पौष मास में भग आदित्य की उपासना से क्या फल मिलता है?

By पं. संजीव शर्मा

द्वादश आदित्य, भग स्वरूप, तांबे के लोटे से अर्घ्य और रोग मुक्ति

पौष मास में भग आदित्य की पूजा: अर्घ्य विधि और लाभ

सामग्री तालिका

द्वादश आदित्य परंपरा और पौष मास में भग स्वरूप का प्राकट्य

सनातन धर्म के वैदिक और पौराणिक वांग्मय में भगवान सूर्य को प्रत्यक्ष देवता के रूप में पूजा गया है। सृष्टि के समस्त दृश्य जगत में केवल सूर्य नारायण ही ऐसे साक्षात ब्रह्म हैं, जिनके दर्शन प्रतिदिन चर्मचक्षुओं से सुलभ होते हैं। सूर्य देव केवल प्रकाश और ताप का भौतिक पिंड नहीं हैं बल्कि वे संपूर्ण चराचर जगत की आत्मा, काल के नियामक तथा जीवन के शाश्वत आधार हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण तथा भविष्य पुराण के अनुसार संवत्सर चक्र के बारह महीनों में सूर्य देव बारह भिन्न-भिन्न रूपों में अपनी रश्मियां पृथ्वी पर बिखेरते हैं, जिन्हें 'द्वादश आदित्य' कहा जाता है।

पौष मास में जब प्रकृति पर शिशिर ऋतु की कड़ाके की ठंड छा जाती है, तब सूर्य देव अपने 'भग' नामक दिव्य स्वरूप में संपूर्ण ब्रह्मांड को ऊर्जावान और आलोकित करते हैं। 'भग' शब्द अत्यंत गूढ़, दार्शनिक और व्यापक अर्थ समेटे हुए है। महर्षि वेदव्यास ने विष्णु पुराण के छठे अंश में स्पष्ट किया है कि संपूर्ण ऐश्वर्य, समग्र धर्म, संपूर्ण यश, अनुपम श्री, असीम ज्ञान तथा पूर्ण वैराग्य-इन छह दिव्य गुणों के समन्वित स्वरूप को ही 'भग' कहा जाता है। इस प्रकार 'भग' साक्षात षडैश्वर्य संपन्न परब्रह्म परमात्मा की सक्रिय शक्ति का नाम है।

शास्त्रीय आयामवैदिक व पौराणिक विधानदार्शनिक एवं फलित परिणाम
नियमविधानविधान
मास का नामपौष मास (संवत्सर का दशम मास)कर्म शुद्धि और आत्मिक ऊर्जा के संचय का पावन काल
प्रधान आदित्य स्वरूपभग आदित्य (द्वादश आदित्यों में प्रमुख)समग्र ऐश्वर्य, आंतरिक तेज, यश और अखंड सौभाग्य
मुख्य अधिष्ठाता वर्णस्वर्णिम रक्त वर्ण (उदीयमान बाल सूर्य)आत्मबल, पराक्रम, चेतना का विस्तार और जीवनी शक्ति
प्रधान अर्घ्य पात्रशुद्ध तांबे का लोटा (ताम्र पात्र)जैव-विद्युत संतुलन और सौर ऊर्जा का तीव्र अवशोषण
अर्घ्य जल घटकशुद्ध जल, रक्त चंदन, कुमकुम, अक्षत, लाल कनेर, गुड़नेत्र ज्योति, रक्त शुद्धि, हड्डियों की दृढ़ता और ओज
प्रधान मंत्र साधनाॐ भगाय नमः अथवा ॐ घृणिः सूर्य आदित्यःकुंडली में सूर्य दोष शमन, राजकृपा और प्रशासनिक विजय
आध्यात्मिक दिशाप्रत्यक्ष पूर्व दिशा (उदयगामी सूर्य का मुख)आज्ञा और अनाहत चक्र का शोधन तथा आत्म साक्षात्कार
पितृ संबंध प्रभावपिता से मधुर संबंध और पितृ दोष की पूर्ण शांतिकुल वृद्धि, वंश प्रतिष्ठा और सामाजिक सम्मान की प्राप्ति

शीत ऋतु के चरम संधिकाल में जब बाह्य वातावरण ठंडा और निष्प्राण होने लगता है, तब भग आदित्य की कोमल रश्मियां मानव देह के लिए साक्षात अमृत संजीवनी का कार्य करती हैं। पौष मास में भग आदित्य की नित्य पूजा से मनुष्य के भीतर का तमस, मानसिक अवसाद तथा शारीरिक जड़ता भस्म हो जाती है और वह नवतेज से संपन्न होकर अपने कर्मक्षेत्र में अग्रसर होता है।


भग आदित्य का तात्विक अर्थ और षडैश्वर्य का रहस्य

वैदिक संहिताओं में सूर्य के 'भग' स्वरूप को समस्त ऐश्वर्यों का उद्गम स्रोत माना गया है। छांदोग्य उपनिषद और भविष्य पुराण के सौर खंड में भग आदित्य के तात्विक स्वरूप की विशद व्याख्या मिलती है। इस स्वरूप को साक्षात भगवान नारायण का तेज माना गया है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड का पालन-पोषण पिता के समान वात्सल्य भाव से करता है। जब मनुष्य पौष मास में भग आदित्य की शरण में जाता है, तो उसके जीवन में छह प्रकार के दिव्य ऐश्वर्य स्वतः प्रकट होने लगते हैं।

  • समग्र ऐश्वर्य (भौतिक व आत्मिक संपदा): भग आदित्य की कृपा से साधक को भौतिक धन, भूमि, भवन तथा आध्यात्मिक संपदा की सहज प्राप्ति होती है। उसके जीवन से दरिद्रता का समूल नाश हो जाता है।
  • समग्र धर्म (कर्तव्य निष्ठा व सात्विकता): सूर्य देव धर्म के प्रत्यक्ष नेत्र हैं। इनकी उपासना से साधक का मन अधर्म, असत्य और छल-कपट से विमुख होकर कर्तव्य के मार्ग पर दृढ़ता से अग्रसर होता है।
  • समग्र यश (कीर्ति व सामाजिक प्रतिष्ठा): सूर्य की रश्मियां जैसे संपूर्ण गगन मंडल में फैलती हैं, वैसे ही भग आदित्य के उपासक की ख्याति, मान-सम्मान और प्रतिष्ठा समाज तथा कार्यक्षेत्र में दिशा-दिशा में व्याप्त होती है।
  • समग्र श्री (आकर्षण व कांति): 'श्री' का अर्थ केवल धन नहीं बल्कि देह का सौंदर्य, चेहरे का सम्मोहक तेज और वाणी का प्रभाव है। पौष मास की साधना से व्यक्ति का प्रभामंडल शुद्ध और स्वर्ण के समान दीप्तिमान बनता है।
  • समग्र ज्ञान (विवेक व प्रज्ञा): सूर्य देव ज्ञान के अधिष्ठाता हैं। इनकी उपासना से मस्तिष्क की जड़ता कटती है, मेधा शक्ति कुशाग्र होती है और कठिन से कठिन समस्याओं के समाधान की दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है।
  • समग्र वैराग्य (आसक्ति मुक्ति): सूर्य प्रतिदिन कर्म करते हैं परंतु किसी फल से बंधते नहीं। इसी प्रकार भग आदित्य की उपासना से मनुष्य सांसारिक बंधनों में रहते हुए भी कमल के पत्ते की भांति निर्लिप्त रहना सीख जाता है।

जब साधक इस रहस्य को समझकर पौष मास में भग आदित्य का ध्यान करता है, तो वह केवल एक सांसारिक याचक नहीं रह जाता बल्कि वह साक्षात सूर्य के तेज का एक अंश बनकर संसार को प्रकाशित करने की सामर्थ्य अर्जित कर लेता है।


कड़ाके की ठंड में तांबे के लोटे से सूर्य अर्घ्य का वैज्ञानिक विज्ञान

पौष मास में तांबे के पात्र से सूर्य को अर्घ्य देने का विधान केवल एक पौराणिक अनुष्ठान नहीं है बल्कि यह भौतिक विज्ञान, प्रकाशिकी (ऑप्टिक्स) और शरीर क्रिया विज्ञान का एक अत्यंत परिष्कृत संगम है। तांबा (कॉपर) धातु विद्युत और ताप की सर्वश्रेष्ठ सुचालक मानी जाती है। वैदिक काल से ही तांबे को सूर्य की धातु के रूप में मान्यता प्राप्त है।

जब शुद्ध तांबे के पात्र में जल भरकर उसे सूर्य की दिशा में सिर से ऊपर उठाकर दोनों हाथों से धार के रूप में गिराया जाता है, तो गिरती हुई जलधारा एक त्रिकोणीय प्रिज्म (Prism) की भांति कार्य करती है। उदीयमान सूर्य की बाल रश्मियां जब उस जलधारा से टकराकर विभक्त होती हैं, तो वे सात मूल रंगों (स्पेक्ट्रम) में टूट जाती हैं।

प्रकाश किरण घटकसूक्ष्म वैज्ञानिक प्रभावशारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य लाभ
नियमविधानविधान
लाल व नारंगी तरंगेंदीर्घ तरंग दैर्ध्य वाली ऊष्मीय तरंगेंरक्त संचार की गति में सुधार, हृदय की धमनियों का फैलाव
पीली तरंगेंतंत्रिका तंत्र को उद्दीप्त करने वाली किरणेंपाचन तंत्र का संवर्धन, जठराग्नि की तीव्रता, मेधा वृद्धि
हरी तरंगेंसंतुलन और शीतलता प्रदाता किरणेंमानसिक शांति, अनिद्रा का शमन, तंत्रिका तनाव से मुक्ति
नीली व बैंगनी तरंगेंजीवाणुरोधक और सूक्ष्म तरंगेंत्वचा के संक्रमण का नाश, पीनियल ग्रंथि का जागरण
जल से छनकर परावर्तित प्रकाशनेत्रों की रेटिना पर सीधा संपर्कचश्मे के नंबर में कमी, मोतियाबिंद का बचाव, दृष्टि प्रखरता

गिरती हुई जलधारा के मध्य से सूर्य देव के लाल बिंब को अनिमेष देखने से सूर्य की कोमल किरणें सीधे नेत्रों की पुतली से होते हुए मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस और पीनियल ग्रंथि तक पहुँचती हैं। कड़ाके की ठंड में जब वातावरण में मेलाटोनिन का स्तर असंतुलित हो जाता है और व्यक्ति अवसाद महसूस करता है, तब यह प्रक्रिया सेरोटोनिन हार्मोन के स्राव को तेज कर देती है।

इसके साथ ही, तांबे के पात्र में रात भर रखा जल या तांबे के लोटे से प्रवाहित जल जब शरीर के आभा मंडल को स्पर्श करता है, तो शरीर के भीतर की स्थिर वैद्युतिकी (Static Electricity) संतुलित हो जाती है। यह प्रक्रिया शरीर की जैविक घड़ी को प्रकृति के साथ जोड़कर रोग प्रतिरोधक क्षमता को कई गुना सुदृढ़ कर देती है।


हड्डियों के रोग और विटामिन डी संश्लेषण का आयुर्वेदिक पक्ष

सर्दियों के चरम काल में जब तापमान गिरता है, तो अधिकांश लोग जोड़ों में जकड़न, घुटनों के दर्द, कमर दर्द और हड्डियों की कमजोरी से पीड़ित होने लगते हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इसे विटामिन डी की कमी तथा आर्थराइटिस कहता है, जबकि महर्षि चरक और वाग्भट ने इसे 'शीत जनित वात प्रकोप' और 'अस्थि मज्जा क्षय' के रूप में परिभाषित किया है।

वैदिक ज्योतिष और आयुर्वेद के अनुसार सूर्य देव मानव शरीर में हड्डियों (अस्थि धातु) के प्रत्यक्ष अधिष्ठाता ग्रह हैं: 'अस्थि सारो रविः'। यदि जन्म कुंडली में सूर्य देव नीच राशि में हों, छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हों अथवा राहु-शनि के दुष्प्रभाव से पीड़ित हों, तो उस जातक को जीवन भर हड्डियों के गंभीर रोग, रीढ़ की हड्डी में विकार, गठिया तथा कैल्शियम की कमी का सामना करना पड़ता है।

  • विटामिन डी का प्राकृतिक संश्लेषण: पौष मास में प्रातःकाल 7 से 9 बजे के बीच जब सूर्य की धूप में लालिमा होती है, तब भग आदित्य की किरणों में यूवी-बी किरणों का वह सुरक्षित अनुपात होता है जो त्वचा के नीचे उपस्थित 7-डिहाइड्रोकोलेस्ट्रॉल को सक्रिय विटामिन डी3 में रूपांतरित कर देता है।
  • कैल्शियम का अवशोषण: सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति के बिना आंतें भोजन से कैल्शियम को अवशोषित नहीं कर पातीं। भग आदित्य की उपासना से शरीर का कैल्शियम चयापचय संतुलित होता है, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस और ऑस्टियोमलेशिया जैसे रोग स्वतः समाप्त होने लगते हैं।
  • श्लेषक कफ का संरक्षण: ठंड के कारण जोड़ों के भीतर का चिकना द्रव (साइनोवियल फ्लूइड) गाढ़ा होने लगता है। सूर्य के ताप से शरीर में उपस्थित वात शांत होता है और जोड़ों की गतिशीलता पुनः स्थापित हो जाती है।
  • रक्त वाहिकाओं का विस्फारण: कड़ाके की ठंड से त्वचा और मांसपेशियों की नसें सिकुड़ जाती हैं। सूर्य के अर्घ्य के उपरांत धूप में बैठने से नसों का संकुचन खुलता है, जिससे पूरे शरीर में रक्त और ऑक्सीजन का संचार सुचारु हो जाता है।

पौष मास में नित्य प्रातःकाल तांबे के पात्र से सूर्य को अर्घ्य देकर कम से कम 20 मिनट तक सूर्य की धूप में बैठना और पीठ पर तिल के तेल की मालिश कराना हड्डियों के समस्त असाध्य रोगों की अचूक और बिना किसी व्यय वाली दिव्य औषधि है।


नेत्र विकारों का शमन और चाक्षुषोपनिषद साधना

ऋग्वेद के सुप्रसिद्ध पुरुष सूक्त में उद्घोष किया गया है: 'चक्षोः सूर्यो अजायत' अर्थात विराट पुरुष परमात्मा के नेत्रों से साक्षात सूर्य देव का प्राकट्य हुआ है। अतः समस्त चराचर जगत में नेत्रों के स्वामी, प्रकाश के स्रोत और दृष्टि के नियामक केवल और केवल भगवान सूर्य हैं। आधुनिक जीवनशैली में कंप्यूटर, मोबाइल और डिजिटल पर्दों पर अत्यधिक समय बिताने के कारण आज समाज का हर दूसरा व्यक्ति दृष्टि दोष, आंखों की शुष्कता, धुंधलापन और दृष्टि की क्षीणता से जूझ रहा है।

पौष मास में जब सूर्य की किरणें अत्यंत मृदु और सौम्य होती हैं, तब नेत्र रोगों से मुक्ति पाने का सबसे शक्तिशाली कालखंड उपस्थित होता है। इस मास में चाक्षुषोपनिषद का पाठ तथा तांबे के पात्र से अर्घ्य समर्पण नेत्र विकारों को जड़ से समाप्त करने की चमत्कारी क्षमता रखता है।

नेत्र विकारशास्त्रीय व यौगिक कारणभग आदित्य साधना द्वारा उपचार विधि
नियमविधानविधान
मायोपिया व हाइपरमेट्रोपियानेत्र लेंस की लचीलेपन में कमीजलधारा के मध्य से सूर्य त्राटक, प्रातः अर्घ्य दर्शन
आंखों का सूखापन (ड्राई आईज)वात व पित्त का असंतुलनअर्घ्य का शेष जल हथेलियों में लेकर नेत्रों पर लगाना
मोतियाबिंद की प्रारंभिक अवस्थाकफ का नेत्र पटल पर आवरणचाक्षुषोपनिषद का नित्य 3 बार पाठ, त्रिफला जल प्रक्षालन
दृष्टि में मंदता व धुंधलापनदृष्टि शिराओं में रक्त की कमीउगते सूर्य के सम्मुख 12 बार सूर्य नमस्कार का अभ्यास
आंखों में जलन व लालिमाआंतरिक पित्त का प्रकोपतांबे के लोटे में गुलाब जल व गंगाजल मिलाकर अर्घ्य

अर्घ्य देने के पश्चात लोटे की तली में जो जल की कुछ बूंदें शेष रह जाती हैं, उन बूंदों को अपनी अनामिका और मध्यमा उंगली के पोरों पर लगाकर अत्यंत श्रद्धापूर्वक अपनी दोनों बंद पलकों पर हल्के से स्पर्श कराना चाहिए। इसके साथ ही 'ॐ ह्रीं हंसः सूर्याय नमः' मंत्र का मन ही मन स्मरण करना चाहिए।

यह क्रिया नेत्रों की सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं को तुरंत ऊर्जावान बना देती है। शास्त्रों का यह अटल विश्वास है कि जो साधक पौष मास में नियमपूर्वक सूर्य को अर्घ्य देकर यह क्रिया करता है, उसे जीवन पर्यंत अंधेपन का सामना नहीं करना पड़ता और उसकी नेत्र ज्योति वृद्धावस्था तक सुरक्षित रहती है।


प्रशासनिक बाधाएं, राजकृपा और पिता से संबंधों का सुधार

वैदिक ज्योतिष के महर्षि पराशर सिद्धांत के अनुसार सूर्य देव को समस्त नौ ग्रहों का अधिपति और साक्षात राजा माना गया है। कालपुरुष के सिद्धांत में सूर्य देव पिता, कुल के पूर्वजों, आत्मा, प्रशासनिक सत्ता, राज्य सेवा, मान-सम्मान, पदोन्नति तथा नेतृत्व क्षमता के सर्वोच्च कारक ग्रह हैं।

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में सूर्य देव कमजोर हों, तो उसे जीवन के प्रत्येक कदम पर अपमान, अधिकारियों का कोप, कोर्ट-कचहरी के मुकदमों में पराजय तथा पैतृक संपत्ति के विवादों का सामना करना पड़ता है। विशेष रूप से पिता और पुत्र के मध्य वैचारिक मतभेद, कलह और अलगाव का मूल कारण भी कुंडली में सूर्य और शनि अथवा सूर्य और राहु का अशुभ संबंध होता है। पौष मास में भग आदित्य की उपासना इन समस्त समस्याओं को तत्काल समाप्त करने की अमोघ सामर्थ्य रखती है।

  • प्रशासनिक व सरकारी कार्यों में विजय: जो व्यक्ति सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं, पदोन्नति में रुकावट झेल रहे हैं अथवा जिनके प्रशासनिक कार्य फाइलों में दबे पड़े हैं, उन्हें पौष मास में प्रतिदिन लाल कनेर का पुष्प डालकर सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए। इससे राजसत्ता के अधिष्ठाता देवता प्रसन्न होते हैं।
  • पिता से मधुर संबंध: पिता के स्वास्थ्य की रक्षा और पिता-पुत्र के संबंधों को प्रगाढ़ बनाने के लिए पौष मास में अर्घ्य देने के उपरांत साधक को अपने पिता के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेना चाहिए। यदि पिता जीवित न हों, तो सूर्य को अर्घ्य देते समय अपने पितरों का स्मरण करना चाहिए।
  • झूठे मुकदमों और शत्रु भय से मुक्ति: भग आदित्य की नित्य उपासना साधक के अंतःकरण में अदम्य साहस और आत्मविश्वास का संचार करती है। समाज में उसके विरोधियों का तेज सूर्य के सामने अंधकार की भांति स्वतः समाप्त हो जाता है।
  • व्यावसायिक यश और साख: व्यापार में साख गिर रही हो अथवा साझेदारी में विवाद चल रहा हो, तो सूर्य को गुड़ मिश्रित जल का अर्घ्य देने से व्यापारिक संबंधों में मधुरता आती है और धन का प्रवाह सुगम होता है।

सूर्य आत्मा के कारक हैं, अतः जब साधक का सूर्य बलवान होता है, तो उसका आत्मबल इतना सुदृढ़ हो जाता है कि वह कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सही निर्णय लेने में सक्षम हो जाता है।


पौष मास की संपूर्ण अर्घ्य विधि और तांत्रिक मंत्र अनुष्ठान

पौष मास में भग आदित्य की पूजा का पूर्ण आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त करने के लिए शास्त्रीय नियमों का कठोरता से पालन करना अनिवार्य है। यह साधना केवल जल चढ़ाने की रस्म नहीं है बल्कि यह अपने स्थूल और सूक्ष्म शरीर को सौर ऊर्जा से चार्ज करने का एक अत्यंत वैज्ञानिक अनुष्ठान है।

प्रातःकालीन शुद्धि और पूर्व तैयारी

प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में (सूर्योदय से लगभग 45 मिनट पूर्व) शय्या का त्याग करें। शीतल अथवा हल्के गुनगुने जल से स्नान करें। इस दिन साबुन का अत्यधिक प्रयोग न करें बल्कि उबटन या केवल जल से स्नान उत्तम माना गया है। स्नान के उपरांत स्वच्छ, बिना सिले अथवा धुले हुए शुद्ध लाल, केसरिया अथवा हल्के पीले वस्त्र धारण करें। काले, गहरे नीले या मटमैले रंग के वस्त्र सूर्य पूजा में पूर्णतः वर्जित हैं।

ताम्र पात्र की शुद्धि और अर्घ्य सामग्री का संयोजन

शुद्ध तांबे का एक ऐसा लोटा लें जिसमें कम से कम आधा से एक लीटर जल समा सके। लोटे को भली-भांति स्वच्छ करें। लोटे में ताजा, स्वच्छ पेयजल भरें। अब उस जल में निम्नलिखित सात दिव्य सामग्रियां श्रद्धापूर्वक मिलाएं:

  1. शुद्ध गंगाजल: जल को तीर्थ रूप बनाने के लिए कुछ बूंदें गंगाजल।
  2. रक्त चंदन अथवा कुमकुम: सूर्य देव के वर्ण को तृप्त करने और ओज बढ़ाने के लिए।
  3. अक्षत (अखंडित चावल): जीवन में अखंड संपन्नता और ऐश्वर्य का प्रतीक (चावल टूटा हुआ न हो)।
  4. लाल पुष्प: विशेष रूप से लाल कनेर, गुड़हल अथवा गुलाब का ताजा पुष्प।
  5. शुद्ध देसी गुड़: जठराग्नि को बल देने और सूर्य के मधुर रस को आकर्षित करने के लिए।
  6. काले तिल की एक चुटकी: शनि और राहु के क्रूर दोषों को शांत करने के लिए।
  7. दूर्वा घास के तीन दल: अमृत तत्व का संचार करने और जीवन को अमरता देने के लिए।

अर्घ्य समर्पण की शास्त्रीय क्रियाविधि

खुले आकाश के नीचे, छत पर अथवा बालकनी में पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा अथवा लाल ऊनी आसन पर खड़े हों। दोनों पैरों के बीच थोड़ी दूरी रखें और पंजों के बल थोड़ा सा ऊपर उठें। तांबे के लोटे को अपने दोनों हाथों से पकड़ें। अंगूठे लोटे के किनारे को स्पर्श न करें बल्कि हथेलियों से लोटे को आधार दें।

अब लोटे को अपने मस्तक से लगभग आठ से दस इंच ऊपर उठाएं। इस स्थिति में लोटे को धीरे-धीरे झुकाते हुए जल की एक पतली और अटूट धारा प्रवाहित करें। जलधारा इस प्रकार गिरनी चाहिए कि वह आपके मस्तक और छाती के स्तर से होते हुए नीचे गिरे। अपनी दोनों खुली आंखों से उस गिरती हुई जलधारा के मध्य से सूर्य देव के लाल बिंब का दर्शन करें।

अर्घ्य जल तीन किस्तों में (तीन बार थोड़ा-थोड़ा रोककर) अर्पित किया जाता है। प्रत्येक बार जल गिराते समय निम्नलिखित महामंत्र का सस्वर अथवा स्पष्ट उच्चारण करें:

ॐ भगाय नमः। ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणाय मनोवांछित फलम् देहि देहि स्वाहा॥

यदि यह मंत्र स्मरण न हो, तो वेदों के सर्वोपरि गायत्री महामंत्र का पाठ करते हुए भी अर्घ्य समर्पित किया जा सकता है:

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥

पाद स्पर्श दोष से रक्षा और प्रदक्षिणा विधान

अर्घ्य का जल सीधे पैरों में न लगे, यह इस पूजा का सबसे अनिवार्य नियम है। सूर्य को अर्पित किया गया जल यदि पैरों में लगता है, तो वह पुण्य के स्थान पर पाप का भागी बना देता है। अतः अपने पैरों के आगे तांबे, पीतल अथवा कांसे का एक बड़ा थाल रखें, ताकि पूरा अर्घ्य जल उसी थाल में एकत्र हो। यदि थाल उपलब्ध न हो, तो किसी पवित्र पुष्प क्यारी, तुलसी के गमले अथवा हरी घास पर खड़े होकर अर्घ्य दें।

अर्घ्य समाप्त होने के उपरांत उसी स्थान पर खड़े होकर घड़ी की सुई की दिशा में (Clockwise) तीन बार प्रदक्षिणा करें। प्रदक्षिणा करते समय यह श्लोक पढ़ें:

यानि कानि च पापानि जन्मांतरकृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिण पदे पदे॥

प्रदक्षिणा के पश्चात धरती पर गिरे हुए जल की कुछ बूंदों को अपनी अनामिका उंगली से उठाकर अपने माथे पर तिलक लगाएं, दोनों नेत्रों पर स्पर्श कराएं और कंठ पर लगाएं। थाल में एकत्र हुए जल को किसी पवित्र पौधे (जैसे शमी, तुलसी, आक अथवा केले के वृक्ष) की जड़ में विसर्जित कर दें।


भग आदित्य स्तोत्र और आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ महात्म्य

अर्घ्य समर्पण के उपरांत यदि समय अनुमति दे, तो उसी आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठ जाएं। पौष मास में वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड में वर्णित 'आदित्य हृदय स्तोत्र' का पाठ साक्षात विजय का वरदान माना गया है।

भगवान श्री राम ने लंका के युद्ध क्षेत्र में रावण जैसे महापराक्रमी असुर का वध करने से पूर्व महर्षि अगस्त्य के उपदेश पर इसी स्तोत्र का तीन बार पाठ किया था। यह स्तोत्र मनुष्य के भीतर के भय, निराशा, संशय और मानसिक अवसाद को एक ही क्षण में भस्म कर देता है।

  • त्रिकाल पाठ का फल: पौष मास में प्रतिदिन प्रातःकाल आदित्य हृदय स्तोत्र का तीन बार पाठ करने वाले जातक को संसार की कोई भी शक्ति पराजित नहीं कर सकती।
  • प्रशासनिक मुकदमों में जीत: जो लोग न्यायालय के मुकदमों, संपत्ति के विवादों अथवा शत्रुओं के कुचक्र से परेशान हैं, उनके लिए यह पाठ एक अभेद्य सुरक्षा कवच बन जाता है।
  • हृदय रोगों से सुरक्षा: यह स्तोत्र हृदय की धड़कनों को संतुलित करता है, रक्तचाप को सामान्य रखता है और व्यक्ति को दीर्घायु प्रदान करता है।

इसके साथ ही भग आदित्य की प्रसन्नता के लिए प्रतिदिन 108 बार 'ॐ भगाय नमः' मंत्र का लाल चंदन की माला पर जप करना चाहिए। यह छोटा सा जप जातक के प्रभामंडल को इतना शक्तिशाली बना देता है कि वह जहां भी जाता है, लोग उसके व्यक्तित्व से सम्मोहित हो जाते हैं।


आहार शुद्धि और पौष मास के विशेष सौर नियम

सूर्य पूजा केवल बाह्य क्रियाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह शरीर के भीतर के अग्नि तत्व को शुद्ध रखने का विज्ञान है। पौष मास में आहार के कुछ कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य बताया गया है ताकि शरीर की आंतरिक जठराग्नि सूर्य के तेज के साथ पूर्ण तालमेल बिठा सके।

  • नमक के अत्यधिक सेवन से परहेज: विशेष रूप से रविवार के दिन नमक का पूर्ण त्याग करना अथवा केवल एक समय सेंधा नमक का सेवन करना सूर्य को अत्यधिक बलवान बनाता है।
  • गुड़ और तिल का नित्य सेवन: गुड़ सूर्य का प्रतीक है और तिल शनि का। पौष मास में तिल-गुड़ की पट्टी, तिलकुट अथवा गुड़ की चाय का सेवन शरीर को आंतरिक ऊष्मा देता है और वात विकारों को नष्ट करता है।
  • तांबे के पात्र में रखे जल का सेवन: रात के समय तांबे के जग में जल भरकर रखें और प्रातःकाल उस जल को बासी मुंह पिएं। यह जल शरीर के विषाक्त पदार्थों (टॉक्सिन्स) को बाहर निकालता है और पाचन को तीव्र करता है।
  • तामसिक भोजन का पूर्ण त्याग: इस पावन मास में मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन और बासी अन्न का सेवन करने वाले व्यक्ति की सूर्य पूजा निष्फल हो जाती है। तामसिक भोजन रक्त को दूषित करता है जिससे सूर्य का तेज क्षीण होता है।

आहार की यह शुद्धि साधक के रक्त को निर्मल बनाती है, जिससे सूर्य की किरणों का अवशोषण शरीर की कोशिकाओं द्वारा सबसे तीव्र गति से होता है।


जीवन का समग्र रूपांतरण और भग आदित्य की चिरंतन कृपा

पौष मास में भगवान सूर्य के भग स्वरूप की उपासना वास्तव में मनुष्य को उसकी अपनी अंतरात्मा की दिव्यता से जोड़ने का एक महापर्व है। यह साधना हमें यह सिखाती है कि जीवन की परिस्थितियां चाहे कितनी भी ठंडी, कठोर, अंधकारमय और निराशाजनक क्यों न हों, यदि हमारे भीतर आत्मबल का सूर्य चमक रहा है, तो कोई भी संकट हमें पराजित नहीं कर सकता।

सूर्य देव प्रतिदिन बिना किसी भेद-भाव के संपूर्ण जगत को अपना प्रकाश और ताप बांटते हैं। उनसे यह प्रेरणा लेकर हमें भी अपने जीवन में परोपकार, करुणा और सेवा का प्रकाश फैलाना चाहिए। कड़ाके की ठंड के इस महीने में जरूरतमंदों को गर्म वस्त्र बांटना, असहायों को अन्न देना और मूक पशुओं की रक्षा करना ही भग आदित्य की सच्ची पूजा है।

जो मनुष्य पौष मास की इस पावन अर्घ्य साधना और भग आदित्य के सिद्धांतों को अपने जीवन में उतार लेता है, उसका जीवन ऐश्वर्य, तेज, मान-सम्मान और उत्तम स्वास्थ्य के उस अखंड शिखर पर पहुँच जाता है, जहां कभी पराजय और अंधकार का साया नहीं पड़ता। आइए, हम सब इस पौष मास में प्रातःकाल उठकर भग आदित्य का वंदन करें और अपने जीवन को प्रकाशमय बनाएं।


FAQ

पौष मास में सूर्य देव के किस स्वरूप की पूजा का विधान है? पौष मास में द्वादश आदित्यों में से भगवान सूर्य के 'भग' स्वरूप की पूजा का शास्त्रीय विधान है, जो समग्र ऐश्वर्य और तेज के प्रतीक हैं।

सूर्य को अर्घ्य देने के लिए तांबे का लोटा ही सर्वश्रेष्ठ क्यों माना जाता है? तांबा सूर्य की धातु है और विद्युत व ताप का श्रेष्ठ सुचालक है, जो सौर ऊर्जा को तीव्र गति से अवशोषित करके साधक के शरीर में संतुलित करता है।

पौष मास में सूर्य उपासना से हड्डियों के रोग कैसे शांत होते हैं? सूर्य हड्डियों के अधिष्ठाता ग्रह हैं; इस मास की धूप से त्वचा में विटामिन डी का प्राकृतिक संश्लेषण होता है और कैल्शियम का अवशोषण बढ़कर अस्थि विकार दूर होते हैं।

अर्घ्य देते समय जलधारा के बीच से सूर्य को देखने का क्या लाभ है? जलधारा एक प्रिज्म की भांति कार्य करती है जो सूर्य की किरणों को सात रंगों में बांटती है, जिससे नेत्रों की ज्योति बढ़ती है और पीनियल ग्रंथि सक्रिय होती है।

पिता से मधुर संबंध बनाने के लिए पौष मास में क्या उपाय करना चाहिए? तांबे के पात्र में गुड़, अक्षत और लाल पुष्प डालकर सूर्य को अर्घ्य दें, 'ॐ भगाय नमः' का जप करें और प्रतिदिन अपने पिता के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें।

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लेखक

पं. संजीव शर्मा

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