया जाता है, जो शरीर में यूरिक एसिड के स्तर को बढ़ाकर जोड़ों की सूजन और आर्थराइटिस के दर्द को तीव्र कर देता है।
  • साधना में तमस की वृद्धि: तांत्रिक और वैष्णव संहिताओं के अनुसार बैंगन को तामसिक शाक माना गया है। इसके सेवन से मन में आलस्य, कामुक विचार और प्रमाद बढ़ता है, जिससे ब्रह्म मुहूर्त में जागरण और मंत्र जप में बाधा उत्पन्न होती है।

रात्रि में दही और ठंडे दूध का सेवन क्यों है वर्जित?

आयुर्वेद के आदि ग्रंथ चरक संहिता में दही के सेवन के अत्यंत कड़े और स्पष्ट नियम निर्धारित किए गए हैं। महर्षि चरक का यह अटल निर्देश है:

न रात्रौ दधि भुञ्जीत।
(अर्थात् रात्रि के समय कभी भी किसी भी ऋतु में दही का सेवन नहीं करना चाहिए।)

पौष मास में रात्रि के समय दही, मट्ठा और कच्चे ठंडे दूध का सेवन साक्षात विष के समान माना गया है।

दुग्ध उत्पादसामान्य गुण धर्मपौष की रात्रि में जैविक प्रभावउत्पन्न होने वाले गंभीर रोग
दही (Curd)उष्ण वीर्य, अम्ल रस, अभिष्यंदी, भारीसूक्ष्म स्रोतों (Body Channels) को अवरुद्ध करनासायनोसाइटिस, टॉन्सिलाइटिस, दमा, चर्म रोग
कच्चा ठंडा दूधशीत वीर्य, भारी, कफ वर्धकजठराग्नि को बुझाना और बलगम का संचयफेफड़ों में निमोनिया, छाती में जकड़न, जुकाम
पतली खट्टी छाछवात शामक (दिन में), शीत (रात में)रात में वात और कफ को एक साथ भड़कानाजोड़ों में तेज दर्द, सिरदर्द व अनिद्रा
पनीर व खोयाअत्यधिक भारी, पचने में कठिनरात में पाचन न होने से आम विष का निर्माणअपच, खट्टी डकारें, आंतों में भारीपन

अभिष्यंदी गुण का वैज्ञानिक रहस्य

दही स्वभाव से 'अभिष्यंदी' होता है। अभिष्यंदी उन पदार्थों को कहा जाता है जो शरीर के सूक्ष्म छिद्रों और रक्त नलिकाओं में गाढ़ा चिपचिपा पदार्थ जमा करके उनके प्रवाह को रोक देते हैं। पौष मास की रात्रि में जब तापमान बहुत कम होता है, दही का यह गुण शरीर में कफ को जमा देता है। इससे श्वसन नलिकाओं में रुकावट आती है, सुबह उठने पर सिर में भारीपन रहता है और चेहरे पर सूजन आ जाती है।

यदि दूध का सेवन करना हो, तो रात्रि में सदैव गाय के दूध को अच्छी तरह उबालकर उसमें सोंठ, हल्दी, दालचीनी अथवा केसर मिलाकर ही गर्म-गर्म पीना चाहिए। यह शरीर को आंतरिक ऊष्मा देता है और कफ को जमने नहीं देता।


खुले में रखा बासी भोजन और पक्षाघात (लकवा) का खतरा

पौष मास की कड़ाके की ठंड में एक बहुत बड़ा भ्रम यह रहता है कि भोजन कई दिनों तक खराब नहीं होता, इसलिए लोग रात का बना भोजन अगले दिन दोपहर अथवा शाम तक खाते रहते हैं। आयुर्वेद और आधुनिक सूक्ष्म जीव विज्ञान दोनों इस आदत को अत्यंत घातक मानते हैं।

  • प्राण ऊर्जा का विसर्जन: सनातन धर्म के अनुसार भोजन बनने के तीन प्रहर (लगभग तीन घंटे) के पश्चात वह 'बासी' हो जाता है और उसमें से जीवनदायिनी प्राण शक्ति समाप्त हो जाती है। श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भोजन ठंडा, बासी, दुर्गंधयुक्त और रसहीन हो चुका हो, वह तामसिक व्यक्तियों को प्रिय होता है और शरीर में केवल रोग उत्पन्न करता है।
  • तापमान व्युत्क्रमण और जीवाणु संचय: सर्दियों में जब भोजन खुले में रखा रहता है, तो वातावरण की नमी और पाला उस पर जम जाता है। यह ठंडा बासी भोजन जब आमाशय में प्रवेश करता है, तो यह प्रदीप्त जठराग्नि पर ठंडे पानी की भांति कार्य करता है, जिससे पाचन अग्नि तत्काल बुझ जाती है।
  • पक्षाघात (लकवा) और फेशियल पाल्सी का खतरा: आयुर्वेद के अनुसार जब बासी, अत्यंत ठंडा और रुक्ष अन्न पेट में पच नहीं पाता, तो वह शरीर की मुख्य रक्त वाहिकाओं में रक्त के थक्के (Blood Clots) और वात का अवरोध उत्पन्न कर देता है। कड़ाके की ठंड में सुबह के समय जब रक्त नलिकाएं पहले से ही संकुचित होती हैं, यह बासी भोजन रक्तचाप को असंतुलित करके 'अर्धित' (फेशियल पाल्सी) अथवा पक्षाघात (ब्रेन स्ट्रोक) का मुख्य कारण बन जाता है।

भोजन सदैव ताजा, गरमा-गरम और शुद्ध गाय के घी से युक्त होना चाहिए। फ्रिज में कई दिनों तक रखा हुआ भोजन गर्म करके खाना भी पौष मास में आंतों के कैंसर और अल्सर का मार्ग प्रशस्त करता है।


अत्यधिक जीरा और खट्टे पदार्थों से परहेज का विज्ञान

भारतीय रसोई में जीरा एक अत्यंत लोकप्रिय मसाला है, परंतु पौष मास में इसका अत्यधिक सेवन वर्जित बताया गया है।

  • जीरे का रुक्ष और शीत वीर्य प्रभाव: जीरा स्वभाव से पाचक होते हुए भी तासीर में अत्यधिक सूखा (रुक्ष) और शीत वीर्य होता है। पौष मास में जब वातावरण पहले से ही शुष्क होता है, भोजन में जीरे का अधिक प्रयोग त्वचा और आंतरिक नसों के भीतर की प्राकृतिक चिकनाई को सोख लेता है। इससे होंठ फटना, एड़ियों का फटना और गंभीर कब्ज की समस्या पैदा होती है। इसके स्थान पर अजवाइन, मेथी और हींग का उपयोग श्रेष्ठ माना गया है।
  • अत्यधिक खट्टे पदार्थों का निषेध: इमली, अमचूर, कच्चा आम और अत्यधिक खट्टे सिरके का सेवन इस मास में वर्जित है। अत्यधिक अम्ल रस रक्त को पतला करने के बजाय उसमें दूषित पित्त को बढ़ाता है, जिससे जोड़ों में दर्द, मांसपेशियों में ऐंठन और दांतों में संवेदनशीलता (झनझनाहट) उत्पन्न होती है।

तामसिक पदार्थों, मांस-मदिरा और बासी वसा का परित्याग

पौष मास को सूर्य उपासना, साधना और अंतर्मुखी ऊर्जा संचय का पवित्र काल माना गया है। इस महीने में तामसिक पदार्थों का सेवन करना शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर आत्मघाती सिद्ध होता है।

तामसिक पदार्थशास्त्रीय व आध्यात्मिक दोषशारीरिक व जैविक दुष्परिणाम
मदिरा (शराब)सूर्य व गुरु का अपमान, मति भ्रष्ट होनायकृत की सूजन, निर्जलीकरण, रक्तचाप का अचानक गिरना
मांसाहारजीवों की हत्या का घोर पाप, तामसिक तमसधमनियों में कोलेस्ट्रॉल जमाव, हृदयघात का खतरा, अपच
बासी मछली व अंडाअत्यधिक कफ व पित्त कारक, विषाक्ततात्वचा पर सोरायसिस, एक्जिमा और रक्त का दूषण
प्याज और लहसुनकाम और क्रोध की वृद्धि, साधना में बाधाजठराग्नि में अत्यधिक दाह, मुंह की दुर्गंध, तामसिक विचार

शीतकाल में मदिरा का सेवन करने से एक क्षणिक भ्रम होता है कि शरीर गर्म हो रहा है, परंतु चिकित्सा विज्ञान के अनुसार यह त्वचा की सतही रक्त नलिकाओं को फैलाकर शरीर की वास्तविक आंतरिक ऊष्मा को तेजी से बाहर निकाल देती है। इसके कारण व्यक्ति 'हाइपोथर्मिया' (अत्यधिक ठंड से शरीर का जम जाना) का शिकार हो जाता है। अतः मदिरा का त्याग इस मास में जीवन रक्षा के लिए अनिवार्य है।


पौष मास की संपूर्ण निषेध तालिका: क्या भूलकर भी न करें

गृहस्थों और साधकों की सुविधा के लिए पौष मास के कड़े निषेध नियमों का एक प्रामाणिक सार संक्षेप:

आहार संबंधी निषेध:

  1. कच्ची मूली का दिन में और किसी भी रूप में रात्रि में मूली का सेवन न करें।
  2. बैंगन की सब्जी अथवा भर्ता खाने से पूरी तरह बचें।
  3. सूर्यास्त के पश्चात दही, मट्ठा, छाछ और ठंडे कच्चे दूध का सेवन कदापि न करें।
  4. पिछले पहर का बचा हुआ ठंडा बासी भोजन अथवा फ्रिज में रखा भोजन न खाएं।
  5. भोजन में अत्यधिक जीरे, इमली, सिरके और बहुत तीखी लाल मिर्च का प्रयोग न करें।
  6. मसूर की दाल, बासी मांस, अंडा और मदिरा का स्पर्श भी न करें।

दिनचर्या और आचरण संबंधी निषेध:

  1. दिन के समय (दोपहर में) सोने से बचें; इससे कफ बढ़ता है और पाचन मंद होता है।
  2. प्रातःकाल बहुत देर तक बिस्तर पर न पड़े रहें; सूर्योदय से पूर्व शय्या त्यागें।
  3. अत्यधिक ठंडे अथवा बर्फीले जल से सिर धोकर स्नान न करें।
  4. शाम के समय घर में अंधेरा न रखें; मुख्य द्वार और तुलसी के समीप दीप अवश्य जलाएं।
  5. परिवार के वृद्धों, माता-पिता और असहाय जीवों का अनादर न करें।

विवेकपूर्ण संयम से आरोग्य और दीर्घायु की प्राप्ति

सनातन धर्म का कोई भी नियम मनुष्य को कष्ट देने के लिए नहीं बनाया गया है बल्कि उसके पीछे गहरा करुणा भाव और जीवन रक्षा का विज्ञान समाहित है। पौष मास के ये कड़े निषेध नियम वास्तव में प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने की एक सुंदर कला हैं।

जब हम अपनी जिह्वा की लोलुपता पर नियंत्रण रखकर इन वर्जित द्रव्यों का त्याग करते हैं, तो हमारी जठराग्नि निष्पाप होकर प्रदीप्त रहती है। शरीर के सातों धातु पुष्ट होते हैं, मन में सात्विक विचारों का उदय होता है और आत्मा में एक दिव्य शांति का संचार होता है। जो मनुष्य पौष मास की इस शास्त्रीय आचार संहिता का निष्ठा से पालन करता है, वह न केवल शीत ऋतु के समस्त मौसमी रोगों और पक्षाघात जैसे भयंकर संकटों से सुरक्षित रहता है बल्कि आगामी पूरे वर्ष के लिए एक निरोगी, तेजस्वी और दीर्घायु जीवन की मजबूत नींव तैयार कर लेता है।


FAQ

पौष मास में मूली खाना धर्मशास्त्रों और आयुर्वेद में क्यों वर्जित माना गया है? पौष में मूली अत्यधिक वात और वायु विकार बढ़ाती है, जिससे जोड़ों का दर्द और पेट का अफारा होता है; ब्रह्मवैवर्त पुराण में इसे मदिरा तुल्य दोषकारी कहा गया है।

सर्दियों की रात में दही खाने से शरीर पर क्या दुष्प्रभाव पड़ता है? दही अभिष्यंदी और कफ वर्धक होता है; रात्रि में इसका सेवन सूक्ष्म स्रोतों को अवरुद्ध करके सायनोसाइटिस, फेफड़ों में बलगम और जोड़ों में जकड़न पैदा करता है।

पौष के महीने में बैंगन का सेवन क्यों नहीं करना चाहिए? बैंगन वात-पित्त को प्रकुपित करता है, इसमें सोलेनाइन तत्व से यूरिक एसिड और जोड़ों का दर्द बढ़ता है तथा शीतकाल में इसमें सूक्ष्म कीटों का संचय रहता है।

क्या पौष मास में बासी भोजन खाने से लकवा (पक्षाघात) का खतरा बढ़ जाता है? हाँ, ठंडा बासी भोजन जठराग्नि को बुझाकर रक्त वाहिकाओं में अवरोध और वात का तीव्र प्रकोप करता है, जिससे सर्दियों में ब्रेन स्ट्रोक और पक्षाघात का जोखिम बढ़ता है।

पौष मास में अत्यधिक जीरे के स्थान पर किन पाचक मसालों का प्रयोग करना चाहिए? जीरा रुक्ष और शीत वीर्य होता है; अतः पौष में इसके स्थान पर सोंठ, अजवाइन, हींग, मेथी और काली मिर्च का प्रयोग करना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत गुणकारी है।

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लेखक

पं. संजीव शर्मा

पं. संजीव शर्मा (63)


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