By पं. नीलेश शर्मा
गुप्त साधना, 60 शाकों का अर्पण, नवार्ण मंत्र और शताक्षी अवतार रहस्य

सनातन काल गणना और देवी उपासना की परंपरा में चार प्रमुख नवरात्रियों (चैत्र, शारदीय और दो आषाढ़ व माघ की गुप्त नवरात्रि) के अतिरिक्त एक अत्यंत विशिष्ट, करुणामयी और प्रकृति स्वरूपा नवरात्रि का विधान शास्त्रों में प्रतिष्ठित है, जिसे 'शाकंभरी नवरात्रि' कहा जाता है। यह पावन पर्व प्रतिवर्ष पौष मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से प्रारंभ होकर पौष पूर्णिमा तक कुल आठ दिनों तक अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। पौष शुक्ल अष्टमी को धर्मशास्त्रों में 'बाणदाष्टमी' अथवा 'दुर्गाष्टमी' के नाम से भी संबोधित किया जाता है, जबकि इस नवरात्रि का समापन पौष पूर्णिमा अर्थात 'शाकंभरी जयंती' के महापर्व पर होता है।
मार्कंडेय पुराण के अंतर्गत वर्णित श्री दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय (नारायणी स्तुति) और श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के सातवें स्कंध में मां भगवती के इस प्राकट्य का अत्यंत विस्तार से वर्णन मिलता है। यह कालखंड केवल धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है बल्कि यह संपूर्ण जीव जगत, वानस्पतिक औषधियों, कृषि संपदा और पंचमहाभूतों के प्रति नतमस्तक होकर कृतज्ञता प्रकट करने का आध्यात्मिक महोत्सव है। शीत ऋतु के मध्य में जब प्रकृति पाले और शुष्कता से जूझ रही होती है तब जीवनदायिनी शक्ति जगदंबा का यह स्वरूप संपूर्ण धरा को अन्न, शाक, जल और निरोगता का दिव्य वरदान प्रदान करता है।
| अनुष्ठानिक आयाम | शास्त्रीय विवरण एवं नियम | आध्यात्मिक व व्यावहारिक प्रतिफल |
|---|---|---|
| प्रधान कालखंड | पौष मास शुक्ल पक्ष अष्टमी (बाणदाष्टमी) से पूर्णिमा तक | अकाल, सूखा, अन्न संकट और असाध्य रोगों से मुक्ति |
| कुल अवधि | 8 पावन दिन (पौष पूर्णिमा पर शाकंभरी जयंती) | पंचतत्व संतुलन, जीवनी शक्ति संचय और दीर्घायु |
| अधिष्ठात्री देवी | भगवती शाकंभरी (मां दुर्गा का सौम्य शताक्षी स्वरूप) | दारिद्र्य नाश, कुपोषण निवारण और अखंड ऐश्वर्य |
| मुख्य भोग सामग्री | मौसमी कच्ची व पकी हरी सब्जियां, कंदमूल, फल व अन्न | शरीर के त्रिदोषों (वात, पित्त, कफ) का संपूर्ण शमन |
| विशिष्ट पूजन द्रव्य | ताजी हरी दूर्वा, हल्दी की गांठ, नीम व तुलसी पत्र, पंचमेवा | चर्म रोगों और रक्त विकारों से तत्काल मुक्ति |
| प्रधान मंत्र साधना | नवार्ण मंत्र एवं शाकंभरी बीज मंत्र अनुष्ठान | वाणी सिद्धि, चक्र जागरण और आत्मिक तेज की प्राप्ति |
| प्रमुख साधना स्थल | सहारनपुर (उ.प्र.), सांभर (राजस्थान) व बादामी (कर्नाटक) | कुल वृद्धि, वास्तु दोष शांति और भौतिक सुरक्षा |
शाकंभरी नवरात्रि के दौरान की गई साधना साधक के स्थूल शरीर को विषमुक्त (डिटॉक्सिफाई) करती है और उसके सूक्ष्म प्राणमय कोष को प्रकृति की संजीवनी ऊर्जा से जोड़ देती है। जो गृहस्थ इस अवधि में मां जगदंबा को हरी सब्जियों और अन्नों का भोग लगाकर उनका प्रसाद ग्रहण करते हैं, उनके घर में वर्ष भर कभी अन्न के भंडार खाली नहीं होते और न ही कोई सदस्य गंभीर मौसमी व्याधियों का शिकार बनता है।
श्रीमद्देवीभागवत महापुराण में वर्णित आख्यान के अनुसार, एक बार दैत्यराज दुर्गम (रुरु का पुत्र) ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या करके चारों वेदों को अपने अधिकार में ले लिया और यह वरदान प्राप्त कर लिया कि देवताओं को मिलने वाले यज्ञ भाग पर उसका नियंत्रण हो जाए। वेदों के लुप्त होते ही पृथ्वी से धर्म, यज्ञ, स्वाध्याय और सत्य का लोप हो गया। ब्राह्मणों ने संध्या वंदन और आहुतियां देना बंद कर दिया, जिससे इंद्र देव कुपित हो गए और पृथ्वी पर वर्षा का चक्र पूरी तरह अवरुद्ध हो गया।
परिणामस्वरूप पृथ्वी पर लगातार सौ वर्षों तक भयंकर सूखा और अकाल पड़ा। नदियां, सरोवर, कुएं और झरने पूरी तरह सूखकर मरुस्थल बन गए। खेतों की माटी में दरारें पड़ गईं, समस्त वृक्ष व वनस्पतियां जलकर राख हो गईं और संपूर्ण चराचर जगत में अन्न व जल का एक भी दाना शेष न रहा। भूख और प्यास से तड़प-तड़पकर करोड़ों जीव, पशु-पक्षी और मनुष्य मृत्यु के मुख में समाने लगे।
यह पौराणिक आख्यान हमें स्पष्ट संदेश देता है कि जब-जब प्रकृति पर संकट आता है और मानव समाज अपनी मूल जड़ों से भटकता है तब प्रकृति स्वरूपा भगवती ही अपने वात्सल्य से समस्त संकटों को हरने के लिए प्रकट होती हैं।
शाकंभरी नवरात्रि के दौरान मां जगदंबा को विभिन्न प्रकार की मौसमी सब्जियों, जड़ी-बूटियों और फलों का अर्पण करना केवल एक रस्म नहीं है बल्कि यह 'द्रव्य यज्ञ' का प्रत्यक्ष रूप है। शास्त्रों में विधान है कि इस आठ दिवसीय अनुष्ठान में मां शाकंभरी को प्रतिदिन कम से कम 60 प्रकार की शाक-सब्जियों और औषधियों का भोग लगाना चाहिए। यदि साठ प्रकार की सब्जियां उपलब्ध न हो सकें, तो अपनी सामर्थ्य अनुसार जितनी भी ताजी मौसमी सब्जियां मिलें, उन्हें एकत्रित करके माता के चरणों में श्रद्धापूर्वक अर्पित किया जाता है।
आयुर्वेद और वनस्पति विज्ञान के दृष्टिकोण से पौष मास की यह चरम शीत ऋतु शरीर में वात और कफ दोष को अत्यधिक बढ़ा देती है। इस समय प्रकृति द्वारा उत्पन्न की जाने वाली सब्जियां स्वभाव से तिक्त, कषाय और उष्ण होती हैं, जो शरीर के आंतरिक विषों को बाहर निकालने में रामबाण सिद्ध होती हैं।
| शाक / औषधि द्रव्य | शास्त्रीय प्रतीक एवं तात्विक गुण | शारीरिक व आध्यात्मिक लाभ |
|---|---|---|
| नियम | विधान | विधान |
| हरी पत्तेदार सब्जियां (पालक, मेथी, बथुआ, चौलाई) | पृथ्वी और जल तत्व, प्रचुर लौह व क्षार | आंतों का शोधन, रक्त में हीमोग्लोबिन वृद्धि, जीवनी शक्ति |
| कंदमूल (मूली, गाजर, शकरकंद, जिमीकंद) | मूलाधार चक्र की ऊर्जा, भूमिगत ओज | शारीरिक सुदृढ़ता, अस्थि मज्जा पुष्टि और स्थायित्व |
| कड़वे व तिक्त शाक (करेला, मेथी दाना, नीम पत्र) | पित्त शोधक, जीवाणुरोधक, रक्त शोधक | मधुमेह नियंत्रण, चर्म रोगों का नाश, तमस की समाप्ति |
| पाचक शाक (अदरक, हरी मिर्च, धनिया, पुदीना) | अग्नि तत्व संवर्धन, जठराग्नि प्रदीप्ति | त्रिदोष संतुलन, अपच व वायु विकार से स्थाई मुक्ति |
| कद्दू, लौकी और तोरई | आकाश तत्व, शीतल व सात्विक रस | हृदय को बल, मानसिक शांति, उच्च रक्तचाप नियंत्रण |
| कच्ची हल्दी की गांठ | देवगुरु बृहस्पति का अंश, एंटीबायोटिक | रोग प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण, रक्त शुद्धि, कांति |
पूजा के दौरान जब इन समस्त शाकों को एक बड़े काष्ठ अथवा पीतल के पात्र में सजाकर मां शाकंभरी के सम्मुख रखा जाता है, तो उस पर माता की कृपादृष्टि पड़ते ही वे साधारण सब्जियां 'महाप्रसाद' और 'दिव्य औषधि' में रूपांतरित हो जाती हैं। पूजा संपन्न होने के उपरांत इन सब्जियों को पकाया जाता है और पूरे परिवार में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है तथा निर्धन बस्तियों में इसका वितरण किया जाता है। यह प्रसाद शरीर के समस्त पुराने रोगों को जड़ से उखाड़ फेंकने की अद्भुत क्षमता रखता है।
शाकंभरी नवरात्रि एक गुप्त नवरात्रि के समान ही फलदायी होती है, अतः इस अवधि में किया गया मंत्र जप शीघ्र सिद्ध होता है। इस नवरात्रि का मुख्य मंत्र सनातन परंपरा का सर्वोपरि 'नवार्ण मंत्र' है, जो महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती तीनों शक्तियों का संयुक्त बीजाक्षर है:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
इसके साथ ही मां शाकंभरी के इस विशिष्ट पौराणिक मंत्र का जप भी अत्यंत प्रभावशाली माना गया है:
शाकम्भरी नीलवर्णा नीलोत्पलविलोचना।
मुष्टिं शिलीमुखापूर्णं कमलं कमलालया॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं भगवत्यै शाकम्भर्यै नमः॥
मंत्र की ध्वनि तरंगे शरीर के सातों चक्रों, विशेष रूप से मणिपुर चक्र (नाभि स्थित अग्नि केंद्र) और अनाहत चक्र (हृदय केंद्र) को शुद्ध और सक्रिय कर देती हैं।
शाकंभरी नवरात्रि के आठ दिनों में प्रतिदिन प्रातः और सायं पूजा का एक निश्चित और पवित्र क्रम होना चाहिए। यह विधि गृहस्थों के लिए अत्यंत सरल और पूर्ण फलदायी है:
पूजा घर को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। एक लकड़ी की चौकी पर नया हरा अथवा लाल रेशमी वस्त्र बिछाएं। चौकी के मध्य में अक्षत (अखंडित चावल) से अष्टदल कमल बनाएं और उस पर तांबे अथवा मिट्टी का मंगल कलश स्थापित करें। कलश में शुद्ध जल, गंगाजल, दूर्वा, सुपारी, हल्दी की गांठ और सिक्का डालें। कलश के मुख पर आम अथवा अशोक के पांच पत्ते रखें और उसके ऊपर एक नारियल पर कलावा बांधकर स्थापित करें।
कलश के सम्मुख मां दुर्गा अथवा मां शाकंभरी का चित्र या धातु का विग्रह स्थापित करें। यदि शाकंभरी माता का विशिष्ट चित्र न हो, तो मां जगदंबा के चित्र को ही शाकंभरी स्वरूप मानकर पूजन किया जाता है। माता को ताजे हरे और लाल पुष्पों की माला पहनाएं। सिंदूर, रोली, अक्षत और अष्टगंध का तिलक लगाएं।
मां के सम्मुख ताजी हरी सब्जियां (पालक, मेथी, गाजर, मूली, शिमला मिर्च, बैंगन, लौकी आदि) और मौसमी फल श्रद्धापूर्वक सजाकर रखें। एक थाली में कच्ची सब्जियों के साथ-साथ शुद्ध गाय के घी में पकी हुई बिना प्याज-लहसुन की सात्विक सब्जी, पूड़ी, हलवा अथवा खीर का नैवेद्य अर्पित करें।
गाय के शुद्ध घी का एक मुखी दीपक प्रज्वलित करें। धूपबत्ती सुलगाएं और गुग्गल या कर्पूर की सुगंध से वातावरण को महकाएं। दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय का पाठ अथवा शाकंभरी स्तोत्र का पाठ करें। अंत में कपूर जलाकर माता की भावपूर्ण आरती करें और शंख ध्वनि करें।
भारतवर्ष में मां शाकंभरी के तीन अत्यंत प्राचीन और चमत्कारी सिद्ध पीठ स्थित हैं, जहां शाकंभरी नवरात्रि के दौरान लाखों श्रद्धालुओं का तांता लगता है। इन तीर्थों का दर्शन करने मात्र से व्यक्ति के जन्म-जन्मांतर के संचित पाप कट जाते हैं।
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में शिवालिक पर्वतमाला की तलहटी में स्थित यह सिद्धपीठ मां शाकंभरी का सबसे प्रमुख और जागृत धाम माना जाता है। मान्यता है कि इसी सुरम्य वन क्षेत्र में मां ने सौ वर्षों के सूखे के बाद देवताओं के आर्तनाद पर शताक्षी और शाकंभरी रूप में अवतार लिया था। इस मंदिर में मां शाकंभरी के साथ-साथ मां भीमा, भ्रामरी और शताक्षी की प्रतिमाएं भी प्रतिष्ठित हैं। मंदिर के समीप ही बाबा भूरा देव (भैरव) का मंदिर है, जिसके दर्शन किए बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है।
राजस्थान की प्रसिद्ध खारे पानी की झील 'सांभर' के तट पर मां शाकंभरी का अत्यंत प्राचीन शक्तिपीठ स्थित है। यह चौहान वंश की कुलदेवी मानी जाती हैं। पौराणिक मान्यता है कि देवी ने यहां के निवासियों की दरिद्रता दूर करने के लिए इस पूरे क्षेत्र को चांदी के मैदान में बदल दिया था, परंतु बाद में लोभ के कारण होने वाले युद्धों से बचाने के लिए उस चांदी को नमक के विशाल भंडार में परिवर्तित कर दिया। यहां नवरात्रि में सब्जियों का विशेष मेला लगता है।
दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य के बागलकोट जिले में बादामी के निकट स्थित 'बनशंकरी' मंदिर मां शाकंभरी का ही दक्षिण भारतीय स्वरूप है। कन्नड़ भाषा में 'बन' का अर्थ वन (जंगल) होता है, अतः वन की अधिष्ठात्री देवी को बनशंकरी कहा जाता है। यहां चालुक्य राजाओं के काल से मां की पूजा होती आ रही है। यहां प्रतिवर्ष पौष मास में भव्य रथोत्सव का आयोजन किया जाता है।
शाकंभरी नवरात्रि के दौरान किए जाने वाले कुछ सरल तांत्रिक और आयुर्वेदिक उपाय व्यक्ति को जीवन के भयंकर संकटों से बाहर निकालने में सक्षम हैं:
शाकंभरी नवरात्रि का मूल दर्शन केवल बाह्य कर्मकांडों तक सीमित नहीं है बल्कि यह मानव जाति को प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने का एक अत्यंत गहरा पारिस्थितिक (इकोलॉजिकल) संदेश देता है। आज जब आधुनिक सभ्यता अंधाधुंध औद्योगिकीकरण, वनों की कटाई और रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से जल, वायु और भूमि को प्रदूषित कर रही है तब मां शाकंभरी का यह अवतार हमें स्मरण कराता है कि हमारा अस्तित्व इस वसुंधरा की हरीतिमा पर ही निर्भर है।
अन्न का एक-एक दाना और सब्जी का प्रत्येक पत्ता साक्षात मां जगदंबा का शरीर है। जब हम भोजन का अनादर करते हैं अथवा थाली में जूठन छोड़ते हैं, तो वास्तव में हम मां शाकंभरी का तिरस्कार कर रहे होते हैं। इस नवरात्रि में हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि:
जब मनुष्य इस भाव से शाकंभरी नवरात्रि का अनुष्ठान करता है, तो उसके भीतर की संकीर्णता मिट जाती है और वह संपूर्ण ब्रह्मांड को मां जगदंबा का ही विराट रूप देखने लगता है। पौष पूर्णिमा के पावन दिन जब इस नवरात्रि की पूर्णाहुति होती है तब साधक का जीवन निरोगता, ऐश्वर्य, मानसिक शांति और आध्यात्मिक तेज से परिपूर्ण हो जाता है।
शाकंभरी नवरात्रि कब से कब तक मनाई जाती है? शाकंभरी नवरात्रि प्रतिवर्ष पौष मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी (बाणदाष्टमी) से प्रारंभ होकर पौष पूर्णिमा (शाकंभरी जयंती) तक कुल 8 दिनों तक मनाई जाती है।
मां भगवती को 'शाकंभरी' नाम किस कारण से प्राप्त हुआ? सौ वर्षों के भीषण अकाल के समय जब देवी ने अपने शरीर से संपूर्ण संसार के भरण-पोषण हेतु शाक, फल, कंदमूल और औषधियां प्रकट कीं तब उनका नाम शाकंभरी पड़ा।
शाकंभरी नवरात्रि में देवी को मुख्य रूप से किस वस्तु का भोग लगाया जाता है? इस नवरात्रि में मां शाकंभरी को मुख्य रूप से विभिन्न प्रकार की कच्ची व पकी मौसमी हरी सब्जियों, फलों, कंदमूल और सात्विक अन्नों का भोग लगाया जाता है।
असाध्य रोगों से मुक्ति के लिए इस नवरात्रि में कौन सा उपाय सबसे उत्तम है? रोगी के वजन के बराबर हरी सब्जियां तौलकर मां शाकंभरी के निमित्त गौशाला में गायों को खिलाना अथवा निर्धनों में बांटना रोग मुक्ति के लिए सर्वोत्तम माना गया है।
मां शाकंभरी का सबसे प्रमुख और प्राचीन सिद्धपीठ कहां स्थित है? मां शाकंभरी का सबसे प्रसिद्ध और मुख्य सिद्धपीठ उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में शिवालिक पर्वत श्रृंखला की तलहटी में स्थित है।
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