पौष बड़ा महोत्सव का महत्व क्या है?

By पं. अभिषेक शर्मा

राजस्थान की लोक परंपरा, 16 मसाले, मूंग दाल हलवा और सामाजिक समरसता

पौष बड़ा महोत्सव: राजस्थान की प्रसिद्ध लोक परंपरा और स्वास्थ्य लाभ

सामग्री तालिका

पौष बड़ा महोत्सव की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और लोक परंपरा

सनातन काल गणना के अनुसार पौष मास भारतीय उपमहाद्वीप में चरम शीत, घने कोहरे और बर्फीली पछुआ हवाओं के आगमन का कालखंड होता है। इस कड़ाके की ठंड के दिनों में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हरियाणा के पारंपरिक मंदिरों तथा सामाजिक संस्थाओं में एक अत्यंत अनूठा, सुरुचिपूर्ण और लोक कल्याणकारी उत्सव मनाया जाता है, जिसे 'पौष बड़ा महोत्सव' अथवा 'पौष बड़ा प्रसादी' के नाम से जाना जाता है। यह महोत्सव केवल एक साधारण धार्मिक कर्मकांड नहीं है बल्कि यह सनातन धर्म के सूक्ष्म ऋतु-विज्ञान, सामुदायिक समरसता, सामूहिक अन्न क्षेत्र और वात्सल्य भाव से परिपूर्ण सेवा परंपरा का साक्षात विग्रह है।

विशेष रूप से राजस्थान की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक राजधानी जयपुर (गुलाबी नगरी) में पौष बड़ा महोत्सव का स्वरूप किसी महाकुंभ के समान भव्य और विराट दिखाई देता है। जयपुर के आराध्य देव भगवान श्री गोविंद देव जी मंदिर, खोले के हनुमान जी, चांदपोल के परकोटे वाले हनुमान जी, मोती डूंगरी गणेश जी और शिला माता मंदिर में पौष मास के कृष्ण पक्ष से लेकर शुक्ल पक्ष तक निरंतर विशाल पौष बड़ा भंडारों का आयोजन किया जाता है। इन आयोजनों में प्रतिदिन लाखों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित होकर भगवान के सम्मुख समर्पित इस दिव्य, स्निग्ध और ऊर्जा प्रदायक महाप्रसाद को ग्रहण करते हैं।

सांस्कृतिक व धार्मिक आयामपारंपरिक स्वरूप एवं विवरणव्यावहारिक व आध्यात्मिक प्रभाव
प्रधान कालखंडसंपूर्ण पौष मास (दिसंबर मध्य से जनवरी मध्य तक)शीत ऋतु की जड़ता का नाश और सामाजिक सक्रियता
प्रमुख भौगोलिक क्षेत्रराजस्थान (जयपुर, शेखावाटी, मारवाड़), उ.प्र., म.प्र.लोक संस्कृति, सामुदायिक बंधुत्व और सामूहिक सेवा
मुख्य अधिष्ठाता देवसंकटमोचन श्री हनुमान जी एवं योगेश्वर श्री कृष्णभय निवारण, आरोग्य, आत्मिक बल और भक्ति का संचार
प्रधान प्रसादी घटकमूंग-मोठ के बड़े, मूंग दाल का हलवा, पुए, पूरी-सब्जीशीतकालीन त्रिदोष संतुलन और प्रोटीन की प्रचुरता
मुख्य औषधीय मसालेसौंफ, साबुत धनिया, काली मिर्च, सोंठ, हींग, लौंगजठराग्नि प्रदीप्ति, वात-कफ शमन और पाचन सुगमता
सामाजिक उद्देश्यसामूहिक पंगत, छुआछूत का नाश और अन्न सेवासामाजिक समरसता, दरिद्र नारायण सेवा और समानता
पर्यावरण व लोक मर्यादापत्तलों (पत्तल-दोने) पर सामूहिक रूप से पंगत प्रसादीप्रकृति संरक्षण, शुद्धता और पर्यावरण-अनुकूल व्यवस्था

यह महोत्सव यह सिद्ध करता है कि सनातन संस्कृति में भक्ति केवल मंदिर के गर्भगृह तक सीमित नहीं है, अपितु जब वह समाज के अंतिम व्यक्ति तक गरमा-गरम पौष्टिक भोजन के रूप में पहुँचती है, तभी वह वास्तविक 'नारायण सेवा' का स्वरूप धारण करती है।


पौष बड़ा महोत्सव की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक उत्पत्ति

पौष बड़ा महोत्सव की उत्पत्ति का इतिहास राजस्थान के भक्ति आंदोलन, रियासतकालीन राजसी परंपराओं और मंदिर संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। प्राचीन काल में जब राजस्थान का विशाल भूभाग कड़ाके की ठंड और शुष्क हवाओं की चपेट में आता था तब रियासतों के शासक, नगर सेठ और वैष्णव संप्रदाय के संत जनसाधारण के पोषण और स्वास्थ्य रक्षा के लिए इस उत्सव की रूपरेखा तैयार करते थे।

मान्यता है कि जयपुर की स्थापना के समय से ही भगवान गोविंद देव जी के दरबार में पौष मास के दौरान भगवान को शीत से बचाने के लिए विशेष 'उष्ण भोग' (गरम तासीर वाले खाद्य पदार्थ) अर्पित करने की परंपरा आरंभ हुई थी।

  • भगवान को शीत निवारक भोग: वैष्णव और निम्बार्क परंपरा में भगवान को एक सजीव बालक अथवा प्रियतम के रूप में पूजा जाता है। शीत ऋतु में भगवान को ठंड न लगे, इसके लिए उन्हें रेशमी और ऊनी वस्त्र पहनाए जाते हैं, गर्भगृह में सुरक्षित सिगड़ी (अंगीठी) रखी जाती है और भोग में ऐसे पदार्थों को शामिल किया जाता है जो स्वभाव से गर्म, स्निग्ध और बलवर्धक हों।
  • संकटमोचन हनुमान जी का सान्निध्य: हनुमान जी साक्षात पवनपुत्र, कलयुग के जाग्रत देवता और असीम शारीरिक व आत्मिक बल के स्वामी हैं। पौष मास में हनुमान जी के मंदिरों में बड़े का भोग लगाने की विशेष परंपरा विकसित हुई। उड़द, मूंग और मोठ की दाल से बने बड़े हनुमान जी को अत्यंत प्रिय हैं क्योंकि दालें पृथ्वी और मंगल तत्व का प्रतिनिधित्व करती हैं जो शारीरिक शौर्य को बढ़ाती हैं।
  • खोले के हनुमान जी का ऐतिहासिक प्रसंग: जयपुर के लक्ष्मण डूंगरी की सुरम्य वादियों में स्थित 'खोले के हनुमान जी' मंदिर में पंडित राधेलाल चौबे जी द्वारा आरंभ किया गया पौष बड़ा महोत्सव आज संपूर्ण विश्व में प्रसिद्ध हो चुका है। यहाँ एक ही दिन में कई टन दाल के बड़े तैयार किए जाते हैं और जाति-वर्ण का भेद मिटाकर लाखों लोग एक साथ बैठकर पंगत में प्रसाद पाते हैं।

इस प्रकार, यह परंपरा राजमहलों के रसोइयों से निकलकर जनसाधारण के आंगनों और मंदिरों तक पहुँची, जिसने आगे चलकर एक विशाल लोक उत्सव का रूप ले लिया।


पौष बड़े का निर्माण विधान और 16 मसालों का रस-रहस्य

पौष बड़ा साधारण पकोड़ा या वड़ा नहीं है बल्कि यह आयुर्वेद के सिद्धांतों के अनुसार निर्मित एक संपूर्ण औषधीय आहार है। इसे तैयार करने की विधि अत्यंत शुद्ध, श्रमसाध्य और वैज्ञानिक होती है।

पौष बड़े का मुख्य आधार 'छिलके वाली मूंग की दाल' और 'मोठ की दाल' का सम्मिश्रण होता है। मूंग की दाल सुपाच्य, पोषक और शीतल होती है, जबकि मोठ की दाल अत्यधिक गर्म, शुष्क और शक्तिवर्धक मानी जाती है। जब इन दोनों दालों को संतुलित अनुपात में मिलाया जाता है, तो यह शीत ऋतु के लिए एक आदर्श खाद्य पदार्थ बन जाता है।

मसाला व घटकआयुर्वेदिक गुण एवं तासीरशारीरिक स्वास्थ्य व पाचन पर प्रभाव
दरदरी सौंफमधुर, तिक्त, दीपन और पाचकपेट में भारीपन नहीं होने देती, आंतों को शीतलता देती है
साबुत धनियाशीतल, त्रिदोष नाशक और मूत्रलआंतरिक जलन को शांत करता है और विषैले तत्व बाहर निकालता है
कुटी हुई काली मिर्चउष्ण, तीक्ष्ण और कफ नाशकफेफड़ों को सुरक्षित रखती है, बलगम और जुकाम का नाश करती है
पिसी हुई सोंठ (शुष्क अदरक)आग्नेय, वात शामक और उत्तेजकजोड़ों के दर्द को रोकती है और जठराग्नि को प्रचंड करती है
शुद्ध हींगउष्ण, वायु नाशक और पाचकदालों के भारीपन को समाप्त करती है, गैस और अफारा रोकती है
दरदरी लौंगतीक्ष्ण, कीटाणुरोधक और स्फूर्तिदायकगले के संक्रमण को समाप्त करती है और शरीर को ऊष्मा देती है
हरी मिर्च व ताजा अदरकअग्नि तत्व प्रदीपक और चयापचय वर्धकपाचन रसों का स्राव बढ़ाती है, भूख खोलती है
साबुत जीराशीतल, पाचक और वात शामकउदर विकारों को शांत करता है और स्वाद को निखारता है

दाल को कई घंटों तक पानी में भिगोने के पश्चात सिलबट्टे अथवा दरदरे रूप में पीसा जाता है। इसके पश्चात उसमें उपर्युक्त समस्त खड़े मसाले, हरी मिर्च, बारीक कटा अदरक और हरी धनिया पत्ती मिलाई जाती है। इस मिश्रण को बड़े-बड़े कड़ाहों में शुद्ध मूंगफली के तेल अथवा सरसों के तेल में धीमी आंच पर तब तक तला जाता है जब तक कि वे बाहर से अत्यंत कुरकुरे और भीतर से एकदम मुलायम न हो जाएं। इन बड़ों के साथ पारंपरिक 'धनिया-पुदीने की तीखी चटनी' और 'अमचूर की मीठी सोंठ' परोसी जाती है जो इनके स्वाद और पाचन को कई गुना बढ़ा देती है।


पौष्टिक मूंग दाल का हलवा और पारंपरिक पूड़ी-सब्जी

पौष बड़ा महोत्सव केवल नमकीन बड़ों तक सीमित नहीं होता बल्कि इसके साथ 'मूंग दाल का हलवा' और 'गरमा-गरम पूड़ी व आलू की रसेदार सब्जी' का संयोजन अनिवार्य माना जाता है। सनातन भोजन परंपरा में 'षडरस' (छह रसों) का संतुलन सर्वोपरि माना गया है, जिसमें नमकीन, तीखे और मीठे का अद्भुत संगम होता है।

मूंग की दाल का हलवा: ऊर्जा का महास्रोत

दाल के बड़ों के तीखे और नमकीन स्वाद को संतुलित करने के लिए शुद्ध देसी गाय के घी में भुना हुआ मूंग दाल का हलवा तैयार किया जाता है।

  • मूंग की धुली दाल को पीसकर भारी कड़ाहों में घंटों तक देसी घी में धीमी आंच पर सुनहरा होने तक सेका जाता है।
  • इसमें दूध, मावा (खोया), केसर, इलायची और प्रचुर मात्रा में काजू, बादाम और पिस्ता मिलाए जाते हैं।
  • यह हलवा शीत ऋतु में शरीर की कोशिकाओं को तुरंत ऊर्जा देता है, हड्डियों के घनत्व को बढ़ाता है और शरीर में शुष्कता आने से रोकता है।

पारंपरिक रसेदार सब्जी और पूरी

बड़ों के साथ विशेष रूप से 'बिना प्याज-लहसुन वाली हिंग-जीरे के तड़के की आलू-टमाटर की रसेदार सब्जी' और कस्तूरी मेथी मिली हुई 'खस्ता पूरियां' परोसी जाती हैं। इस संपूर्ण थाली को जब पत्तल पर परोसा जाता है, तो यह भोजन शरीर के सातों धातुओं (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र) को तुरंत पुष्ट कर देता है।


शीत ऋतु में पौष बड़े का वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक पक्ष

चरक संहिता और वाग्भट रचित अष्टांग हृदयम के अनुसार, शीत ऋतु (शिशिर और हेमंत) में मनुष्य की त्वचा के रोमछिद्र बंद हो जाने के कारण शरीर की आंतरिक ऊष्मा बाहर नहीं निकल पाती और वह आमाशय में एकत्र हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप मनुष्य की 'जठराग्नि' (पाचन अग्नि) वर्ष के अन्य सभी महीनों की तुलना में सबसे अधिक तीव्र और प्रचंड हो जाती है।

यदि इस समय शरीर को हल्का, सूखा अथवा अल्पाहार दिया जाए, तो वह प्रचंड जठराग्नि शरीर के अपने ही धातुओं को सुखाने लगती है, जिससे व्यक्ति दुर्बल, रूखा और वात रोगों का शिकार हो जाता है।

  • प्रोटीन की प्रचुर आपूर्ति: मूंग और मोठ की दालें प्रोटीन का उत्कृष्ट शाकाहारी स्रोत हैं। कड़ाके की ठंड में जब मांसपेशियों में खिंचाव और कमजोरी आने लगती है तब यह दाल प्रोटीन ऊतकों की त्वरित मरम्मत करता है।
  • मसालों द्वारा वात-कफ का शमन: सर्दियों में चलने वाली बर्फीली शीतलहर शरीर में वात और कफ को अत्यधिक प्रकोपित करती है। बड़े में प्रयुक्त सौंफ, सोंठ, हींग और काली मिर्च मिलकर श्वसन तंत्र में बलगम को जमने नहीं देते और रक्त नलिकाओं के संकुचन को खोलते हैं।
  • ऊष्मा का स्थाई संचय: तेल और घी में तले गए ये खाद्य पदार्थ शरीर को पर्याप्त कैलोरी प्रदान करते हैं, जिससे शरीर का तापमान बाह्य ठंड के बावजूद 37 डिग्री सेल्सियस पर स्थिर बना रहता है।
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) का विकास: अदरक, साबुत धनिया और हींग का सम्मिश्रण आंतों के माइक्रोबायोम को सुदृढ़ करता है, जिससे मौसमी फ्लू, सर्दी, खांसी और वायरल संक्रमण का खतरा पूरी तरह टल जाता है।

इस प्रकार, हमारे पूर्वजों ने धर्म और उत्सव के आवरण में एक ऐसी भोजन शैली को समाज में प्रतिष्ठित किया जो वैज्ञानिक रूप से मानव जीवन की रक्षा करने में सक्षम थी।


सामाजिक समरसता, पंगत परंपरा और दरिद्र नारायण सेवा

पौष बड़ा महोत्सव का सबसे सुंदर और प्रेरणादायी पक्ष इसका सामाजिक ढांचा है। भारतीय समाज में जहां कई बार वर्ग, जाति, धन और पद के आधार पर विभाजन देखने को मिलते हैं, वहीं पौष बड़ा महोत्सव इन सभी कृत्रिम दीवारों को एक ही क्षण में ढहा देता है।

मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों पर जब पौष बड़े का भंडारा होता है, तो वहां कोई वीआईपी या साधारण व्यक्ति नहीं होता।

  • पंगत में समानता का दर्शन: एक ही पंक्ति (पंगत) में जमीन पर बिछी टाट-पट्टी पर शहर का सबसे धनी उद्योगपति और एक निर्धन श्रमिक कंधे से कंधा मिलाकर बैठते हैं। दोनों के सम्मुख एक ही प्रकार की पत्तल रखी जाती है और दोनों को समान भाव से वही गरम प्रसाद परोसा जाता है।
  • अहंकार का विसर्जन: समाज के प्रतिष्ठित और संपन्न लोग अपनी गाड़ियों और पदों को भूलकर अपने हाथों में बाल्टियां लेकर भक्तों की पंगत में बड़े और हलवा परोसते हैं। यह सेवा भाव मनुष्य के भीतर के सूक्ष्म अहंकार को पूरी तरह गला देता है।
  • सामूहिक सहभागिता: इस आयोजन में किसी एक व्यक्ति का धन नहीं लगता बल्कि मोहल्ले, कॉलोनी अथवा व्यापार मंडल के सभी लोग मिलकर अपनी-अपनी सामर्थ्य अनुसार दाल, तेल, मसाले, घी और श्रम का योगदान देते हैं।
  • पर्यावरण के अनुकूल व्यवस्था: इस महोत्सव में प्लास्टिक अथवा थर्माकोल के बर्तनों का प्रयोग पूर्णतः वर्जित होता है। ढाक (पलाश) अथवा साल के पत्तों से बनी पारंपरिक पत्तलों और मिट्टी के कुल्हड़ों का प्रयोग किया जाता है, जो उपयोग के बाद स्वतः माटी में मिलकर खाद बन जाते हैं।

यह उत्सव 'वसुधैव कुटुम्बकम्' और 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' के उस अमर वैदिक उद्घोष का साक्षात मूर्त रूप है, जहां समाज का प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे के सुख-दुख और पोषण का सहभागी बनता है।


प्रमुख सिद्ध पीठ: जयपुर के खोले के हनुमान जी और गोविंद देव जी का वैभव

राजस्थान में पौष बड़ा महोत्सव का जो वैभव दिखाई देता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। विशेष रूप से दो मंदिरों का पौष बड़ा महोत्सव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात है:

1. खोले के हनुमान जी मंदिर (जयपुर)

जयपुर-दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग पर पहाड़ियों की गोद में स्थित 'खोले के हनुमान जी' मंदिर परिसर में पौष मास में ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरा जयपुर शहर ही वहाँ उमड़ पड़ा हो।

  • यहाँ के विशाल रसोइयों में पचास से अधिक बड़े-बड़े कड़ाहों में निरंतर बड़े तले जाते हैं।
  • दाल को फेंटने, मसाले मिलाने और बड़े उतारने के लिए सैकड़ों अनुभवी कारीगर और हजारों स्वयंसेवक दिन-रात निस्वार्थ सेवा करते हैं।
  • मंदिर की पहाड़ियों पर एक समय में दस हजार से अधिक श्रद्धालु एक साथ पंगत में बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं।
  • यहाँ की व्यवस्था इतनी सुव्यवस्थित होती है कि स्वच्छता, अनुशासन और श्रद्धा का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

2. श्री गोविंद देव जी मंदिर (सिटी पैलेस, जयपुर)

जयपुर के राजपरिवार और जनसाधारण के आराध्य भगवान गोविंद देव जी के दरबार में पौष मास की द्वादशी अथवा किसी विशिष्ट तिथि पर 'झांकी पौष बड़ा महोत्सव' आयोजित होता है।

  • भगवान गोविंद देव जी और माता राधा जी को विशेष गर्म पोशाक धारण कराई जाती है और उनके सम्मुख सोने-चांदी के विशाल थालों में बड़ों, हलवे, खीर, मालपुए और छप्पन भोग की नयनाभिराम झांकी सजाई जाती है।
  • मंगला आरती से लेकर शयन आरती तक मंदिर प्रांगण में लाखों भक्तों को दोने में रखकर गरमा-गरम पौष बड़ा प्रसादी का वितरण किया जाता है।
  • भक्त इसे केवल भोजन नहीं बल्कि ठाकुर जी का साक्षात कृपा प्रसाद मानकर अत्यंत श्रद्धा से अपने मस्तक पर लगाते हैं।

आधुनिक युग में पौष बड़ा महोत्सव का महत्व और संरक्षण

आज की भागदौड़ भरी, आत्मकेंद्रित और डिजिटल जीवनशैली में जब मनुष्य अपने ही घरों के कमरों में सिमटकर एकाकी होता जा रहा है तब पौष बड़ा महोत्सव जैसे लोक पर्वों की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है।

यह महोत्सव हमें सिखाता है कि:

  1. परस्पर मेल-मिलाप का अवसर: कड़ाके की ठंड में जब लोग अपने घरों से बाहर निकलकर सामूहिक आयोजनों में भाग लेते हैं, तो सामाजिक संबंधों में नई ऊष्मा और आत्मीयता का संचार होता है।
  2. संस्कृति का अगली पीढ़ी में हस्तांतरण: जब युवा और बच्चे पंगत में बैठकर भोजन करते हैं और स्वयं अपने हाथों से बड़े परोसते हैं, तो वे सेवा, परोपकार, विनम्रता और अपनी सनातन परंपराओं का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करते हैं।
  3. भूख और कुपोषण के विरुद्ध अभियान: पौष मास की भीषण ठंड में कोई भी निर्धन, साधु अथवा बेसहारा व्यक्ति भूखा न सोए, यह सामाजिक जिम्मेदारी इस महोत्सव के माध्यम से स्वतः पूरी हो जाती है।
  4. पारंपरिक खानपान की पुनर्प्रतिष्ठा: आधुनिक फास्ट फूड और जंक फूड के इस युग में पौष बड़ा यह सिद्ध करता है कि हमारे पारंपरिक देशी व्यंजन स्वाद में भी अद्वितीय हैं और स्वास्थ्य के लिए भी परम लाभकारी हैं।

पौष बड़ा महोत्सव वास्तव में राजस्थान और उत्तर भारत की उस अमर भावना का प्रतीक है जहाँ धर्म केवल पूजा की थाली तक सीमित नहीं रहता बल्कि वह कड़ाहों में पककर, पत्तलों पर सजकर और भूखे चेहरों पर मुस्कान बनकर ईश्वर की सच्ची आराधना बन जाता है।


FAQ

पौष बड़ा महोत्सव मुख्य रूप से किस महीने में और किन क्षेत्रों में मनाया जाता है? यह महोत्सव मुख्य रूप से हिन्दू पंचांग के पौष मास (दिसंबर-जनवरी) में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हरियाणा के मंदिरों में मनाया जाता है।

पौष बड़े बनाने में किन दालों और मसालों का विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है? पौष बड़े में मुख्य रूप से छिलके वाली मूंग और मोठ की दाल का उपयोग होता है तथा सौंफ, साबुत धनिया, काली मिर्च, सोंठ, हींग और लौंग जैसे पाचक मसाले मिलाए जाते हैं।

शीत ऋतु में पौष बड़ा खाने का क्या वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक लाभ है? सर्दियों में जठराग्नि तीव्र होती है; मूंग-मोठ से प्रचुर प्रोटीन मिलता है और गर्म मसाले वात-कफ को शांत करके शरीर को आंतरिक ऊष्मा और ऊर्जा प्रदान करते हैं।

जयपुर में पौष बड़ा महोत्सव के लिए कौन से दो मंदिर सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं? जयपुर में 'खोले के हनुमान जी मंदिर' और सिटी पैलेस स्थित 'श्री गोविंद देव जी मंदिर' का पौष बड़ा महोत्सव पूरे भारत में सबसे विशाल और प्रसिद्ध माना जाता है।

पौष बड़ा महोत्सव में पंगत परंपरा का क्या सामाजिक महत्व है? पंगत में अमीर-गरीब और जाति-पाति का भेद मिटाकर सभी लोग एक साथ जमीन पर बैठकर पत्तलों में भोजन करते हैं, जिससे सामाजिक समरसता और समानता बढ़ती है।

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लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

पं. अभिषेक शर्मा (63)


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इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

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