पौष पूर्णिमा और शाकंभरी जयंती का क्या महत्व है?

By पं. संजीव शर्मा

अन्नपूर्णा दर्शन, पुष्कर स्नान, सत्यनारायण कथा और चंद्र अर्घ्य

पौष पूर्णिमा 2026: शाकंभरी जयंती, पूजा विधि और चंद्र अर्घ्य

सामग्री तालिका

पौष पूर्णिमा और शाकंभरी जयंती का शास्त्रीय परिचय

सनातन काल गणना के वैदिक पंचांग के अनुसार पौष मास के शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि को 'पौष पूर्णिमा' कहा जाता है। यह पावन तिथि संवत्सर चक्र के सर्वाधिक आध्यात्मिक और खगोलीय रूप से जागृत दिनों में से एक मानी जाती है। इसी परम पावन तिथि पर जगत कल्याणी पराशक्ति माँ जगदम्बा के 'शाकंभरी' अवतार का जन्मोत्सव अर्थात 'शाकंभरी जयंती' का महापर्व संपूर्ण भारतवर्ष में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। पौष पूर्णिमा केवल एक तिथि का समापन नहीं है बल्कि यह पौष मास के गहन आत्म संयम, शीतकालीन तपस्या और अन्न-जल की सुरक्षा के संकल्प की पूर्णता का प्रतीक है।

इस दिन आकाश मंडल में चंद्रमा अपनी संपूर्ण सोलह कलाओं से युक्त होकर समस्त सत्ताईस नक्षत्रों के राजा 'पुष्य नक्षत्र' के प्रभाव में विराजमान रहता है। चंद्रमा का अपने स्वराशि स्वामी नक्षत्र संयोग और पूर्ण कलाओं से संपन्न होना जल तत्व, औषधियों और मानव मन पर अमृतमयी वर्षा करता है। धर्मशास्त्रों, मत्स्य पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार पौष पूर्णिमा के दिन तीर्थ स्नान, सत्यनारायण कथा श्रवण, काशी में माँ अन्नपूर्णा के दर्शन तथा कच्चे दूध से चंद्र अर्घ्य देने से जातक के जन्म-जन्मांतर के मानसिक संताप, शारीरिक व्याधियां और दरिद्रता का समूल नाश हो जाता है।

अनुष्ठानिक आयामशास्त्रीय विवरण एवं नियमआध्यात्मिक व व्यावहारिक प्रतिफल
प्रधान तिथिपौष मास शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तिथिमानसिक शांति, अकाल मृत्यु भय नाश और सर्वसिद्धि
मुख्य जयंती उत्सवभगवती शाकंभरी जयंती (शताक्षी प्राकट्य)अन्न-जल संकट मुक्ति, आरोग्य और धन-धान्य वृद्धि
खगोलीय नक्षत्र स्थितिपुष्य नक्षत्र और कर्क राशि का चंद्रमामन का परम पोषण, भावनात्मक स्थिरता और ओज वृद्धि
प्रधान तीर्थ केंद्रकाशी (अन्नपूर्णा मंदिर), पुष्कर और प्रयागराजअश्वमेध यज्ञ समान पुण्य और जन्म-मरण चक्र से मुक्ति
मुख्य देव अनुष्ठानसत्यनारायण कथा, शिवलिंग पर कच्चा दूध, चंद्र पूजापरिवार में सुख-समृद्धि, वास्तु शुद्धि और शिव कृपा
प्रधान भोग सामग्री60 प्रकार की हरी सब्जियां, कंदमूल, फल और खीरत्रिदोष शमन, कुपोषण निवारण और अंतःकरण शुद्धि
प्रमुख चंद्र अर्घ्य द्रव्यतांबे अथवा चांदी के पात्र में कच्चा दूध, जल, अक्षतअनिद्रा, अवसाद, नेत्र विकार और रक्त शुद्धि
दान महात्म्यकाले तिल, देसी गुड़, गर्म वस्त्र और नए अन्न का दाननवग्रह शांति, पितृ तृप्ति और अक्षय पुण्य संचय

पौष पूर्णिमा के पावन संधिकाल पर किया गया एक भी सात्विक कर्म सहस्र गुना होकर फलित होता है। यह दिन प्रकृति के साथ एकाकार होने, अपनी मूल जड़ों की ओर लौटने और अन्न-जल के प्रति अपनी अगाध कृतज्ञता व्यक्त करने का स्वर्णिम अवसर प्रदान करता है।


काशी में माँ अन्नपूर्णा का दिव्य दर्शन और शाक उत्सव का रहस्य

भगवान शिव की शाश्वत नगरी काशी (वाराणसी) में पौष पूर्णिमा का धार्मिक उल्लास अपने चरम पर होता है। काशी के सुप्रसिद्ध श्री माँ अन्नपूर्णा मंदिर में इस पावन तिथि पर भव्य 'शाक उत्सव' का आयोजन किया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जब पृथ्वी पर अन्न-जल का घोर अकाल पड़ा था और समस्त प्राणी त्राहि-त्राहि कर रहे थे तब माँ पार्वती ने अन्नपूर्णा और शाकंभरी का स्वरूप धारण करके अपने ही विग्रह से समस्त वनस्पतियां और अन्न प्रकट किए थे।

काशी में इस दिन माँ अन्नपूर्णा के स्वर्ण विग्रह अथवा मूल प्रतिमा को नाना प्रकार की हरी सब्जियों, फल-फूलों और कंदमूल से सजाया जाता है। संपूर्ण गर्भगृह और मंदिर प्रांगण हरी सब्जियों की अद्भुत छटा से हरा-भरा दिखाई देता है।

  • भगवान विश्वनाथ को भिक्षा दान: काशी खंड के अनुसार स्वयं देवाधिदेव महादेव ने संसार के भरण-पोषण और काल की क्षुधा शांत करने के लिए माँ अन्नपूर्णा के सम्मुख भिक्षुक बनकर अपनी झोली फैलाई थी। पौष पूर्णिमा के दिन जो श्रद्धालु काशी में माँ अन्नपूर्णा के दर्शन करता है, उसके घर में कभी अन्न और धन का अभाव नहीं रहता।
  • सब्जियों का दिव्य भोग: इस दिन मंदिर में तोरई, लौकी, पालक, मेथी, बथुआ, गाजर, मूली, फूलगोभी, शिमला मिर्च, कंदमूल और मौसमी फलों के पहाड़ रूपी भोग लगाए जाते हैं। पूजा के उपरांत यह समस्त सामग्री भक्तों और दीन-दुखियों में महाप्रसाद के रूप में वितरित की जाती है।
  • दरिद्रता का समूल नाश: इस दिन माँ अन्नपूर्णा के दर्शन करने मात्र से व्यक्ति के संचित प्रारब्ध के दरिद्र योग नष्ट हो जाते हैं और उसके कार्यक्षेत्र में निरंतर समृद्धि का प्रवाह बना रहता है।

पुष्कर सरोवर में महास्नान का पौराणिक और तात्विक माहात्म्य

राजस्थान के अजमेर के निकट स्थित 'पुष्कर राज' को सनातन संस्कृति में समस्त तीर्थों का राजा (तीर्थराज) माना गया है। पद्म पुराण के सृष्टि खंड के अनुसार, भगवान ब्रह्मा ने संपूर्ण पृथ्वी पर केवल पुष्कर में ही अपना प्रधान यज्ञ संपन्न किया था। पौष पूर्णिमा के दिन पुष्कर सरोवर में स्नान करने का महत्व शास्त्रों में अवर्णनीय बताया गया है।

मान्यता है कि पौष पूर्णिमा के दिन ब्रह्म मुहूर्त में ब्रह्मा जी, समस्त तैंतीस कोटि देवता और पवित्र नदियां पुष्कर के पावन जल में सूक्ष्म रूप से उपस्थित रहती हैं।

तीर्थ स्नान केंद्रशास्त्रीय मान्यता एवं पृष्ठभूमिआध्यात्मिक व शारीरिक प्रतिफल
पुष्कर राज सरोवरभगवान ब्रह्मा की यज्ञस्थली और कमल पत्र का प्राकट्यतीनों तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक) का समूल निवारण
प्रयागराज त्रिवेणीकल्पवास का औपचारिक आरंभ और गंगा-यमुना संगमएक सहस्र अश्वमेध यज्ञों के अनुष्ठान के समान पुण्य
काशी दशाश्वमेधभगवान विश्वनाथ और माँ अन्नपूर्णा की पावन छत्रछायापितरों की मुक्ति, मोक्ष प्राप्ति और आरोग्य का वरदान
गंगासागर संगममहर्षि कपिल के आश्रम में साठ हजार सगर पुत्रों का उद्धारपुनर्जन्म के बंधनों से मुक्ति और पाप संस्कारों का क्षय

पुष्कर के पावन जल में डुबकी लगाने से पूर्व हाथ में कुश और काले तिल लेकर देवताओं, ऋषियों और पितरों का तर्पण करना चाहिए। ऐसा करने से जातक को ब्रह्मलोक की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है और उसके कुल की कई पीढ़ियों के पूर्वज परम शांति को प्राप्त होते हैं।


पुष्य नक्षत्र और चंद्रमा की 16 कलाओं का खगोलीय विज्ञान

पौष पूर्णिमा की रात्रि खगोल विज्ञान और शरीर क्रिया विज्ञान दोनों ही दृष्टियों से अत्यंत दुर्लभ और प्रभावशाली मानी जाती है। इस तिथि पर चंद्रमा पृथ्वी के सर्वाधिक निकट होता है और अपने पूर्ण गुरुत्वाकर्षण तथा श्वेत प्रकाश के साथ चमकता है। पुष्य नक्षत्र समस्त सत्ताईस नक्षत्रों में सबसे अधिक पोषणकारी और अमृत प्रदान करने वाला नक्षत्र है।

ऋग्वेद के अनुसार पुष्य नक्षत्र देवगुरु बृहस्पति का साक्षात प्रतीक है और इसके स्वामी कर्मफलदाता शनि देव हैं। जब चंद्रमा पुष्य नक्षत्र में स्थित होकर अपनी सोलह कलाओं का अमृत बरसाता है, तो पृथ्वी पर उपस्थित समस्त वनस्पतियों, औषधीय पौधों और जल स्रोतों में प्राण शक्ति का संचार कई गुना तीव्र हो जाता है।

  • मानव मस्तिष्क और जल तत्व का संतुलन: मानव मस्तिष्क और शरीर में लगभग सत्तर प्रतिशत से अधिक जल तत्व विद्यमान है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की विद्युत-चुंबकीय तरंगें सीधे मानव तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती हैं। पुष्य नक्षत्र की शांति मन की चंचलता, हिस्टीरिया, अत्यधिक तनाव और अवसाद को पूरी तरह शांत कर देती है।
  • औषधीय गुणों की वृद्धि: आयुर्वेद के अनुसार इस रात्रि में खुले आकाश के नीचे रखी गई औषधियां, जड़ी-बूटियां और खीर अमृत के समान गुणकारी हो जाती हैं। जो व्यक्ति इस ऊर्जा का अवशोषण करता है, उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता असाधारण रूप से बढ़ जाती है।
  • भावनात्मक स्थिरता और आत्मबल: चंद्रमा मन का कारक ग्रह है ('चंद्रमा मनसो जातः')। पुष्य नक्षत्र में पूर्ण चंद्र का ध्यान करने से व्यक्ति के भीतर सकारात्मक विचारों का उदय होता है और उसकी निर्णय क्षमता अत्यंत परिपक्व हो जाती है।

भगवान सत्यनारायण की पावन कथा और पूजन विधान

पौष पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की पूजा और कथा श्रवण का विधान सनातन घरों में अत्यंत लोकप्रिय और कल्याणकारी है। स्कंद पुराण के रेवा खंड में वर्णित सत्यनारायण व्रत कथा मनुष्य को यह सिखाती है कि कलियुग में केवल सत्य का आचरण करना और प्रभु का नाम संकीर्तन करना ही सबसे बड़ा यज्ञ है।

पूजन सामग्री और मंडप सज्जा

प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत्त हों। पूजा गृह में एक स्वच्छ काष्ठ की चौकी स्थापित करें और उस पर पीला रेशमी वस्त्र बिछाएं। चौकी के चारों कोनों पर केले के चार खंभे बांधकर एक सुंदर मंडप का निर्माण करें। चौकी के मध्य में अक्षत से अष्टदल कमल बनाएं और उस पर तांबे अथवा पीतल का मंगल कलश स्थापित करें। कलश पर आम्र पल्लव और नारियल रखें। कलश के सम्मुख भगवान सत्यनारायण की प्रतिमा अथवा शालिग्राम शिला और माता लक्ष्मी को विराजमान करें।

विशेष नैवेद्य: सपाद भक्ष्य (पंजरी और पंचामृत)

सत्यनारायण भगवान की पूजा में 'सपाद भक्ष्य' अर्थात सवा के अनुपात में बना प्रसाद अर्पित करने का शास्त्रीय नियम है:

  • सवा पाव भुना हुआ गेहूं का आटा, सवा पाव शुद्ध देसी घी और सवा पाव पिसी हुई मिश्री या शर्करा मिलाकर बनाई गई पंजरी।
  • इस पंजरी में कटे हुए केले, पंचमेवा (काजू, बादाम, किशमिश, मखाना, अखरोट) और प्रचुर मात्रा में तुलसी पत्र मिलाएं।
  • इसके साथ ही गाय के कच्चे दूध, दही, घी, शहद और शर्करा से बना पंचामृत तैयार करें।
पूजन क्रमशास्त्रीय उपचार एवं विधिआध्यात्मिक भाव एवं उद्देश्य
प्रथमपाद्य, अर्घ्य और आचमनप्रभु के श्रीचरणों का पवित्र जल और गुलाब जल से प्रक्षालन
द्वितीयपंचामृत व केसर स्नानभगवान शालिग्राम का अभिषेक और पाप विकारों का शमन
तृतीयपीतांबर और यज्ञोपवीत अर्पणसात्विक चेतना, मर्यादा और ब्रह्मतेज का वरण
चतुर्थगोपीचंदन व तुलसी मंजरीप्रभु के मस्तक पर शीतल तिलक और असीम भक्ति का अर्पण
पंचमकथा श्रवण व पंच अध्याय पाठसत्य के मार्ग पर चलने का संकल्प और संशयों का नाश
षष्ठसपाद भक्ष्य नैवेद्य समर्पणजीवन में पूर्णता, मधुरता और लक्ष्मी नारायण कृपा
सप्तममहाआरती और शंख ध्वनिअज्ञान रूपी अंधकार का नाश और घर में मंगल प्रवेश

कथा समाप्त होने के उपरांत सभी उपस्थित भक्तों में चरणामृत और पंजरी का प्रसाद वितरित करें। जो साधक पौष पूर्णिमा पर यह कथा सुनता है, उसके अटके हुए व्यापारिक और पारिवारिक कार्य तत्काल सिद्ध होते हैं।


शिवलिंग पर कच्चा दूध अर्पण और मानसिक संताप मुक्ति

पौष पूर्णिमा के दिन देवाधिदेव महादेव की आराधना का अत्यंत अलौकिक महत्व है। भगवान शिव ने स्वयं अपने मस्तक पर चंद्रमा को धारण किया हुआ है, जिसे 'चंद्रशेखर' स्वरूप कहा जाता है। यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में चंद्रमा नीच का हो, राहु-केतु के साथ ग्रहण दोष बना रहा हो, अथवा जातक निरंतर अज्ञात भय, फोबिया, डिप्रेशन और अनिद्रा से जूझ रहा हो, तो इस दिन शिवलिंग पर विशेष अभिषेक करना चाहिए।

  • कच्चे गोदुग्ध से रुद्राभिषेक: प्रातःकाल किसी प्राचीन शिवालय में जाकर तांबे के अतिरिक्त चांदी, कांसे अथवा पीतल के लोटे में देसी गाय का कच्चा (बिना उबला) दूध भरें। उसमें थोड़ा सा गंगाजल, मिश्री, श्वेत चंदन और काले तिल मिलाएं।
  • महामृत्युंजय मंत्र का उच्चारण: शिवलिंग पर दूध की अत्यंत पतली और अविरल धार छोड़ते हुए निरंतर 'ॐ नमः शिवाय' अथवा महामृत्युंजय मंत्र का सस्वर जप करें।
  • बिल्वपत्र और अक्षत अर्पण: अभिषेक के उपरांत शिवलिंग पर ग्यारह बिना कटे-फटे बिल्वपत्र और अखंडित श्वेत अक्षत अर्पित करें। इसके पश्चात भगवान शिव से अपने मानसिक विकारों, तनाव और अशांति को दूर करने की विनम्र प्रार्थना करें।

यह अभिषेक जातक की सुषुम्ना नाड़ी में शीतलता प्रदान करता है, मस्तिष्क की तंत्रिकाओं को शांत करता है और कुंडली के समस्त चंद्र दोषों को तत्काल निष्प्रभावी बना देता है।


चंद्र अर्घ्य की संपूर्ण शास्त्रीय विधि और औषधीय लाभ

पौष पूर्णिमा की रात्रि में जब पूर्ण चंद्रमा आकाश के मध्य में उदित हो जाए (सामान्यतः रात्रि 8 से 10 बजे के मध्य) तब चंद्रमा को अर्घ्य देना एक अत्यंत चमत्कारी और स्वास्थ्यवर्धक साधना मानी जाती है।

अर्घ्य सामग्री का संयोजन

एक शुद्ध चांदी अथवा कांसे के पात्र में शीतल पेयजल भरें। उस जल में निम्नलिखित सामग्रियां श्रद्धापूर्वक मिलाएं:

  1. देसी गाय का कच्चा दूध: दो चम्मच दूध शीतलता और मातृत्व ऊर्जा का संवाहक है।
  2. अक्षत (साबुत चावल): चंद्रमा का मुख्य धान्य जो स्थिरता का प्रतीक है।
  3. श्वेत चंदन अथवा कर्पूर: मानसिक शीतलता और सुगंध के लिए।
  4. श्वेत पुष्प: सफेद कनेर, चमेली अथवा मोगरे के पुष्प।
  5. मिश्री के कुछ दाने: जीवन में मधुरता और ऊर्जा संवर्धन के लिए।

अर्घ्य देने की विधि

खुले आकाश के नीचे, छत अथवा बालकनी में खड़े होकर अपना मुख चंद्रमा की दिशा में करें। अपने दोनों हाथों को सिर से ऊपर उठाएं और पात्र को धीरे-धीरे झुकाते हुए जल की एक पतली धारा प्रवाहित करें। उस गिरती हुई श्वेत जलधारा के मध्य से अपनी खुली आंखों से पूर्ण चंद्रमा के बिंब का दर्शन करें।

अर्घ्य समर्पित करते समय निम्नलिखित मंत्र का तीन बार स्पष्ट उच्चारण करें:

ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्त्वाय धीमहि तन्नो चन्द्रः प्रचोदयात्॥
ॐ सों सोमाय नमः॥

चंद्र दर्शन के शारीरिक और नेत्र लाभ

  • नेत्र ज्योति का संवर्धन: गिरती हुई दुग्ध मिश्रित जलधारा से जब चंद्रमा की शीतल किरणें छनकर आंखों की पुतलियों पर पड़ती हैं, तो इससे आंखों की नसें शिथिल होती हैं, आंखों का सूखापन (ड्राई आईज) दूर होता है और दृष्टि में प्रखरता आती है।
  • अनिद्रा और सिरदर्द से मुक्ति: अर्घ्य के उपरांत भूमि पर गिरे जल की कुछ बूंदों को अपनी अनामिका उंगली से उठाकर अपने दोनों नेत्रों, माथे के मध्य (आज्ञा चक्र) और कंठ पर स्पर्श कराएं। यह क्रिया मस्तिष्क में मेलाटोनिन हार्मोन के स्तर को संतुलित करके गहरी और शांत निद्रा प्रदान करती है।
  • महिलाओं के हार्मोनल चक्र का संतुलन: चंद्रमा स्त्रीत्व और प्रजनन चक्र का नियामक है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की सीधी किरणों में 15 से 20 मिनट बैठने से महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़े विकार और हार्मोनल असंतुलन प्राकृतिक रूप से ठीक होने लगते हैं।

पौष पूर्णिमा के अचूक दान और पुण्य संचय के नियम

धर्मशास्त्रों में पौष पूर्णिमा को दान का महाकुंभ कहा गया है। शीत ऋतु का चरम काल होने के कारण इस दिन दिए गए गर्म और पोषक पदार्थों का दान कई पीढ़ियों तक पुण्य फल प्रदान करता है।

  • काले तिल और देसी गुड़ का दान: इस दिन सवा किलो काले तिल और सवा किलो देसी गुड़ का दान किसी जरूरतमंद, साधु अथवा मंदिर में करने से सूर्य और शनि दोनों ग्रहों के दोष एक साथ शांत होते हैं।
  • ऊनी वस्त्र और कंबलों का वितरण: खुले में सोने वाले निर्धनों, कुष्ठ रोगियों अथवा अनाथालयों में गर्म ऊनी कंबल, स्वेटर और जूते-चप्पल दान करना साक्षात नारायण की सेवा के समान फल देता है।
  • चावल और दूध का दान: चंद्र ग्रह को परम बली बनाने के लिए किसी वृद्ध स्त्री अथवा योग्य ब्राह्मण को नए चावल, गाय का दूध और श्वेत वस्त्र दान करें।
  • खिचड़ी और अन्न क्षेत्र में सेवा: पौष पूर्णिमा के दिन सार्वजनिक भंडारे में गरम खिचड़ी, मौसमी सब्जियों और पूड़ी का वितरण करने से घर के अन्न भंडार कभी रिक्त नहीं होते।

दान देते समय मन में यह भाव होना चाहिए कि यह सब कुछ ईश्वर का ही दिया हुआ है और मैं केवल एक निमित्त मात्र हूँ।


आध्यात्मिक पूर्णता और चेतना का नव विहान

पौष पूर्णिमा का यह दिव्य पर्व हमें प्रकृति, परमात्मा और अपनी अंतरात्मा के साथ पूर्ण सामंजस्य स्थापित करने का संदेश देता है। यह तिथि हमें सिखाती है कि जिस प्रकार पूर्ण चंद्रमा बिना किसी भेद-भाव के संपूर्ण जगत को अपनी शीतल चांदनी से तृप्त करता है, उसी प्रकार हमें भी अपने जीवन में करुणा, शीतलता, प्रेम और सेवा का प्रकाश फैलाना चाहिए।

शाकंभरी जयंती का यह पावन दिन हमें याद दिलाता है कि पृथ्वी की हरी-भरी संपदा ही हमारे प्राणों का आधार है। अन्न-जल का आदर करना, दीन-दुखियों की क्षुधा शांत करना और अपने भीतर के अहंकार को त्यागकर सत्य के मार्ग पर चलना ही पौष पूर्णिमा की सच्ची साधना है। जो मनुष्य इस दिन के संपूर्ण नियमों, सत्यनारायण कथा, तीर्थ स्नान और चंद्र अर्घ्य के विधान को अपने जीवन में उतारता है, उसका संपूर्ण वर्ष आरोग्य, संपन्नता, मानसिक शांति और दिव्य आनंद के अखंड प्रकाश से जगमगा उठता है।


FAQ

पौष पूर्णिमा के दिन कौन सी प्रमुख जयंती मनाई जाती है? पौष पूर्णिमा के दिन मां भगवती के प्रकृति स्वरूपा 'शाकंभरी' अवतार की जयंती संपूर्ण भारतवर्ष में मनाई जाती है।

काशी के माँ अन्नपूर्णा मंदिर में पौष पूर्णिमा पर क्या विशेष आयोजन होता है? काशी में इस दिन भव्य शाक उत्सव मनाया जाता है, जिसमें मां अन्नपूर्णा को विभिन्न प्रकार की ताजी हरी सब्जियों और फलों का विराट भोग लगाया जाता है।

पौष पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देने का क्या स्वास्थ्य लाभ है? कच्चे दूध और जल से चंद्र अर्घ्य देने तथा जलधारा के मध्य से चंद्र दर्शन करने से नेत्र ज्योति बढ़ती है, अनिद्रा दूर होती है और मानसिक तनाव समाप्त होता है।

इस दिन सत्यनारायण भगवान को कौन सा विशेष प्रसाद अर्पित किया जाता है? इस दिन सवा के अनुपात में भुने गेहूं के आटे, देसी घी और शर्करा से बनी पंजरी, कटे केले, तुलसी दल और पंचामृत का 'सपाद भक्ष्य' प्रसाद अर्पित किया जाता है।

पुष्कर सरोवर में पौष पूर्णिमा पर स्नान करने का क्या महात्म्य है? पुष्कर तीर्थराज है; पौष पूर्णिमा पर यहाँ ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने से समस्त पापों का नाश होता है और अश्वमेध यज्ञ समान पुण्य फल प्राप्त होता है।

पाएं अपनी सटीक कुंडली

कुंडली बनाएं

क्या आपको यह पसंद आया?

लेखक

पं. संजीव शर्मा

पं. संजीव शर्मा (63)


अनुभव: 20

इनसे पूछें: Family Planning, Career

इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें

WELCOME TO

ZODIAQ

Right Decisions at the right time with ZODIAQ