By पं. अमिताभ शर्मा
सूर्य उपासना, भग आदित्य पूजन, खरमास और आंतरिक ऊर्जा संचय

सनातन काल गणना के वैदिक सिद्धांतों के अनुसार पौष मास हिन्दू वर्ष का दसवां अत्यंत पावन और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण कालखंड माना गया है। लोक भाषा तथा ग्रामीण बोलचाल में इसे पूस का महीना भी कहा जाता है। यह मास प्रकृति के गंभीर संधिकाल का प्रतिनिधित्व करता है, जहां शरद ऋतु की विदाई और हेमंत से शिशिर ऋतु के आगमन का स्पष्ट प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। अंग्रेजी कैलेंडर अर्थात ग्रेगोरियन पंचांग के अनुसार यह कालखंड प्रतिवर्ष दिसंबर के अंतिम सप्ताह से प्रारंभ होकर जनवरी के मध्य तक विस्तृत रहता है।
पौष मास का नामकरण चंद्रमा के पुष्य नक्षत्र में पूर्ण होने के कारण हुआ है। वैदिक ज्योतिष में पुष्य को सभी सत्ताईस नक्षत्रों में राजा का स्थान प्राप्त है। इसे पोषण करने वाला और अमृत प्रदान करने वाला नक्षत्र कहा जाता है। जब चंद्रमा इस नक्षत्र की आभा से युक्त होकर पौष पूर्णिमा का निर्माण करता है, तो संपूर्ण ब्रह्मांड में सात्विक और पोषक ऊर्जा का प्रवाह तीव्र हो जाता है। इस कालखंड में आकाश मंडल में उपस्थित ग्रह और नक्षत्र ऐसी स्थिति में आते हैं जो मानव शरीर के भीतर आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत करने के लिए सबसे अनुकूल मानी जाती है।
| पंचांग तत्व | शास्त्रीय विवरण | दार्शनिक एवं खगोलीय प्रभाव |
|---|---|---|
| नियम | विधान | विधान |
| मास क्रम | सनातन संवत्सर का दशम मास | कर्म और साधना की परिपक्वता का काल |
| अधिष्ठाता देवता | भगवान सूर्य नारायण का भग स्वरूप | ऐश्वर्य, तेज, आरोग्य और आत्मबल की वृद्धि |
| संबंधित नक्षत्र | पुष्य नक्षत्र और पुनर्वसु नक्षत्र | पोषण, स्थिरता और आध्यात्मिक ज्ञान का जागरण |
| ऋतु चक्र | हेमंत ऋतु का अवसान एवं शिशिर का प्राकट्य | बाह्य शीतलता और आंतरिक ऊर्जा का संरक्षण |
| खगोलीय घटना | धनु राशि से मकर राशि में सूर्य का संक्रमण | दक्षिणायन का समापन और उत्तरायण का शुभारंभ |
| मुख्य साधना माध्यम | तांबे के पात्र से सूर्य अर्घ्य, गायत्री जप, तिल दान | पितृ तृप्ति, पाप क्षय और नवग्रह शांति |
| प्रमुख आध्यात्मिक संकल्प | सात्विक आहार, ब्रह्म मुहूर्त जागरण और तीर्थ स्नान | ओज की वृद्धि और अंतःकरण की निर्मलता |
| संबंधित धातु | ताम्र अर्थात तांबा और स्वर्ण | सौर ऊर्जा का अवशोषण और जैव विद्युत संतुलन |
| प्रमुख व्रत श्रृंखला | सफला एकादशी, पौष पुत्रदा एकादशी और पौष पूर्णिमा | संकल्प सिद्धि, वंश रक्षा और मोक्ष प्राप्ति |
इस मास के दौरान जब मनुष्य अपने दैनिक कार्यों को पंचांग के नियमों के अनुसार व्यवस्थित करता है, तो उसे न केवल मानसिक शांति की अनुभूति होती है बल्कि उसके पारिवारिक और सामाजिक जीवन में भी स्थिरता का समावेश होता है। प्राचीन ऋषियों ने इस महीने को आत्म संयम और तपस्या के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता दी थी, क्योंकि इस समय का वातावरण सांसारिक वासनाओं से मुक्त होकर ब्रह्म चिंतन में लीन होने के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।
पौराणिक संहिताओं और महाभारत के अनुशासन पर्व में पौष मास की महिमा का अत्यंत विशद वर्णन मिलता है। इस मास को मुख्य रूप से भगवान सूर्य देव का मास माना गया है। वैदिक परंपरा के अनुसार वर्ष के बारह महीनों में सूर्य देव बारह अलग अलग स्वरूपों में तपते हैं, जिन्हें द्वादश आदित्य कहा जाता है। पौष मास में सूर्य देव के भग स्वरूप की पूजा का विधान शास्त्रों में प्रतिष्ठित है।
भग का शाब्दिक अर्थ ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य से परिपूर्ण दिव्य सत्ता है। जब मनुष्य पौष मास में सूर्य नारायण के भग स्वरूप का ध्यान करता है, तो उसके भीतर का अज्ञान, आलस्य और शारीरिक दुर्बलता जलकर भस्म हो जाती है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार प्राचीन काल में महर्षि कश्यप और माता अदिति के तप से प्रसन्न होकर जब सूर्य देव प्रकट हुए, तब उन्होंने जगत के पालन पोषण का भार इसी मास में विशेष रूप से स्वीकार किया था।
सूर्य देव केवल एक खगोलीय तारा नहीं हैं बल्कि वे प्रत्यक्ष देवता हैं जिनके दर्शन प्रतिदिन सुलभ होते हैं। पौष मास में जब सूर्य की किरणें मंद और शीतल होने लगती हैं, तब उनके तेज का सत्कार करना मनुष्य के लिए अत्यंत आवश्यक हो जाता है। जब साधक प्रातःकाल हाथ जोड़कर सूर्य नारायण का वंदन करता है, तो उसका अंतःकरण एक दिव्य प्रकाश से भर जाता है।
हेमंत और शिशिर ऋतु के इस संधिकाल में बाह्य वातावरण में ठंड अपने चरम पर पहुँच जाती है। प्रकृति की इस बाह्य शीतलता का मानव शरीर की आंतरिक जैविक प्रणाली पर अत्यंत गहरा और प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। आयुर्वेद के महान ग्रंथों चरक संहिता और अष्टांग हृदयम में इस कालखंड की शारीरिक क्रियाविधि का सूक्ष्म वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है।
सर्दियों के इस मौसम में जब बाहर का तापमान गिरता है, तो मानव त्वचा के सूक्ष्म रोमछिद्र ठंड के प्रभाव से संकुचित हो जाते हैं। इस संकुचन के कारण शरीर की आंतरिक ऊष्मा बाहर नहीं निकल पाती और वह पेट के भीतर केंद्रित हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप मनुष्य की जठराग्नि अत्यंत तीव्र और प्रदीप्त हो जाती है।
| शारीरिक परिवर्तन | आयुर्वेदिक सिद्धांत | स्वास्थ्य रक्षक उपाय |
|---|---|---|
| नियम | विधान | विधान |
| जठराग्नि की तीव्रता | आंतरिक ऊष्मा का उदर में संचय | तिल, गुड़, घी और पौष्टिक अन्न का सेवन |
| त्वचा का रूखापन | बाह्य शीत वायु द्वारा नमी का शोषण | तिल या सरसों के तेल से नित्य अभ्यंग मालिश |
| वात और कफ का असंतुलन | तापमान में भारी गिरावट का प्रभाव | सोंठ, अजवाइन, मेथी और उष्ण जल का उपयोग |
| आलस्य और निद्रा की अधिकता | तमोगुण और शीत का प्रभाव | ब्रह्म मुहूर्त में जागरण और सूर्य नमस्कार |
| रक्त संचार में मंदता | रक्त वाहिकाओं का संकुचन | प्रातःकालीन धूप का सेवन और शारीरिक योग |
| अस्थि एवं संधि पीड़ा | वात दोष का जोड़ों में संचय | दशमूल क्वाथ और तिल तेल का प्रयोग |
| श्वास नलिकाओं का संकोच | कफ का छाती में जमाव | तुलसी, काली मिर्च और अदरक का काढ़ा |
जब जठराग्नि प्रबल होती है, तब शरीर को ऐसे आहार की आवश्यकता होती है जो पचने में भारी हो और लंबे समय तक ऊर्जा दे सके। यदि इस समय शरीर को उचित और पौष्टिक आहार न दिया जाए, तो वह बढ़ी हुई अग्नि शरीर के अपने ही धातुओं को सुखाने लगती है। इसलिए हमारे मनीषियों ने पौष मास में तिल, गुड़, बाजरा, मक्का, उड़द और शुद्ध गाय के घी से बने व्यंजनों के सेवन का शास्त्रीय नियम बनाया था।
पौष मास खगोलीय दृष्टि से एक युगांतकारी परिवर्तन का साक्षी बनता है। सनातन धर्म में काल को दो मुख्य आयनों में विभाजित किया गया है, दक्षिणायन और उत्तरायण। दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि माना जाता है, जिसमें सूर्य देव दक्षिण गोलार्ध की ओर यात्रा करते हैं, जबकि उत्तरायण को देवताओं का दिन माना जाता है।
पौष मास के उत्तरार्ध में जब सूर्य देव धनु राशि की अपनी यात्रा समाप्त करके मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस पावन क्षण को मकर संक्रांति कहा जाता है। मकर संक्रांति के साथ ही सूर्य का उत्तरायण प्रारंभ हो जाता है। इस मास का संपूर्ण पूर्वार्ध एक प्रकार से उत्तरायण के स्वागत की आध्यात्मिक तैयारी है।
पौष मास हमें यह सिखाता है कि जीवन में चाहे कितना भी घना शीत और अंधकार क्यों न हो, प्रकाश और ऊष्मा का आगमन अटल है। जब मनुष्य इस सत्य को अपने जीवन में उतार लेता है, तो वह हर प्रकार के संकट का सामना धैर्य और प्रसन्नता के साथ करने में सक्षम हो जाता है।
पौष मास का अधिकांश भाग खरमास अथवा धनुर्मास के अंतर्गत आता है। जब सूर्य देव देवगुरु बृहस्पति की राशि धनु में संचरण करते हैं, तो सनातन पंचांग के अनुसार विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन और नए व्यापार की शुरुआत जैसे समस्त लौकिक मांगलिक कार्य पूर्ण रूप से वर्जित हो जाते हैं।
सामान्य दृष्टि से लोग इसे एक अशुभ समय समझ लेते हैं, परंतु वैदिक दर्शन में इसका अत्यंत गूढ़ और सकारात्मक अर्थ है। सूर्य आत्मा है और गुरु ज्ञान है। जब आत्मा ज्ञान की राशि में प्रवेश करती है, तो वह समय बाह्य उत्सवों और सांसारिक दिखावे का नहीं बल्कि आत्म चिंतन, ध्यान, अध्ययन और ईश्वर के साथ एकाकार होने का होता है।
खरमास हमें यह स्मरण कराता है कि केवल बाहरी उपलब्धियां ही जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं हैं बल्कि आंतरिक शांति और आत्मिक विकास ही वास्तविक उपलब्धि है। जो व्यक्ति इस समय का सदुपयोग अपनी साधना में करता है, वह खरमास समाप्त होते ही एक नवीन तेज और आत्मविश्वास के साथ समाज में उभरता है।
पौष मास में अपने जीवन को पवित्र और ओजस्वी बनाने के लिए साधक को एक निश्चित दैनिक साधना क्रम का पालन करना चाहिए। इस मास में सूर्य नारायण को दिया गया एक लोटा जल मनुष्य के भाग्य के बंद कपाट खोल सकता है।
प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में शय्या का त्याग करना चाहिए। इसके पश्चात शीतल अथवा सुखोष्ण जल से स्नान करके लाल अथवा पीले स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। एक शुद्ध तांबे के लोटे में ताजा जल भरें। उस जल में थोड़ा सा कुमकुम, रक्त चंदन, लाल कनेर अथवा गुड़हल का पुष्प, अक्षत और थोड़ा सा शुद्ध देसी गुड़ मिलाएं।
दोनों हाथों को अपने मस्तक से ऊपर उठाकर पूर्व दिशा की ओर मुख करें। गिरती हुई जलधारा के मध्य से सूर्य देव के लाल बिंब का दर्शन करते हुए तीन बार में पूरा जल अर्पित करें। अर्घ्य देते समय ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणाय मनोवांछित फलम् देहि देहि स्वाहा अथवा गायत्री मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करना चाहिए।
यह साधना मनुष्य के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ करती है और उसके प्रभामंडल को सोने के समान चमकदार बना देती है। जो साधक इस नियम का पूरे महीने पालन करता है, उसका चेहरा एक अलौकिक तेज से चमकने लगता है।
पौष मास को पितरों की शांति और मुक्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है। शास्त्रों में इस मास को छोटा पितृपक्ष भी कहा जाता है। इस महीने में किए गए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से पूर्वज अत्यंत प्रसन्न होते हैं और अपने वंशजों को दीर्घायु, ऐश्वर्य और शांति का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
दान देते समय मन में तनिक भी अहंकार नहीं होना चाहिए। यह भावना रखनी चाहिए कि ईश्वर द्वारा दी गई वस्तुओं में से एक छोटा सा अंश समाज के वंचित वर्ग को समर्पित किया जा रहा है। जब इस निष्काम भाव से दान किया जाता है, तो उसका पुण्य फल कई पीढ़ियों तक बना रहता है।
पौष मास में अनेक महत्वपूर्ण व्रत और पर्व आते हैं जो मानव जीवन को आध्यात्मिक दिशा प्रदान करते हैं। यह महीना केवल व्यक्तिगत साधना का नहीं बल्कि सामूहिक भक्ति और उत्सव का भी समय है।
यह सभी व्रत मनुष्य को सांसारिक मोह से ऊपर उठाकर ईश्वरीय चेतना के साथ जोड़ने का माध्यम बनते हैं। प्रत्येक व्रत के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक उद्देश्य छिपा होता है जो साधक के जीवन को व्यवस्थित करता है।
पौष का यह पवित्र महीना मनुष्य को प्रकृति के अनुशासन में बंधकर जीना सिखाता है। जब हम अपनी दिनचर्या को सूर्य के उदय और अस्त के साथ जोड़ लेते हैं, तो हमारे शरीर की जैविक घड़ी ब्रह्मांड की घड़ी के साथ तालमेल बिठा लेती है।
यह मास केवल एक कालखंड नहीं है बल्कि यह अपने खान पान को परिष्कृत करने, अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखने, ज्ञान के स्वाध्याय में समय बिताने और परोपकार के द्वारा अपने संचित कर्मों को धोने का एक स्वर्णिम अवसर है। जो मनुष्य पौष मास की इस शास्त्रीय मर्यादा का पालन करता है, उसका शरीर एक अभेद्य दुर्ग की भांति निरोगी बन जाता है और उसकी आत्मा में दिव्य शांति का प्रकाश फैल जाता है।
आइए हम सब इस पावन मास में सूर्य नारायण की उपासना करें, शीत से पीड़ित जीवों की सेवा करें और अपने अंतःकरण में ज्ञान की अखंड ज्योति प्रज्वलित करके अपने जीवन को सार्थक बनाएं। यह साधना ही हमारे जीवन को अज्ञान के अंधकार से निकालकर अमरता के परम प्रकाश की ओर ले जाएगी।
पौष मास को सूर्य देव का महीना क्यों कहा जाता है? पौष मास में सूर्य देव के भग स्वरूप की उपासना की जाती है जो ऐश्वर्य और तेज प्रदान करते हैं, इसलिए इसे सूर्य का पावन मास माना गया है।
अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार पौष मास कब से कब तक पड़ता है? यह मास सामान्यतः प्रतिवर्ष दिसंबर के अंतिम सप्ताह से प्रारंभ होकर जनवरी के मध्य अर्थात मकर संक्रांति के समय तक रहता है।
पौष मास में विवाह और गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य क्यों नहीं होते? इस मास में सूर्य देव धनु राशि में गोचर करते हैं जिससे खरमास लग जाता है, इस अवधि में गुरु का तेज क्षीण होने से मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं।
पौष के महीने में सूर्य को अर्घ्य देते समय तांबे के लोटे में क्या मिलाना चाहिए? जल में थोड़ा सा लाल चंदन, कुमकुम, अक्षत, गुड़ और लाल पुष्प मिलाकर सूर्य देव को अर्घ्य देना सबसे उत्तम माना गया है।
इस महीने में किन वस्तुओं का दान करने से सबसे अधिक पुण्य मिलता है? पौष मास में काले तिल, गुड़, ऊनी वस्त्र, कंबल, जूते और गर्म खिचड़ी का दान करने से पितृ तृप्त होते हैं और नवग्रह शांत होते हैं।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 20
इनसे पूछें: Family Planning, Career
इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें
WELCOME TO
Right Decisions at the right time with ZODIAQ