गुरु गोबिंद सिंह जयंती का क्या महत्व है?

By अपर्णा पाटनी

पौष शुक्ल सप्तमी, प्रकाश पर्व, खालसा पंथ और साहिबजादों का बलिदान

गुरु गोबिंद सिंह जयंती 2026: प्रकाश पर्व, इतिहास और कथा

सामग्री तालिका

पौष शुक्ल सप्तमी और दशमेश पिता का पावन प्रकाश पर्व

सनातन काल गणना के वैदिक पंचांग के अनुसार पौष मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि संपूर्ण मानवता के इतिहास में एक अत्यंत पावन, तेजस्वी और क्रांतिकारी दिन मानी जाती है। इसी परम पवित्र तिथि को सिख धर्म के दसवें गुरु, खालसा पंथ के सृजक, अध्यात्म और शौर्य के अप्रतिम प्रतीक श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का प्राकट्य बिहार के ऐतिहासिक नगर पटना साहिब में हुआ था। सिख परंपरा में इस पावन दिवस को 'प्रकाश पर्व' अथवा 'प्रकाशोत्सव' के रूप में संपूर्ण विश्व में अत्यंत श्रद्धा, गरिमा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। पौष मास की यह पावन सप्तमी केवल एक महापुरुष का जन्मोत्सव मात्र नहीं है बल्कि यह मानवीय आत्मसम्मान, धार्मिक स्वतंत्रता, अन्याय के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिरोध और संत-सिपाही के दिव्य आदर्श का साक्षात शंखनाद है।

उस कालखंड में जब भारतवर्ष मुगल आक्रांताओं के बर्बर अत्याचारों, बलात् धर्म परिवर्तन और सामाजिक दासता के घोर अंधकार में डूब चुका था तब दशमेश पिता गुरु गोबिंद सिंह जी का अवतरण एक आध्यात्मिक सूर्य के समान हुआ। उन्होंने जनमानस के भीतर व्याप्त कायरता, निराशा और पराजय की भावना को समूल नष्ट कर दिया। उन्होंने यह सिद्ध कर दिखाया कि सच्चा अध्यात्म केवल हिमालय की कंदराओं में मौन बैठने तक सीमित नहीं है बल्कि पीड़ित मानवता की रक्षा के लिए हाथ में तलवार उठाकर अत्याचारी सत्ता के सम्मुख सीना तानकर खड़े हो जाना ही वास्तविक धर्म है।

ऐतिहासिक व आध्यात्मिक आयामशास्त्रीय विवरण एवं स्थितिसामाजिक व राष्ट्रीय प्रभाव
पावन प्राकट्य तिथिपौष मास शुक्ल पक्ष सप्तमी तिथिधर्म रक्षा हेतु दिव्य शौर्य और चेतना का नव विहान
अवतरण स्थलतख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब (बिहार)राष्ट्रीय एकता और संपूर्ण भारत की आध्यात्मिक कड़ी
पूज्य माता-पितानौवें गुरु तेग बहादुर जी एवं माता गूजरी जीत्याग, तपस्या और बलिदान की सर्वोच्च परंपरा
सृजन एवं स्थापनाबैसाखी 1699 को खालसा पंथ की स्थापनाजाति-पाति का नाश, आत्मरक्षा हेतु कृपाण धारण
प्रधान उपाधिसंत-सिपाही, सरबंसदानी, दशमेश पिता, कलगीधरभक्ति और शक्ति का संपूर्ण व संतुलित संगम
मुख्य धार्मिक अनुष्ठानअखंड पाठ, नगर कीर्तन, प्रभात फेरी, लंगरसामुदायिक समरसता, सेवा भाव और गुरु महिमा
अंतिम गुरु परंपराश्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को शाश्वत गुरु घोषित करनादेहधारी गुरु परंपरा की समाप्ति और शब्द गुरु की स्थापना
पावन अमर संदेशचिड़ियों से मैं बाज लड़ायूँ, सवा लाख से एक लड़ायूँअदम्य साहस, आत्मबल और निर्भयता का संचार

दशमेश पिता का संपूर्ण जीवन इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि जब न्याय के समस्त शांतिपूर्ण मार्ग अवरुद्ध हो जाएं तब धर्म और मानवता की रक्षा के लिए शस्त्र उठाना सर्वथा न्यायसंगत और पवित्र कर्तव्य बन जाता है। पौष शुक्ल सप्तमी का यह पर्व हमें अपने भीतर के भय को त्यागकर सत्य और धर्म के मार्ग पर अडिग रहने की शाश्वत प्रेरणा प्रदान करता है।


पटना साहिब में अवतरण और बाल्यकाल का अलौकिक प्रभाव

गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म 22 दिसंबर 1666 (पौष शुक्ल सप्तमी, संवत 1723) को गंगा के पावन तट पर स्थित पटना साहिब में हुआ था। उनके बाल्यकाल का नाम 'गोबिंद राय' था। उनके जन्म से पूर्व ही उनके पिता, सिखों के नौवें गुरु श्री तेग बहादुर जी पूर्वोत्तर भारत (असम और बंगाल) में धर्म के प्रचार-प्रसार और समाज को संगठित करने की यात्रा पर थे। बाल गोबिंद राय ने अपने जीवन के प्रारंभिक वर्ष पटना की पावन धरती पर व्यतीत किए।

बाल्यावस्था से ही उनके व्यक्तित्व में असीम आध्यात्मिक तेज और अद्वितीय पराक्रम के दर्शन होने लगे थे। वे साधारण बालकों की भांति केवल खेल-कूद में समय नष्ट नहीं करते थे बल्कि गंगा तट पर अपने सहपाठियों की दो सेनाएं बनाकर युद्ध कौशल, धनुर्विद्या और नकली दुर्गों पर विजय पाने का अभ्यास किया करते थे।

  • पीर भीखन शाह की परीक्षा और कौतुक: जब बालक गोबिंद राय का जन्म हुआ तब पंजाब के प्रसिद्ध मुस्लिम सूफी संत पीर भीखन शाह ने पूर्व दिशा की ओर झुककर नमाज पढ़ी। जब शिष्यों ने इसका कारण पूछा, तो उन्होंने कहा कि पूरब में एक महान ईश्वरीय ज्योति का प्राकट्य हुआ है। पीर भीखन शाह पटना पहुँचे और उन्होंने बालक के सम्मुख दो मिट्टियों की कुल्लियां (कटोरियां) रखीं-एक हिंदू धर्म की प्रतीक थी और दूसरी इस्लाम की। बाल गोबिंद राय ने मुस्कुराते हुए अपने दोनों नन्हें हाथ एक साथ दोनों कटोरियों पर रख दिए। यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि वे किसी संकीर्ण पंथ के लिए नहीं बल्कि संपूर्ण मानवता के उद्धार और न्याय की रक्षा के लिए अवतरित हुए हैं।
  • गंगा तट पर कंगन विसर्जन का प्रसंग: एक बार जब उनकी माता ने उन्हें बहुमूल्य सोने के कंगन पहनाए, तो उन्होंने एक कंगन गंगा के अथाह जल में फेंक दिया। जब माता ने पूछा कि दूसरा कंगन कहां है, तो उन्होंने दूसरा कंगन भी उसी स्थान पर फेंकते हुए कहा कि वह वहां गया है। इस बाललीला से उन्होंने यह संदेश दिया कि सांसारिक स्वर्ण और भौतिक संपदा नश्वर है, जबकि आत्मा का ईश्वरीय तेज ही शाश्वत सत्य है।
  • पंडित शिवदत्त की साधना सिद्धि: पटना के एक अत्यंत विद्वान ब्राह्मण पंडित शिवदत्त प्रतिदिन गंगा तट पर भगवान श्री राम और श्री कृष्ण की प्रतिमा का ध्यान करते थे, परंतु उन्हें आत्मिक शांति नहीं मिलती थी। बाल गोबिंद राय जब उनके समीप गए और उन्होंने अपनी आंखें खोलीं, तो उन्हें बालक के भीतर साक्षात भगवान श्री राम और भगवान श्री कृष्ण का चतुर्भुज दिव्य रूप दिखाई दिया। पंडित शिवदत्त उनके चरणों में नतमस्तक हो गए।

पटना की धरती पर अपने बाल्यकाल की इन अलौकिक लीलाओं से समाज को आलोकित करने के पश्चात संवत 1728 में वे अपने परिवार के साथ पंजाब के आनंदपुर साहिब आ गए, जो आगे चलकर भारत के इतिहास का सबसे बड़ा शक्ति केंद्र बना।


कश्मीरी पंडितों की पुकार और नौ वर्ष की आयु में पिता का बलिदान

17वीं शताब्दी का उत्तरार्ध भारत के इतिहास का सबसे अंधकारमय काल था। दिल्ली के तख्त पर क्रूर मुगल शासक औरंगजेब बैठा था, जिसका एकमात्र संकल्प संपूर्ण भारतवर्ष को बलपूर्वक 'दारुल इस्लाम' में परिवर्तित करना था। कश्मीर के सूबेदार इफ्तिखार खान ने कश्मीरी पंडितों और ब्राह्मणों पर असहनीय अत्याचार प्रारंभ कर दिए। उन्हें यह विकल्प दिया गया कि या तो वे इस्लाम स्वीकार करें अथवा तलवार के घाट उतरने के लिए तैयार रहें।

अत्यंत व्यथित, असहाय और भयभीत होकर कश्मीरी पंडितों का एक प्रतिनिधिमंडल पंडित कृपा राम दत्त के नेतृत्व में आनंदपुर साहिब में सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर जी की शरण में पहुँचा। उन्होंने अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपनी संस्कृति, धर्म और शिखा-जनेऊ की रक्षा की गुहार लगाई।

  • गुरु तेग बहादुर जी का मौन चिंतन: कश्मीरी पंडितों की करुण व्यथा सुनकर नौवें पातशाह गुरु तेग बहादुर जी अत्यंत गंभीर हो गए। उन्होंने कहा कि इस समय संपूर्ण राष्ट्र पर भय का काला साया छा चुका है। जनमानस के भीतर आत्मबल जगाने के लिए किसी महान, निष्पाप और पवित्र महापुरुष के आत्मबलिदान की परम आवश्यकता है।
  • नौ वर्षीय गोबिंद राय का अमर उद्घोष: उस समय सभा में उपस्थित नौ वर्ष के बालक गोबिंद राय ने अपने पिता के चरणों में शीश झुकाकर अत्यंत निर्भीकता से कहा: "पिता जी! इस संपूर्ण संसार में आपसे बढ़कर पवित्र, धर्मात्मा और त्यागी महापुरुष दूसरा कौन हो सकता है? कश्मीरी पंडितों और सनातन धर्म की रक्षा के लिए आपसे श्रेष्ठ बलिदान किसी और का नहीं हो सकता।"
  • शहादत की स्वीकृति: एक नौ वर्ष के अबोध बालक के मुख से यह उत्तर सुनकर गुरु तेग बहादुर जी का हृदय गर्व से भर गया। उन्हें विश्वास हो गया कि उनके पश्चात यह बालक इस राष्ट्र का मार्गदर्शन करने में पूर्णतः समर्थ है। गुरु तेग बहादुर जी ने पंडितों से कहा कि जाकर औरंगजेब से कह दो कि यदि गुरु तेग बहादुर इस्लाम स्वीकार कर लेंगे, तो हम सभी स्वेच्छा से मुस्लिम बन जाएंगे।
  • चांदनी चौक में सर्वोच्च बलिदान: 11 नवंबर 1675 को दिल्ली के चांदनी चौक में गुरु तेग बहादुर जी ने सनातन धर्म, तिलक और जनेऊ की रक्षा के लिए शीश कटवा दिया, परंतु अपना धर्म और सत्य का मार्ग नहीं त्यागा। नौ वर्ष की कोमल आयु में अपने पिता का यह सर्वोच्च बलिदान देखकर बाल गोबिंद राय की चेतना ने एक विशाल क्रांति का रूप ले लिया।

खालसा पंथ की स्थापना: चिड़ियों से बाज लड़ाने का दिव्य विज्ञान

पिता के बलिदान के पश्चात गुरु गोबिंद सिंह जी ने यह भली-भांति अनुभव किया कि केवल उपदेशों और माला जपने से क्रूर आक्रांताओं के अत्याचारों को नहीं रोका जा सकता। जब तक समाज के भीतर आत्मरक्षा की शक्ति, स्वाभिमान और भुजाओं में पराक्रम नहीं होगा तब तक दुर्बल समाज पर भेड़िए निरंतर आक्रमण करते रहेंगे।

वर्ष 1699 की बैसाखी के पावन दिन आनंदपुर साहिब की धरती पर एक ऐसा युगांतकारी इतिहास रचा गया जिसने भारत के भविष्य को सदा के लिए बदल दिया। उस दिन लगभग अस्सी हजार श्रद्धालुओं की विशाल सभा में गुरु गोबिंद सिंह जी नंगी तलवार हाथ में लेकर मंच पर प्रकट हुए और उन्होंने गर्जना करते हुए कहा: "मुझे धर्म की रक्षा के लिए एक शीश की भेंट चाहिए! क्या इस सभा में कोई ऐसा वीर है जो अपने गुरु और धर्म के लिए अपना मस्तक समर्पित कर सके?"

पंज प्यारेमूल नाम एवं जातिगत पृष्ठभूमिसामाजिक व आध्यात्मिक संदेश
भाई दया सिंहदया राम (लाहौर के खत्री समाज से)धर्म का पहला स्तंभ दया और करुणा है
भाई धर्म सिंहधर्म चंद (हस्तिनापुर/मेरठ के जाट समाज से)जीवन का दूसरा आधार कर्तव्य और धर्म है
भाई हिम्मत सिंहहिम्मत राय (जगन्नाथ पुरी, ओडिशा के धीवर/कहार समाज से)संघर्ष का तीसरा गुण अदम्य साहस और हिम्मत है
भाई मोहकम सिंहमोहकम चंद (द्वारका, गुजरात के दर्जी/छींपा समाज से)समाज का चौथा आधार मर्यादा और अनुशासन है
भाई साहिब सिंहसाहिब चंद (बीदर, कर्नाटक के नाई समाज से)आत्मसम्मान का पांचवां आधार स्वाभिमान और शक्ति है

गुरु जी ने बारी-बारी से तंबू के भीतर ले जाकर पांच शीशों की मांग की और अंत में उन पांचों वीरों को दिव्य वस्त्रों में सुसज्जित कर जनता के सामने प्रस्तुत किया। उन्होंने लोहे के बाटे में सतलुज नदी का जल और माता जीतू जी द्वारा डाली गई पताशे की मिठास मिलाकर अपनी दुधारी तलवार (खंडा) से मथकर 'अमृत' तैयार किया।

गुरु जी ने इन पांचों वीरों को अमृत छकाकर 'पंज प्यारे' बनाया और उन्हें 'सिंह' (शेर) की उपाधि दी। इसके पश्चात गुरु जी स्वयं उन पंज प्यारों के सम्मुख घुटनों के बल बैठ गए और बोले: "अब आप मुझे अमृत छकाकर अपने समान सिंह बनाइए।" इस अभूतपूर्व घटना पर इतिहासकार आज भी नतमस्तक होते हैं, जहां गुरु शिष्य बन गया और शिष्य गुरु के आसन पर आसीन हो गया। इसे 'वाहो वाहो गोबिंद सिंह आपे गुर चेला' कहा गया।

खालसा पंथ की स्थापना करके गुरु जी ने सदियों से दबी-कुचली, तथाकथित निम्न जातियों के भीतर वह शौर्य भर दिया कि उन्होंने मुगलों की विशाल सेनाओं को धूल चटा दी। उन्होंने घोषणा की:

सवा लाख से एक लड़ाऊँ, चिड़ियों सों मैं बाज तड़ौँ।
तबै गोबिंद सिंह नाम कहाऊँ॥

खालसा के प्रत्येक सदस्य के लिए पांच ककार (केश, कंगा, कड़ा, कच्छा और कृपाण) धारण करना अनिवार्य किया गया, जो शुद्धता, अनुशासन, आत्मरक्षा और मानवीय गरिमा के प्रतीक हैं।


चमकौर का महायुद्ध और चारों साहिबजादों का अमर बलिदान

गुरु गोबिंद सिंह जी का संपूर्ण जीवन त्याग और बलिदान की एक ऐसी गाथा है जिसकी तुलना संपूर्ण विश्व के इतिहास में कहीं नहीं मिलती। उन्होंने धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना संपूर्ण परिवार-पिता, माता और चारों पुत्र-हंसते-हंसते न्योछावर कर दिया, इसीलिए उन्हें सिख इतिहास में 'सरबंसदानी' (सर्वस्व दान करने वाला) कहा जाता है।

दिसंबर 1704 में जब मुगलों और पहाड़ी राजाओं ने आनंदपुर साहिब के किले को कई महीनों तक घेरे रखा और पवित्र कुरान व गाय की झूठी कसमें खाकर गुरु जी को किला छोड़ने का सुरक्षित मार्ग देने का वचन दिया तब गुरु जी ने किला खाली किया। परंतु सरसा नदी के तट पर विश्वासघाती मुगलों ने अचानक भीषण आक्रमण कर दिया। सरसा नदी के तूफानी पानी में गुरु जी का संपूर्ण परिवार सदा के लिए बिछड़ गया।

1. चमकौर की कच्ची गढ़ी का असमान युद्ध

गुरु गोबिंद सिंह जी अपने दो बड़े साहिबजादों-अजीत सिंह (17 वर्ष) और जुझार सिंह (14 वर्ष)-तथा मात्र चालीस भूखे-प्यासे सिखों के साथ चमकौर की एक कच्ची गढ़ी (मिट्टी की हवेली) में घिर गए। बाहर दस लाख की विशाल मुगल सेना खड़ी थी। इतिहास गवाह है कि संसार में चालीस वीरों ने दस लाख की सेना का सामना केवल चमकौर में किया।

  • बाबा अजीत सिंह की शहादत: बड़े पुत्र अजीत सिंह ने अपने पिता से रणभूमि में जाने की आज्ञा मांगी। गुरु जी ने अपने हाथों से पुत्र को शस्त्रों से सुसज्जित किया और युद्ध में भेजा। अजीत सिंह ने मुगलों की सेना में हाहाकार मचा दिया और सैकड़ों शत्रुओं को मारकर वीरगति प्राप्त की।
  • बाबा जुझार सिंह का पराक्रम: अपने बड़े भाई को शहीद होते देखकर चौदह वर्षीय जुझार सिंह ने युद्ध में जाने का आग्रह किया। पिता ने अपने दूसरे कलेजे के टुकड़े को भी रणभूमि में भेज दिया। जुझार सिंह भी मुगलों के छक्के छुड़ाते हुए धर्म की रक्षा करते हुए अमर हो गए।
  • जब दोनों पुत्र वीरगति को प्राप्त हुए, तो गुरु गोबिंद सिंह जी ने गढ़ी की छत से आकाश की ओर हाथ उठाकर अकाल पुरख का धन्यवाद किया और कहा: "हे प्रभु! तेरी अमानत मैंने तुझे ससम्मान लौटा दी है, मैंने अपने धर्म के मार्ग पर कोई आंच नहीं आने दी।"

2. सरहिंद की दीवार में छोटे साहिबजादों की शहादत

दूसरी ओर, गुरु जी की पूज्य माता गूजरी जी और दोनों छोटे साहिबजादे-बाबा जोरावर सिंह (9 वर्ष) और बाबा फतेह सिंह (7 वर्ष)-अपने रसोइए गंगू के विश्वासघात के कारण सरहिंद के नवाब वजीर खान द्वारा बंदी बना लिए गए। उन्हें कड़ाके की भीषण ठंड में ठंडे बुर्ज में भूखा-प्यासा कैद रखा गया।

  • वजीर खान की कचहरी में जब इन नन्हें बालकों को पेश किया गया और धन, जागीर तथा जीवन का प्रलोभन देकर इस्लाम स्वीकार करने को कहा गया, तो उन सात और नौ वर्ष के वीरों ने गरजकर 'जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल' का जयघोष किया।
  • नवाब के आदेश पर दोनों मासूम बालकों को जीवित ही ईंटों की दीवार में चिनवा दिया गया। दीवार के गिर जाने के पश्चात भी जब उन्होंने अपना धर्म नहीं त्यागा, तो उनके शीश काट दिए गए। ठंडे बुर्ज में जब माता गूजरी जी को यह समाचार मिला, तो उन्होंने भी प्रभु के ध्यान में अपने प्राण त्याग दिए।

जब आनंदपुर में सिखों ने विलाप करते हुए गुरु जी से कहा कि आपके चारों पुत्र शहीद हो गए, तो दशमेश पिता ने अपनी सभा में उपस्थित समस्त सिखों की ओर संकेत करते हुए वह अमर वाक्य कहा जो आज भी हर भारतीय की आत्मा को झकझोर देता है:

इन पुत्रन के सीस पर, वार दिये सुत चार।
चार मूए तो क्या भया, जीवत कई हजार॥


प्रकाश पर्व का पूजन विधान, अखंड पाठ और नगर कीर्तन

पौष मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को गुरु गोबिंद सिंह जयंती अर्थात प्रकाश पर्व के रूप में संपूर्ण विश्व में अत्यंत भक्तिभाव के साथ मनाया जाता है। इस पावन दिन गुरुद्वारों और घरों में एक विशेष आध्यात्मिक दिनचर्या का पालन किया जाता है:

1. श्री अखंड पाठ साहिब का समापन

प्रकाश पर्व से ठीक अड़तालीस घंटे पूर्व गुरुद्वारों और श्रद्धालु गृहस्थों के घरों में 'श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी' के अखंड पाठ (बिना रुके निरंतर संपूर्ण पाठ) का शुभारंभ किया जाता है। पौष शुक्ल सप्तमी के प्रातःकाल इस पाठ का अत्यंत भावपूर्ण समापन (भोग) होता है। श्रद्धालु शांत चित्त से बैठकर गुरुवाणी के पावन श्लोकों का श्रवण करते हैं।

2. भव्य नगर कीर्तन और पंज प्यारे

प्रकाश पर्व के उपलक्ष्य में शहरों और नगरों में अत्यंत विशाल और नयनाभिराम 'नगर कीर्तन' (धार्मिक शोभायात्रा) निकाला जाता है।

  • इस शोभायात्रा की अगुवाई पारंपरिक पोशाक और खुली कृपाण लिए 'पंज प्यारे' करते हैं।
  • एक अत्यंत सुंदर, फूलों से सजी हुई पालकी साहिब में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को विराजमान किया जाता है।
  • शोभायात्रा के मार्ग पर श्रद्धालु नंगे पैर झाड़ू लगाकर सड़क की सफाई करते हैं और गुलाब की पंखुड़ियां बिखेरते हैं।
  • नगर कीर्तन में सिख नौजवान पारंपरिक युद्ध कला 'गतका' का अत्यंत साहसिक और हैरतअंगेज प्रदर्शन करते हैं, जो गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा प्रदत्त शस्त्र विद्या की याद दिलाता है।
प्रकाश पर्व अनुष्ठानशास्त्रीय व व्यावहारिक स्वरूपआध्यात्मिक व सामाजिक फल
प्रभात फेरीसूर्योदय से पूर्व तारों की छांव में गुरुवाणी गायनअंतःकरण की शुद्धि और सात्विक ऊर्जा का संचार
शबद कीर्तन'देह शिवा बर मोहे इहै' का सामूहिक गायनआत्मबल की वृद्धि और भय व कायरता का नाश
गुरु का लंगरबिना किसी जाति-भेद के सबको एक पंगत में भोजनसामाजिक समरसता, समानता और सेवा भाव की प्रतिष्ठा
अर्दाससर्वत्र मानवता के कल्याण (सरबत दा भला) की प्रार्थनाअहंकार का विसर्जन और ईश्वरीय अनुग्रह की प्राप्ति

दशम ग्रंथ और गुरु गोबिंद सिंह जी का बहुआयामी साहित्य

गुरु गोबिंद सिंह जी केवल एक अद्वितीय योद्धा और सेनापति ही नहीं थे बल्कि वे संस्कृत, फारसी, ब्रजभाषा, पंजाबी और अरबी के प्रकांड विद्वान और महान कवि भी थे। उनके दरबार में बावन (52) प्रसिद्ध कवि और विद्वान सदैव निवास करते थे। गुरु जी ने युद्ध के मैदान के साथ-साथ साहित्य के माध्यम से भी सोई हुई भारतीय आत्मा को झकझोर कर जगा दिया।

उनकी समस्त पावन रचनाओं का संग्रह 'दशम ग्रंथ' के नाम से जाना जाता है।

  • जाप साहिब: यह परमात्मा के निर्गुण और निराकार स्वरूप की स्तुति का एक अत्यंत तेजस्वी स्तोत्र है, जिसमें ईश्वर के असीम गुणों का वर्णन संस्कृत और ब्रजभाषा के अनूठे छंदों में किया गया है।
  • अकाल उस्तत: इसमें उन्होंने संपूर्ण मानवता की एकता का शाश्वत संदेश देते हुए लिखा: "मानस की जात सभै एकै पहिचानबो" अर्थात संपूर्ण मानव जाति केवल एक ही ईश्वर की संतान है, उसमें कोई ऊंच-नीच नहीं है।
  • चंडी चरित्र एवं वार श्री भगौती जी की: गुरु जी ने मां भगवती दुर्गा के पराक्रम और महिषासुर वध की कथाओं का ब्रजभाषा में ऐसा ओजस्वी वर्णन किया कि उसे सुनकर कायरों की भुजाएं भी फड़कने लगती थीं। सिख अरदास की प्रथम पंक्ति "प्रथम भगौती सिमर कै गुरु नानक लई धियाइ" गुरु गोबिंद सिंह जी की ही अमर देन है।
  • जफरनामा (विजय पत्र): यह फारसी भाषा में लिखा गया एक ऐतिहासिक और दार्शनिक पत्र है, जिसे गुरु जी ने औरंगजेब के नाम भेजा था। जब गुरु जी का संपूर्ण परिवार बिछड़ गया और वे दीना-कांगड़ के जंगलों में थे तब उन्होंने औरंगजेब की क्रूरता, झूठी कसमों और नैतिक पराजय को उजागर करते हुए यह पत्र लिखा था। इस पत्र का एक-एक शब्द औरंगजेब की अंतरात्मा पर हथौड़े की भांति लगा, जिसके पश्चात वह गहरे अवसाद में चला गया और कुछ ही समय बाद उसकी मृत्यु हो गई। जफरनामा में गुरु जी ने वह अमर नीति सिद्धांत लिखा:

चूँ कार अज़ हमह हीलते दर गुज़शत।
हलाल अस्त बुरदन ब शमशीर दस्त॥
(अर्थात्: जब अन्याय और अत्याचार को रोकने के समस्त शांतिपूर्ण उपाय निष्फल हो जाएं तब हाथ में तलवार उठाना पूर्णतः न्यायसंगत और पवित्र है।)


'शब्द गुरु' की स्थापना और देहधारी गुरु परंपरा का समापन

गुरु गोबिंद सिंह जी का सनातन संस्कृति और सिख इतिहास को सबसे बड़ा और क्रांतिकारी उपहार 'शब्द गुरु' की स्थापना थी। 7 अक्टूबर 1708 को नांदेड़ (महाराष्ट्र) में सचखंड गमन से पूर्व उन्होंने सिखों को एकत्रित किया और स्पष्ट आदेश दिया कि मेरे पश्चात कोई भी देहधारी मनुष्य सिखों का गुरु नहीं होगा।

उन्होंने पांच पैसे और एक नारियल रखकर आदि ग्रंथ (श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी) के सम्मुख मत्था टेका और संपूर्ण सिख पंथ को शब्द ब्रह्म के चरणों में समर्पित कर दिया। उन्होंने यह ऐतिहासिक आदेश दिया:

आज्ञा भई अकाल की तबै चलायो पंथ।
सब सिखन को हुकम है गुरु मान्यो ग्रंथ॥
गुरु ग्रंथ जी मान्यो प्रगट गुरां की देह।
जो प्रभ को मिलबो चहै खोज सबद में लेह॥

गुरु जी ने स्पष्ट किया कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज संतों और गुरुओं की पावन वाणी ही साक्षात जागृत गुरु है। जो भी मनुष्य प्रभु से साक्षात्कार करना चाहता है, वह गुरुवाणी के शब्दों में चिंतन करके परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। इस दिव्य निर्णय ने सिख समाज को किसी भी व्यक्तिवादी पाखंड अथवा देहधारी आडंबर से सदा के लिए मुक्त कर दिया।


वर्तमान युग में दशमेश पिता की शिक्षाओं की प्रासंगिकता

आज जब इक्कीसवीं सदी का मानव स्वार्थ, भौतिकता की अंधी दौड़, मानसिक अवसाद, धार्मिक असहिष्णुता और नैतिक पतन के भंवर में फंसा हुआ है तब गुरु गोबिंद सिंह जी का जीवन दर्शन एक प्रकाश स्तंभ के समान हमारा मार्गदर्शन करता है।

दशमेश पिता हमें सिखाते हैं कि:

  1. अन्याय के सम्मुख कभी न झुकें: चाहे विरोधी कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, सत्य और न्याय के मार्ग पर अकेले चलने का साहस रखें।
  2. भक्ति और शक्ति का संतुलन: केवल अध्यात्म मनुष्य को पलायनवादी बना सकता है और केवल शक्ति मनुष्य को अत्याचारी बना सकती है। अतः जीवन में एक हाथ में माला (भक्ति) और दूसरे हाथ में कृपाण (शक्ति) का होना आवश्यक है।
  3. सामाजिक समरसता और समानता: जाति, वर्ण, भाषा और क्षेत्र के आधार पर मनुष्यों के बीच कोई भेद नहीं होना चाहिए।
  4. सर्वस्व समर्पण का भाव: राष्ट्र, धर्म और पीड़ित मानवता की रक्षा के लिए यदि अपना सर्वस्व भी न्योछावर करना पड़े, तो मुख पर कोई शिकन नहीं होनी चाहिए।

पौष शुक्ल सप्तमी के इस पावन प्रकाश पर्व पर आइए, हम सब दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के चरणों में कोटि-कोटि शीश झुकाएं, उनके द्वारा रचित ओजस्वी साहित्य का स्वाध्याय करें और उनके अमर आदर्शों को अपने जीवन में धारण कर एक सशक्त, निर्भय, न्यायप्रिय और समरस समाज के निर्माण का संकल्प लें।


FAQ

गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म किस तिथि और किस स्थान पर हुआ था? गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म पौष मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि (22 दिसंबर 1666) को बिहार के पवित्र ऐतिहासिक नगर पटना साहिब में हुआ था।

सिख धर्म में इस पर्व को 'प्रकाश पर्व' क्यों कहा जाता है? इस दिन संपूर्ण संसार को अज्ञान, भय, कायरता और अत्याचार के अंधकार से मुक्त करने वाली एक दिव्य आध्यात्मिक ज्योति का प्राकट्य हुआ था, इसलिए इसे प्रकाश पर्व कहते हैं।

खालसा पंथ की स्थापना कब और किस उद्देश्य से की गई थी? खालसा पंथ की स्थापना 1699 में बैसाखी के दिन आनंदपुर साहिब में जाति-पाति के विनाश, धर्म की रक्षा और मुगलों के अत्याचारों के विरुद्ध समाज को सशस्त्र व स्वाभिमानी बनाने हेतु की गई थी।

गुरु गोबिंद सिंह जी को 'सरबंसदानी' क्यों कहा जाता है? धर्म, सत्य और राष्ट्र की रक्षा के लिए उन्होंने अपने पिता (गुरु तेग बहादुर जी), माता (माता गूजरी जी) और चारों साहिबजादों का सर्वोच्च बलिदान दे दिया, इसलिए उन्हें सर्वस्व दानी (सरबंसदानी) कहा जाता है।

गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा लिखा गया 'जफरनामा' क्या है? जफरनामा (विजय पत्र) फारसी भाषा में लिखा गया एक ऐतिहासिक और नैतिक पत्र है, जिसे गुरु गोबिंद सिंह जी ने मुगल आक्रांता औरंगजेब की क्रूरता और असत्य को उजागर करने के लिए भेजा था।

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लेखक

अपर्णा पाटनी

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