By पं. संजीव शर्मा
वर्ष के संधिकाल में धन वृद्धि, कनकधारा विधान और कुबेर पोटली निर्माण

पौष मास वैदिक काल गणना के अनुसार शीत ऋतु का वह अत्यंत गूढ़, प्रशांत और तपस्या प्रधान कालखंड माना जाता है जब भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव अपनी वार्षिक खगोलीय यात्रा में दक्षिणायन की अंतिम सीमांत परिधि में गोचर करते हैं। सामान्य लौकिक दृष्टिकोण से समाज में इसे धनु संक्रांति अथवा मलमास और खरमास कहकर सांसारिक मांगलिक उत्सवों, विवाह संस्कारों और नवीन निर्माण कार्यों के लिए निषिद्ध घोषित कर दिया जाता है, परंतु तंत्र शास्त्र, आगम ग्रंथों और प्राचीन वैदिक ज्योतिष के गोपनीय अध्यायों में इसे आंतरिक साधना सिद्धि, गुप्त अनुष्ठान और अक्षय धन संचय का परम फलदायी समय स्वीकार किया गया है। यह पवित्र महीना प्रायः आधुनिक ग्रेगोरियन कैलेंडर के दिसंबर मास के अंतिम सप्ताह और जनवरी मास के आरंभिक पखवाड़े के साथ पूर्ण रूप से मेल खाता है, जब संपूर्ण संसार, प्रत्येक गृहस्थ, स्वतंत्र व्यापारी और आध्यात्मिक साधक अपने विगत बारह महीनों के वित्तीय लेखा जोखा का गंभीर मूल्यांकन करता है और आगामी नूतन वर्ष के लिए नए आर्थिक लक्ष्यों, व्यापारिक निवेशों तथा पारिवारिक सुरक्षा की विस्तृत योजनाएं तैयार करता है। जब प्रकृति बाह्य रूप से घने कोहरे, शीतलहर और शांत वातावरण के प्रभाव से अंतर्मुखी होने लगती है तब उस समय ब्रह्मांडीय आकाश मंडल में माता महालक्ष्मी और यक्षराज धनाध्यक्ष कुबेर देव की संयुक्त प्राण ऊर्जा को अपनी ओर आकर्षित करना अत्यंत सुगम और सहज हो जाता है।
प्राचीन वैदिक ज्योतिषीय सिद्धांतों के आलोक में जहां भगवान सूर्य देव जातक की जन्म पत्रिका में आत्मकारक ग्रह होकर उसकी आंतरिक शक्ति, प्रशासनिक तेज, सामाजिक प्रतिष्ठा और आरोग्य को पूर्णतः नियंत्रित करते हैं, वहीं दूसरी ओर माता महालक्ष्मी इस चराचर जगत में भौतिक पोषण, अष्ट ऐश्वर्य, स्थिर समृद्धि और कीर्ति की साक्षात अधिष्ठात्री महाशक्ति हैं। उनके साथ इस सृष्टि के समस्त कोषों के रक्षक और उत्तर दिशा के अधिपति यक्षराज कुबेर देव को संचित धन, बहुमूल्य धातुओं, भूमि और व्यापारिक लाभ का दिव्य कोषाध्यक्ष स्वीकार किया गया है। शास्त्र सम्मत सत्य यह है कि जब तक माता लक्ष्मी के अनुग्रह से अर्जित किए गए धन को कुबेर देव की स्थिरता और संरक्षण की शक्ति प्राप्त नहीं होती तब तक किसी भी आवासीय भवन अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठान में धन का संचय और ठहराव कदापि संभव नहीं हो पाता। पौष मास की शीतल रात्रियों में बहने वाली वायु और ऊर्जा तरंगे इतनी स्थिर, सूक्ष्म और तमोगुण नाशक होती हैं कि इस विशेष कालखंड में की गई एक रात्रि की निष्ठावान साधना भी साधक के जन्म जन्मांतर के दारिद्र्य योगों और कर्म बंधनों को काटकर उसके गृह में वर्ष भर के लिए सुख, शांति और समृद्धि के नवीन द्वार खोल देती है। इस दिव्य तांत्रिक और वैदिक साधना के समस्त अनिवार्य अंग, विशिष्ट तिथियां, शास्त्रीय नैवेद्य और पूजन सामग्रियों का संपूर्ण विवरण नीचे प्रस्तुत तालिका में सुव्यवस्थित रूप से दिया गया है।
| साधना घटक | वैदिक नियम और पूजन सामग्री | ज्योतिषीय आधार और आध्यात्मिक महत्व |
|---|---|---|
| प्रमुख तिथियां | पौष शुक्ल पक्ष के शुक्रवार, अष्टमी और पौष पूर्णिमा | महालक्ष्मी तत्व और चंद्र किरणों का चरम ऊर्जा संरेखण |
| मुख्य दिशा | उत्तर दिशा और ईशान कोण (उत्तर पूर्व) | कुबेर देव और देवगुरु बृहस्पति का संयुक्त आधिपत्य क्षेत्र |
| अभिषेक सामग्री | कच्चा गाय का दूध, कश्मीरी केसर, गंगाजल और गुलाब जल | कुंडली में शुक्र, चंद्र और गुरु के अशुभ दोषों का शमन |
| विशिष्ट नैवेद्य | मखाने की खीर और गाय के घी में बना केसरिया हलवा | देवी महालक्ष्मी की तृप्ति और भौतिक आकर्षण बल की वृद्धि |
| प्रधान स्तोत्र | आदि शंकराचार्य कृत कनकधारा स्तोत्र और श्री सूक्त | व्यापार में रुके हुए धन की प्राप्ति और ऋण मुक्ति का विधान |
| मुख्य मंत्र जाप | ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः | कोषाध्यक्ष कुबेर की कृपा से धन संचय और बरकत की प्राप्ति |
| धारण वस्त्र | शुद्ध श्वेत अथवा पीत वर्ण के रेशमी वस्त्र | सात्विक चेतना का जागरण और विद्युत चुंबकीय ऊर्जा का रक्षण |
दिसंबर मास का अंतिम चरण और जनवरी मास का प्रारंभिक प्रभात केवल एक सामान्य कैलेंडर की तारीखों का परिवर्तन मात्र नहीं होता बल्कि यह संपूर्ण भूमंडल पर एक साथ करोड़ों मानव मस्तिष्कों द्वारा की जाने वाली संकल्प शक्ति का सामूहिक संक्रमण काल होता है। इस संधि काल में संपूर्ण विश्व का ध्यान आर्थिक स्थिरता, नए व्यापारिक अनुबंधों, ऋण मुक्ति और आगामी वर्ष में धन वृद्धि के उपायों पर केंद्रित रहता है। वैदिक ऋषि परंपरा हमें यह गूढ़ संदेश देती है कि बाह्य संसार में किसी भी लौकिक संकल्प की सिद्धि केवल मनुष्य के बौद्धिक श्रम से नहीं होती बल्कि वह इस बात पर निर्भर करती है कि उस जातक की व्यक्तिगत प्राण ऊर्जा और उसके आवासीय वातावरण का सूक्ष्म धन तत्व के साथ कितना गहरा तादात्म्य स्थापित है। जब कोई प्रबुद्ध व्यक्ति पौष मास की इन पवित्र घड़ियों में अपने संपूर्ण वित्तीय जीवन का शांत चित्त होकर आत्मविश्लेषण करता है और वैदिक विधियों द्वारा अपनी आर्थिक ऊर्जा को पुनर्संरेखित करता है, तो उसके भाग्य में आगामी वर्ष में आने वाली वित्तीय हानियों के योग स्वतः निष्प्रभावी होने लगते हैं।
कालपुरुष की कुंडली में दूसरा भाव संचित धन, कुटुंब और वाणी का माना जाता है, जबकि एकादश भाव समस्त प्रकार के लाभ, आय के निरंतर स्रोतों और दीर्घकालिक इच्छाओं की पूर्ति का प्रतिनिधित्व करता है। इन दोनों महत्वपूर्ण भावों का सूक्ष्म आध्यात्मिक संबंध सीधे तौर पर माता महालक्ष्मी के ऐश्वर्य और धनाध्यक्ष कुबेर के खजाने से जुड़ा हुआ है। यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में दरिद्र योग, केमद्रुम योग, गुरु चांडाल योग अथवा शनि राहु की युति के कारण लगातार आर्थिक पतन हो रहा हो, तो पौष मास के शुक्ल पक्ष में की गई यह गुप्त आराधना उन सभी मारक ग्रहों के दुष्प्रभावों को शांत कर देती है। इस साधना के निरंतर प्रभाव से जातक के मस्तिष्क में सूक्ष्म वित्तीय विवेक का उदय होता है, व्यर्थ के अपव्यय पर अंकुश लगता है और व्यापारिक जीवन में पिछले कई वर्षों से अटके हुए जटिल सौदे स्वतः सुलझने लगते हैं।
प्राचीन वैदिक संहिताओं, तंत्र प्रदीप और नारद पुराण में यह अत्यंत स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि जो साधक केवल माता महालक्ष्मी की ही एकांगी आराधना करते हैं, उनके जीवन में धन का आगमन बड़ी तीव्रता से तो होता है परंतु देवी के चंचला स्वरूप के कारण वह धन उतनी ही तेजी से व्यर्थ के मार्गों में नष्ट भी हो जाता है। इसके विपरीत जो मनुष्य केवल यक्षराज कुबेर की पूजा करते हैं, वे धन को सुरक्षित तो रख पाते हैं परंतु वे सांसारिक सुखों, उदारता और यश से वंचित रह जाते हैं क्योंकि कुबेर केवल संरक्षण के अधिकारी हैं, वैभव के दाता नहीं। इसी गूढ़ रहस्य को ध्यान में रखते हुए आचार्यों ने पौष मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाले शुक्रवार की रात्रि में इन दोनों दिव्य शक्तियों की एक साथ संयुक्त आराधना का विधान निर्धारित किया है। इस साधना को रात्रि के 9 बजे से 12 बजे के मध्य करना सर्वोत्तम फल प्रदान करता है, जिसे वैदिक ज्योतिष में निशीथ काल और स्थिर लग्न का कालखंड स्वीकार किया गया है।
इस अनुष्ठान को प्रारंभ करने के लिए सर्वप्रथम अपने घर अथवा कार्यालय के उत्तर दिशा या उत्तर पूर्व अर्थात ईशान कोण को गंगाजल और गौमूत्र का छिड़काव करके पूर्णतः पवित्र करना चाहिए। उस स्थान पर आम अथवा चंदन की लकड़ी की एक शुद्ध चौकी स्थापित करें और उसके ऊपर बिना कटा फटा नवीन लाल अथवा चमकीला पीला रेशमी वस्त्र बिछाएं। चौकी के मध्य भाग में शुद्ध अक्षत की सहायता से अष्टदल कमल का सुंदर निर्माण करें और उस अष्टदल कमल के ऊपर माता महालक्ष्मी और धनाध्यक्ष कुबेर के सिद्ध तांत्रिक यंत्रों अथवा उनकी पाषाण या धातु की प्रतिमाओं को प्रेमपूर्वक विराजमान करें। चौकी के पूर्व भाग में एक शुद्ध तांबे या चांदी के कलश में पवित्र जल भरकर उसमें एक चांदी का सिक्का, साबुत सुपारी, हरी दूर्वा, हल्दी की गांठ और आम के पांच पल्लव रखकर उस पर जटा वाला श्रीफल स्थापित करें। साधक स्वयं उत्तर दिशा की ओर अपना मुख करके शुद्ध ऊनी अथवा कुशा के आसन पर बैठे और अपने ऊपर तीन बार पवित्रीकरण जल छिड़क कर शुद्ध अंतःकरण से साधना का अटूट संकल्प ग्रहण करे।
पूजन के आरंभ में सबसे पहले प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश का स्मरण करना अनिवार्य है क्योंकि विघ्नहर्ता के आशीर्वाद के बिना कोई भी साधना निर्विघ्न पूर्णता तक नहीं पहुंच पाती। इसके पश्चात माता महालक्ष्मी को ताजे लाल कमल के पुष्प, सुगंधित गुलाब, प्राकृतिक चंदन का इत्र, रक्त चंदन और अक्षत अर्पित करें। धनाध्यक्ष कुबेर को पीले कनेर के पुष्प, पीला चंदन, साबुत धनिया के दाने और कमलगट्टे की माला समर्पित करनी चाहिए। दोनों दिव्य विग्रहों के सम्मुख गाय के शुद्ध देशी घी का एक अखंड चौमुखा दीपक प्रज्वलित करना चाहिए जो पूरी साधना काल में प्रज्वलित रहे। इसके उपरांत पंचोपचार विधि से दोनों देव शक्तियों का विधिवत पूजन संपन्न करके अपने कल्याण की प्रार्थना करनी चाहिए।
मखाना एक अत्यंत सात्विक और पवित्र बीज है जिसकी उत्पत्ति केवल निर्मल जल के भीतर होती है और जल का सीधा तात्विक संबंध माता महालक्ष्मी से माना गया है क्योंकि देवी का प्राकट्य भी क्षीरसागर के मंथन से हुआ था। मखाने का पूर्ण श्वेत वर्ण चंद्रमा के शीतल प्रकाश का साक्षात प्रतीक है और खीर के निर्माण में प्रयुक्त होने वाला शुद्ध गाय का दूध और मिश्री कुंडली के शुक्र ग्रह और चंद्र ग्रह को सर्वोच्च बल प्रदान करते हैं। जब इस खीर में कश्मीरी केसर की कुछ पंखुड़ियां मिला दी जाती हैं, तो यह नवैद्य देवगुरु बृहस्पति और सूर्य नारायण की दिव्य ऊर्जा का एक अद्भुत समन्वय बन जाता है। पौष मास की कड़ाके की ठंड में माता महालक्ष्मी को मखाने की गरमागरम खीर और शुद्ध गाय के घी में भुने हुए केसरिया हलवे का भोग लगाने से देवी का हृदय अत्यंत द्रवित और प्रसन्न हो जाता है, जिसके फलस्वरूप साधक के अन्न और धन के भंडार जीवन पर्यंत कभी रिक्त नहीं होते।
नैवेद्य अर्पण के पश्चात साधक को आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित सुप्रसिद्ध कनकधारा स्तोत्र का शांत चित्त होकर कम से कम 3 बार अथवा विशेष संकट की स्थिति में 11 बार सस्वर पाठ करना चाहिए। यह दिव्य स्तोत्र वह चमत्कारी ध्वनि विज्ञान है जिसने प्राचीन काल में एक परम निर्धन ब्राह्मण स्त्री के जीर्ण शीर्ण घर में साक्षात स्वर्ण के आंवलों की वर्षा करा दी थी। जिन व्यापारियों, उद्योगपतियों अथवा सामान्य नौकरीपेशा व्यक्तियों की मेहनत की कमाई किसी दिवालिया संस्था, घाटे के व्यापार अथवा धोखेबाज व्यक्तियों के पास लंबे समय से फंसी हुई है, उनके लिए पौष मास में कनकधारा स्तोत्र का रात्रि कालीन पाठ एक अचूक ब्रह्मांडीय उपाय सिद्ध होता है। इस स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक से उत्पन्न होने वाली सूक्ष्म ध्वनियां आकाश मंडल में उपस्थित धन आकर्षण के गुप्त परमाणुओं को तुरंत सक्रिय कर देती हैं। पाठ करते समय अपने निकट तांबे के पात्र में जल भरकर रखें और पाठ पूर्ण होने के उपरांत उस अभिमंत्रित जल को अपने व्यावसायिक गल्ले, तिजोरी और मुख्य द्वार पर छिड़क दें।
पौष मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी, एकादशी अथवा किसी भी शुक्रवार की शुभ रात्रि में सिद्ध की जाने वाली कुबेर पोटली घर की दरिद्रता को समूल नष्ट करने का एक अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली तांत्रिक उपाय है। यह केवल कुछ भौतिक वस्तुओं का संग्रह मात्र नहीं है बल्कि यह विशिष्ट वैदिक पदार्थों के माध्यम से धन की ऊर्जा को एक केंद्र पर बांधने का एक प्राचीन यंत्र विधान है, जिसे यदि सही मुहूर्त में तैयार करके अपनी निजी तिजोरी में रख दिया जाए तो यह चुंबक की तरह निरंतर धन को खींचती रहती है।
पोटली निर्माण हेतु दुर्लभ सामग्री का संकलन: सवा मीटर बिना सिला हुआ शुद्ध रेशमी पीला अथवा चटख लाल वस्त्र लें। इसके साथ 5 पीली अभिमंत्रित कौड़ियां, 5 प्राकृतिक गोमती चक्र, 1 लघु नारियल, 5 गांठें साबुत पीली हल्दी, 1 शुद्ध चांदी का सिक्का, 11 कमलगट्टे के बीज, 1 पूजा सुपारी, 21 साबुत चावल के दाने और थोड़ी सी जावित्री एकत्र करें।
पंचामृत और गंगाजल द्वारा पदार्थों का शुद्धिकरण: इन सभी पवित्र पदार्थों को एक चांदी अथवा पीतल की स्वच्छ थाली में रखें। सर्वप्रथम इन सभी वस्तुओं को कच्चे गाय के दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल के मिश्रण से बने पंचामृत से स्नान कराएं। उसके पश्चात शुद्ध गुनगुने गंगाजल से धोकर इन्हें एक साफ सूती वस्त्र से सुखा लें।
अष्टगंध और केसर से विधिवत प्रतिष्ठा: अब प्रत्येक वस्तु पर अष्टगंध, शुद्ध कस्तूरी, कश्मीरी केसर और अनामिका उंगली से रोली का तिलक लगाएं। महालक्ष्मी और कुबेर देव का ध्यान करते हुए इन सभी सामग्रियों के ऊपर अक्षत और ताजी गुलाब की पंखुड़ियां छिड़कें।
कुबेर बीज मंत्र द्वारा ऊर्जा का संचार: कमलगट्टे की माला अथवा स्फटिक की शुद्ध माला को हाथ में लेकर कुबेर देव के इस सिद्ध मंत्र का कम से कम 108 बार अथवा 11 माला तक स्पष्ट उच्चारण के साथ जाप करें: "ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा"। प्रत्येक मंत्र की समाप्ति पर पोटली की सामग्री को गाय के उपले पर सुलग रहे लोबान और गूगल की धूप का धुआं स्पर्श कराएं।
पोटली का शास्त्रीय बंधन और स्थापना: संपूर्ण जप समाप्त होने के पश्चात उन सभी 9 दिव्य सामग्रियों को रेशमी वस्त्र के ठीक केंद्र में रखें। अब मौली अथवा सुनहरे गोटेदार धागे की सहायता से उस वस्त्र को लपेटते हुए उसमें कुल सात गांठें लगाएं। इसके पश्चात इस सिद्ध कुबेर पोटली को श्रद्धापूर्वक अपने घर की मुख्य तिजोरी, अलमारी के लॉकर अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठान के कैश बॉक्स में इस प्रकार स्थापित करें कि उसका मुख उत्तर दिशा की ओर रहे।
नित्य दर्शन और पवित्रता के कड़े नियम: इस सिद्ध कुबेर पोटली को बार बार खोलकर देखना अथवा अपवित्र हाथों से स्पर्श करना पूर्णतः वर्जित है। प्रतिदिन संध्या के समय जब घर में दीप प्रज्वलित किया जाए तब तिजोरी को थोड़ा सा खोलकर बाहर से ही अगरबत्ती और कपूर की सुगंध इस पोटली को दिखानी चाहिए, जिससे इसकी आकर्षण शक्ति पूरे वर्ष पर्यंत जागृत बनी रहे।
वैदिक संस्कृति की यह शाश्वत परंपरा रही है कि धन की अधिष्ठात्री देवी को केवल मंत्रों और स्तोत्रों से नहीं रिझाया जा सकता बल्कि इसके साथ त्याग, तपस्या और स्वार्थरहित दान का संतुलन होना परम आवश्यक है। पौष मास में पड़ने वाली सफला एकादशी इस दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण तिथि मानी गई है। इस दिन पूर्ण निर्जला अथवा फलाहार व्रत रखकर जो साधक भगवान नारायण और लक्ष्मी का पूजन करता है, उसके जीवन के समस्त पूर्व संचित पाप जलकर भस्म हो जाते हैं और उसके द्वारा लिए गए समस्त व्यावसायिक निर्णय सफलता के शिखर पर पहुंचते हैं। इसी प्रकार पौष मास के शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी संतान के भाग्य को उज्ज्वल करके परिवार के आर्थिक भविष्य को सुरक्षित बनाती है। पौष मास की पूर्णिमा के दिन किसी भी पवित्र तीर्थ स्थल अथवा घर पर ही गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करके काले तिल, शुद्ध गुड़, ऊनी कंबल, चमड़े के स्थान पर कपड़े के जूते और तांबे के बर्तनों का गुप्त दान करने से मनुष्य को कई गुना अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
शास्त्रों में यह अकाट्य नियम उल्लिखित है कि जो गृहस्थ अपनी न्यायपूर्वक कमाई गई आय का न्यूनतम दसवां भाग धर्म कार्यों, निर्धन कन्याओं के विवाह, असहाय रोगियों की चिकित्सा और गोमाता की सेवा में सहर्ष समर्पित करता है, उसके घर में महालक्ष्मी कभी भी अपना आसन छोड़कर नहीं जातीं। पौष मास की भीषण शीत ऋतु में खुले आकाश के नीचे ठिठुर रहे निर्धन और असहाय मनुष्यों को गर्म भोजन और ऊनी वस्त्र भेंट करने से जन्म कुंडली के शनि देव, राहु और केतु के समस्त क्रूर योग स्वतः शांत हो जाते हैं। जब कर्मफल दाता शनि देव जातक की सेवा भावना से संतुष्ट होते हैं, तो वे कुबेर देव को उस जातक के लिए अपने अक्षय भंडारों के द्वार खोलने का गुप्त आदेश दे देते हैं, क्योंकि बिना कर्म की शुद्धता के प्राप्त हुआ धन कभी भी मनुष्य को मानसिक शांति प्रदान नहीं कर सकता।
वैदिक अध्यात्म का वास्तविक सौन्दर्य इस बात में निहित है कि वह केवल भौतिक चमत्कारों का सब्जबाग नहीं दिखाता बल्कि वह मानव के अंतःकरण में एक अत्यंत दृढ़ नैतिक अनुशासन, संतुलन और जागृत चेतना का निर्माण करता है। पौष मास के इस एकांत और शांत वातावरण में संपन्न की जाने वाली लक्ष्मी कुबेर साधना का चरम लक्ष्य केवल भौतिक धन का अंबार लगाना नहीं है बल्कि धन के प्रति मनुष्य के दृष्टिकोण को पूर्णतः सात्विक, मर्यादित और पवित्र बनाना है। जब कोई साधक वर्ष के इस महान संधिकाल में अपनी वाणी पर संयम रखकर, मन से ईर्ष्या का त्याग करके और अपने कर्मों को सत्य की कसौटी पर कसकर इस अनुष्ठान को पूर्ण करता है, तो उसके भीतर एक अभूतपूर्व मानसिक दृढ़ता का जन्म होता है। यह साधना हमें यह शाश्वत सत्य समझाती है कि धन कभी भी जीवन का अंतिम साध्य नहीं हो सकता, वह केवल धर्म के पालन, अपने आश्रितों के भरण पोषण और समाज के कल्याण का एक पवित्र साधन मात्र है। जो भी निष्ठावान साधक पौष मास के इन रहस्यमयी वैदिक और तांत्रिक सूत्रों को अपने आचरण में उतारता है, वह आने वाले नए वर्ष में केवल अथाह आर्थिक समृद्धि ही प्राप्त नहीं करता बल्कि वह समाज में यश, पारिवारिक सौहार्द और परम आत्मिक शांति का भी अधिकारी बन जाता है।
क्या पौष मास के खरमास में लक्ष्मी पूजन करना शास्त्रों के अनुसार वर्जित है? पौष मास में सूर्य के धनु राशि में होने के कारण लगने वाले खरमास में केवल विवाह, मुंडन, यज्ञोपवीत और नए भवन निर्माण की नींव डालने जैसे सांसारिक उत्सव वर्जित माने गए हैं। किसी भी देवी देवता की नित्य पूजा, गुप्त तांत्रिक साधनाएं, कनकधारा स्तोत्र पाठ, मंत्र जप और धन आकर्षण के समस्त अनुष्ठान करने के लिए यह कालखंड शास्त्रों में अत्यंत फलदायी और सिद्धिकारक माना गया है।
कुबेर पोटली को घर अथवा व्यापार स्थल पर किस दिशा में रखना सर्वाधिक लाभकारी है? कुबेर पोटली को सदैव भवन अथवा प्रतिष्ठान के उत्तरी भाग में स्थित किसी भारी तिजोरी, अलमारी अथवा कैश बॉक्स में स्थापित करना चाहिए। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि तिजोरी का पल्ला हमेशा उत्तर दिशा की ओर खुले, क्योंकि उत्तर दिशा साक्षात धनाध्यक्ष कुबेर देव की मानी गई है जिससे धन आगमन में कभी बाधा नहीं आती।
कनकधारा स्तोत्र का पाठ दिन में कितनी बार करना चाहिए और इसका सही नियम क्या है? पौष मास के शुक्ल पक्ष में कनकधारा स्तोत्र का पाठ प्रातः काल स्नान के उपरांत 3 बार और विशेष रूप से शुक्रवार की रात्रि में 11 बार करना सर्वोत्तम माना जाता है। पाठ करते समय शुद्ध घी का दीपक अवश्य प्रज्वलित रखें और उच्चारण पूर्णतः शुद्ध होना चाहिए। यदि समय सीमित हो तो प्रतिदिन 1 बार भी एकाग्रचित्त होकर पाठ किया जा सकता है।
व्यापार में डूबा हुआ अथवा किसी को उधार दिया गया धन वापस पाने का अचूक उपाय क्या है? अटके हुए धन को निकालने के लिए पौष मास के किसी भी शुक्रवार को एक साबुत भोजपत्र पर अनार की कलम और लाल चंदन की स्याही से उस देनदार व्यक्ति का नाम लिखें। उस भोजपत्र को मां लक्ष्मी के चरणों में रखकर 11 बार कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें और तत्पश्चात उस भोजपत्र को शुद्ध शहद की एक छोटी कांच की शीशी में डुबोकर अपने घर की उत्तर दिशा में गुप्त रूप से सुरक्षित रख दें।
क्या साधना काल में माता लक्ष्मी को अर्पित की गई मखाने की खीर का सेवन परिवार कर सकता है? हां, साधना पूर्ण होने के उपरांत माता महालक्ष्मी और धनाध्यक्ष कुबेर को निवेदित की गई मखाने की खीर और हलवे को घर के सभी सदस्यों में प्रसाद के रूप में प्रेमपूर्वक वितरित करना चाहिए तथा साधक को स्वयं भी इसका सेवन करना चाहिए। यह दिव्य प्रसाद शरीर की जीवनी शक्ति को बढ़ाता है और घर में सात्विक प्रेम का संचार करता है।
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