पौष मास में वात दोष से कैसे बचें?

By पं. नीलेश शर्मा

जोड़ों का दर्द, गठिया, पक्षाघात से बचाव, निर्गुंडी-महानारायण तेल और काढ़ा

पौष मास में वात दोष निवारण: जोड़ों का दर्द और गठिया के उपाय

सामग्री तालिका

पौष मास में वात प्रकोप का आयुर्वेदिक और ऋतुचर्या सिद्धांत

सनातन काल गणना के वैदिक पंचांग और आयुर्वेद के मौलिक सिद्धांतों के अनुसार पौष मास (दिसंबर-जनवरी) शिशिर ऋतु के आगमन और हेमंत के समापन का अत्यंत संवेदनशील संधिकाल होता है। इस कालखंड में संपूर्ण बाह्य प्रकृति कड़ाके की ठंड, घने कोहरे, पाले और बर्फीली पछुआ हवाओं के प्रभाव में आ जाती है। आयुर्वेद के आदि ग्रंथ चरक संहिता के सूत्रस्थान और अष्टांग हृदयम के अनुसार, यह कालखंड त्रिदोषों में से सर्वाधिक शक्तिशाली 'वात दोष' के तीव्र प्रकोप और संचय का समय होता है। वात दोष का निर्माण वायु और आकाश तत्वों के मिलन से होता है, जिसके नैसर्गिक गुण रुक्ष (सूखा), शीत (ठंडा), लघु (हल्का), सूक्ष्म और चल (गतिशील) हैं।

जब बाह्य वातावरण में तापमान अत्यधिक गिर जाता है और हवा में शुष्कता बढ़ जाती है, तो प्रकृति के समान गुण धर्म के सिद्धांत ('सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धि कारणम्') के अनुसार मानव शरीर के भीतर का वात तत्व भी अचानक प्रकुपित हो उठता है। यह बढ़ा हुआ वात शरीर के सूक्ष्म स्रोतों (Channels) में संकुचन पैदा करता है, त्वचा के नीचे की प्राकृतिक चिकनाई को सोख लेता है और जोड़ों के भीतर उपस्थित चिकने सायनोवियल द्रव (कफ का स्नेहांश) को सुखा देता है। विशेष रूप से 45 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों में, जब जीवन स्वाभाविक रूप से 'वात प्रधान अवस्था' में प्रवेश कर चुका होता है, यह प्रकोप अत्यंत उग्र रूप धारण कर लेता है।

आयुर्वेदिक व ज्योतिषीय आयामशास्त्रीय स्थिति एवं विवरणशारीरिक व पैथोलॉजिकल प्रभाव
ऋतु संधिकालहेमंत का अवसान एवं शिशिर का प्रारंभबाह्य वातावरण में भारी शीत, शुष्कता व वायु वेग
प्रकुपित शारीरिक दोषवात दोष का चरम प्रकोप, कफ का संचयजोड़ों में शूल, सायनोवियल द्रव ह्रास, नसों में खिंचाव
प्रभावित आयु वर्ग45 वर्ष से अधिक आयु के स्त्री-पुरुषस्वाभाविक वार्धक्य जनित अस्थि-धातु क्षय व वायु वृद्धि
अधिष्ठाता ग्रह प्रभावमंदगामी कर्मफलदाता शनि देव (वायु तत्व अधिपति)हड्डियों की दुर्बलता, पैरों में दर्द, पक्षाघात का जोखिम
प्रधान औषधीय तेलनिर्गुंडी, महानारायण, दशमूल व तिल का तेलसंधियों का पोषण, वात का शमन और स्नायु शक्ति
मुख्य पाचक क्वाथसोंठ, मेथी दाना, अजवाइन और दालचीनी काढ़ाआम विष का पाचन, अवरोध निवारण और आंतरिक ऊष्मा
प्रधान फलश्रुतिगठिया, सायटिका, फ्रोजन शोल्डर व पक्षाघात से रक्षाओज संवर्धन, निर्बाध रक्त संचार व दीर्घायु

यदि इस ऋतु में प्रकुपित वात को समय रहते संतुलित न किया जाए, तो यह केवल जोड़ों के दर्द तक सीमित नहीं रहता बल्कि रक्त वाहिकाओं को संकुचित करके रक्तचाप को अचानक बढ़ा देता है, जिससे पक्षाघात (लकवा) और फेशियल पाल्सी जैसी जानलेवा व्याधियां जन्म लेती हैं।


वात व्याधियों का सूक्ष्म विकृति विज्ञान: गठिया, सायटिका और पक्षाघात

आयुर्वेद में अस्सी प्रकार के नानात्मज वात विकारों का विशद वर्णन मिलता है। जब पौष मास की शीतलहर शरीर पर प्रहार करती है, तो वात दोष रक्त और मज्जा धातु के साथ मिलकर विभिन्न अंगों में जाकर अवरोध उत्पन्न करता है। इसे 'अवरोधजन्य वात प्रकोप' अथवा 'धातुक्षयजन्य वात' कहा जाता है।

  • संधिवात (Osteoarthritis): कड़ाके की ठंड में जोड़ों के भीतर उपस्थित कफ का श्लेषक अंश सूख जाता है। उपास्थि (Cartilage) के घिसने से हड्डियों के सिरे आपस में रगड़ खाने लगते हैं, जिससे घुटनों, कूल्हों और उंगलियों के जोड़ों में असहनीय दर्द, सूजन और उठने-बैठने पर कट-कट की ध्वनि आती है।
  • आमवात (Rheumatoid Arthritis): सर्दियों में जब मंद पाचन के कारण भोजन पूरी तरह नहीं पचता, तो आंतों में 'आम' (विषाक्त कच्चा रस) बनता है। यह आम रस प्रकुपित वात के साथ मिलकर संधियों में जमा हो जाता है, जिससे सुबह के समय जोड़ों में जकड़न (Morning Stiffness), तीव्र लालिमा और बुखार जैसी स्थिति बन जाती है।
  • गृध्रसी (Sciatica): रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से (L4-L5, S1) की नसों पर ठंड के कारण दबाव बढ़ता है। यह दर्द कूल्हे से प्रारंभ होकर पैर की एड़ी तक बिजली के करंट की भांति दौड़ता है, जिससे चलना-फिरना दूभर हो जाता है।
  • पक्षाघात और अर्दित (Paralysis & Facial Palsy): पौष मास के ब्रह्म मुहूर्त में सुबह 4 से 7 बजे के बीच रक्त वाहिकाएं अत्यधिक संकुचित होती हैं। मस्तिष्क की ओर रक्त ले जाने वाली धमनियों में जब वात का तीव्र अवरोध होता है, तो मस्तिष्क की कोशिकाओं को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। इसके कारण चेहरे का एक तरफ मुड़ जाना (अर्दित) अथवा शरीर के एक हिस्से का सुन्न व निष्क्रिय हो जाना (पक्षाघात) घटित होता है।
  • अंसशूल (Frozen Shoulder): कंधे के जोड़ की मांसपेशियों और टेंडन्स में वात और कफ का जमाव होने से हाथ ऊपर उठाना अथवा पीछे ले जाना असंभव हो जाता है।

ज्योतिषीय दृष्टि: शनि की प्रतिकूलता और 45 वर्ष की आयु का चक्र

सनातन ज्योतिष में नौ ग्रहों के अंतर्गत कर्मफलदाता शनि देव को संपूर्ण वायु तत्व, वात प्रकृति, हड्डियों के जोड़ों, स्नायु तंत्र (नर्वस सिस्टम) और दीर्घकालिक व्याधियों का सर्वोच्च स्वामी माना गया है। शनि स्वभाव से अत्यंत शीतल, मंद, रुक्ष और कृष्ण वर्ण के ग्रह हैं। कालपुरुष की कुंडली में मकर और कुंभ राशियां घुटनों और पिंडलियों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

जब किसी जातक की जन्म कुंडली में शनि देव नीच राशि (मेष) में स्थित हों, सूर्य अथवा मंगल के साथ शत्रुवत संबंध बना रहे हों, या जातक शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या अथवा महादशा से गुजर रहा हो, तो पौष मास में उसके शरीर में वात जनित रोग अचानक उग्र हो जाते हैं।

ज्योतिषीय ग्रह स्थितिशरीर पर प्रकट होने वाले लक्षणपौष मास में निवारक उपाय
नीच राशि (मेष) में शनिघुटनों का घिसना, जोड़ों में लगातार दर्द, चलने में असमर्थताशनिवार को काले तिल व सरसों तेल का दान, पीपल दीपदान
शनि-राहु की युति (शापित दोष)अज्ञात कंपन, नसों का सूखना, पक्षाघात व नर्वस ब्रेकडाउनचितकबरे कंबल का दान, महामृत्युंजय मंत्र का नित्य जप
छठे अथवा आठवें भाव में शनिपुराना असाध्य गठिया, रीढ़ की हड्डी में गंभीर विकृतिकाले उड़द की खिचड़ी का वितरण, निर्गुंडी तेल से मालिश
45 वर्ष से अधिक आयु (वात काल)शरीर में स्वाभाविक रूप से कैल्शियम व सायनोवियल द्रव की कमीनित्य प्रातः तिल-गुड़ का सेवन, गुनगुने जल का उषापान

जीवन का 45 वर्ष से बाद का कालखंड आयुर्वेदिक दृष्टि से 'वृद्धावस्था' अर्थात वात की प्रधानता का काल माना जाता है। इस उम्र में शरीर के हार्मोनल स्तर में बदलाव आता है और अस्थि घनत्व (Bone Density) घटने लगता है। अतः इस आयु वर्ग के लोगों को पौष मास में अपनी जीवनशैली और आहार पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है।


औषधीय तेलों से अभ्यंग: निर्गुंडी, महानारायण और तिल का विज्ञान

आयुर्वेद में वात दोष को शांत करने का एकमात्र परम अमोघ साधन 'स्नेहन' अर्थात तेल की मालिश (अभ्यंग) को माना गया है। महर्षि वाग्भट कहते हैं कि जिस प्रकार सूखी लकड़ी पर निरंतर तेल लगाने से वह लचीली हो जाती है और मुड़ने पर भी नहीं टूटती, ठीक उसी प्रकार नियमित अभ्यंग करने से वृद्ध और जर्जर शरीर भी सुदृढ़, लचीला और वात रोगों से मुक्त हो जाता है।

पौष मास में अभ्यंग के लिए निम्नलिखित तीन दिव्य तेलों का प्रयोग रामबाण माना गया है:

1. निर्गुंडी का तेल (Nirgundi Oil)

निर्गुंडी (सम्हालू) को आयुर्वेद में सबसे शक्तिशाली शोथहर (Anti-inflammatory) और शूलप्रशमन (Pain Reliever) वनस्पति माना गया है।

  • निर्गुंडी की पत्तियों का रस तिल के तेल में पकाकर यह तेल तैयार किया जाता है।
  • यह नसों की सूजन को तत्काल समाप्त करता है और जोड़ों के भीतर गहराई तक समाकर दर्द को खींच लेता है।
  • सायटिका, फ्रोजन शोल्डर और घुटनों के पुराने दर्द में निर्गुंडी तेल को हल्का गुनगुना करके 15 मिनट तक मालिश करना चमत्कारी परिणाम देता है।

2. महानारायण तेल (Mahanarayan Oil)

यह पचास से अधिक दुर्लभ जड़ी-बूटियों (दशमूल, अश्वगंधा, शतावरी, बला, देवदारू आदि) को गाय के दूध और तिल के तेल में सिद्ध करके बनाया गया एक शास्त्रीय दिव्य तेल है।

  • यह तेल सीधे हड्डियों की मज्जा को पोषण प्रदान करता है और घिस चुकी कार्टिलेज की मरम्मत करता है।
  • पक्षाघात (लकवा) के रोगियों के लिए महानारायण तेल से पूरे शरीर की मालिश करना प्राणरक्षक माना गया है। यह निष्क्रिय हो चुकी नसों में पुनः चेतना का संचार करता है।

3. शुद्ध काले तिल का तेल (Sesame Oil)

यदि औषधीय तेल उपलब्ध न हों, तो शुद्ध कच्ची घानी का तिल का तेल वात शमन के लिए प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ उपहार है।

  • तिल का तेल स्वभाव से अत्यंत सूक्ष्मगामी होता है, जो त्वचा की सातों परतों को पार करके नसों तक पहुँचता है।
  • इसमें उपस्थित प्राकृतिक मैग्नीशियम, कैल्शियम और लिनोलेइक एसिड मांसपेशियों के खिंचाव को मिटाते हैं।
औषधीय तेलप्रमुख घटक एवं गुणविशिष्ट रोग निवारणप्रयोग विधि
निर्गुंडी तेलनिर्गुंडी स्वरस, तिल तेल, तीक्ष्ण, शोथहरसायटिका, स्पोंडिलाइटिस, तीव्र जोड़ों का दर्दगुनगुना करके 15 मिनट मालिश, तदुपरांत गर्म सेंक
महानारायण तेलदशमूल, अश्वगंधा, बला, गोदुग्ध, गुरुपक्षाघात (लकवा), नसों की कमजोरी, जीर्ण गठियासुबह-शाम पूरे मेरुदंड व निष्क्रिय अंगों पर मालिश
तिल का तेलशुद्ध काले तिल का स्नेहांश, उष्ण, सूक्ष्मगामीसामान्य बदन दर्द, त्वचा का फटना, मांसपेशियों की जकड़नप्रतिदिन प्रातः स्नान से 30 मिनट पूर्व संपूर्ण शरीर मालिश

पाचक काढ़े: सोंठ, मेथी, अजवाइन और दालचीनी का जादुई योग

वात दोष के शमन के लिए केवल बाह्य मालिश पर्याप्त नहीं है; आंतरिक रूप से पाचन तंत्र को शुद्ध करना और जठराग्नि को बलवान बनाए रखना भी अनिवार्य है। सर्दियों में बनने वाले 'आम विष' को जलाने के लिए सोंठ, मेथी और अजवाइन का काढ़ा साक्षात अमृत के समान कार्य करता है।

दिव्य वातनाशक काढ़ा बनाने की प्रामाणिक विधि

  • सामग्री:
    1. सोंठ का चूर्ण (शुष्क अदरक) - आधा चम्मच
    2. साबुत मेथी दाना - एक चम्मच
    3. शुद्ध अजवाइन - आधा चम्मच
    4. दालचीनी की छाल - एक छोटा टुकड़ा
    5. कुटी हुई काली मिर्च - दो दाने
    6. एक चुटकी सेंधा नमक अथवा थोड़ा सा पुराना देसी गुड़
  • निर्माण विधि: एक गिलास (लगभग 250 मिली) पेयजल में इन सभी औषधियों को डालें। इसे मिट्टी अथवा स्टील के पात्र में धीमी आंच पर तब तक उबालें जब तक कि जल घटकर आधा (लगभग 100 मिली) न रह जाए। इसे छानकर हल्का गुनगुना घूंट-घूंट करके चाय की भांति पिएं।
  • सेवन का समय: प्रातःकाल शौच आदि से निवृत्त होने के पश्चात खाली पेट, अथवा सायंकाल 5 से 6 बजे के मध्य इसका सेवन करना चाहिए।

इन घटकों का औषधीय प्रभाव

  • सोंठ (Dry Ginger): सोंठ को 'विश्वभेषज' (सार्वभौमिक औषधि) कहा गया है। यह आमाशय में जमे हुए कफ और आम को सुखाती है तथा रक्त नलिकाओं के अवरोधों को खोलती है।
  • मेथी दाना (Fenugreek): मेथी में प्रचुर मात्रा में एल्कलॉइड्स और एंटी-इंफ्लेमेटरी तत्व होते हैं जो यूरिक एसिड के स्तर को घटाते हैं और जोड़ों के दर्द को शांत करते हैं।
  • अजवाइन (Carom Seeds): अजवाइन में उपस्थित 'थाइमोल' उदर के अफारे, गैस और मांसपेशियों की ऐंठन को तत्काल समाप्त करता है।
  • दालचीनी (Cinnamon): यह रक्त के थक्के जमने से रोकती है, धमनियों को लचीला बनाती है और शरीर के आंतरिक तापमान को स्थिर रखती है।

पौष मास में वात रोगियों के लिए आहार नियम: क्या खाएं और क्या छोड़ें

वात रोगों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए आहार का चयन जीवन और मरण के समान महत्वपूर्ण होता है। एक गलत आहार वात के दर्द को कई गुना बढ़ा सकता है।

आहार श्रेणीपथ्य (क्या अवश्य खाएं)अपथ्य (क्या भूलकर भी न खाएं)
प्रधान अनाजपुराना गेहूं, बाजरा, मक्का, कुलथी, नया चावलमैदा, सूजी, बेसन की तली वस्तुएं, बासी अन्न
दालेंछिलके वाली मूंग दाल, मसूर, अरहर (घी तड़का)चना दाल, राजमा, छोले, सफेद मटर, उड़द (रात में)
शाक व सब्जियांबथुआ, मेथी का साग, पालक, परवल, सहजन (ड्रमस्टिक)कच्ची मूली, बैंगन, फूलगोभी, पत्तागोभी, भिंडी, अरबी
स्नेह व वसागाय का शुद्ध घी, तिल का तेल, सरसों का तेलरिफाइंड तेल, डालडा, पाम ऑयल, वनस्पति घी
पेय पदार्थगुनगुना जल, सोंठ युक्त दूध, लहसुन की खीरफ्रिज का ठंडा पानी, कोल्ड ड्रिंक्स, आइसक्रीम, छाछ (रात में)
स्वाद व रसमधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा) और लवण (नमकीन)अत्यधिक तीखा (कटु), कड़वा (तिक्त) और कसैला (कषाय)

विशेष रूप से लहसुन का प्रयोग वात रोगियों के लिए वरदान माना गया है। प्रातःकाल गाय के दूध में लहसुन की दो से तीन कलियां उबालकर 'लहसुन क्षीरपाक' बनाकर पीने से सायटिका और पक्षाघात का खतरा पूरी तरह टल जाता है।


दिनचर्या और आचरण: पक्षाघात और ठंड से बचाव के व्यावहारिक सूत्र

कड़ाके की ठंड के दिनों में अचानक लगने वाली ठंडी हवा पक्षाघात का मुख्य कारण बनती है। वात रोगियों को अपनी दैनिक दिनचर्या में निम्नलिखित नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए:

  1. सुबह के तापमान से सुरक्षा: सुबह 4 बजे से 7 बजे के बीच जब बाहर पाला और शीतलहर चल रही हो तब बिस्तर से उठते ही सीधे नंगे पैर ठंडे फर्श पर पैर न रखें। उठने से पहले बिस्तर में ही 2 मिनट अपने हाथों और पैरों की उंगलियों को चलाएं।
  2. सिर, कान और तलवों को ढकना: शरीर से ऊष्मा का सर्वाधिक विसर्जन सिर और कानों के माध्यम से होता है। जब भी घर से बाहर निकलें, अपने सिर और कानों को ऊनी टोपी या मफलर से पूरी तरह ढकें तथा पैरों में ऊनी मोजे अवश्य पहनें।
  3. गर्म पानी की सिकाई (स्वेदन): मालिश के उपरांत जोड़ों पर गर्म पानी की थैली (Hot Water Bag) अथवा रेत की पोटली से सिकाई करें। स्वेदन से त्वचा के रोमछिद्र खुलते हैं और तेल भीतर तक समा जाता है।
  4. धूप का नियमित सेवन: प्रातः 8 से 10 बजे के मध्य सूर्य की ओर पीठ करके कम से कम 20 मिनट बैठें। सौर ऊष्मा प्राकृतिक रूप से मेरुदंड की नसों को शक्ति देती है।
  5. दिन में सोने का त्याग: दोपहर के समय भोजन के तुरंत बाद सोने से कफ और आम बढ़ता है, जिससे नसों में रुकावट आती है।

शनि ग्रह की शांति और वात दोष मुक्ति के अचूक ज्योतिषीय उपाय

वात दोष की शांति के लिए औषधीय उपचार के साथ-साथ शनि देव की तात्विक कृपा प्राप्त करना भी अनिवार्य है। पौष मास में किए गए ये उपाय असाध्य रोगों से रक्षा करते हैं:

  • छाया पात्र दान का विधान: शनिवार के दिन एक कांसे अथवा लोहे की कटोरी में शुद्ध सरसों का तेल भरें। उसमें एक तांबे का सिक्का डालें। उस तेल में अपना चेहरा (छाया) स्पष्ट रूप से देखें और मन ही मन शनि देव से रोग मुक्ति की प्रार्थना करें। इसके पश्चात उस तेल को किसी शनि मंदिर में अथवा किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दान कर दें। यह उपाय अकाल मृत्यु और पक्षाघात के संकट को टाल देता है।
  • काले श्वान और कौवे की सेवा: प्रतिदिन भोजन की पहली रोटी पर थोड़ा सा सरसों का तेल और गुड़ लगाकर काले कुत्ते को खिलाएं तथा पक्षियों के लिए बाजरा रखें। इससे स्नायु तंत्र के रोग शांत होते हैं।
  • महामृत्युंजय मंत्र का संपुट जप: सायंकाल पीपल के वृक्ष के नीचे तिल के तेल का चौमुखा दीपक जलाकर रुद्राक्ष की माला से महामृत्युंजय मंत्र की एक माला जप करें। यह मंत्र नसों में प्राण ऊर्जा का संचार करता है।
  • दिव्यांगों और वृद्धों की सेवा: शनिवार के दिन किसी वृद्ध आश्रम अथवा अस्पताल में जाकर असहाय वृद्धों को गर्म कंबल, ऊनी मोजे और दर्द निवारक औषधियां भेंट करें। उनकी अंतरात्मा से निकला आशीर्वाद कुंडली के क्रूरतम शनि दोष को शांत कर देता है।

प्रकृति के अनुशासन से आरोग्य और दीर्घायु की प्राप्ति

पौष मास की यह ठिठुरती ठंड हमें प्रकृति के कठोर अनुशासन का स्मरण कराती है। वात दोष का यह प्रकोप हमें यह सिखाता है कि जिस प्रकार वृक्ष शीत ऋतु में अपने पत्तों को गिराकर अपनी ऊर्जा को जड़ों में समेट लेते हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी इस कालखंड में अपनी जीवनशैली को अंतर्मुखी, शांत और सुरक्षित बना लेना चाहिए।

जब हम अपनी दिनचर्या में तिल के तेल के अभ्यंग को स्थान देते हैं, सोंठ और मेथी के काढ़े से अपनी जठराग्नि को तृप्त रखते हैं और अपने मन को ईश्वरीय आराधना में लीन रखते हैं, तो शीत की यह बर्फीली हवा हमारे शरीर का तनिक भी अनिष्ट नहीं कर पाती।

जो मनुष्य पौष मास के इन आयुर्वेदिक और ज्योतिषीय सूत्रों को अपने जीवन में उतार लेता है, वह गठिया, सायटिका और पक्षाघात जैसे भयंकर रोगों से सदा सुरक्षित रहता है। उसका शरीर वज्र के समान सुदृढ़, मन शांत और जीवन अखंड आरोग्य के प्रकाश से परिपूर्ण हो जाता है।


FAQ

पौष मास में 45 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को वात दोष का अधिक खतरा क्यों रहता है? 45 वर्ष के बाद शरीर स्वाभाविक रूप से वात प्रधान अवस्था में प्रवेश करता है, जिससे अस्थि धातु क्षीण होती है और बाह्य शीतलता से जोड़ों का सायनोवियल द्रव तेजी से सूखता है।

गठिया और सायटिका के दर्द में निर्गुंडी तेल का प्रयोग कैसे करना चाहिए? निर्गुंडी तेल को हल्का गुनगुना करके प्रभावित जोड़ों और नसों पर 15 मिनट तक हल्के हाथों से मालिश करें और उसके बाद गर्म पानी की थैली से सिकाई करें।

पौष के महीने में सोंठ, मेथी और अजवाइन का काढ़ा पीने का क्या वैज्ञानिक लाभ है? यह काढ़ा शरीर में जमे आम विष को जलाता है, यूरिक एसिड घटाता है, रक्त संचार तेज करता है और आंतों की गैस व मांसपेशियों की ऐंठन को समाप्त करता है।

सर्दियों की सुबह पक्षाघात (लकवा) का खतरा सबसे अधिक किस समय रहता है? सुबह 4:00 से 7:00 बजे के बीच रक्त वाहिकाएं अत्यधिक संकुचित होती हैं; इस समय अचानक ठंडी हवा के संपर्क में आने से मस्तिष्क की धमनियों में अवरोध से लकवे का खतरा बढ़ता है।

कुंडली में शनि नीच का होने पर वात रोगों से बचने के लिए क्या उपाय करें? शनिवार को छाया पात्र दान करें, काले तिल व ऊनी वस्त्र जरूरतमंदों को दें, पीपल नीचे तिल के तेल का दीपक जलाएं और नित्य महामृत्युंजय मंत्र का जप करें।

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लेखक

पं. नीलेश शर्मा

पं. नीलेश शर्मा (63)


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