By अपर्णा पाटनी
पौष शुक्ल सप्तमी, प्रकाश पर्व, खालसा पंथ और साहिबजादों का बलिदान

सनातन काल गणना के वैदिक पंचांग के अनुसार पौष मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि संपूर्ण मानवता के इतिहास में एक अत्यंत पावन, तेजस्वी और क्रांतिकारी दिन मानी जाती है। इसी परम पवित्र तिथि को सिख धर्म के दसवें गुरु, खालसा पंथ के सृजक, अध्यात्म और शौर्य के अप्रतिम प्रतीक श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का प्राकट्य बिहार के ऐतिहासिक नगर पटना साहिब में हुआ था। सिख परंपरा में इस पावन दिवस को 'प्रकाश पर्व' अथवा 'प्रकाशोत्सव' के रूप में संपूर्ण विश्व में अत्यंत श्रद्धा, गरिमा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। पौष मास की यह पावन सप्तमी केवल एक महापुरुष का जन्मोत्सव मात्र नहीं है बल्कि यह मानवीय आत्मसम्मान, धार्मिक स्वतंत्रता, अन्याय के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिरोध और संत-सिपाही के दिव्य आदर्श का साक्षात शंखनाद है।
उस कालखंड में जब भारतवर्ष मुगल आक्रांताओं के बर्बर अत्याचारों, बलात् धर्म परिवर्तन और सामाजिक दासता के घोर अंधकार में डूब चुका था तब दशमेश पिता गुरु गोबिंद सिंह जी का अवतरण एक आध्यात्मिक सूर्य के समान हुआ। उन्होंने जनमानस के भीतर व्याप्त कायरता, निराशा और पराजय की भावना को समूल नष्ट कर दिया। उन्होंने यह सिद्ध कर दिखाया कि सच्चा अध्यात्म केवल हिमालय की कंदराओं में मौन बैठने तक सीमित नहीं है बल्कि पीड़ित मानवता की रक्षा के लिए हाथ में तलवार उठाकर अत्याचारी सत्ता के सम्मुख सीना तानकर खड़े हो जाना ही वास्तविक धर्म है।
| ऐतिहासिक व आध्यात्मिक आयाम | शास्त्रीय विवरण एवं स्थिति | सामाजिक व राष्ट्रीय प्रभाव |
|---|---|---|
| पावन प्राकट्य तिथि | पौष मास शुक्ल पक्ष सप्तमी तिथि | धर्म रक्षा हेतु दिव्य शौर्य और चेतना का नव विहान |
| अवतरण स्थल | तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब (बिहार) | राष्ट्रीय एकता और संपूर्ण भारत की आध्यात्मिक कड़ी |
| पूज्य माता-पिता | नौवें गुरु तेग बहादुर जी एवं माता गूजरी जी | त्याग, तपस्या और बलिदान की सर्वोच्च परंपरा |
| सृजन एवं स्थापना | बैसाखी 1699 को खालसा पंथ की स्थापना | जाति-पाति का नाश, आत्मरक्षा हेतु कृपाण धारण |
| प्रधान उपाधि | संत-सिपाही, सरबंसदानी, दशमेश पिता, कलगीधर | भक्ति और शक्ति का संपूर्ण व संतुलित संगम |
| मुख्य धार्मिक अनुष्ठान | अखंड पाठ, नगर कीर्तन, प्रभात फेरी, लंगर | सामुदायिक समरसता, सेवा भाव और गुरु महिमा |
| अंतिम गुरु परंपरा | श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को शाश्वत गुरु घोषित करना | देहधारी गुरु परंपरा की समाप्ति और शब्द गुरु की स्थापना |
| पावन अमर संदेश | चिड़ियों से मैं बाज लड़ायूँ, सवा लाख से एक लड़ायूँ | अदम्य साहस, आत्मबल और निर्भयता का संचार |
दशमेश पिता का संपूर्ण जीवन इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि जब न्याय के समस्त शांतिपूर्ण मार्ग अवरुद्ध हो जाएं तब धर्म और मानवता की रक्षा के लिए शस्त्र उठाना सर्वथा न्यायसंगत और पवित्र कर्तव्य बन जाता है। पौष शुक्ल सप्तमी का यह पर्व हमें अपने भीतर के भय को त्यागकर सत्य और धर्म के मार्ग पर अडिग रहने की शाश्वत प्रेरणा प्रदान करता है।
गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म 22 दिसंबर 1666 (पौष शुक्ल सप्तमी, संवत 1723) को गंगा के पावन तट पर स्थित पटना साहिब में हुआ था। उनके बाल्यकाल का नाम 'गोबिंद राय' था। उनके जन्म से पूर्व ही उनके पिता, सिखों के नौवें गुरु श्री तेग बहादुर जी पूर्वोत्तर भारत (असम और बंगाल) में धर्म के प्रचार-प्रसार और समाज को संगठित करने की यात्रा पर थे। बाल गोबिंद राय ने अपने जीवन के प्रारंभिक वर्ष पटना की पावन धरती पर व्यतीत किए।
बाल्यावस्था से ही उनके व्यक्तित्व में असीम आध्यात्मिक तेज और अद्वितीय पराक्रम के दर्शन होने लगे थे। वे साधारण बालकों की भांति केवल खेल-कूद में समय नष्ट नहीं करते थे बल्कि गंगा तट पर अपने सहपाठियों की दो सेनाएं बनाकर युद्ध कौशल, धनुर्विद्या और नकली दुर्गों पर विजय पाने का अभ्यास किया करते थे।
पटना की धरती पर अपने बाल्यकाल की इन अलौकिक लीलाओं से समाज को आलोकित करने के पश्चात संवत 1728 में वे अपने परिवार के साथ पंजाब के आनंदपुर साहिब आ गए, जो आगे चलकर भारत के इतिहास का सबसे बड़ा शक्ति केंद्र बना।
17वीं शताब्दी का उत्तरार्ध भारत के इतिहास का सबसे अंधकारमय काल था। दिल्ली के तख्त पर क्रूर मुगल शासक औरंगजेब बैठा था, जिसका एकमात्र संकल्प संपूर्ण भारतवर्ष को बलपूर्वक 'दारुल इस्लाम' में परिवर्तित करना था। कश्मीर के सूबेदार इफ्तिखार खान ने कश्मीरी पंडितों और ब्राह्मणों पर असहनीय अत्याचार प्रारंभ कर दिए। उन्हें यह विकल्प दिया गया कि या तो वे इस्लाम स्वीकार करें अथवा तलवार के घाट उतरने के लिए तैयार रहें।
अत्यंत व्यथित, असहाय और भयभीत होकर कश्मीरी पंडितों का एक प्रतिनिधिमंडल पंडित कृपा राम दत्त के नेतृत्व में आनंदपुर साहिब में सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर जी की शरण में पहुँचा। उन्होंने अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपनी संस्कृति, धर्म और शिखा-जनेऊ की रक्षा की गुहार लगाई।
पिता के बलिदान के पश्चात गुरु गोबिंद सिंह जी ने यह भली-भांति अनुभव किया कि केवल उपदेशों और माला जपने से क्रूर आक्रांताओं के अत्याचारों को नहीं रोका जा सकता। जब तक समाज के भीतर आत्मरक्षा की शक्ति, स्वाभिमान और भुजाओं में पराक्रम नहीं होगा तब तक दुर्बल समाज पर भेड़िए निरंतर आक्रमण करते रहेंगे।
वर्ष 1699 की बैसाखी के पावन दिन आनंदपुर साहिब की धरती पर एक ऐसा युगांतकारी इतिहास रचा गया जिसने भारत के भविष्य को सदा के लिए बदल दिया। उस दिन लगभग अस्सी हजार श्रद्धालुओं की विशाल सभा में गुरु गोबिंद सिंह जी नंगी तलवार हाथ में लेकर मंच पर प्रकट हुए और उन्होंने गर्जना करते हुए कहा: "मुझे धर्म की रक्षा के लिए एक शीश की भेंट चाहिए! क्या इस सभा में कोई ऐसा वीर है जो अपने गुरु और धर्म के लिए अपना मस्तक समर्पित कर सके?"
| पंज प्यारे | मूल नाम एवं जातिगत पृष्ठभूमि | सामाजिक व आध्यात्मिक संदेश |
|---|---|---|
| भाई दया सिंह | दया राम (लाहौर के खत्री समाज से) | धर्म का पहला स्तंभ दया और करुणा है |
| भाई धर्म सिंह | धर्म चंद (हस्तिनापुर/मेरठ के जाट समाज से) | जीवन का दूसरा आधार कर्तव्य और धर्म है |
| भाई हिम्मत सिंह | हिम्मत राय (जगन्नाथ पुरी, ओडिशा के धीवर/कहार समाज से) | संघर्ष का तीसरा गुण अदम्य साहस और हिम्मत है |
| भाई मोहकम सिंह | मोहकम चंद (द्वारका, गुजरात के दर्जी/छींपा समाज से) | समाज का चौथा आधार मर्यादा और अनुशासन है |
| भाई साहिब सिंह | साहिब चंद (बीदर, कर्नाटक के नाई समाज से) | आत्मसम्मान का पांचवां आधार स्वाभिमान और शक्ति है |
गुरु जी ने बारी-बारी से तंबू के भीतर ले जाकर पांच शीशों की मांग की और अंत में उन पांचों वीरों को दिव्य वस्त्रों में सुसज्जित कर जनता के सामने प्रस्तुत किया। उन्होंने लोहे के बाटे में सतलुज नदी का जल और माता जीतू जी द्वारा डाली गई पताशे की मिठास मिलाकर अपनी दुधारी तलवार (खंडा) से मथकर 'अमृत' तैयार किया।
गुरु जी ने इन पांचों वीरों को अमृत छकाकर 'पंज प्यारे' बनाया और उन्हें 'सिंह' (शेर) की उपाधि दी। इसके पश्चात गुरु जी स्वयं उन पंज प्यारों के सम्मुख घुटनों के बल बैठ गए और बोले: "अब आप मुझे अमृत छकाकर अपने समान सिंह बनाइए।" इस अभूतपूर्व घटना पर इतिहासकार आज भी नतमस्तक होते हैं, जहां गुरु शिष्य बन गया और शिष्य गुरु के आसन पर आसीन हो गया। इसे 'वाहो वाहो गोबिंद सिंह आपे गुर चेला' कहा गया।
खालसा पंथ की स्थापना करके गुरु जी ने सदियों से दबी-कुचली, तथाकथित निम्न जातियों के भीतर वह शौर्य भर दिया कि उन्होंने मुगलों की विशाल सेनाओं को धूल चटा दी। उन्होंने घोषणा की:
सवा लाख से एक लड़ाऊँ, चिड़ियों सों मैं बाज तड़ौँ।
तबै गोबिंद सिंह नाम कहाऊँ॥
खालसा के प्रत्येक सदस्य के लिए पांच ककार (केश, कंगा, कड़ा, कच्छा और कृपाण) धारण करना अनिवार्य किया गया, जो शुद्धता, अनुशासन, आत्मरक्षा और मानवीय गरिमा के प्रतीक हैं।
गुरु गोबिंद सिंह जी का संपूर्ण जीवन त्याग और बलिदान की एक ऐसी गाथा है जिसकी तुलना संपूर्ण विश्व के इतिहास में कहीं नहीं मिलती। उन्होंने धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना संपूर्ण परिवार-पिता, माता और चारों पुत्र-हंसते-हंसते न्योछावर कर दिया, इसीलिए उन्हें सिख इतिहास में 'सरबंसदानी' (सर्वस्व दान करने वाला) कहा जाता है।
दिसंबर 1704 में जब मुगलों और पहाड़ी राजाओं ने आनंदपुर साहिब के किले को कई महीनों तक घेरे रखा और पवित्र कुरान व गाय की झूठी कसमें खाकर गुरु जी को किला छोड़ने का सुरक्षित मार्ग देने का वचन दिया तब गुरु जी ने किला खाली किया। परंतु सरसा नदी के तट पर विश्वासघाती मुगलों ने अचानक भीषण आक्रमण कर दिया। सरसा नदी के तूफानी पानी में गुरु जी का संपूर्ण परिवार सदा के लिए बिछड़ गया।
गुरु गोबिंद सिंह जी अपने दो बड़े साहिबजादों-अजीत सिंह (17 वर्ष) और जुझार सिंह (14 वर्ष)-तथा मात्र चालीस भूखे-प्यासे सिखों के साथ चमकौर की एक कच्ची गढ़ी (मिट्टी की हवेली) में घिर गए। बाहर दस लाख की विशाल मुगल सेना खड़ी थी। इतिहास गवाह है कि संसार में चालीस वीरों ने दस लाख की सेना का सामना केवल चमकौर में किया।
दूसरी ओर, गुरु जी की पूज्य माता गूजरी जी और दोनों छोटे साहिबजादे-बाबा जोरावर सिंह (9 वर्ष) और बाबा फतेह सिंह (7 वर्ष)-अपने रसोइए गंगू के विश्वासघात के कारण सरहिंद के नवाब वजीर खान द्वारा बंदी बना लिए गए। उन्हें कड़ाके की भीषण ठंड में ठंडे बुर्ज में भूखा-प्यासा कैद रखा गया।
जब आनंदपुर में सिखों ने विलाप करते हुए गुरु जी से कहा कि आपके चारों पुत्र शहीद हो गए, तो दशमेश पिता ने अपनी सभा में उपस्थित समस्त सिखों की ओर संकेत करते हुए वह अमर वाक्य कहा जो आज भी हर भारतीय की आत्मा को झकझोर देता है:
इन पुत्रन के सीस पर, वार दिये सुत चार।
चार मूए तो क्या भया, जीवत कई हजार॥
पौष मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को गुरु गोबिंद सिंह जयंती अर्थात प्रकाश पर्व के रूप में संपूर्ण विश्व में अत्यंत भक्तिभाव के साथ मनाया जाता है। इस पावन दिन गुरुद्वारों और घरों में एक विशेष आध्यात्मिक दिनचर्या का पालन किया जाता है:
प्रकाश पर्व से ठीक अड़तालीस घंटे पूर्व गुरुद्वारों और श्रद्धालु गृहस्थों के घरों में 'श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी' के अखंड पाठ (बिना रुके निरंतर संपूर्ण पाठ) का शुभारंभ किया जाता है। पौष शुक्ल सप्तमी के प्रातःकाल इस पाठ का अत्यंत भावपूर्ण समापन (भोग) होता है। श्रद्धालु शांत चित्त से बैठकर गुरुवाणी के पावन श्लोकों का श्रवण करते हैं।
प्रकाश पर्व के उपलक्ष्य में शहरों और नगरों में अत्यंत विशाल और नयनाभिराम 'नगर कीर्तन' (धार्मिक शोभायात्रा) निकाला जाता है।
| प्रकाश पर्व अनुष्ठान | शास्त्रीय व व्यावहारिक स्वरूप | आध्यात्मिक व सामाजिक फल |
|---|---|---|
| प्रभात फेरी | सूर्योदय से पूर्व तारों की छांव में गुरुवाणी गायन | अंतःकरण की शुद्धि और सात्विक ऊर्जा का संचार |
| शबद कीर्तन | 'देह शिवा बर मोहे इहै' का सामूहिक गायन | आत्मबल की वृद्धि और भय व कायरता का नाश |
| गुरु का लंगर | बिना किसी जाति-भेद के सबको एक पंगत में भोजन | सामाजिक समरसता, समानता और सेवा भाव की प्रतिष्ठा |
| अर्दास | सर्वत्र मानवता के कल्याण (सरबत दा भला) की प्रार्थना | अहंकार का विसर्जन और ईश्वरीय अनुग्रह की प्राप्ति |
गुरु गोबिंद सिंह जी केवल एक अद्वितीय योद्धा और सेनापति ही नहीं थे बल्कि वे संस्कृत, फारसी, ब्रजभाषा, पंजाबी और अरबी के प्रकांड विद्वान और महान कवि भी थे। उनके दरबार में बावन (52) प्रसिद्ध कवि और विद्वान सदैव निवास करते थे। गुरु जी ने युद्ध के मैदान के साथ-साथ साहित्य के माध्यम से भी सोई हुई भारतीय आत्मा को झकझोर कर जगा दिया।
उनकी समस्त पावन रचनाओं का संग्रह 'दशम ग्रंथ' के नाम से जाना जाता है।
चूँ कार अज़ हमह हीलते दर गुज़शत।
हलाल अस्त बुरदन ब शमशीर दस्त॥
(अर्थात्: जब अन्याय और अत्याचार को रोकने के समस्त शांतिपूर्ण उपाय निष्फल हो जाएं तब हाथ में तलवार उठाना पूर्णतः न्यायसंगत और पवित्र है।)
गुरु गोबिंद सिंह जी का सनातन संस्कृति और सिख इतिहास को सबसे बड़ा और क्रांतिकारी उपहार 'शब्द गुरु' की स्थापना थी। 7 अक्टूबर 1708 को नांदेड़ (महाराष्ट्र) में सचखंड गमन से पूर्व उन्होंने सिखों को एकत्रित किया और स्पष्ट आदेश दिया कि मेरे पश्चात कोई भी देहधारी मनुष्य सिखों का गुरु नहीं होगा।
उन्होंने पांच पैसे और एक नारियल रखकर आदि ग्रंथ (श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी) के सम्मुख मत्था टेका और संपूर्ण सिख पंथ को शब्द ब्रह्म के चरणों में समर्पित कर दिया। उन्होंने यह ऐतिहासिक आदेश दिया:
आज्ञा भई अकाल की तबै चलायो पंथ।
सब सिखन को हुकम है गुरु मान्यो ग्रंथ॥
गुरु ग्रंथ जी मान्यो प्रगट गुरां की देह।
जो प्रभ को मिलबो चहै खोज सबद में लेह॥
गुरु जी ने स्पष्ट किया कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज संतों और गुरुओं की पावन वाणी ही साक्षात जागृत गुरु है। जो भी मनुष्य प्रभु से साक्षात्कार करना चाहता है, वह गुरुवाणी के शब्दों में चिंतन करके परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। इस दिव्य निर्णय ने सिख समाज को किसी भी व्यक्तिवादी पाखंड अथवा देहधारी आडंबर से सदा के लिए मुक्त कर दिया।
आज जब इक्कीसवीं सदी का मानव स्वार्थ, भौतिकता की अंधी दौड़, मानसिक अवसाद, धार्मिक असहिष्णुता और नैतिक पतन के भंवर में फंसा हुआ है तब गुरु गोबिंद सिंह जी का जीवन दर्शन एक प्रकाश स्तंभ के समान हमारा मार्गदर्शन करता है।
दशमेश पिता हमें सिखाते हैं कि:
पौष शुक्ल सप्तमी के इस पावन प्रकाश पर्व पर आइए, हम सब दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के चरणों में कोटि-कोटि शीश झुकाएं, उनके द्वारा रचित ओजस्वी साहित्य का स्वाध्याय करें और उनके अमर आदर्शों को अपने जीवन में धारण कर एक सशक्त, निर्भय, न्यायप्रिय और समरस समाज के निर्माण का संकल्प लें।
गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म किस तिथि और किस स्थान पर हुआ था? गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म पौष मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि (22 दिसंबर 1666) को बिहार के पवित्र ऐतिहासिक नगर पटना साहिब में हुआ था।
सिख धर्म में इस पर्व को 'प्रकाश पर्व' क्यों कहा जाता है? इस दिन संपूर्ण संसार को अज्ञान, भय, कायरता और अत्याचार के अंधकार से मुक्त करने वाली एक दिव्य आध्यात्मिक ज्योति का प्राकट्य हुआ था, इसलिए इसे प्रकाश पर्व कहते हैं।
खालसा पंथ की स्थापना कब और किस उद्देश्य से की गई थी? खालसा पंथ की स्थापना 1699 में बैसाखी के दिन आनंदपुर साहिब में जाति-पाति के विनाश, धर्म की रक्षा और मुगलों के अत्याचारों के विरुद्ध समाज को सशस्त्र व स्वाभिमानी बनाने हेतु की गई थी।
गुरु गोबिंद सिंह जी को 'सरबंसदानी' क्यों कहा जाता है? धर्म, सत्य और राष्ट्र की रक्षा के लिए उन्होंने अपने पिता (गुरु तेग बहादुर जी), माता (माता गूजरी जी) और चारों साहिबजादों का सर्वोच्च बलिदान दे दिया, इसलिए उन्हें सर्वस्व दानी (सरबंसदानी) कहा जाता है।
गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा लिखा गया 'जफरनामा' क्या है? जफरनामा (विजय पत्र) फारसी भाषा में लिखा गया एक ऐतिहासिक और नैतिक पत्र है, जिसे गुरु गोबिंद सिंह जी ने मुगल आक्रांता औरंगजेब की क्रूरता और असत्य को उजागर करने के लिए भेजा था।
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