By पं. अभिषेक शर्मा
सिंदूर लेपन, चमेली का तेल, हनुमान बाहुक, बजरंग बाण और शीतकालीन स्तोत्र साधना

सनातन काल गणना के वैदिक पंचांग के अनुसार पौष मास संपूर्ण संवत्सर चक्र का सर्वाधिक शीतल, शुष्क और तमोगुणी प्रभाव वाला कालखंड माना जाता है। शिशिर ऋतु के आगमन के साथ जब तापमान में भारी गिरावट आती है तब मानव शरीर में आलस्य, सुस्ती, जोड़ों में जकड़न और ऊर्जा का अभाव स्वाभाविक रूप से बढ़ने लगता है। ऐसे संवेदनशील समय में रुद्र के ग्यारहवें अवतार, साक्षात पवनपुत्र और आग्नेय ऊर्जा के जीवंत प्रतीक श्री हनुमान जी की साधना साधक के भीतर एक अभूतपूर्व प्राणिक चेतना और आत्मबल का संचार करती है।
वैदिक ज्योतिष और तंत्र शास्त्रों में हनुमान जी को मंगल ग्रह का सर्वोच्च नियंत्रक और शनि के क्रूर प्रभावों को शांत करने वाला जाग्रत देव माना गया है। पौष मास में जब प्रत्यक्ष सूर्य देव धनु राशि में स्थित होकर शीत की मंदता को झेल रहे होते हैं तब हनुमान जी की लाल सिंदूरी आभा और चमेली के तेल की उग्र सुगंध से युक्त साधना शरीर के भीतर सोई हुई कुण्डलिनी और पाचन शक्ति (जठराग्नि) को तुरंत सक्रिय कर देती है। यह साधना केवल संकटों से मुक्ति पाने का माध्यम नहीं है बल्कि कड़ाके की ठंड में शारीरिक बल, मानसिक दृढ़ता और निर्भयता प्राप्त करने का एक अत्यंत वैज्ञानिक आध्यात्मिक उपक्रम है।
| साधना व तात्विक आयाम | शास्त्रीय विवरण एवं नियम | आध्यात्मिक व व्यावहारिक प्रतिफल |
|---|---|---|
| प्रधान साधना काल | संपूर्ण पौष मास, विशेषकर मंगलवार एवं शनिवार | आलस्य, डिप्रेशन, अज्ञात भय और शारीरिक दुर्बलता का नाश |
| मुख्य अधिष्ठाता स्वरूप | संकटमोचन महाबली हनुमान जी (रुद्रावतार) | असीम शारीरिक बल, स्नायु शक्ति, आत्मबल और दीर्घायु |
| प्रधान अर्पण द्रव्य | शुद्ध नारंगी सिंदूर एवं सुगंधित चमेली का तेल | मंगल और शनि दोषों का शमन, आभा मंडल की शुद्धि |
| मुख्य भोग सामग्री | देसी गुड़, भुने हुए लाल चने, तुलसी पत्र और केला | मांस धातु की पुष्टि, हीमोग्लोबिन वृद्धि और त्वरित ऊर्जा |
| प्रधान स्तोत्र पाठ | हनुमान बाहुक, बजरंग बाण और सुंदरकांड | वात व्याधियों से मुक्ति, असाध्य पीड़ा निवारण, सुरक्षा |
| साधना की मुख्य दिशा | पूर्व अथवा दक्षिण दिशा (मंगल व यम की दिशा) | नकारात्मक शक्तियों, तंत्र बाधा और नजर दोष का विनाश |
| मुख्य आसन व वस्त्र | लाल ऊनी कंबल का आसन एवं लाल/केसरिया सूती वस्त्र | प्राणिक विद्युत का संरक्षण और मूलाधार चक्र का उद्दीपन |
पौष मास में हनुमान जी का आश्रय लेने वाले साधक के जीवन से शीत की जड़ता उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे प्रातःकालीन सूर्य के उदय होते ही घना कोहरा छंट जाता है।
हनुमान जी को सिंदूर और चमेली के तेल का चोला चढ़ाने की परंपरा का संबंध केवल एक पौराणिक आख्यान मात्र से नहीं है बल्कि इसके पीछे गहरा तात्विक, रासायनिक और खगोलीय विज्ञान समाहित है। वाल्मीकि रामायण और आनंद रामायण के अनुसार, जब माता सीता को मांग में सिंदूर लगाते देखकर बालक हनुमान ने इसका कारण पूछा, तो माता ने बताया कि इससे भगवान श्री राम की आयु और प्रसन्नता बढ़ती है। अपने प्रभु के प्रति अगाध प्रेम के वशीभूत होकर हनुमान जी ने अपने संपूर्ण शरीर पर ही सिंदूर का लेपन कर लिया था।
ज्योतिषीय और जैविक दृष्टिकोण से यह लेपन शीत ऋतु में अत्यधिक प्रभावशाली सिद्ध होता है:
गोस्वामी तुलसीदास जी ने जब कलियुग के प्रभाव और वात प्रकोप के कारण अपनी बाहु (भुजाओं) में असहनीय, जलती हुई फोड़े-फुंसियों और जोड़ों की पीड़ा का सामना किया था तब उन्होंने काशी में हनुमान जी की प्रत्यक्ष स्तुति में 'हनुमान बाहुक' की रचना की थी। पौष मास की अत्यधिक ठंड में जब वात प्रकुपित होकर जोड़ों, हड्डियों और नसों में तीव्र शूल उत्पन्न करता है तब हनुमान बाहुक का पाठ एक अचूक संजीवनी औषधि की भांति कार्य करता है।
पौष मास के छोटे दिन, धूप का अभाव और लगातार रहने वाला अंधेरा कई बार साधक के मस्तिष्क में एक गहरा अवसाद (Depression) और अकारण भय पैदा कर देता है। ऐसे समय में 'बजरंग बाण' का पाठ चेतना में साहस की ज्वाला प्रज्वलित करता है।
उठु उठु चलु तोहि राम दोहाई। पायँ परौं कर जोरि मनाई॥
जनकसुता हरि धूप दिखावौ। कोप करहु नहिं देर लगावौ॥
बजरंग बाण की भाषा सामान्य काव्यात्मक भाषा नहीं है; यह एक उच्च कोटि का 'शाबर तांत्रिक मंत्र' है जिसमें भगवान श्री राम की शपथ दिलाकर हनुमान जी की सुषुप्त शक्तियों को तत्काल जाग्रत किया जाता है।
| स्तोत्र का स्वरूप | संबंधित शारीरिक व मानसिक क्षेत्र | साधक को प्राप्त होने वाला प्रतिफल |
|---|---|---|
| हनुमान बाहुक पाठ | मांस धातु, अस्थि जोड़, नसों का रक्त संचार | गठिया, नसों का दर्द, फोड़े-फुंसी और शारीरिक दुर्बलता का नाश |
| बजरंग बाण पाठ | मूलाधार व आज्ञा चक्र, अवचेतन मन | भयानक स्वप्न, अवसाद, तांत्रिक षड्यंत्र और भय से मुक्ति |
| हनुमान चालीसा (100 बार) | संपूर्ण आभा मंडल, प्राणमय कोष | समस्त विघ्नों का समूल निवारण, मनोकामना सिद्धि |
| सुंदरकांड पाठ | मणिपुर चक्र, वाणी, संकल्प शक्ति | पारिवारिक अशांति का शमन, व्यापार में भारी वृद्धि |
बजरंग बाण का पाठ करते समय साधक को पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य और पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए। इसका प्रयोग किसी के अनिष्ट के लिए नहीं बल्कि केवल आत्मरक्षा और आत्मबल के संवर्धन हेतु ही किया जाना चाहिए।
पौष मास में हनुमान जी की पूजा का विधान अन्य महीनों से थोड़ा भिन्न होता है, क्योंकि इस समय ऋतु अनुकूलन हेतु उष्ण और ऊर्जादायक उपचारों की प्रधानता होती है।
प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व अथवा सायंकाल गोधूलि वेला में स्नान करके लाल अथवा गाढ़े केसरिया रंग के धुले हुए वस्त्र धारण करें। दक्षिण अथवा पूर्व दिशा की ओर मुख करके लाल ऊनी आसन पर बैठें। लकड़ी की एक चौकी पर लाल रेशमी वस्त्र बिछाएं और उस पर हनुमान जी की ऐसी प्रतिमा या चित्र स्थापित करें जिसमें वे वीर मुद्रा में गदा धारण किए हुए हों अथवा प्रभु श्री राम की सेवा में बैठे हों।
यदि आप घर पर धातु अथवा पारद विग्रह का पूजन कर रहे हैं, या मंदिर में जाकर चोला चढ़ा रहे हैं, तो क्रम निम्नलिखित होना चाहिए:
हनुमान जी को शीतकाल में अत्यधिक ऊष्मा और पोषण देने वाला भोग अर्पित किया जाता है:
हनुमान साधना सात्विक और उग्र दोनों स्वरूपों में फलित होती है। पौष मास में इस साधना का संकल्प लेने वाले साधक को निम्नलिखित कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य है:
पौष मास की यह पावन हनुमान साधना मनुष्य के भीतर छिपे उस 'अजेय वीर' को जगा देती है जो सांसारिक कठिनाइयों और शीत की जड़ता के कारण सुप्त हो चुका था। जब एक साधक कड़ाके की ठंड में प्रातःकाल उठकर लाल वस्त्र धारण करता है, सिंदूर का तिलक लगाता है और सिंह के समान गरजकर हनुमान बाहुक और बजरंग बाण का पाठ करता है, तो उसके भीतर की समस्त दुर्बलताएं भस्म हो जाती हैं।
उसकी भुजाओं में नया बल, हृदय में अदम्य साहस और आंखों में एक दिव्य चुंबकीय तेज उत्पन्न होता है। कोई भी बाहरी ठंड, कोई भी ग्रह दोष और कोई भी गुप्त षड्यंत्र उसके आत्मविश्वास को डिगा नहीं सकता। जो व्यक्ति पौष मास में हनुमान जी की इस शरण को स्वीकार कर लेता है, उसका जीवन भयमुक्त, रोगमुक्त और अखंड विजय के प्रकाश से आलोकित हो उठता है।
पौष मास में हनुमान जी को चमेली के तेल में सिंदूर मिलाकर चोला क्यों चढ़ाया जाता है? सिंदूर मंगल-सूर्य का और चमेली का तेल उष्ण वीर्य होता है; शीतकाल में यह चोला शरीर के भीतर आग्नेय ऊर्जा जगाता है और शनि के समस्त क्रूर दोषों को शांत करता है।
जोड़ों के पुराने दर्द और नसों के खिंचाव में 'हनुमान बाहुक' का पाठ कैसे लाभकारी है? गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी शारीरिक वात पीड़ा से मुक्ति हेतु इसकी रचना की थी; तांबे के जल के सम्मुख इसका पाठ करने से नसों का अवरोध खुलता है और दर्द मिटता है।
पौष मास में हनुमान जी को गुड़ और चने का भोग लगाने का क्या वैज्ञानिक लाभ है? गुड़ में प्राकृतिक आयरन व ऊष्मा होती है और भुने चने में प्रचुर प्रोटीन; शीत ऋतु में यह भोग शरीर की मांस धातु को पुष्ट कर मांसपेशियों को तुरंत बल देता है।
बजरंग बाण का पाठ करते समय किन विशेष सावधानियों का ध्यान रखना चाहिए? बजरंग बाण में भगवान राम की शपथ होती है, अतः इसका पाठ करते समय पूर्ण ब्रह्मचर्य, पवित्रता और सात्विक आहार का पालन अनिवार्य है; इसे अकारण नहीं जपना चाहिए।
क्या महिलाएं भी पौष मास में हनुमान जी की यह साधना कर सकती हैं? हाँ, महिलाएं हनुमान चालीसा, बजरंग बाण और सुंदरकांड का पाठ पूरी श्रद्धा से कर सकती हैं, परंतु उन्हें विग्रह को सीधे स्पर्श करने व चोला चढ़ाने से बचना चाहिए।
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