लोहड़ी पर अग्नि पूजन कैसे करें?

By पं. अमिताभ शर्मा

नई फसल का अर्पण, दुल्ला भट्टी की कथा और लोहड़ी का खगोलीय रहस्य

लोहड़ी पर्व: अग्नि पूजन विधि, दुल्ला भट्टी की कथा व उपाय

लोहड़ी का पावन महापर्व सनातन वैदिक काल गणना और उत्तर भारतीय लोक संस्कृति का वह अत्यंत उल्लासमय, ऊर्जावान, तेजस्वी और सामूहिक कृतज्ञता का पर्व माना जाता है जो पौष मास के अंतिम दिनों में मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पूर्व प्रतिवर्ष 13 जनवरी की संध्या को संपूर्ण पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और निकटवर्ती अंचलों में अपार श्रद्धा, भक्ति और उमंग के साथ मनाया जाता है। खगोलीय दृष्टिकोण से यह पर्व केवल एक सामान्य लोक उत्सव नहीं है बल्कि यह शीत ऋतु की चरम सीमा के समापन, भगवान भुवन भास्कर के दक्षिणायन मार्ग के अंतिम क्षणों और मकर संक्रांति के साथ प्रारंभ होने वाले पावन उत्तरायण के दिव्य संधिकाल का उद्घोषक माना गया है। इस पावन संध्या पर शीत ऋतु की सबसे लंबी, ठंडी और गंभीर रात्रियों में से एक का अंत होता है और इसके तत्काल पश्चात सूर्य देव की किरणों की दिशा में स्पष्ट परिवर्तन आने लगता है जिससे दिन धीरे धीरे बड़े होने लगते हैं और सूर्य का प्रकाश अधिक प्रखर, उष्ण और संपूर्ण भूमंडल को नवजीवन प्रदान करने वाला बनने लगता है। प्राचीन वैदिक परंपरा और श्रुति ग्रंथों में इस लोकोत्सव को केवल सांसारिक आमोद प्रमोद का साधन नहीं माना गया है बल्कि यह साक्षात अग्नि देव, वरुण देव, भुवन भास्कर सूर्य नारायण और अन्नपूर्णा धरती माता के प्रति संपूर्ण मानव जाति द्वारा अपने प्रथम अन्नाहुति के माध्यम से कृतज्ञता ज्ञापित करने का एक परम पवित्र यज्ञ विधान है जो व्यक्ति के अंतःकरण और बाह्य पर्यावरण दोनों को एक साथ शुद्ध कर देता है।

भारत की कृषि प्रधान ग्रामीण संस्कृति में लोहड़ी का पर्व रबी की नई फसल के आगमन, खेतों में मंद बयार के साथ लहलहाती हरी भरी गेहूं और जौ की बालियों, चारों ओर फैली सरसों के पीले फूलों की स्वर्णिम चादर और गन्ने की मीठी पैदावार के आनंदोत्सव का प्रत्यक्ष प्रतीक है। ग्रामीण अंचलों में जब परिश्रमी किसान अपनी हाड़ कंपाने वाली शीतकालीन मेहनत से उपजाए गए नए गन्ने से बने ताजे रस, सुनहरे गुड़, तिल, मूंगफली और मक्का के पके हुए दानों को अपने खलिहानों में देखते हैं, तो उनका हृदय परमात्मा की इस असीम अनुकंपा के प्रति नतमस्तक हो जाता है। सनातन धर्म की यह शाश्वत और अटूट मर्यादा रही है कि भूमि से उत्पन्न होने वाले किसी भी नए अन्न का उपभोग मनुष्य तब तक अपने व्यक्तिगत पोषण के लिए नहीं करता जब तक कि उस प्रथम फसल का पावन अंश इस संपूर्ण चराचर जगत के प्रत्यक्ष दृश्य देवता भगवान अग्नि देव को श्रद्धापूर्वक समर्पित न कर दिया जाए। खुले आकाश के नीचे प्रज्वलित की जाने वाली लोहड़ी की पावन अग्नि वास्तव में वह पवित्र सूक्ष्म माध्यम बनती है जो मनुष्य के समर्पण, कृतज्ञता और आस्था को सीधे दिव्य शक्तियों तक पहुंचाती है। इस पावन पर्व के प्रमुख घटक, शास्त्रीय विधान, आहुति द्रव्य और सांस्कृतिक परंपराओं का विस्तृत विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

लोहड़ी पर्व घटकशास्त्रीय और पारंपरिक विधानज्योतिषीय और वैज्ञानिक महत्व
पर्व की तिथि और कालपौष मास का अंतिम दिन (प्रतिवर्ष 13 जनवरी की संध्या)सूर्य के मकर राशि में प्रवेश से ठीक पूर्व संधिकाल का खगोलीय पर्व
प्रमुख अधिष्ठाता देवताअग्नि देव, सूर्य नारायण और वनस्पति के देवताकफ और शीत जनित शारीरिक विकारों का नाश और सौर ऊर्जा का स्वागत
पूजन का मुख्य स्थानभवन का खुला प्रांगण, छत अथवा सार्वजनिक चौकखुले आकाश के नीचे अग्नि, पृथ्वी और वायु तत्वों का प्रत्यक्ष संतुलन
पवित्र आहुति द्रव्यतिल, गुड़, रेवड़ी, गजक, मूंगफली और मक्के के फूलेनए अन्न का प्रथम देव अर्पण और शीतकाल में शरीर की जठराग्नि का संवर्धन
प्रमुख लोक अनुष्ठानअग्नि की सात परिक्रमा और 'आदर आए दिलदर जाए' का उद्घोषदरिद्रता, रोग, ईर्ष्या और नकारात्मक ऊर्जा का समूल विनाश
विशिष्ट सांस्कृतिक स्वरूपभांगड़ा, गिद्दा, ढोल वादन और पारंपरिक लोकगीतसामूहिक उल्लास, मानसिक अवसाद की मुक्ति और सामाजिक सौहार्द
विशेष लाभार्थीनवविवाहित युगल और नवजात शिशुकुल वृद्धि, दीर्घायु, शारीरिक आरोग्य और दांपत्य जीवन में स्थिरता

लोहड़ी के पीछे छिपा खगोलीय और सौर विज्ञान क्या है?

वैदिक ज्योतिष और आधुनिक सौर खगोल विज्ञान के सूक्ष्म सिद्धांतों के अनुसार पृथ्वी की धुरी के विशिष्ट झुकाव के कारण सूर्य देव जब अपनी वार्षिक आकाशीय यात्रा में मकर रेखा की ओर से धीरे धीरे उत्तर की ओर मुड़ते हुए कर्क रेखा की दिशा में लौटना प्रारंभ करते हैं, तो उस महान खगोलीय संधिकाल को उत्तरायण कहा जाता है। लोहड़ी की रात्रि वास्तव में उस दिव्य सौर संक्रमण से ठीक पहले की अंतिम शीतकालीन रात्रि होती है जब सूर्य देव धनु राशि की अपनी अंतिम अंशों की यात्रा पूर्ण कर रहे होते हैं। इस समय पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में रात्रि का अंधकार सर्वाधिक घना होता है और वायुमंडल में अत्यधिक शुष्कता व चुभने वाली ठंडक व्याप्त रहती है जिससे मानव शरीर में वात और कफ दोष का असंतुलन अपने चरम शिखर पर पहुंच जाता है। जब किसी बस्ती या परिवार के लोग खुले वातावरण में एकत्र होकर विशाल काष्ठ अग्नि प्रज्वलित करते हैं, तो उस अग्नि की प्रचंड लपटों से निकलने वाली प्राणवान ऊष्मा उस क्षेत्र की विषाक्त, भारी और ठंडी वायु को तुरंत विरल बनाकर ऊपर उठा देती है।

अग्नि में आहुति के रूप में श्रद्धापूर्वक समर्पित किए जाने वाले काले व सफेद तिल, शुद्ध गन्ने का गुड़, सुगंधित रेवड़ी, गाय का देशी घी और कपूर के जलने से निकलने वाली औषधीय वाष्प संपूर्ण वायुमंडल में फैल जाती है जो शीत ऋतु में पनपने वाले घातक जीवाणुओं, विषाणुओं और फंगस के बीजाणुओं को पल भर में नष्ट कर देती है। यह एक अत्यंत उच्च कोटि की वैज्ञानिक लोक परंपरा है जो समाज के प्रत्येक वर्ग को सर्दियों के लंबे आलस्य, मौसमी अवसाद और शारीरिक सुस्ती से बाहर निकालकर एक नई स्फूर्ति, उमंग और कार्यक्षमता से सराबोर कर देती है। सनातन ज्योतिष शास्त्र में अग्नि देव को सूर्य देव का भूलोक पर साक्षात पार्थिव प्रतिनिधि माना गया है। रात्रि के गहन अंधकार में जब सूर्य देव दृष्टिगोचर नहीं होते, उस समय अग्नि देव का पूजन करना वास्तव में सूर्य की उसी जीवनदायिनी प्राण शक्ति और चेतना का सम्मान करना है जिसके बल पर संपूर्ण वनस्पति जगत और मानव जीवन जीवित रहता है।

दुल्ला भट्टी की अमर लोककथा और सामाजिक समरसता का संदेश क्या है?

लोहड़ी के पावन पर्व के साथ मध्यकालीन भारत के अमर लोकनायक दुल्ला भट्टी की शौर्य गाथा इतनी गहराई से जुड़ी हुई है कि उनके स्मरण के बिना लोहड़ी का कोई भी पारंपरिक लोकगीत पूर्ण नहीं माना जा सकता। प्रामाणिक ऐतिहासिक आख्यानों के अनुसार दुल्ला भट्टी, जिनका मूल नाम अब्दुल्ला भट्टी था, मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में पंजाब के एक अत्यंत वीर, स्वाभिमानी और शरणागत रक्षक योद्धा थे जिन्होंने उस समय के अत्याचारी सामंतों, भ्रष्ट अधिकारियों और शोषकों के विरुद्ध निर्धन किसानों और असहाय प्रजा के अधिकारों के लिए सशस्त्र संघर्ष किया था। उस अंधकारमय कालखंड में कुछ पतित और वासनांध सामंतों द्वारा निर्धन हिंदू परिवारों की असहाय कन्याओं का बलपूर्वक अपहरण करके उन्हें मध्य एशियाई बाजारों में दासियों के रूप में बेच दिया जाता था। दुल्ला भट्टी ने न केवल ऐसे कुकर्मी सामंतों को कठोर दंड दिया बल्कि उन असहाय बालिकाओं को उनके चंगुल से छुड़ाकर उन्हें अपनी सगी पुत्रियों के समान स्नेह, सुरक्षा और सम्मान प्रदान किया।

सुंदरी और मुंदरी नामक दो अनाथ हिंदू कन्याओं की करुण और प्रेरक गाथा आज भी उत्तर भारत के प्रत्येक गांव और नगर में बड़े आदर के साथ गाई जाती है। जब एक अत्याचारी और लंपट जमींदार ने उन दोनों अनाथ बहनों पर बुरी दृष्टि डाली और उनके निर्धन चाचा को डरा धमकाकर उन्हें छीनने का षड्यंत्र रचा तब दुल्ला भट्टी ने उस अत्याचारी को ललकारा और दोनों बालिकाओं को सुरक्षित वन के एकांत में ले आए। वहां उन्होंने उसी रात लोहड़ी की पवित्र अग्नि प्रज्वलित करवाई और समाज के सुयोग्य हिंदू युवकों को बुलाकर उनका विवाह उन कन्याओं के साथ पूरे वैदिक और सामाजिक सम्मान के साथ संपन्न कराया। उस समय जंगल में कोई साधन उपलब्ध न होने के कारण दुल्ला भट्टी ने अपने पास मौजूद केवल एक सेर शक्कर और थोड़े से तिल उन बालिकाओं की झोली में डालकर स्वयं उनका कन्यादान किया। यही कारण है कि आज भी लोहड़ी के दिन जब छोटे बच्चे और किशोर टोलियां बनाकर घर घर जाते हैं, तो वे बड़े गर्व, उत्साह और आनंद के साथ यह अमर गीत गाते हैं कि 'सुंदर मुंदरिये हो, तेरा कौन विचारा हो, दुल्ला भट्टी वाला हो'। यह ऐतिहासिक गाथा हमें यह अमर संदेश देती है कि धर्म, जाति और संप्रदाय की संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठकर नारी के सम्मान की रक्षा करना, असहायों का संबल बनना और संपूर्ण समाज को परस्पर विश्वास और प्रेम के सूत्र में बांधना ही लोहड़ी का वास्तविक मानवीय और आध्यात्मिक दर्शन है।

अग्नि पूजन की वैदिक विधि और आहुति का शास्त्रीय विधान क्या है?

लोहड़ी की पावन संध्या के समय जब पश्चिम दिशा में सूर्य देव अस्ताचल की ओर प्रस्थान कर जाएं तब घर के खुले प्रांगण में, छत पर अथवा गांव या मोहल्ले के किसी स्वच्छ सार्वजनिक चौक पर गाय के सूखे गोबर के उपले, आम की पवित्र समिधा, पलाश की लकड़ियां और तिल के सूखे डंठल एकत्र करके एक सुंदर गोल वेदी का निर्माण किया जाता है। इस पवित्र काष्ठ समूह के केंद्र में शुद्ध देशी कपूर और गाय का घी रखकर अग्नि का पावन आह्वान किया जाता है। अग्नि के धधकते ही उपस्थित सभी लोग हाथ जोड़कर साक्षात अग्नि देव और जल के देवता वरुण का ध्यान करते हैं। परिवार के सबसे वयोवृद्ध सदस्य तांबे के लोटे में शुद्ध जल लेकर अग्नि देव के चारों ओर जल की एक पवित्र धारा प्रवाहित करते हैं जिसे शास्त्रीय भाषा में अर्घ्य विधान और रक्षा रेखा कहा जाता है।

इसके उपरांत सभी उपस्थित परिजन, मित्र और पड़ोसी अपने दोनों हाथों में काले व सफेद तिल, गुड़ की डलियां, कुरकुरी रेवड़ियां, तिलकुट, मूंगफली और भुने हुए मक्के के फूले लेकर पूर्ण श्रद्धा और एकाग्रता के साथ अग्नि की प्रज्वलित ज्वालाओं में समर्पित करते हैं। वैदिक शास्त्रों में भगवान अग्नि को 'हव्यवाह' और 'कव्यवाह' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे मनुष्यों द्वारा श्रद्धापूर्वक अर्पित किए गए प्रत्येक हविष्य को स्वयं ग्रहण करके उसे अत्यंत सूक्ष्म ऊर्जा तरंगों में रूपांतरित करते हैं और देवताओं तक पहुंचाते हैं। आहुति समर्पित करते समय पारंपरिक लोक भाषा में 'आदर आए, दिलदर जाए' का समवेत स्वर में उच्चार किया जाता है, जिसका शास्त्रीय अर्थ यह है कि इस घर और समाज में परस्पर आदर, प्रेम, लक्ष्मी और सद्गुणों का प्रवेश हो तथा दरिद्रता, आलस्य, दुर्भावना और रोगों का समूल नाश हो जाए। आहुति समर्पण के पश्चात सभी लोग हाथ जोड़कर अग्नि देव की सात बार प्रदक्षिणा करते हैं और अपने कुल की रक्षा, संतानों की दीर्घायु और अन्न धन के भंडारों के भरे रहने की प्रार्थना करते हैं। अंत में जब अग्नि की प्रचंड लपटें शांत होकर अंगारों में बदल जाती हैं तब उस दिव्य पवित्र ताप से अपने दोनों हाथों को सेंककर अपने मस्तक, नेत्रों और हृदय पर लगाया जाता है जिससे शरीर की संपूर्ण शीतकालीन जकड़न और मानसिक भारीपन तत्क्षण विलीन हो जाता है।

लोहड़ी पर किए जाने वाले 5 प्रमुख कल्याणकारी उपाय कौन से हैं?

इस पावन ऋतु परिवर्तन के संधिकाल पर पारिवारिक सुख शांति, स्वास्थ्य संवर्धन और जीवन में स्थायी सौभाग्य प्राप्त करने के लिए पांच प्रमुख पारंपरिक और वैदिक उपाय अत्यंत चमत्कारी प्रभाव दिखाते हैं।

  1. नवविवाहित युगलों का अग्नि फेरा और अखंड सौभाग्य आशीर्वाद: जिस परिवार में उस वर्ष किसी युवक अथवा युवती का नया विवाह संपन्न हुआ हो, उसके लिए लोहड़ी का उत्सव अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य माना जाता है। नववधू पारंपरिक वेशभूषा, लाल चूड़ा और सुंदर आभूषण धारण करके अपने पति के साथ अग्नि की सात बार श्रद्धापूर्वक परिक्रमा करती है और अग्नि में तिल, रेवड़ी व मक्के की आहुति देती है। इसके उपरांत परिवार और समाज के सभी बड़े बुजुर्ग उस नवदंपति के मस्तक पर अक्षत और दूर्वा रखकर उन्हें दीर्घायु, अखंड दांपत्य प्रेम और सुयोग्य संतान की प्राप्ति का हृदय से आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

  2. नवजात शिशु का प्रथम लोहड़ी संस्कार और बालारिष्ट शांति: जिस घर में उस वर्ष किसी नन्हे बालक अथवा बालिका का जन्म हुआ हो, वहां पहली लोहड़ी का आयोजन अत्यंत विशाल स्तर पर किया जाता है। नवजात शिशु को उसकी माता की गोद में बिठाकर लोहड़ी की पावन अग्नि के निकट लाया जाता है और उस दिव्य अग्नि की सौम्य ऊष्मा शिशु के कोमल शरीर को स्पर्श कराई जाती है। लोक मान्यता और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अग्नि देव के इस पावन ताप और तिल की आहुति के धुएं से शिशु के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा चक्र बन जाता है जिससे उस पर किसी भी प्रकार की बुरी नजर, नकारात्मक स्पंदन अथवा बालारिष्ट दोष का प्रभाव नहीं पड़ता और उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता अत्यधिक बढ़ जाती है।

  3. काले तिल, उड़द और वस्त्रों का गुप्त महादान: मकर संक्रांति से ठीक पूर्व की इस संध्या पर किए गए दान का शास्त्रों में कई गुना अधिक पुण्य फल वर्णित है। इस दिन किसी अत्यंत निर्धन, असहाय, दिव्यांग अथवा वृद्ध व्यक्ति को काले तिल, शुद्ध गन्ने का गुड़, कच्ची मूंगफली, साबुत उड़द की दाल और मोटे ऊनी कंबल का श्रद्धापूर्वक गुप्त दान करना चाहिए। यह दान जन्म कुंडली में स्थित शनि देव, राहु और केतु के क्रूर दुष्प्रभावों को तत्काल शांत कर देता है और जातक को अचानक आने वाली दुर्घटनाओं और भयंकर आर्थिक संकटों से मुक्ति दिलाता है।

  4. ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्दा का आध्यात्मिक उल्लास: लोहड़ी की धधकती अग्नि के चारों ओर पुरुषों द्वारा किया जाने वाला ओजस्वी भांगड़ा और स्त्रियों द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला कोमल गिद्दा नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है। यह मानव शरीर के भीतर दबे हुए समस्त मानसिक तनाव, अवसाद, कुंठा और शारीरिक आलस्य को पूरी तरह बाहर निकालने की एक अत्यंत प्रभावी यौगिक क्रिया है। ढोल की तीव्र और लयबद्ध नाद तरंगे वातावरण में उपस्थित तमोगुण और नकारात्मक ऊर्जा को छिन्न भिन्न कर देती हैं जिससे मन में सात्विक उल्लास, नवीन उमंग और सामाजिक भाईचारे का गहरा संचार होता है।

  5. पारंपरिक उष्ण खानपान द्वारा शारीरिक कायाकल्प: लोहड़ी की रात और उसके अगले दिन मकर संक्रांति के पावन अवसर पर मक्के की रोटी, सरसों का ताजा साग, सफेद मक्खन, तिल के स्वादिष्ट लड्डू, गन्ने के ताजे रस में पकाई गई खीर और भुनी हुई मूंगफली का सामूहिक सेवन किया जाता है। आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार यह संपूर्ण आहार शीत ऋतु के चरम प्रकोप में शरीर के भीतर प्राकृतिक ऊष्मा बनाए रखता है, पाचन तंत्र को असाधारण बल प्रदान करता है और आने वाले वसंत व ग्रीष्म ऋतु के लिए शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति को सुदृढ़ कर देता है।

सामाजिक समरसता और बंधुत्व का विस्तार कैसे होता है?

लोहड़ी का महापर्व सनातन भारत की उस महान और उदार सांस्कृतिक चेतना का सजीव दर्शन कराता है जहां व्यक्तिगत स्वार्थ, अहंकार और संकीर्ण दीवारें स्वतः ही ढह जाती हैं। इस पावन रात्रि में किसी भी प्रकार का सामाजिक भेदभाव, ऊंच नीच, जाति पाति और निर्धन व धनी का अंतर पूरी तरह समाप्त हो जाता है। संपूर्ण गांव, मोहल्ले और समाज के लोग एक ही अग्नि के पवित्र घेरे में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होते हैं, एक ही थाली से रेवड़ी, मूंगफली और गुड़ का प्रसाद ग्रहण करते हैं और एक साथ मिलकर प्राचीन लोकगीतों की मधुर तान छेड़ते हैं। यदि दो परिवारों, पड़ोसियों अथवा सगे संबंधियों के मध्य किसी पुरानी बात को लेकर कोई मनमुटाव, कटुता अथवा विवाद चल रहा हो, तो लोहड़ी की पवित्र अग्नि के सम्मुख एक दूसरे को बाहों में भरकर गले लगाया जाता है और उस पुरानी शत्रुता को उसी अग्नि में भस्म करके नए सिरे से प्रेम का शुभारंभ किया जाता है।

यह पावन पर्व समाज के प्रत्येक व्यक्ति को यह गहरा पाठ पढ़ाता है कि मानव जीवन का सच्चा आनंद कभी भी अकेले रहकर भौतिक सुखों का उपभोग करने में नहीं है बल्कि समाज के साथ मिलकर अपनी खुशियों को कई गुना बढ़ाने में है। जब छोटे छोटे बच्चे टोलियां बनाकर मोहल्ले के प्रत्येक द्वार पर दस्तक देते हैं और लोहड़ी के पारंपरिक गीत गाकर गुड़ और उपहार मांगते हैं, तो कोई भी गृहस्थ उन्हें खाली हाथ नहीं लौटाता बल्कि बड़े आदर और वात्सल्य के साथ उन्हें नए अन्न और धन का उपहार भेंट करता है। यह बाल सुलभ परंपरा नई पीढ़ी के कोमल अंतःकरण में सामाजिक जुड़ाव, लोक संस्कृति के प्रति अगाध आदर और बड़ों के प्रति सेवा भाव का गहरा बीजारोपण करती है। लोहड़ी वास्तव में आपसी प्रेम, अटूट विश्वास और परस्पर निर्भरता का वह पावन सूत्र है जो हमारे सामाजिक ताने बाने को युगों युगों से सुदृढ़ बनाए हुए है।

लोहड़ी की अग्नि का शाश्वत आध्यात्मिक संदेश क्या है?

वैदिक दर्शन और उपनिषदों का यह शाश्वत सत्य है कि अग्नि पंचमहाभूतों में वह एकमात्र तत्व है जो कभी भी किसी भी परिस्थिति में अपवित्र नहीं हो सकता। अग्नि में जो कुछ भी डाला जाता है, अग्नि उसके समस्त दोषों को भस्म करके उसे अपने ही समान विशुद्ध, पवित्र और प्रकाशमान बना देती है। लोहड़ी की यह गगनचुंबी पावन ज्वालाएं हमें यह अमर आध्यात्मिक संदेश देती हैं कि मनुष्य को अपने भीतर छिपे हुए संकीर्ण अहंकार, कटुता, ईर्ष्या, काम, क्रोध और अतीत के समस्त कड़वे अनुभवों की आहुति इस पवित्र अग्नि में दे देनी चाहिए। जिस प्रकार एक कृषक अपनी नई फसल का प्रथम अन्न अग्नि देव को समर्पित करके एक नई आशा और उत्साह के साथ अपने नववर्ष का स्वागत करता है, ठीक उसी प्रकार प्रत्येक साधक को अपने अंतःकरण के समस्त विकारों का होम करके अपने जीवन में प्रेम, करुणा, क्षमा और परोपकार की नई ऊर्जा का स्वागत करना चाहिए। जब कोई समाज लोहड़ी के इस उदात्त और दिव्य भाव को अपने दैनिक आचरण में उतारता है, तो उस समाज में कभी भी वैमनस्य, अशिक्षा और दरिद्रता का अंधकार नहीं ठहर सकता। भगवान अग्नि देव की यह पावन और दैदीप्यमान ज्वाला हम सभी के जीवन में उत्तम स्वास्थ्य, अक्षय समृद्धि, परम शांति और अटूट सामाजिक समरसता का मंगलमय प्रकाश सदैव बिखेरती रहे, यही इस लोकोत्सव की वास्तविक और सर्वोच्च सार्थकता है।

FAQ

लोहड़ी का पर्व प्रतिवर्ष 13 जनवरी को ही क्यों मनाया जाता है? लोहड़ी का पर्व विशुद्ध रूप से सौर चक्र और मकर संक्रांति की खगोलीय स्थिति पर आधारित होता है। चूंकि सूर्य देव का मकर राशि में प्रवेश सामान्यतः प्रतिवर्ष 14 जनवरी को होता है, इसलिए पौष मास के अंतिम दिन के रूप में और उत्तरायण की पूर्व संध्या के रूप में लोहड़ी सदैव 13 जनवरी को ही परंपरागत रूप से पूरे देश में मनाई जाती है।

लोहड़ी की पवित्र अग्नि में कौन कौन सी वस्तुएं अर्पित करना अनिवार्य माना गया है? लोहड़ी की पावन अग्नि में रबी की नई फसल से संबंधित प्राकृतिक पदार्थ जैसे नए गन्ने से बनी रेवड़ी, गजक, गुड़, काले व सफेद तिल, भुनी हुई मूंगफली और मक्का के फूले अर्थात पॉपकॉर्न अर्पित किए जाते हैं। इसके साथ ही अग्नि की शुद्धि और देव तृप्ति के लिए देशी कपूर और गाय का शुद्ध घी भी अवश्य समर्पित किया जाता है।

लोहड़ी पर नवविवाहित जोड़े के लिए अग्नि परिक्रमा का क्या महत्व है? विवाह के उपरांत पड़ने वाली प्रथम लोहड़ी पर नवदंपति द्वारा अग्नि की सात परिक्रमा करना उनके दांपत्य जीवन को अटूट स्थिरता, शारीरिक आरोग्य और परस्पर समर्पण का वरदान प्रदान करता है। सनातन मान्यता के अनुसार अग्नि को साक्षी मानकर किए गए इस अनुष्ठान से वैवाहिक जीवन में आने वाली समस्त नकारात्मक बाधाएं स्वतः ही नष्ट हो जाती हैं।

दुल्ला भट्टी की कथा लोहड़ी के गीतों में क्यों गाई जाती है? दुल्ला भट्टी ने मध्यकाल में अत्याचारी सामंतों के चंगुल से असहाय हिंदू कन्याओं सुंदरी और मुंदरी की रक्षा की थी और लोहड़ी की पावन अग्नि जलाकर एक पिता की भांति उनका सम्मानपूर्वक विवाह संपन्न कराया था। उनके इस निस्वार्थ त्याग, अदम्य शौर्य और सामाजिक समरसता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु लोहड़ी के प्रत्येक लोकगीत में उनका नाम अत्यंत श्रद्धा से लिया जाता है।

लोहड़ी की अग्नि की परिक्रमा कितनी बार करनी चाहिए और क्या बोलना चाहिए? लोहड़ी की पावन अग्नि की परिक्रमा पूर्ण श्रद्धा के साथ सात बार करनी चाहिए। परिक्रमा करते समय अपने दोनों हाथों में तिल, रेवड़ी और मूंगफली लेकर अग्नि में आहुति देते हुए 'आदर आए दिलदर जाए' का समवेत स्वर में उच्चारण करना चाहिए जिसका अर्थ है कि घर में सुख सौभाग्य और सम्मान का वास हो तथा समस्त प्रकार की दरिद्रता और रोगों का नाश हो।

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

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