सुबह की धूप से ओज और ऊर्जा कैसे बढ़ाएं?

By पं. अभिषेक शर्मा

पौष मास में सूर्य स्नान, अथर्ववेद रश्मि चिकित्सा, विटामिन D और ओज संचय

सुबह की धूप का विज्ञान: पौष में सूर्य स्नान, विटामिन D और लाभ

सामग्री तालिका

पौष मास की स्वर्णिम धूप और खगोलीय संधिकाल

सनातन काल गणना के वैदिक पंचांग के अनुसार पौष मास संवत्सर चक्र का सर्वाधिक शीतल और ऊर्जा-संवेदी कालखंड माना जाता है। शिशिर ऋतु के आगमन के साथ जब तापमान में भारी गिरावट आती है तब संपूर्ण प्रकृति एक मौन संधिकाल से गुजरती है। इस महीने में पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध पर सूर्य की किरणें एक अत्यंत विशिष्ट और तिरछे कोण से आपतित होती हैं। खगोल विज्ञान और प्रकाशिकी (Optics) के अनुसार इस विशिष्ट झुकाव के कारण वायुमंडल से छनकर आने वाली प्रातःकालीन सौर किरणों में हानिकारक विकिरण न्यूनतम और लाभदायक तरंग दैर्ध्य (Wavelength) अधिकतम होती है।

अथर्ववेद के कई मंत्रों में सूर्य की इन कोमल बाल-रश्मियों को 'रश्मि चिकित्सा' अर्थात सूर्य किरण चिकित्सा के रूप में प्रतिष्ठा दी गई है। वैदिक ऋषियों ने सहस्रों वर्ष पूर्व यह उद्घाटित कर दिया था कि सूर्य केवल प्रकाश का भौतिक पिंड नहीं है बल्कि वह प्रत्यक्ष प्राण, ओज और संपूर्ण चराचर जगत की आत्मा है। कड़ाके की ठंड के दिनों में प्रातः 8 बजे से 10 बजे के मध्य की धूप मानव शरीर के लिए साक्षात अमृत संजीवनी का कार्य करती है। यह केवल त्वचा को ताप देने का साधन नहीं है बल्कि यह शरीर की आंतरिक जैव-विद्युत प्रणाली (Bio-Electric System) को पुनः संतुलित करने का एक अद्वितीय विज्ञान है।

वैज्ञानिक व आध्यात्मिक आयामशास्त्रीय विवरण एवं स्थितिखगोलीय व दैहिक प्रभाव
प्रधान कालखंडसंपूर्ण पौष मास, विशेषकर प्रातः 8:00 से 10:00 बजेत्वचा के नीचे प्राकृतिक विटामिन D3 का तीव्र संश्लेषण
सौर किरण कोणशीतकालीन अयनांत के उपरांत विशिष्ट तिरछा कोणसुरक्षित यूवी-बी (UV-B) किरणों का सौम्य आगमन
प्रधान वैदिक संदर्भअथर्ववेद (रश्मि चिकित्सा सूक्त) व सामवेदसंचित वात-कफ शमन, मेधा वृद्धि और ओज संचय
मुख्य शारीरिक मुद्रासूर्य की ओर पीठ करके पद्मासन अथवा वज्रासनसुषुम्ना नाड़ी का सक्रियण और रीढ़ की हड्डी को ऊष्मा
जैविक घटक रूपांतरण7-डीहाइड्रोकोलेस्ट्रॉल का प्री-विटामिन D में परिवर्तनअस्थि घनत्व सुदृढ़ता, कैल्शियम अवशोषण और स्फूर्ति
मानसिक स्वास्थ्य लाभसेरोटोनिन हार्मोन का स्राव, मेलाटोनिन संतुलनमौसमी अवसाद (SAD), सुस्ती और अनिद्रा का समूल नाश
ज्योतिषीय संरेखणसूर्य ग्रह (आत्मकारक, आरोग्य व तेजस का स्वामी)कुंडली में सूर्य दोष शमन, आत्मविश्वास और यश की प्राप्ति

शीत ऋतु की मंद धूप में कुछ समय बिताना शरीर की कोशिकाओं को सीधे सौर ऊर्जा से चार्ज करने के समान है। जो मनुष्य इस प्राकृतिक चक्र का सम्मान करते हुए प्रतिदिन नियमित सूर्य स्नान करता है, उसके शरीर में वर्ष भर के लिए अटूट रोग प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण हो जाता है।


अथर्ववेद की रश्मि चिकित्सा और सूर्य की किरणों का विज्ञान

अथर्ववेद के प्रथम कांड के बाइसवें सूक्त में सूर्य की किरणों द्वारा हृदय रोग, पीलिया (हरिमा) और दुर्बलता के निवारण का स्पष्ट वर्णन मिलता है। महर्षियों ने सूर्य के प्रकाश को सात प्रमुख रंगों और दो अदृश्य स्पेक्ट्रम (अवरक्त अर्थात इन्फ्रारेड और पराबैंगनी अर्थात अल्ट्रावायलेट) में विभाजित करके उसके सूक्ष्म प्रभावों का अन्वेषण किया था।

वैदिक रश्मि चिकित्सा के अनुसार जब सूर्य की किरणें मानव शरीर के संपर्क में आती हैं, तो वे केवल त्वचा की ऊपरी सतह तक सीमित नहीं रहतीं बल्कि वे त्वचा की सात परतों को भेदकर रक्त वाहिकाओं, मांसपेशियों और अस्थि मज्जा तक प्रवेश करती हैं।

  • रक्त वर्ण रश्मियां (Red Spectrum): यह तरंग दैर्ध्य शरीर के रक्त संचार को तेज करती है, धमनी संकुचन को खोलती है और शीतकाल में हाथ-पैरों में होने वाली सुन्नता को दूर करती है।
  • पीत वर्ण रश्मियां (Yellow Spectrum): यह प्रकाश मस्तिष्क की तंत्रिकाओं को जाग्रत करता है, बुद्धि को प्रखर बनाता है और यकृत (Liver) की कार्यप्रणाली को उत्तेजित करता है।
  • हरित वर्ण रश्मियां (Green Spectrum): यह तंत्रिका तंत्र को शांति प्रदान करती हैं, मानसिक तनाव का शमन करती हैं और उच्च रक्तचाप को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित रखती हैं।
  • अवरक्त किरणें (Infrared Rays): सुबह की धूप में उपस्थित इन्फ्रारेड किरणें शरीर के भीतर गहरी ऊष्मा पहुँचाती हैं, जिससे जोड़ों की अकड़न, सायनोवियल द्रव का जमना और मांसपेशियों का दर्द समाप्त होता है।
  • पराबैंगनी किरणें (UV-B Rays): प्रातःकाल के विशिष्ट पहर में यूवी-बी किरणों का एक सुरक्षित अनुपात त्वचा में प्रवेश करके प्राकृतिक विटामिन D के निर्माण को सक्रिय करता है।

विटामिन D3 का प्राकृतिक संश्लेषण और अस्थि मज्जा का पोषण

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और जैव-रसायन विज्ञान (Biochemistry) के अनुसार विटामिन D वास्तव में कोई साधारण विटामिन नहीं है बल्कि यह एक अत्यंत शक्तिशाली स्टेरॉयड हार्मोन (Secosteroid Hormone) की भांति कार्य करता है। मानव शरीर भोजन के माध्यम से इस तत्व को सीधे पर्याप्त मात्रा में अवशोषित नहीं कर सकता; इसके सक्रिय निर्माण के लिए सूर्य का सीधा प्रकाश अनिवार्य है।

पौष मास की सुबह जब सूर्य की किरणें मानव त्वचा पर पड़ती हैं, तो त्वचा के उपकला ऊतकों (Epithelial Tissues) में उपस्थित '7-डीहाइड्रोकोलेस्ट्रॉल' नामक रासायनिक घटक सौर ऊर्जा को अवशोषित करता है। यह ऊर्जा इसे 'कोलेकैल्सीफेरोल' (विटामिन D3) में रूपांतरित कर देती है। इसके उपरांत यह तत्व यकृत और वृक्क (Kidneys) से होकर सक्रिय रूप धारण करता है।

शारीरिक प्रणालीविटामिन D की कमी से विकारसूर्य स्नान द्वारा जैविक लाभ
कंकाल तंत्र (Skeletal System)ऑस्टियोपोरोसिस, रिकेट्स, हड्डियों का क्षरणआंतों में कैल्शियम व फास्फोरस का पूर्ण अवशोषण
मस्कुलर सिस्टम (Muscles)मांसपेशियों में खिंचाव, कमजोरी, ऐंठनपेशियों की संकुचन क्षमता में सुधार, सुदृढ़ता
रोग प्रतिरोधक प्रणालीबार-बार वायरल संक्रमण, टीबी का खतराटी-कोशिकाओं (T-Cells) की सक्रियता, एंटीबॉडी निर्माण
हृदय संस्थान (Cardiovascular)उच्च रक्तचाप, धमनियों में कठोरतानाइट्रिक ऑक्साइड का विमोचन, रक्त वाहिकाओं का लचीलापन
अंतःस्रावी तंत्र (Endocrine)थायराइड असंतुलन, इंसुलिन प्रतिरोधइंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार, चयापचय संतुलन

पौष मास में नियमित 20 से 30 मिनट धूप में बैठने से रक्त में सीरम 25-हाइड्रॉक्सीविटामिन D का स्तर प्राकृतिक रूप से 50 से 70 ng/mL के सुरक्षित स्तर पर पहुँच जाता है। यह संचित विटामिन हड्डियों के जोड़ों के भीतर उपस्थित चिकने द्रव को सूखने से बचाता है, जिससे वृद्धावस्था में भी घुटनों और रीढ़ की हड्डी में लचक बनी रहती है।


सूर्य की ओर पीठ करके बैठने का मेरुदंडीय और यौगिक रहस्य

आयुर्वेद और यौगिक विज्ञान में सूर्य स्नान के समय शरीर की स्थिति (Posture) को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। शास्त्रों का यह स्पष्ट निर्देश है कि शीत ऋतु में सूर्य स्नान करते समय मनुष्य को अपना मुख सूर्य की ओर करने के बजाय अपनी पीठ सूर्य की ओर रखनी चाहिए।

इसके पीछे अत्यंत गहरा शरीर क्रिया विज्ञान और सुषुम्ना नाड़ी का रहस्य निहित है:

  • मेरुदंड (रीढ़ की हड्डी) का केंद्रीय महत्व: मानव रीढ़ की हड्डी शरीर का मुख्य ऊर्जा स्तंभ है। इसी मेरुदंड के भीतर सुषुम्ना नाड़ी प्रवाहित होती है तथा इसके दोनों ओर इड़ा और पिंगला नाड़ियों का चक्र चलता है। जब सूर्य की सीधी ऊष्मा रीढ़ की हड्डी पर पड़ती है, तो मेरुदंड के भीतर उपस्थित अस्थि मज्जा (Bone Marrow) उत्तेजित होती है, जिससे लाल रक्त कणिकाओं (RBC) का निर्माण तीव्र गति से होता है।
  • फेफड़ों की पिछली सतह को ऊष्मा: मानव फेफड़ों का एक बहुत बड़ा हिस्सा पीठ की ओर स्थित होता है। शीतकाल में बलगम और कफ का जमाव फेफड़ों के पिछले भाग में सबसे अधिक होता है। जब पीठ पर धूप का ताप पड़ता है, तो यह ऊष्मा फेफड़ों की श्वासनलियों में जमे हुए गाढ़े कफ को पिघलाकर बाहर निकालने में सहायता करती है।
  • सूर्य नाड़ी (पिंगला) का जागरण: पीठ के ऊपरी भाग में, विशेष रूप से दोनों कंधों के मध्य में सूर्य का मुख्य ऊर्जा केंद्र माना गया है। इस केंद्र पर धूप लगने से शरीर की पिंगला नाड़ी सक्रिय हो जाती है, जिससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है और शरीर का आंतरिक तापमान स्थिर रहता है।
  • नेत्रों और चेहरे की रक्षा: यदि सूर्य की ओर सीधे मुख करके बैठा जाए, तो सूर्य की तीव्र चमक आंखों की रेटिना पर अनावश्यक दबाव डालती है और चेहरे की संवेदनशील त्वचा पर झुर्रियां व पिगमेंटेशन की समस्या हो सकती है। पीठ करके बैठने से नेत्र पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं।

मौसमी अवसाद (SAD) और न्यूरोट्रांसमीटर का संतुलन

पौष मास के छोटे दिन, लगातार छाया रहने वाला घना कोहरा और सूर्य के प्रकाश की कमी का सीधा असर मानव मस्तिष्क के तंत्रिका-रसायनों (Neurotransmitters) पर पड़ता है। आधुनिक मनोचिकित्सा विज्ञान इसे 'सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर' (SAD) अर्थात मौसमी अवसाद कहता है। इस स्थिति में व्यक्ति बिना किसी स्पष्ट कारण के उदासी, अत्यधिक नींद, काम में अरुचि, चिड़चिड़ापन और निराशा का अनुभव करने लगता है।

सुबह की सर्द धूप इस मनोवैज्ञानिक संकट की सबसे शक्तिशाली और प्राकृतिक औषधि है:

मस्तिष्क रसायन (Neurotransmitter)धूप के अभाव में स्थितिसुबह की धूप के बाद परिवर्तन
सेरोटोनिन (Serotonin)स्तर अत्यधिक गिर जाता हैतत्काल स्राव बढ़ता है, मन में प्रसन्नता व उत्साह
मेलाटोनिन (Melatonin)दिन के समय भी स्रावित होता रहता हैदिन में स्राव बंद होता है, रात में गहरी व शांत नींद
डोपामाइन (Dopamine)प्रेरणा और एकाग्रता में भारी कमीन्यूरोनल मार्ग सक्रिय होते हैं, कार्यक्षमता में वृद्धि
कोर्टिसोल (Cortisol)तनाव हार्मोन का स्तर अनियंत्रितदैनिक जैविक घड़ी (Circadian Rhythm) का नियमन

जब सूर्य का प्रकाश आंखों के रेटिना से होकर मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस क्षेत्र में स्थित सुप्राकाइस्मैटिक न्यूक्लियस (SCN) तक पहुँचता है, तो यह पीनियल ग्रंथि को संकेत देता है कि अब दिन हो चुका है। इससे दिन में बनने वाला सुस्ती कारक मेलाटोनिन हार्मोन तुरंत रुक जाता है और सेरोटोनिन का स्राव प्रारंभ हो जाता है। परिणाम स्वरूप व्यक्ति ऊर्जा, सकारात्मकता और आत्मबल से परिपूर्ण हो जाता है।


चक्रों पर प्रभाव: मूलाधार से सहस्रार तक ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन

कुंडलिनी योग और सूक्ष्म ऊर्जा विज्ञान के अनुसार मानव शरीर में स्थित सात चक्र सौर ऊर्जा के विभिन्न आयामों को ग्रहण करने वाले ट्रांसफार्मर की भांति कार्य करते हैं। सूर्य स्नान के समय जब सौर फोटॉन्स (Solar Photons) शरीर के संपर्क में आते हैं, तो ये चक्र सक्रिय होकर संतुलन की अवस्था में आ जाते हैं।

  • मणिपुर चक्र (नाभि केंद्र): मणिपुर चक्र को शरीर का 'सूर्य चक्र' (Solar Plexus) कहा जाता है। यह अग्नि तत्व का प्रधान केंद्र है। जब प्रातःकाल नाभि और पेट के पिछले भाग पर धूप पड़ती है, तो मणिपुर चक्र की ऊर्जा प्रदीप्त होती है। इससे पाचन शक्ति तीव्र होती है, संशय मिटते हैं और व्यक्ति में नेतृत्व क्षमता का विकास होता है।
  • अनाहत चक्र (हृदय केंद्र): पीठ के ऊपरी भाग पर धूप लगने से हृदय चक्र में प्राण वायु का संचार बढ़ता है। यह व्यक्ति के भीतर भय, असुरक्षा की भावना और संकीर्णता को मिटाकर प्रेम, करुणा और आत्मविश्वास का विस्तार करता है।
  • आज्ञा चक्र (भ्रूमध्य): धूप में बैठकर जब आंखें बंद करके ध्यान किया जाता है, तो पलकों से छनकर जाने वाली लालिमा आज्ञा चक्र को उद्दीप्त करती है। यह पीनियल ग्रंथि को सक्रिय करके अंतर्दृष्टि और एकाग्रता को बढ़ाती है।
  • सहस्रार चक्र (ब्रह्मरंध्र): खुले आकाश के नीचे सिर के तालु भाग पर सूर्य की किरणों का स्पर्श सहस्रार चक्र को ब्रह्मांडीय चेतना के साथ जोड़ता है, जिससे मानसिक जड़ता और अज्ञान का नाश होता है।

ज्योतिषीय दृष्टि: आत्मकारक सूर्य का संवर्धन और ओज वृद्धि

वैदिक ज्योतिष में भगवान सूर्य को नवग्रहों का अधिपति, कालपुरुष की आत्मा, पिता, मान-प्रतिष्ठा, आत्मबल और शारीरिक तेज का सर्वोच्च स्वामी माना गया है। मानव शरीर में उपस्थित 'ओजस' (जीवन का अंतिम सूक्ष्म तत्व) का सीधा संबंध सूर्य के बल से है। यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में सूर्य देव तुला राशि में नीच के हों, राहु-केतु के ग्रहण में हों अथवा छठे, आठवें या बारहवें भाव में बैठकर निर्बल हों, तो वह व्यक्ति निरंतर शारीरिक व्याधियों, हीनभावना, पिता से मतभेद और समाज में अपयश का सामना करता है।

पौष मास में सूर्य स्नान करना कुंडली के सूर्य को बलवान करने की एक साक्षात तात्विक रेमेडी (उपाय) है:

  • आत्मबल की वृद्धि: सूर्य आत्मा के कारक हैं। जब साधक धूप का सेवन करता है, तो उसके भीतर का संशय और कायरता भस्म हो जाती है। उसका आत्मबल इतना सुदृढ़ हो जाता है कि वह जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी चट्टान की भांति अडिग रहता है।
  • प्रशासनिक व राजकृपा की प्राप्ति: सरकारी नौकरी, उच्च पदों की प्राप्ति और प्रशासनिक कार्यों में आ रही बाधाएं सुबह की धूप में बैठकर गायत्री मंत्र का जप करने से दूर हो जाती हैं।
  • पिता के स्वास्थ्य में सुधार: सूर्य पिता का कारक है। पौष मास में सूर्य स्नान करने और पिता के चरण स्पर्श करने से कुल का मान-सम्मान बढ़ता है और पितृ दोष शांत होते हैं।
  • ओज का संचय: आयुर्वेद में ओज को जीवन का सार कहा गया है। सूर्य की किरणों का अवशोषण शरीर के सातों धातुओं को पकाकर ओज में रूपांतरित कर देता है, जिससे चेहरे पर एक अलौकिक स्वर्णिम चमक (Aura) प्रकट होती है।

वैज्ञानिक सूर्य स्नान की संपूर्ण विधि और आवश्यक सावधानियां

सूर्य स्नान का पूर्ण लाभ तभी प्राप्त होता है जब उसे सही समय, सही विधि और आवश्यक सावधानियों के साथ संपन्न किया जाए। अनुचित रीति से अथवा तेज धूप में बैठने से त्वचा को हानि पहुँच सकती है।

1. समय का शास्त्रीय चयन

  • सर्वोत्तम समय: प्रातः 8:00 बजे से 10:00 बजे के मध्य (जब धूप में लालिमा और स्वर्णिम चमक हो)।
  • अवधि: प्रतिदिन 20 से 30 मिनट का समय पर्याप्त है।
  • वर्जित समय: दोपहर 12 बजे से 3 बजे के बीच की तीखी धूप में कभी भी सूर्य स्नान न करें, क्योंकि इस समय पराबैंगनी किरणें त्वचा को जला सकती हैं।

2. वस्त्र और आसन का विधान

  • सूर्य स्नान के समय सूती, हल्के और ढीले वस्त्र धारण करें। यदि संभव हो तो श्वेत अथवा हल्के पीले रंग के वस्त्र पहनें।
  • नायलॉन, पॉलिएस्टर अथवा सिंथेटिक वस्त्र धूप की किरणों को त्वचा तक पहुँचने से रोकते हैं।
  • बैठने के लिए भूमि पर सीधे न बैठें; कुशा का आसन अथवा लाल ऊनी कंबल बिछाकर बैठें।

3. अभ्यंग (तेल मालिश) का संयोजन

  • सूर्य स्नान से पूर्व पूरे शरीर पर, विशेष रूप से पीठ, कमर और जोड़ों पर शुद्ध तिल के तेल अथवा सरसों के तेल की हल्की मालिश करें।
  • तेल की स्निग्धता सूर्य की किरणों को त्वचा में गहराई तक समाने में सहायता करती है और त्वचा को रूखा होने से बचाती है।

4. आवश्यक सावधानियां

  • सूर्य स्नान करते समय सिर पर अत्यधिक ताप न लगने दें; सिर को किसी सूती कपड़े से ढक लें।
  • धूप सेवन के तुरंत बाद ठंडा पानी न पिएं और न ही तुरंत स्नान करें। कम से कम 20 मिनट बाद सामान्य तापमान के पानी का सेवन करें अथवा गुनगुने जल से स्नान करें।
  • यदि त्वचा पर किसी प्रकार की जलन अथवा अत्यधिक लालिमा दिखाई दे, तो तुरंत छाया में आ जाएं।

प्रकृति के साथ तादात्म्य और जीवन का दिव्य कायाकल्प

पौष मास की यह सुबह की सर्द धूप हमें प्रकृति के साथ एकाकार होकर जीने का एक अनुपम अवसर प्रदान करती है। आधुनिक युग में कंक्रीट के मकानों, वातानुकूलित कमरों और डिजिटल पर्दों के पीछे बंद होकर मनुष्य ने उस सूर्य से अपना संपर्क तोड़ लिया है जो उसके जीवन का मूल आधार है। इसी का परिणाम है कि आज समाज में अवसाद, अस्थि विकार और मानसिक तनाव महामारी का रूप ले चुके हैं।

जब हम पौष मास की शीतल सुबह में अपने कमरों से बाहर निकलकर, खुले आकाश के नीचे, भगवान सूर्य की स्वर्णिम किरणों के सम्मुख अपनी पीठ करके बैठते हैं, तो वह केवल शरीर को तपाना नहीं होता बल्कि वह अपनी आत्मा को संपूर्ण ब्रह्मांड के साथ जोड़ना होता है।

उस समय ली जाने वाली प्रत्येक श्वास और त्वचा पर पड़ने वाली प्रत्येक किरण हमारे भीतर के अंधकार, आलस्य और व्याधियों को धो डालती है। जो मनुष्य पौष मास के इस आध्यात्मिक और वैज्ञानिक सूर्य स्नान को अपनी दिनचर्या का अंग बना लेता है, उसका जीवन आरोग्य, असीम ओज, मानसिक शांति और आध्यात्मिक दिव्यता के उस अखंड प्रकाश से भर जाता है, जहां कभी निराशा का साया नहीं पड़ता।


FAQ

पौष मास में सूर्य स्नान (Sunbathing) के लिए कौन सा समय सबसे उत्तम माना गया है? पौष मास में सुबह 8:00 बजे से 10:00 बजे के बीच का समय सूर्य स्नान के लिए सर्वोत्तम है, जब धूप में कोमल स्वर्णिम रश्मियां होती हैं और हानिकारक विकिरण नहीं होता।

सूर्य स्नान करते समय सूर्य की ओर पीठ करके बैठने का क्या वैज्ञानिक कारण है? रीढ़ की हड्डी (सुषुम्ना नाड़ी) और फेफड़ों का बड़ा हिस्सा पीठ की ओर होता है; पीठ पर धूप लगने से अस्थि मज्जा में रक्त निर्माण तेज होता है, कफ पिघलता है और आंखें सुरक्षित रहती हैं।

धूप में बैठने से मौसमी अवसाद (SAD) कैसे दूर होता है? सूर्य का प्रकाश मस्तिष्क में सेरोटोनिन (प्रसन्नता हार्मोन) के स्राव को तेज करता है और दिन में मेलाटोनिन को रोककर जैविक घड़ी को संतुलित करता है, जिससे अवसाद समाप्त होता है।

सूर्य स्नान से पहले शरीर पर तिल का तेल लगाना क्यों लाभकारी है? तिल का तेल त्वचा को शुष्क होने से बचाता है, वात दोष को शांत करता है और सूर्य की अवरक्त व पराबैंगनी किरणों को त्वचा की गहरी परतों तक अवशोषित कराने में मदद करता है।

ज्योतिष के अनुसार सुबह की धूप का सेवन करने से कुंडली का कौन सा ग्रह बलवान होता है? सुबह की धूप का सेवन करने से कुंडली का आत्मकारक ग्रह 'सूर्य' परम बलवान होता है, जिससे आत्मबल, मान-सम्मान, प्रशासनिक सफलता और जीवन में ओज की वृद्धि होती है।

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लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

पं. अभिषेक शर्मा (63)


अनुभव: 20

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इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

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