By पं. नीलेश शर्मा
जोड़ों का दर्द, गठिया, पक्षाघात से बचाव, निर्गुंडी-महानारायण तेल और काढ़ा

सनातन काल गणना के वैदिक पंचांग और आयुर्वेद के मौलिक सिद्धांतों के अनुसार पौष मास (दिसंबर-जनवरी) शिशिर ऋतु के आगमन और हेमंत के समापन का अत्यंत संवेदनशील संधिकाल होता है। इस कालखंड में संपूर्ण बाह्य प्रकृति कड़ाके की ठंड, घने कोहरे, पाले और बर्फीली पछुआ हवाओं के प्रभाव में आ जाती है। आयुर्वेद के आदि ग्रंथ चरक संहिता के सूत्रस्थान और अष्टांग हृदयम के अनुसार, यह कालखंड त्रिदोषों में से सर्वाधिक शक्तिशाली 'वात दोष' के तीव्र प्रकोप और संचय का समय होता है। वात दोष का निर्माण वायु और आकाश तत्वों के मिलन से होता है, जिसके नैसर्गिक गुण रुक्ष (सूखा), शीत (ठंडा), लघु (हल्का), सूक्ष्म और चल (गतिशील) हैं।
जब बाह्य वातावरण में तापमान अत्यधिक गिर जाता है और हवा में शुष्कता बढ़ जाती है, तो प्रकृति के समान गुण धर्म के सिद्धांत ('सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धि कारणम्') के अनुसार मानव शरीर के भीतर का वात तत्व भी अचानक प्रकुपित हो उठता है। यह बढ़ा हुआ वात शरीर के सूक्ष्म स्रोतों (Channels) में संकुचन पैदा करता है, त्वचा के नीचे की प्राकृतिक चिकनाई को सोख लेता है और जोड़ों के भीतर उपस्थित चिकने सायनोवियल द्रव (कफ का स्नेहांश) को सुखा देता है। विशेष रूप से 45 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों में, जब जीवन स्वाभाविक रूप से 'वात प्रधान अवस्था' में प्रवेश कर चुका होता है, यह प्रकोप अत्यंत उग्र रूप धारण कर लेता है।
| आयुर्वेदिक व ज्योतिषीय आयाम | शास्त्रीय स्थिति एवं विवरण | शारीरिक व पैथोलॉजिकल प्रभाव |
|---|---|---|
| ऋतु संधिकाल | हेमंत का अवसान एवं शिशिर का प्रारंभ | बाह्य वातावरण में भारी शीत, शुष्कता व वायु वेग |
| प्रकुपित शारीरिक दोष | वात दोष का चरम प्रकोप, कफ का संचय | जोड़ों में शूल, सायनोवियल द्रव ह्रास, नसों में खिंचाव |
| प्रभावित आयु वर्ग | 45 वर्ष से अधिक आयु के स्त्री-पुरुष | स्वाभाविक वार्धक्य जनित अस्थि-धातु क्षय व वायु वृद्धि |
| अधिष्ठाता ग्रह प्रभाव | मंदगामी कर्मफलदाता शनि देव (वायु तत्व अधिपति) | हड्डियों की दुर्बलता, पैरों में दर्द, पक्षाघात का जोखिम |
| प्रधान औषधीय तेल | निर्गुंडी, महानारायण, दशमूल व तिल का तेल | संधियों का पोषण, वात का शमन और स्नायु शक्ति |
| मुख्य पाचक क्वाथ | सोंठ, मेथी दाना, अजवाइन और दालचीनी काढ़ा | आम विष का पाचन, अवरोध निवारण और आंतरिक ऊष्मा |
| प्रधान फलश्रुति | गठिया, सायटिका, फ्रोजन शोल्डर व पक्षाघात से रक्षा | ओज संवर्धन, निर्बाध रक्त संचार व दीर्घायु |
यदि इस ऋतु में प्रकुपित वात को समय रहते संतुलित न किया जाए, तो यह केवल जोड़ों के दर्द तक सीमित नहीं रहता बल्कि रक्त वाहिकाओं को संकुचित करके रक्तचाप को अचानक बढ़ा देता है, जिससे पक्षाघात (लकवा) और फेशियल पाल्सी जैसी जानलेवा व्याधियां जन्म लेती हैं।
आयुर्वेद में अस्सी प्रकार के नानात्मज वात विकारों का विशद वर्णन मिलता है। जब पौष मास की शीतलहर शरीर पर प्रहार करती है, तो वात दोष रक्त और मज्जा धातु के साथ मिलकर विभिन्न अंगों में जाकर अवरोध उत्पन्न करता है। इसे 'अवरोधजन्य वात प्रकोप' अथवा 'धातुक्षयजन्य वात' कहा जाता है।
सनातन ज्योतिष में नौ ग्रहों के अंतर्गत कर्मफलदाता शनि देव को संपूर्ण वायु तत्व, वात प्रकृति, हड्डियों के जोड़ों, स्नायु तंत्र (नर्वस सिस्टम) और दीर्घकालिक व्याधियों का सर्वोच्च स्वामी माना गया है। शनि स्वभाव से अत्यंत शीतल, मंद, रुक्ष और कृष्ण वर्ण के ग्रह हैं। कालपुरुष की कुंडली में मकर और कुंभ राशियां घुटनों और पिंडलियों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
जब किसी जातक की जन्म कुंडली में शनि देव नीच राशि (मेष) में स्थित हों, सूर्य अथवा मंगल के साथ शत्रुवत संबंध बना रहे हों, या जातक शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या अथवा महादशा से गुजर रहा हो, तो पौष मास में उसके शरीर में वात जनित रोग अचानक उग्र हो जाते हैं।
| ज्योतिषीय ग्रह स्थिति | शरीर पर प्रकट होने वाले लक्षण | पौष मास में निवारक उपाय |
|---|---|---|
| नीच राशि (मेष) में शनि | घुटनों का घिसना, जोड़ों में लगातार दर्द, चलने में असमर्थता | शनिवार को काले तिल व सरसों तेल का दान, पीपल दीपदान |
| शनि-राहु की युति (शापित दोष) | अज्ञात कंपन, नसों का सूखना, पक्षाघात व नर्वस ब्रेकडाउन | चितकबरे कंबल का दान, महामृत्युंजय मंत्र का नित्य जप |
| छठे अथवा आठवें भाव में शनि | पुराना असाध्य गठिया, रीढ़ की हड्डी में गंभीर विकृति | काले उड़द की खिचड़ी का वितरण, निर्गुंडी तेल से मालिश |
| 45 वर्ष से अधिक आयु (वात काल) | शरीर में स्वाभाविक रूप से कैल्शियम व सायनोवियल द्रव की कमी | नित्य प्रातः तिल-गुड़ का सेवन, गुनगुने जल का उषापान |
जीवन का 45 वर्ष से बाद का कालखंड आयुर्वेदिक दृष्टि से 'वृद्धावस्था' अर्थात वात की प्रधानता का काल माना जाता है। इस उम्र में शरीर के हार्मोनल स्तर में बदलाव आता है और अस्थि घनत्व (Bone Density) घटने लगता है। अतः इस आयु वर्ग के लोगों को पौष मास में अपनी जीवनशैली और आहार पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है।
आयुर्वेद में वात दोष को शांत करने का एकमात्र परम अमोघ साधन 'स्नेहन' अर्थात तेल की मालिश (अभ्यंग) को माना गया है। महर्षि वाग्भट कहते हैं कि जिस प्रकार सूखी लकड़ी पर निरंतर तेल लगाने से वह लचीली हो जाती है और मुड़ने पर भी नहीं टूटती, ठीक उसी प्रकार नियमित अभ्यंग करने से वृद्ध और जर्जर शरीर भी सुदृढ़, लचीला और वात रोगों से मुक्त हो जाता है।
पौष मास में अभ्यंग के लिए निम्नलिखित तीन दिव्य तेलों का प्रयोग रामबाण माना गया है:
निर्गुंडी (सम्हालू) को आयुर्वेद में सबसे शक्तिशाली शोथहर (Anti-inflammatory) और शूलप्रशमन (Pain Reliever) वनस्पति माना गया है।
यह पचास से अधिक दुर्लभ जड़ी-बूटियों (दशमूल, अश्वगंधा, शतावरी, बला, देवदारू आदि) को गाय के दूध और तिल के तेल में सिद्ध करके बनाया गया एक शास्त्रीय दिव्य तेल है।
यदि औषधीय तेल उपलब्ध न हों, तो शुद्ध कच्ची घानी का तिल का तेल वात शमन के लिए प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ उपहार है।
| औषधीय तेल | प्रमुख घटक एवं गुण | विशिष्ट रोग निवारण | प्रयोग विधि |
|---|---|---|---|
| निर्गुंडी तेल | निर्गुंडी स्वरस, तिल तेल, तीक्ष्ण, शोथहर | सायटिका, स्पोंडिलाइटिस, तीव्र जोड़ों का दर्द | गुनगुना करके 15 मिनट मालिश, तदुपरांत गर्म सेंक |
| महानारायण तेल | दशमूल, अश्वगंधा, बला, गोदुग्ध, गुरु | पक्षाघात (लकवा), नसों की कमजोरी, जीर्ण गठिया | सुबह-शाम पूरे मेरुदंड व निष्क्रिय अंगों पर मालिश |
| तिल का तेल | शुद्ध काले तिल का स्नेहांश, उष्ण, सूक्ष्मगामी | सामान्य बदन दर्द, त्वचा का फटना, मांसपेशियों की जकड़न | प्रतिदिन प्रातः स्नान से 30 मिनट पूर्व संपूर्ण शरीर मालिश |
वात दोष के शमन के लिए केवल बाह्य मालिश पर्याप्त नहीं है; आंतरिक रूप से पाचन तंत्र को शुद्ध करना और जठराग्नि को बलवान बनाए रखना भी अनिवार्य है। सर्दियों में बनने वाले 'आम विष' को जलाने के लिए सोंठ, मेथी और अजवाइन का काढ़ा साक्षात अमृत के समान कार्य करता है।
वात रोगों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए आहार का चयन जीवन और मरण के समान महत्वपूर्ण होता है। एक गलत आहार वात के दर्द को कई गुना बढ़ा सकता है।
| आहार श्रेणी | पथ्य (क्या अवश्य खाएं) | अपथ्य (क्या भूलकर भी न खाएं) |
|---|---|---|
| प्रधान अनाज | पुराना गेहूं, बाजरा, मक्का, कुलथी, नया चावल | मैदा, सूजी, बेसन की तली वस्तुएं, बासी अन्न |
| दालें | छिलके वाली मूंग दाल, मसूर, अरहर (घी तड़का) | चना दाल, राजमा, छोले, सफेद मटर, उड़द (रात में) |
| शाक व सब्जियां | बथुआ, मेथी का साग, पालक, परवल, सहजन (ड्रमस्टिक) | कच्ची मूली, बैंगन, फूलगोभी, पत्तागोभी, भिंडी, अरबी |
| स्नेह व वसा | गाय का शुद्ध घी, तिल का तेल, सरसों का तेल | रिफाइंड तेल, डालडा, पाम ऑयल, वनस्पति घी |
| पेय पदार्थ | गुनगुना जल, सोंठ युक्त दूध, लहसुन की खीर | फ्रिज का ठंडा पानी, कोल्ड ड्रिंक्स, आइसक्रीम, छाछ (रात में) |
| स्वाद व रस | मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा) और लवण (नमकीन) | अत्यधिक तीखा (कटु), कड़वा (तिक्त) और कसैला (कषाय) |
विशेष रूप से लहसुन का प्रयोग वात रोगियों के लिए वरदान माना गया है। प्रातःकाल गाय के दूध में लहसुन की दो से तीन कलियां उबालकर 'लहसुन क्षीरपाक' बनाकर पीने से सायटिका और पक्षाघात का खतरा पूरी तरह टल जाता है।
कड़ाके की ठंड के दिनों में अचानक लगने वाली ठंडी हवा पक्षाघात का मुख्य कारण बनती है। वात रोगियों को अपनी दैनिक दिनचर्या में निम्नलिखित नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए:
वात दोष की शांति के लिए औषधीय उपचार के साथ-साथ शनि देव की तात्विक कृपा प्राप्त करना भी अनिवार्य है। पौष मास में किए गए ये उपाय असाध्य रोगों से रक्षा करते हैं:
पौष मास की यह ठिठुरती ठंड हमें प्रकृति के कठोर अनुशासन का स्मरण कराती है। वात दोष का यह प्रकोप हमें यह सिखाता है कि जिस प्रकार वृक्ष शीत ऋतु में अपने पत्तों को गिराकर अपनी ऊर्जा को जड़ों में समेट लेते हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी इस कालखंड में अपनी जीवनशैली को अंतर्मुखी, शांत और सुरक्षित बना लेना चाहिए।
जब हम अपनी दिनचर्या में तिल के तेल के अभ्यंग को स्थान देते हैं, सोंठ और मेथी के काढ़े से अपनी जठराग्नि को तृप्त रखते हैं और अपने मन को ईश्वरीय आराधना में लीन रखते हैं, तो शीत की यह बर्फीली हवा हमारे शरीर का तनिक भी अनिष्ट नहीं कर पाती।
जो मनुष्य पौष मास के इन आयुर्वेदिक और ज्योतिषीय सूत्रों को अपने जीवन में उतार लेता है, वह गठिया, सायटिका और पक्षाघात जैसे भयंकर रोगों से सदा सुरक्षित रहता है। उसका शरीर वज्र के समान सुदृढ़, मन शांत और जीवन अखंड आरोग्य के प्रकाश से परिपूर्ण हो जाता है।
पौष मास में 45 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को वात दोष का अधिक खतरा क्यों रहता है? 45 वर्ष के बाद शरीर स्वाभाविक रूप से वात प्रधान अवस्था में प्रवेश करता है, जिससे अस्थि धातु क्षीण होती है और बाह्य शीतलता से जोड़ों का सायनोवियल द्रव तेजी से सूखता है।
गठिया और सायटिका के दर्द में निर्गुंडी तेल का प्रयोग कैसे करना चाहिए? निर्गुंडी तेल को हल्का गुनगुना करके प्रभावित जोड़ों और नसों पर 15 मिनट तक हल्के हाथों से मालिश करें और उसके बाद गर्म पानी की थैली से सिकाई करें।
पौष के महीने में सोंठ, मेथी और अजवाइन का काढ़ा पीने का क्या वैज्ञानिक लाभ है? यह काढ़ा शरीर में जमे आम विष को जलाता है, यूरिक एसिड घटाता है, रक्त संचार तेज करता है और आंतों की गैस व मांसपेशियों की ऐंठन को समाप्त करता है।
सर्दियों की सुबह पक्षाघात (लकवा) का खतरा सबसे अधिक किस समय रहता है? सुबह 4:00 से 7:00 बजे के बीच रक्त वाहिकाएं अत्यधिक संकुचित होती हैं; इस समय अचानक ठंडी हवा के संपर्क में आने से मस्तिष्क की धमनियों में अवरोध से लकवे का खतरा बढ़ता है।
कुंडली में शनि नीच का होने पर वात रोगों से बचने के लिए क्या उपाय करें? शनिवार को छाया पात्र दान करें, काले तिल व ऊनी वस्त्र जरूरतमंदों को दें, पीपल नीचे तिल के तेल का दीपक जलाएं और नित्य महामृत्युंजय मंत्र का जप करें।
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