मकर संक्रांति से जीवन में क्या बदलाव आएंगे?

By अपर्णा पाटनी

सूर्य का उत्तरायण प्रवेश, खरमास समाप्ति, 12 राशियों पर प्रभाव और उपाय

मकर संक्रांति 2026: उत्तरायण, खरमास समाप्ति और 12 राशियों का फल

सामग्री तालिका

मकर संक्रांति का खगोलीय और पंचांगीय स्वरूप

सनातन काल गणना के वैदिक सिद्धांतों के अनुसार मकर संक्रांति संपूर्ण सौर संवत्सर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण, तेजस्वी और युगांतकारी खगोलीय पर्व माना जाता है। पंचांग के अनुसार जब ग्रहों के राजा प्रत्यक्ष देवता भुवन भास्कर सूर्य नारायण देवगुरु बृहस्पति की आग्नेय राशि धनु की अपनी यात्रा समाप्त करके अपने पुत्र शनि देव की पृथ्वी तत्वीय राशि मकर में संक्रमण करते हैं तब उस पावन संक्रमण काल को 'मकर संक्रांति' की संज्ञा दी जाती है। ग्रेगोरियन कैलेंडर अर्थात अंग्रेजी पंचांग के अनुसार यह महापर्व प्रतिवर्ष सामान्यतः 14 या 15 जनवरी को मनाया जाता है।

यह संक्रमण केवल राशि परिवर्तन मात्र नहीं है, अपितु यह सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण होने का दिव्य प्रस्थान बिंदु है। सनातन ज्योतिष में उत्तरायण को 'देवताओं का दिन' और दक्षिणायन को 'देवताओं की रात्रि' कहा गया है। मकर संक्रांति के साथ ही एक महीने से चला आ रहा खरमास (मलमास) विधिवत समाप्त हो जाता है और विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश तथा नए प्रतिष्ठानों के आरंभ जैसे समस्त मांगलिक कार्यों का शंखनाद पुनः हो जाता है।

पंचांग व खगोलीय आयामशास्त्रीय विवरण एवं स्थितिखगोलीय व आध्यात्मिक प्रभाव
नियमविधानविधान
संक्रांति का नाममकर संक्रांति (उत्तरायण संक्रमण)सौर संवत्सर का सबसे बड़ा परिवर्तन काल
सौर राशि प्रवेशधनु राशि से मकर राशि में प्रवेशसूर्य और शनि का दुर्लभ पिता-पुत्र समन्वय
अयनांत परिवर्तनदक्षिणायन का समापन, उत्तरायण का शुभारंभदेवताओं के छह मास के दिवस का प्रारंभ
खरमास की समाप्तिधनुर्मास का औपचारिक अंतसमस्त शुभ व मांगलिक कार्यों की पुनः शुरुआत
प्रमुख तत्व समन्वयअग्नि तत्व (सूर्य) और पृथ्वी तत्व (मकर राशि)जीवन में स्थिरता, तेज और कर्मठता का संचार
मुख्य तीर्थ स्नानप्रयागराज त्रिवेणी, गंगासागर, हरिद्वार, काशीजन्म-जन्मांतर के पापों का क्षय और मोक्ष सिद्धि
प्रधान दान सामग्रीकाले तिल, देसी गुड़, तांबा, गर्म वस्त्र और खिचड़ीसूर्य व शनि दोष निवारण और अक्षय पुण्य फल
खानपान परंपरातिलकुट, रेवड़ी, तिल के लड्डू, उड़द दाल खिचड़ीआंतरिक जठराग्नि रक्षा और वात-कफ शमन

सूर्य जब उत्तरायण होते हैं तब पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में दिन की अवधि धीरे-धीरे लंबी होने लगती है और रातें छोटी होने लगती हैं। मंद और शीतल हुई धूप पुनः प्रखर होने लगती है, जो प्रकृति के जड़ हो चुके स्वरूप में नवीन चेतना और स्फूर्ति का संचार करती है।


सूर्य का उत्तरायण प्रवेश और भीष्म पितामह का संकल्प

महाभारत के शांति पर्व और अनुशासन पर्व में सूर्य के उत्तरायण होने की असीम महिमा का विशद वर्णन मिलता है। कुरुक्षेत्र के भीषण धर्मयुद्ध में जब कौरव सेनापति महाबली भीष्म पितामह अर्जुन के तीक्ष्ण बाणों से छलनी होकर 'शरशय्या' पर गिर पड़े थे तब उनके पास अपने पिता शांतनु द्वारा प्रदत्त 'इच्छा मृत्यु' का दिव्य वरदान था। वे चाहते तो उसी क्षण अपने नश्वर शरीर का त्याग कर सकते थे, परंतु उन्होंने सूर्य के दक्षिणायन में देह त्यागना स्वीकार नहीं किया।

भीष्म पितामह अट्ठावन दिनों तक बाणों की तीखी शय्या पर अत्यंत असहनीय पीड़ा सहते हुए केवल इसलिए लेटे रहे कि सूर्य कब धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे और उत्तरायण का पवित्र काल आरंभ होगा।

  • मुक्ति का उत्तरायण मार्ग: छान्दोग्य उपनिषद और श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट घोषणा करते हैं कि अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष और उत्तरायण के छह महीनों में देह त्यागने वाले ब्रह्मवेत्ता साधक सीधे परब्रह्म को प्राप्त होते हैं, उनका इस संसार में पुनरागमन नहीं होता।
  • दक्षिणायन का संयम: दक्षिणायन को पितरों और धुएं का मार्ग माना गया है, जिसमें प्राण त्यागने पर जीव को चंद्रलोक के सूक्ष्म चक्रों से होकर पुनः जन्म लेना पड़ सकता है।
  • भीष्म पितामह की मोक्ष प्राप्ति: जैसे ही मकर संक्रांति के पावन दिन सूर्य ने मकर राशि में प्रवेश किया, भीष्म पितामह ने योगबल से अपनी संपूर्ण इंद्रियों को नियंत्रित किया, भगवान श्री कृष्ण के चतुर्भुज स्वरूप का ध्यान किया और ब्रह्मरंध्र को भेदकर अपने प्राणों को विसर्जित कर दिया।

भीष्म पितामह का यह प्रसंग संपूर्ण मानव जाति को यह शिक्षा देता है कि मृत्यु केवल सांसारिक अंत नहीं है बल्कि वह चेतना के संक्रमण का सर्वोच्च क्षण है। संक्रांति का यह काल हमें अपनी आत्मा को प्रकाश, ज्ञान और मुक्ति के सन्मार्ग की ओर मोड़ने की प्रेरणा देता है।


सूर्य और शनि का अलौकिक मिलन: पिता-पुत्र का मधुर संबंध

पौराणिक इतिहास के अनुसार सूर्य देव और उनके पुत्र शनि देव के बीच का संबंध वैदिक ज्योतिष में अत्यंत रहस्यमयी और परस्पर विरोधी माना जाता है। सूर्य देव जहां साक्षात प्रकाश, तेज, आत्मा और राजा के प्रतीक हैं, वहीं शनि देव अंधकार, वैराग्य, तपस्या और कर्मफल के न्यायधीश हैं। सूर्य की पत्नी छाया के पुत्र होने के कारण शनि देव का अपने पिता सूर्य के साथ प्राचीन मतभेद और वैचारिक विरोध रहा है।

परंतु मकर संक्रांति का दिन इस ब्रह्मांडीय कटुता को मिटाकर प्रेम और सौहार्द स्थापित करने का सबसे बड़ा शास्त्रीय उदाहरण प्रस्तुत करता है।

ग्रह संबंध आयामपौराणिक पृष्ठभूमिमकर संक्रांति पर तात्विक प्रभाव
नियमविधानविधान
पिता-पुत्र का मिलनसूर्य देव का शनि के घर (मकर राशि) में जानाअहंकार का त्याग और पारिवारिक सामंजस्य की विजय
काले तिल से स्वागतशनि देव द्वारा काले तिल से पिता का पूजनतिल दान द्वारा शनि के समस्त क्रूर दोषों का शमन
सूर्य का आशीर्वादशनि के मकर भवन को धन-धान्य से भरने का वरदानमकर राशि पर सूर्य के तेज से नव ऊर्जा की प्रतिष्ठा
ज्योतिषीय समन्वयआत्मा (सूर्य) और कर्म (शनि) का एकीकरणकर्मयोग के द्वारा आत्मिक सिद्धि और समाज में सम्मान

श्रीमद्देवीभागवत और भविष्य पुराण के अनुसार एक बार सूर्य देव अपने पुत्र शनि देव के घर पहुंचे, जो उस समय पूर्णतः साधनहीन था। शनि देव ने अपने पिता के सत्कार के लिए घर में उपस्थित काले तिलों से उनका पूजन किया। सूर्य देव अपने पुत्र की इस निष्कपट और श्रद्धापूर्ण भक्ति से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने शनि को वरदान दिया कि जब भी मैं तुम्हारे घर अर्थात मकर राशि में आऊंगा, तुम्हारा घर अक्षय धन, ऐश्वर्य और शांति से भर जाएगा।

यही कारण है कि मकर संक्रांति के दिन तिल से सूर्य की पूजा करने और तिल का दान करने से सूर्य और शनि दोनों के दोष एक साथ शांत हो जाते हैं। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि पारिवारिक संबंधों में चाहे कितनी भी कड़वाहट आ चुकी हो, बड़ों का सम्मान करके और विनम्रता का व्यवहार करके उन संबंधों को पुनः प्रेम में बदला जा सकता है।


संक्रांति का पुण्य काल, महापुण्य काल और स्नान-दान विधि

मकर संक्रांति के दिन समय का विभाजन अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक रूप से किया जाता है। जिस क्षण सूर्य देव धनु राशि की सीमा को पार करके मकर राशि के शून्य अंश पर चरण रखते हैं, उसे 'संक्रांति प्रवेश क्षण' कहा जाता है। धर्मशास्त्रों के प्रामाणिक ग्रंथ 'निर्णय सिंधु' और 'धर्म सिंधु' के अनुसार संक्रांति के स्पर्श काल से पूर्व और पश्चात का समय 'पुण्य काल' और 'महापुण्य काल' कहलाता है।

संक्रांति के दिन किया गया कोई भी धार्मिक कृत्य, जप, नदी स्नान और दान सामान्य दिनों की तुलना में अनंत गुना अधिक फल प्रदान करता है।

कालखंड विभाजनशास्त्रीय समय सीमाअभीष्ट धार्मिक कृत्य एवं फल
नियमविधानविधान
संक्रांति प्रवेश क्षणसूर्य के मकर राशि में प्रवेश का सूक्ष्म क्षणसंकल्प, देव ध्यान और मानस पूजा
महापुण्य कालसंक्रांति क्षण से लगभग दो घंटे पूर्व व पश्चातपवित्र तीर्थ स्नान, रुद्रार्चन, गुप्त स्वर्ण व तांबा दान
सामान्य पुण्य कालसंक्रांति के दिन सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तकतिल-गुड़ दान, अन्नदान, खिचड़ी वितरण, पितृ तर्पण
अपरिवर्तित नियमयदि संक्रांति सूर्यास्त के बाद होअगले दिन प्रातः काल के प्रथम प्रहर में पुण्य काल मान्य

संक्रांति स्नान और दान की शास्त्रीय विधि

  • तीर्थ व गंगा स्नान: मकर संक्रांति के दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व किसी पवित्र नदी, विशेष रूप से त्रिवेणी संगम, गंगा, यमुना, नर्मदा अथवा गोदावरी में स्नान करना चाहिए। यदि नदी तक जाना संभव न हो, तो घर में ही सामान्य जल में गंगाजल, काले तिल और कुश डालकर स्नान करना चाहिए।
  • तिल उबटन का प्रयोग: स्नान से पूर्व शरीर पर तिल के तेल अथवा तिल के लेप की मालिश करनी चाहिए। शास्त्रों में मकर संक्रांति पर तिल के छह प्रयोग बताए गए हैं: तिल के जल से स्नान, तिल का उबटन, तिल से हवन, तिल का जल पीना, तिल का भोजन और तिल का दान।
  • सूर्य देव को ताम्र अर्घ्य: स्नान के उपरांत तांबे के लोटे में शुद्ध जल, रक्त चंदन, कुमकुम, अक्षत, लाल पुष्प, गुड़ और तिल मिलाकर पूर्व दिशा में उदीयमान सूर्य को तीन बार में अर्घ्य दें।
  • खिचड़ी और तिल का महादान: इस दिन नए चावल, काली उड़द की दाल, हल्दी, नमक, घी और मौसमी सब्जियों से युक्त 'कच्ची खिचड़ी' का सीधा (सामग्री) निकालकर किसी योग्य ब्राह्मण अथवा निर्धन व्यक्ति को दान करना चाहिए।

इस दिन किए गए दान से मनुष्य के सात जन्मों के दरिद्र योग नष्ट हो जाते हैं और उसके घर में माता अन्नपूर्णा का स्थाई वास होता है।


गंगासागर मेला और पौराणिक भगीरथ तपस्या का प्रसंग

मकर संक्रांति के साथ भारत के सबसे महान तीर्थों में से एक 'गंगासागर' का नाम अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। जनमानस में यह लोकोक्ति अत्यंत प्रसिद्ध है: 'सब तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार'। पश्चिम बंगाल में जहां मां गंगा अपनी लंबी यात्रा समाप्त करके बंगाल की खाड़ी अर्थात हिंद महासागर में विलीन होती हैं, उस पवित्र संगम को गंगासागर कहा जाता है।

पौराणिक इतिहास के अनुसार सूर्यवंशी राजा सगर के साठ हजार पुत्र महर्षि कपिल के आश्रम में उनके कोप की क्रोधाग्नि से भस्म होकर पाताल लोक में शापग्रस्त पड़े थे। उनकी मुक्ति केवल तभी संभव थी जब स्वर्ग की पावन नदी गंगा पृथ्वी पर उतरकर उनकी भस्म को स्पर्श करती।

  • भगीरथ का कठोर तप: राजा सगर के प्रपौत्र महाराज भगीरथ ने अपनी कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी और भगवान शिव को प्रसन्न किया और मां गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा।
  • कपिल मुनि का आश्रम: भगीरथ जी अपने रथ पर आगे-आगे चले और उनके पीछे-पीछे वेगवती गंगा प्रवाहित हुईं। मकर संक्रांति के ही पावन दिन गंगा जी महर्षि कपिल के आश्रम में पहुँचीं और राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की भस्म को पवित्र जल से आप्लावित किया।
  • साठ हजार पितरों का उद्धार: गंगा के पावन स्पर्श से राजा सगर के सभी पूर्वज तत्क्षण शापमुक्त होकर दिव्य विमानों पर बैठकर वैकुंठ लोक को चले गए।

इसी ऐतिहासिक विजय के उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर लाखों श्रद्धालु गंगासागर में डुबकी लगाते हैं। मान्यता है कि इस दिन गंगासागर में स्नान करके पितरों का तर्पण करने से कुल की इक्कीस पीढ़ियों के पूर्वज तृप्त हो जाते हैं और साधक को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।


तिल-गुड़ का सेवन, खिचड़ी परंपरा और पतंगबाजी का विज्ञान

मकर संक्रांति केवल पूजा-पाठ का पर्व नहीं है बल्कि यह आयुर्वेद, मौसम विज्ञान और सामाजिक मनोविज्ञान का एक अद्भुत उत्सव है। इस दिन खाए जाने वाले विशेष भोज्य पदार्थों और की जाने वाली गतिविधियों के पीछे गहन शारीरिक और वैज्ञानिक रहस्य छिपे हुए हैं।

परंपरा एवं गतिविधिवैज्ञानिक व आयुर्वेदिक सिद्धांतशारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य लाभ
नियमविधानविधान
तिल और गुड़ का सेवनतिल में प्रचुर कैल्शियम, तेल; गुड़ में आयरन व ऊष्माशीत ऋतु में हड्डियों की मजबूती, वात का शमन, ऊर्जा
उड़द दाल की खिचड़ीउड़द में प्रोटीन, चावल में कार्ब्स, मसालों में पाचक तत्वजठराग्नि को बल, आंतों की शुद्धि और सुपाच्य पोषण
खुले आकाश में पतंगबाजीप्रातःकालीन धूप का सीधा शरीर पर अवशोषणविटामिन डी का निर्माण, नेत्र ज्योति, अवसाद का नाश
सामूहिक उत्सव व मेल-जोलशीत की जड़ता को तोड़कर उमंग का संचारमानसिक स्फूर्ति, सामाजिक समरसता और सौहार्द

सर्दियों के इस मौसम में तापमान गिरने से शरीर की त्वचा रूखी हो जाती है और जोड़ों में दर्द होने लगता है। तिल में उपस्थित प्राकृतिक तेल त्वचा को स्निग्धता प्रदान करता है, जबकि गुड़ रक्त में हीमोग्लोबिन के स्तर को बढ़ाकर शरीर का तापमान नियंत्रित रखता है।

उड़द की दाल की खिचड़ी खाने से शनि देव की पीड़ा शांत होती है, क्योंकि उड़द शनि की धातु मानी गई है। पतंग उड़ाने के बहाने मनुष्य कड़ाके की ठंड के दिनों में कई घंटे खुले आकाश के नीचे सूर्य की स्वर्णिम धूप में व्यतीत करता है। सूर्य की ये कोमल किरणें शरीर में संक्रमण को नष्ट करती हैं, रक्त संचार को गति देती हैं और सर्दियों के अवसाद को भगा देती हैं।


मकर संक्रांति का सभी 12 राशियों पर विस्तृत ज्योतिषीय प्रभाव

सूर्य का मकर राशि में प्रवेश सभी बारह राशियों के जातकों के जीवन में युगांतकारी परिवर्तन लेकर आता है। किसी राशि के लिए यह गोचर मान-सम्मान और धन की वर्षा करता है, तो किसी राशि के लिए आत्मसंयम और स्वास्थ्य रक्षा का संदेश देता है।

1. मेष राशि

मेष राशि के जातकों के लिए सूर्य का गोचर दशम भाव अर्थात कर्म स्थान में होगा। दशम भाव में सूर्य को 'दिग्बल' प्राप्त होता है। इसके प्रभाव से आपके कार्यक्षेत्र में पदोन्नति, नई नौकरी के अवसर और प्रशासनिक कार्यों में भारी सफलता प्राप्त होगी। पिता के साथ संबंध सुधरेंगे और समाज में मान-प्रतिष्ठा का विस्तार होगा।

2. वृषभ राशि

वृषभ राशि के जातकों के लिए सूर्य का प्रवेश नवम भाव अर्थात भाग्य स्थान में होगा। भाग्य का पूर्ण सहयोग मिलेगा। लंबी दूरी की धार्मिक यात्राएं अथवा तीर्थाटन के योग बनेंगे। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रयासरत विद्यार्थियों को बड़ी सफलता मिलेगी। पिता के स्वास्थ्य का थोड़ा ध्यान रखना आवश्यक होगा।

3. मिथुन राशि

मिथुन राशि के जातकों के लिए यह गोचर अष्टम भाव में होगा। अष्टम भाव में सूर्य का गोचर स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने की चेतावनी देता है। वाहन चलाते समय सावधानी बरतें और अचानक आने वाले उतार-चढ़ावों से विचलित न हों। गूढ़ विद्याओं, शोध और आध्यात्मिक साधना के लिए यह समय अत्यंत अनुकूल सिद्ध होगा।

4. कर्क राशि

कर्क राशि के जातकों के लिए सूर्य सप्तम भाव अर्थात दांपत्य और साझेदारी के स्थान में गोचर करेंगे। जीवनसाथी के साथ वैचारिक मतभेदों से बचें और अपने क्रोध पर नियंत्रण रखें। व्यापारिक साझेदारी में नए अनुबंध हो सकते हैं, परंतु किसी भी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से पूर्व भली-भांति जांच कर लें।

5. सिंह राशि

सिंह राशि के स्वामी स्वयं सूर्य देव हैं और वे आपके छठे भाव अर्थात शत्रु और रोग स्थान में गोचर करेंगे। छठे भाव में सूर्य का गोचर अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है। आपके समस्त गुप्त शत्रु परास्त होंगे, कोर्ट-कचहरी के मुकदमों में आपकी विजय होगी और पुराने रोगों से मुक्ति मिलेगी।

6. कन्या राशि

कन्या राशि के जातकों के लिए सूर्य का गोचर पंचम भाव अर्थात बुद्धि, विद्या और संतान के स्थान में होगा। विद्यार्थियों के लिए यह समय अपनी एकाग्रता को बढ़ाने का है। प्रेम संबंधों में थोड़ा अहंकार से बचें। आर्थिक दृष्टि से नए निवेश के अवसर प्राप्त होंगे जो भविष्य में लाभ देंगे।

7. तुला राशि

तुला राशि के जातकों के लिए सूर्य चतुर्थ भाव अर्थात सुख और माता के स्थान में प्रवेश करेंगे। पारिवारिक जीवन में थोड़ी अशांति रह सकती है, अतः माता के स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें। भूमि, भवन अथवा वाहन के क्रय-विक्रय के योग बनेंगे। कार्यक्षेत्र में आपकी जिम्मेदारियां बढ़ेंगी।

8. वृश्चिक राशि

वृश्चिक राशि के जातकों के लिए सूर्य तृतीय भाव अर्थात पराक्रम और छोटे भाई-बहनों के स्थान में गोचर करेंगे। तीसरे भाव में सूर्य का गोचर आपके पराक्रम और आत्मविश्वास में अभूतपूर्व वृद्धि करेगा। आपके द्वारा लिए गए साहसिक निर्णय सफलता दिलाएंगे। छोटे भाई-बहनों का सहयोग प्राप्त होगा।

9. धनु राशि

धनु राशि के जातकों के लिए सूर्य आपकी राशि से निकलकर द्वितीय भाव अर्थात धन और वाणी के स्थान में प्रवेश करेंगे। आपकी वाणी में प्रभाव बढ़ेगा, परंतु कटु वचनों के प्रयोग से बचें। संचित धन में वृद्धि होगी। पैतृक संपत्ति से जुड़े विवाद सुलझेंगे और परिवार में मांगलिक उत्सव का वातावरण बनेगा।

10. मकर राशि

मकर राशि के जातकों की अपनी ही राशि अर्थात प्रथम भाव (लग्न) में सूर्य देव का प्रवेश होगा। आपके व्यक्तित्व में एक नवीन चमक और नेतृत्व क्षमता का उदय होगा। सिरदर्द अथवा रक्तचाप की समस्या से थोड़ा सावधान रहें। वैवाहिक जीवन में अपने जीवनसाथी की भावनाओं का आदर करें।

11. कुंभ राशि

कुंभ राशि के जातकों के लिए सूर्य द्वादश भाव अर्थात व्यय और विदेश स्थान में गोचर करेंगे। अनपेक्षित खर्चों में वृद्धि हो सकती है, अतः अपने बजट पर नियंत्रण रखें। विदेश यात्रा अथवा विदेशी कंपनियों से जुड़े व्यापार में बड़ा लाभ प्राप्त हो सकता है। नेत्र विकारों से सचेत रहें।

12. मीन राशि

मीन राशि के जातकों के लिए सूर्य का गोचर एकादश भाव अर्थात आय और लाभ स्थान में होगा। यह गोचर आपके लिए आर्थिक रूप से स्वर्णिम अवसर लेकर आएगा। आय के नए स्रोत बनेंगे, पुराने रुके हुए धन की प्राप्ति होगी और बड़े सामाजिक संपर्कों से जीवन को नई दिशा मिलेगी।


संक्रांति पर किए जाने वाले अचूक उपाय और दान संकल्प

मकर संक्रांति के इस महापर्व पर अपनी राशि के अनुसार अथवा सामान्य रूप से किए गए कुछ प्रामाणिक वैदिक उपाय जीवन के समस्त अवरोधों को नष्ट करने में रामबाण सिद्ध होते हैं।

  • ताम्र पात्र और गुड़ का दान: सूर्य ग्रह को बलवान करने के लिए सवा किलो गुड़ और तांबे का एक बर्तन किसी मंदिर में अथवा निर्धन व्यक्ति को दान करें।
  • काले तिल और उड़द की खिचड़ी: शनि देव की साढ़ेसाती और ढैय्या के कष्टों से मुक्ति के लिए काले तिल और उड़द की दाल की बनी गर्म खिचड़ी का वितरण कुष्ठ रोगियों अथवा भूखों में करें।
  • गौमाता की सेवा: संक्रांति के दिन गाय को अपने हाथों से हरी घास, गुड़ और तिल के लड्डू खिलाएं। इससे तैंतीस कोटि देवताओं का आशीर्वाद एक साथ प्राप्त होता है।
  • आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ: संक्रांति के दिन प्रातःकाल सूर्य के सम्मुख बैठकर वाल्मीकि रामायण के 'आदित्य हृदय स्तोत्र' का तीन बार पाठ करने से प्रशासनिक बाधाएं और मुकदमों का भय समाप्त होता है।
  • पितरों के निमित्त दीपदान: संध्या समय किसी पवित्र नदी के तट पर अथवा पीपल के वृक्ष के नीचे तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करने से पितृ तृप्त होकर वंश वृद्धि का वरदान देते हैं।

नवचेतना का उदय और संक्रांति का शाश्वत संदेश

मकर संक्रांति केवल एक वार्षिक उत्सव नहीं है बल्कि यह मानव चेतना के रूपांतरण का महापर्व है। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि जिस प्रकार सूर्य देव अंधकार को चीरकर उत्तरायण की ओर बढ़ते हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने भीतर के अज्ञान, आलस्य और संकीर्णता को त्यागकर ज्ञान, कर्मठता और परोपकार के प्रकाश की ओर निरंतर अग्रसर रहना चाहिए।

कड़ाके की ठंड के बीच सूर्य का मकर राशि में प्रवेश हमें आशा और विश्वास की नई किरण दिखाता है। यह संदेश देता है कि कठिन से कठिन समय भी बीत जाता है और नवीन प्रभात का आगमन अवश्यंभावी है। आइए, हम सब मकर संक्रांति के इस पावन अवसर पर पवित्र नदियों में डुबकी लगाकर अपने अंतःकरण को शुद्ध करें, समाज के वंचितों की सेवा करके अपने धन को सार्थक बनाएं और सूर्य नारायण के दिव्य तेज को अपने जीवन में धारण करें।


FAQ

मकर संक्रांति का पर्व प्रतिवर्ष 14 या 15 जनवरी को ही क्यों मनाया जाता है? यह पर्व सौर गणना पर आधारित है; सूर्य जब धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, वह खगोलीय घटना प्रतिवर्ष 14 या 15 जनवरी को ही घटित होती है।

मकर संक्रांति के दिन तिल और गुड़ का सेवन क्यों किया जाता है? तिल और गुड़ की तासीर गर्म होती है जो शीत ऋतु में शरीर को आंतरिक ऊष्मा और ऊर्जा प्रदान करती है तथा सूर्य और शनि दोनों ग्रहों को शांत करती है।

भीष्म पितामह ने प्राण त्यागने के लिए उत्तरायण की प्रतीक्षा क्यों की थी? शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण में देह त्यागने वाले साधकों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और वे पुनर्जन्म के सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।

मकर संक्रांति पर गंगासागर स्नान का क्या विशेष महत्व है? इसी पावन तिथि पर मां गंगा ने राजा सगर के साठ हजार शापग्रस्त पुत्रों का उद्धार किया था, अतः यहां स्नान से पितृ तृप्त होते हैं और मोक्ष मिलता है।

खरमास कब समाप्त होता है और मांगलिक कार्य कब से शुरू होते हैं? मकर संक्रांति के दिन जैसे ही सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, खरमास समाप्त हो जाता है और विवाह आदि शुभ कार्य पुनः आरंभ हो जाते हैं।

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लेखक

अपर्णा पाटनी

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