पौष मास में 12 राशियों का भविष्य क्या है?

By पं. अमिताभ शर्मा

धनु और मकर संक्रांति का दोहरा प्रभाव, स्वास्थ्य सलाह और अचूक वैदिक उपाय

पौष मास राशिफल: सूर्य गोचर का 12 राशियों पर प्रभाव व उपाय

सनातन वैदिक ज्योतिष, सौर सिद्धांत और ब्रह्मांडीय काल गणना के अत्यंत गूढ़ और वैज्ञानिक नियमों के अंतर्गत पौष मास संपूर्ण वर्ष का सर्वाधिक निर्णायक, ऊर्जावान, संवेदनशील और भाग्य परिवर्तक कालखंड माना जाता है क्योंकि इस संपूर्ण महीने में ग्रहों के अधिपति भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव आकाश मंडल में एक नहीं बल्कि दो अत्यंत प्रभावशाली, महत्वपूर्ण और परस्पर विरोधी स्वभाव वाली राशियों में अपना गोचर चक्र पूर्ण करते हैं। पौष मास के प्रथम पखवाड़े में भगवान सूर्य नारायण देवगुरु बृहस्पति के आधिपत्य वाली द्विस्वभाव अग्नि तत्व प्रधान धनु राशि में संचरण करते हैं, जिसे हमारे धर्मशास्त्रों और मुहूर्त संहिताओं में धनु संक्रांति अथवा मलमास और खरमास की औपचारिक संज्ञा दी जाती है। इस विशिष्ट खगोलीय अवधि में भौतिक संसार की बाह्य महत्वाकांक्षाएं, नए व्यापारिक अनुबंध और सांसारिक उत्सव स्वतः ही शांत होने लगते हैं तथा मानव जाति की चेतना अंतर्मुखी होकर धर्म, तत्व दर्शन, संयम और परा विद्या के गंभीर अनुसंधान की ओर मुड़ने लगती है। इसके उपरांत जब पौष मास के अंतिम चरण में भगवान भुवन भास्कर अपने परम तेजस्वी रथ को मोड़ते हुए अपने ही औरस पुत्र तथा कर्मफल दाता भगवान शनि देव के स्वामित्व वाली पृथ्वी तत्व प्रधान मकर राशि की सीमा में प्रवेश करते हैं, जिसे संपूर्ण भारतवर्ष मकर संक्रांति के महापर्व के रूप में मनाता है तब से सूर्य देव की पावन उत्तरायण यात्रा का औपचारिक और दिव्य शुभारंभ हो जाता है। देवगुरु बृहस्पति की सात्विक और ज्ञानमयी राशि से निकलकर कर्म न्याय के अधिपति शनि देव की व्यावहारिक, कठोर और अनुशासित राशि में सूर्य नारायण का यह दोहरा आकाशीय संक्रमण संपूर्ण भूमंडल की जलवायु, ऋतु चक्र और मानव समाज की समस्त बारह राशियों के भौतिक, मानसिक, पारिवारिक और वित्तीय जीवन पर युगांतरकारी प्रभाव डालने की अद्वितीय क्षमता रखता है।

कालपुरुष की नैसर्गिक कुंडली के सूक्ष्म सिद्धांतों के प्रकाश में भगवान सूर्य देव संपूर्ण जगत की आत्मा, आत्मबल, प्रशासनिक सत्ता, पिता, मान प्रतिष्ठा, नेत्र ज्योति, मेरुदंड और शारीरिक जीवनी शक्ति के एकमात्र शाश्वत नियंत्रक और जीवनदाता ग्रह स्वीकार किए गए हैं। जब सूर्य का राशि परिवर्तन होता है, तो उसका सीधा, गहरा और अमिट प्रभाव मनुष्य के शरीर के भीतर प्रवाहित होने वाली सूक्ष्म जैविक प्राण ऊर्जा, रक्त संचार और मन के संकल्प विकल्पों पर बहुत तीव्रता से पड़ता है। पौष मास की यह हाड़ कंपाने वाली भीषण शीतलता जहां एक ओर प्रकृति में वात और कफ दोष को अप्रत्याशित रूप से बढ़ा देती है, वहीं दूसरी ओर सूर्य का यह राशि संक्रमण विभिन्न राशियों के जातकों को अपनी पुरानी भूलों का सुधार करने, जीवन के वित्तीय बजट को संतुलित करने और अपने शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा करने की गंभीर चेतावनी देता है। मेष, सिंह और धनु जैसी अग्नि तत्व की राशियों के लिए यह दोहरा गोचर अंतःकरण के तेज को प्रज्वलित करने वाला, आंतरिक नेतृत्व क्षमता को उभारने वाला और आध्यात्मिक विजय प्रदान करने वाला सिद्ध होता है, जबकि इसके विपरीत वृषभ, कन्या और मकर जैसी पृथ्वी तत्व की राशियों को अपने वात संतुलन, हड्डियों के घनत्व, घुटनों के स्वास्थ्य और अनियंत्रित आर्थिक खर्चों पर अत्यधिक संयम रखने की आवश्यकता पड़ती है। वहीं दूसरी ओर वायु तत्व की मिथुन, तुला और कुंभ राशियों के लिए बौद्धिक विकास, नए आजीविका अनुबंधों और व्यावसायिक विस्तार के अप्रत्याशित द्वार खुलते हैं तथा कर्क, वृश्चिक और मीन जैसी संवेदनशील जल तत्व की राशियों को शीत ऋतु में अपने भावनात्मक संतुलन और रक्तचाप को स्थिर बनाए रखने की भारी परीक्षा देनी पड़ती है। इस पूरे महीने में सभी बारह राशियों पर पड़ने वाले ग्रह गोचर के प्रभाव, उनके स्वास्थ्य सूत्र और दैनिक वैदिक उपायों का प्रामाणिक तुलनात्मक विवरण नीचे प्रस्तुत तालिका में सुव्यवस्थित रूप से दिया गया है।

राशि एवं तत्वपौष मास में सूर्य का गोचर प्रभावमुख्य स्वास्थ्य एवं मानसिक स्थितिअचूक दैनिक वैदिक उपाय
मेष (अग्नि तत्व)भाग्य भाव से दशम कर्म भाव में प्रवेशऊर्जावान, आत्मबल में भारी वृद्धि, सिरदर्द की आशंकातांबे के लोटे से सूर्य को रोली मिश्रित जल का नित्य अर्घ्य
वृषभ (पृथ्वी तत्व)अष्टम भाव से नवम त्रिकोण भाव में गमनजोड़ों का दर्द, आंतों की सुस्ती और पेट में गैसप्रातः काल सूर्य नमस्कार और कनकधारा स्तोत्र का पाठ
मिथुन (वायु तत्व)सप्तम साझेदारी भाव से अष्टम भाव में संचरणदांपत्य में संवाद हीनता, रक्तचाप में उतार चढ़ावगाय को हरा चारा और गुड़ खिलाना तथा सूर्य बीज मंत्र
कर्क (जल तत्व)छठवें रोग शत्रु भाव से सप्तम भाव में प्रवेशमौसमी कफ, श्वास विकार और भावनात्मक संवेदनशीलताशिवलिंग पर कच्चा दूध, काले तिल अर्पित करना और शिव उपासना
सिंह (अग्नि तत्व)पंचम बुद्धि भाव से छठवें शत्रु हंता भाव मेंशत्रुओं पर विजय, प्रतियोगी परीक्षा में लाभ, अपचआदित्य हृदय स्तोत्र का नित्य पाठ और केसर का तिलक
कन्या (पृथ्वी तत्व)चतुर्थ सुख भाव से पंचम बुद्धि भाव में गोचरअनिद्रा, सीने में भारीपन, मानसिक एकाग्रता में उतारतांबे के पात्र में रखा जल पीना और संकटनाशन गणेश स्तोत्र
तुला (वायु तत्व)तृतीय पराक्रम भाव से चतुर्थ सुख भाव मेंपारिवारिक सुख में वृद्धि, माता के स्वास्थ्य की चिंताश्री सूक्त का पाठ और चावल, दूध अथवा सफेद वस्त्र का दान
वृश्चिक (जल तत्व)द्वितीय धन भाव से तृतीय पराक्रम भाव मेंपराक्रम में वृद्धि, छोटी यात्राएं, गले में खराशभगवान सूर्य को लाल पुष्प अर्पित करना और गायत्री मंत्र जप
धनु (अग्नि तत्व)लग्न भाव से द्वितीय धन कुटुंब भाव में संचरणआर्थिक लाभ, मान सम्मान, वाणी में उग्रता से बचावमाथे पर हल्दी का तिलक और विष्णु सहस्रनाम का पाठ
मकर (पृथ्वी तत्व)द्वादश व्यय भाव से प्रथम लग्न भाव में प्रवेशसिर में भारीपन, हड्डियों में अकड़न, खर्चों पर नियंत्रणकाले तिल मिश्रित जल से स्नान और शनि चालीसा का पाठ
कुंभ (वायु तत्व)एकादश लाभ भाव से द्वादश व्यय भाव में गमनविदेश से लाभ, अत्यधिक चिंतन, पैरों में नसों का दर्दशनिवार को पीपल के नीचे सरसों के तेल का चौमुखा दीपक
मीन (जल तत्व)दशम कर्म भाव से एकादश लाभ भाव में गोचरपदोन्नति, आर्थिक विस्तार, कफ जनित मौसमी आलस्यभगवान नारायण को पीले कनेर के पुष्प और तुलसी दल अर्पण

मेष, सिंह और धनु राशि के लिए आध्यात्मिक जागृति का समय क्यों है?

अग्नि तत्व प्रधान मेष, सिंह और धनु राशि के जातकों के लिए पौष मास का यह संपूर्ण समय अपनी सुषुप्त आत्मिक शक्तियों को पहचानने, अंतरात्मा की आवाज को सुनने और अपने सामाजिक प्रभुत्व को पुनः स्थापित करने का एक स्वर्णिम अवसर सिद्ध होता है। मेष राशि के स्वामी सेनापति मंगल देव हैं जो नवग्रह मंडल में भगवान सूर्य देव के परम अंतरंग मित्र माने गए हैं। पौष मास के प्रथम पखवाड़े में सूर्य देव मेष राशि से नवम धर्म भाव में बैठकर जातक के भाग्य को नया संबल प्रदान करते हैं और पिता के साथ संबंधों को प्रगाढ़ बनाते हैं। इसके उपरांत जैसे ही मकर संक्रांति पर सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, वे मेष राशि से दशम कर्म भाव में आकर स्वतः ही दिग्बली हो जाते हैं। दशम भाव में सूर्य का यह संचरण मेष राशि के जातकों को राज्य सत्ता से भारी लाभ, प्रशासनिक क्षेत्रों में उच्च पद की प्राप्ति, व्यापार में नई व्यावसायिक साख और सामाजिक प्रतिष्ठा में अप्रत्याशित उछाल प्रदान करता है। इस राशि के जातकों को केवल अपने उग्र स्वभाव, क्रोध और अति उत्साह पर संयम रखना चाहिए ताकि उनकी मानसिक ऊर्जा व्यर्थ के वाद विवाद में नष्ट न हो सके।

सिंह राशि स्वयं भगवान भुवन भास्कर सूर्य देव की अपनी मूल त्रिकोण राशि है, अतः सूर्य के किसी भी गोचर का सबसे त्वरित और स्पष्ट प्रभाव इसी राशि के जातकों पर दिखाई देता है। पौष मास के दौरान सूर्य देव सिंह राशि से पंचम ज्ञान भाव से निकलकर छठवें शत्रुहंता भाव में प्रवेश करते हैं। पंचम भाव में सूर्य का संचरण जहां विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति, बौद्धिक विश्लेषण और उच्च शिक्षा में उत्तम सफलता के मार्ग प्रशस्त करता है, वहीं छठवें भाव में सूर्य का प्रवेश जातक के गुप्त विरोधियों, ईर्ष्यालु शत्रुओं और मुकदमों का पूरी तरह दमन कर देता है। जो जातक किसी पुरानी असाध्य बीमारी, बैंक ऋण अथवा व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा से जूझ रहे थे, उन्हें इस मास में चमत्कारी राहत प्राप्त होती है। धनु राशि स्वयं देवगुरु बृहस्पति की मूल त्रिकोण राशि है जहां पौष मास के पहले भाग में सूर्य स्वयं प्रथम लग्न भाव में विराजमान होकर जातक के चेहरे पर एक अलौकिक राजसी तेज और व्यक्तित्व में दार्शनिक गंभीरता का संचार करते हैं। मास के उत्तरार्ध में जब सूर्य द्वितीय धन भाव में जाएंगे, तो आकस्मिक धन लाभ और पैतृक संपत्ति के योग बनेंगे, यद्यपि इस राशि वालों को अपनी वाणी में कठोरता और अहंकार का त्याग करना होगा क्योंकि द्वितीय भाव का सूर्य कभी कभी परिवार के भीतर अकारण कटुता उत्पन्न कर देता है।

वृषभ, कन्या और मकर राशि को स्वास्थ्य और वित्त पर क्यों संभलना होगा?

पृथ्वी तत्व प्रधान वृषभ, कन्या और मकर राशि के जातकों के लिए पौष मास का यह शीतकालीन समय शारीरिक स्वास्थ्य, खानपान के अनुशासन और वित्तीय बजट के प्रबंधन की दृष्टि से अत्यधिक सजग रहने की चेतावनी देता है। वृषभ राशि के स्वामी दैत्य गुरु शुक्र देव हैं जिनका सूर्य देव के साथ नैसर्गिक शत्रुता का संबंध माना गया है। पौष मास के प्रथम चरण में सूर्य देव वृषभ राशि से अष्टम भाव में संचरण करते हैं जो ज्योतिष में आयु, अचानक आने वाली रुकावटों, गुप्त रोगों और आकस्मिक धन हानि का भाव माना गया है। इस संवेदनशील अवधि में वृषभ राशि के जातकों को किसी भी प्रकार के नए सट्टे, शेयर बाजार के जोखिम भरे निवेश अथवा अजनबियों पर अंधविश्वास करने से पूरी तरह बचना चाहिए। इस राशि के जातकों को कड़ाके की ठंड में वात रोग, घुटनों का दर्द, सायटिका और आंतों में अपच की समस्या घेर सकती है, अतः उन्हें अपने दैनिक आहार में शुद्ध देशी गाय के घी, सोंठ और हल्के गुनगुने जल का नियमित सेवन अनिवार्य रूप से करना चाहिए।

कन्या राशि के स्वामी बुध देव हैं जो सूर्य के सानिध्य में आकर बुधादित्य योग का निर्माण करते हैं, परंतु पौष मास में सूर्य देव कन्या राशि से चतुर्थ सुख भाव और पंचम बुद्धि भाव के संधिकाल को प्रभावित करते हैं। चतुर्थ भाव में सूर्य का संचरण गृह क्लेश, मानसिक अशांति, सीने में कफ का जमाव और माता के स्वास्थ्य में अचानक गिरावट का कारण बन सकता है। कन्या राशि वालों को इस अवधि में नया वाहन खरीदने अथवा अचल संपत्ति के लेन देन में समस्त कानूनी दस्तावेजों की भली भांति जांच कर लेनी चाहिए। मकर राशि स्वयं सूर्य पुत्र शनि देव की अपनी राशि है और सूर्य का मकर राशि में प्रवेश इस राशि के जातकों के प्रथम भाव अर्थात लग्न को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। मकर राशि पर शनि का प्रभाव होने से सूर्य की उष्णता और शनि की शीतलता के कारण लग्न में एक तीव्र अंतर्द्वंद्व उत्पन्न होता है। इसके फलस्वरूप जातक को अत्यधिक सिरदर्द, आंखों में जलन, रक्तचाप में अचानक उतार चढ़ाव और जीवनसाथी के साथ अहम् का टकराव झेलना पड़ सकता है। मकर राशि के जातकों को इस पूरे मास में अपने मन से संकीर्णता का त्याग करके नित्य प्रातः तिलोदक स्नान करना चाहिए और शनिवार के दिन लोहे के पात्र में सरसों का तेल भरकर छाया दान अवश्य करना चाहिए।

मिथुन, तुला और कुंभ राशि के लिए करियर के नए मार्ग कैसे खुलेंगे?

वायु तत्व प्रधान मिथुन, तुला और कुंभ राशि के जातकों के लिए पौष मास की यह खगोलीय स्थिति मानसिक प्रखरता, नए संपर्कों के विस्तार और आजीविका के क्षेत्र में युगांतरकारी उपलब्धियां प्राप्त करने वाली सिद्ध होती है। मिथुन राशि के स्वामी बुध देव हैं जो बुद्धि और व्यापार के परम कारक हैं। पौष मास में सूर्य देव मिथुन राशि से सप्तम साझेदारी भाव से निकलकर अष्टम भाव की ओर अग्रसर होते हैं। इस गोचर के प्रभाव से व्यापार में जो सौदे पिछले कई महीनों से कानूनी पेचीदगियों अथवा साझेदारों के आपसी अविश्वास के कारण अधर में लटके हुए थे, वे अचानक अनुकूलता के साथ सुलझने लगेंगे। विशेष रूप से जो जातक सूचना प्रौद्योगिकी, मीडिया, जनसंपर्क, लेखन, वकालत और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कार्यरत हैं, उनके लिए यह समय पदोन्नति और नए अनुबंधों की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करेगा। मिथुन राशि वालों को केवल इस बात का ध्यान रखना होगा कि वे अपने महत्वपूर्ण व्यावसायिक रहस्यों को किसी भी तीसरे व्यक्ति के सम्मुख प्रकट न करें और अपने वित्तीय लेनदेन को पूर्णतः पारदर्शी बनाए रखें।

तुला राशि के जातकों के लिए सूर्य का यह गोचर तीसरे पराक्रम भाव से निकलकर चौथे सुख भाव में घटित होगा। तीसरे भाव का सूर्य तुला राशि वालों के पराक्रम, शारीरिक साहस और निर्णय लेने की क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि करता है जिससे वे अपने कार्यक्षेत्र में कठिन से कठिन चुनौतियों को बहुत सुगमता से पार कर लेते हैं। इस समय जो जातक नौकरी में स्थानांतरण अथवा वेतन वृद्धि की प्रतीक्षा कर रहे थे, उन्हें अपने उच्चाधिकारियों का पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा। यद्यपि चौथे भाव में सूर्य का प्रवेश घरेलू वातावरण में थोड़ा सा तनाव उत्पन्न कर सकता है, परंतु आर्थिक दृष्टि से यह समय भूमि, भवन अथवा पैतृक संपत्ति के विक्रय से भारी लाभ कराने वाला सिद्ध होगा। कुंभ राशि के स्वामी भी कर्मफल दाता शनि देव हैं और सूर्य का संचरण कुंभ राशि से ग्यारहवें लाभ भाव से निकलकर बारहवें व्यय भाव में होगा। ग्यारहवें भाव में सूर्य का संचरण पुराने मित्रों और बड़े भाइयों के सहयोग से आय के नए स्रोत खोलता है, जबकि बारहवें भाव में सूर्य का जाना विदेशी कंपनियों, आयात निर्यात और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों से भारी धन लाभ कराता है। कुंभ राशि वालों को इस अवधि में पैरों के दर्द और अनिद्रा से बचने हेतु शनिवार को पीपल के नीचे चौमुखा दीपक जलाना चाहिए।

कर्क, वृश्चिक और मीन राशि के लिए भावनात्मक संतुलन के सूत्र क्या हैं?

जल तत्व प्रधान कर्क, वृश्चिक और मीन राशि के जातकों के लिए पौष मास का यह संपूर्ण संधिकाल मानसिक शांति, पारिवारिक संबंधों और भावनात्मक संतुलन की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील रहने वाला है। कर्क राशि के स्वामी चंद्रमा हैं जो मानव मन की चंचलता और जल तत्व के साक्षात प्रतीक माने गए हैं। पौष मास में सूर्य देव कर्क राशि से छठवें भाव से निकलकर सातवें दांपत्य भाव में प्रवेश करते हैं। छठवें भाव का सूर्य जहां जातक के पुराने रोगों को समाप्त करता है और कोर्ट कचहरी के मुकदमों में विजय दिलाता है, वहीं सातवें भाव में सूर्य का आगमन जीवनसाथी के साथ व्यर्थ की बातों पर वैचारिक टकराव उत्पन्न कर सकता है। कर्क राशि के जातकों को शीत ऋतु के प्रभाव से बचने और मन को शांत रखने के लिए प्रतिदिन चांदी के गिलास से जल पीना चाहिए और सायंकाल भगवान शिव के पंचाक्षर मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करना चाहिए।

वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल देव हैं और इस राशि के लिए भगवान सूर्य नवम त्रिकोण भाव के स्वामी होकर परम कारक और मंगलकारी ग्रह बनते हैं। पौष मास में सूर्य देव वृश्चिक राशि से द्वितीय धन भाव से निकलकर तृतीय पराक्रम भाव में गोचर करेंगे। द्वितीय भाव का सूर्य जहां संचित कोष में वृद्धि करता है, वहीं वाणी में कभी कभी अनावश्यक तल्खी घोल देता है, अतः परिवार के वृद्ध सदस्यों से वार्तालाप करते समय शब्दों का चयन बहुत सावधानी से करना चाहिए। तृतीय भाव में मकर संक्रांति के बाद सूर्य का प्रवेश वृश्चिक राशि के पुरुषार्थ को हिमालय के समान अडिग बना देगा जिससे वे अपने विरोधियों पर पूरी तरह हावी रहेंगे। मीन राशि के स्वामी देवगुरु बृहस्पति हैं और सूर्य देव इस राशि से दसवें कर्म भाव से निकलकर ग्यारहवें लाभ भाव में प्रवेश करेंगे। दसवें भाव में सूर्य का संचरण कार्यक्षेत्र में जातक का मान सम्मान बढ़ाता है और ग्यारहवें भाव में सूर्य का जाना जीवन के समस्त आर्थिक अवरोधों को समाप्त करके नए निवेशों से निरंतर लाभ प्रदान करता है। मीन राशि वालों को केवल अपने आलस्य का त्याग करना होगा और प्रतिदिन प्रातः काल भगवान भुवन भास्कर को तांबे के लोटे से जल अर्पित करना होगा।

पौष मास में सभी राशियों के लिए 5 सार्वभौमिक कल्याणकारी उपाय कौन से हैं?

अपनी जन्म कुंडली के समस्त क्रूर ग्रह दोषों को शांत करने और पौष मास के इस दोहरे सूर्य गोचर से अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आकर्षित करने हेतु पांच प्रमुख सार्वभौमिक वैदिक उपाय प्रत्येक जातक को अवश्य अपनाने चाहिए।

  1. तांबे के लोटे से नित्य प्रातः सूर्य अर्घ्य का शास्त्रीय विधान: सभी बारह राशियों के जातकों को प्रतिदिन सूर्योदय के 45 मिनट के भीतर एक शुद्ध तांबे के लोटे में ताजा जल भरकर उसमें दो चुटकी लाल चंदन, कुमकुम, अक्षत और थोड़ा सा गुड़ मिलाकर उगते हुए सूर्य देव को तीन बार में अर्घ्य समर्पित करना चाहिए। अर्घ्य देते समय दोनों हाथों को सिर से ऊपर उठाएं और गिरते हुए जल की पतली धार के मध्य से भगवान सूर्य के स्वर्णिम बिंब का दर्शन करें तथा गायत्री मंत्र का शांत मन से उच्चारण करें।

  2. काले तिल और शुद्ध सरसों के तेल का शनिवार महादान: चूंकि पौष मास का नक्षत्र स्वामी कर्मफल दाता शनि देव हैं, अतः प्रत्येक शनिवार को किसी अत्यंत निर्धन, असहाय व्यक्ति अथवा सफाई कर्मचारी को काले तिल, शुद्ध सरसों का तेल, साबुत काली उड़द की दाल और एक मोटा काला कंबल श्रद्धापूर्वक दान करना चाहिए। यह उपाय विशेष रूप से वृषभ, मिथुन, कन्या, तुला, मकर और कुंभ राशि वालों के जीवन से समस्त अदृश्य बाधाओं को तत्काल समाप्त कर देता है।

  3. आदित्य हृदय स्तोत्र का पूर्व मुखी होकर एकाग्र पाठ: वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड में वर्णित महर्षि अगस्त्य द्वारा भगवान श्रीराम को रावण वध से पूर्व प्रदान किया गया 'आदित्य हृदय स्तोत्र' संपूर्ण ब्रह्मांड में सूर्य देव का सबसे शक्तिशाली स्तुति गान है। प्रतिदिन प्रातः काल पूर्व दिशा की ओर मुख करके इस दिव्य स्तोत्र का पाठ करने से हृदय की नसें स्वस्थ रहती हैं, नेत्र ज्योति बढ़ती है, आत्मविश्वास में अप्रत्याशित वृद्धि होती है और जातक को जीवन के किसी भी क्षेत्र में पराजय का मुख नहीं देखना पड़ता।

  4. गाय के शुद्ध देसी घी का नियमित सेवन और दीपदान: कड़ाके की ठंड में मानव शरीर के वात दोष को शांत करने और सातों धातुओं को पुष्ट करने के लिए अपने भोजन में दो छोटे चम्मच गाय का घी अवश्य शामिल करें। इसके साथ ही प्रतिदिन संध्या समय गोधूलि वेला में घर के पूजा स्थल अथवा ईशान कोण में गाय के घी का एक बड़ा दीपक प्रज्वलित करने से घर की समस्त नकारात्मक ऊर्जाएं तत्क्षण नष्ट हो जाती हैं और गृहस्थी में महालक्ष्मी का स्थायी वास होता है।

  5. असहाय मनुष्यों और मूक पशुओं को गर्म आहार का वितरण: पौष मास की हाड़ कंपाने वाली ठंड में सड़कों पर विचरण करने वाले निराश्रित कुत्तों को सरसों के तेल से चुपड़ी हुई ताजी रोटी खिलाएं, छतों पर पक्षियों के लिए बाजरा और जल की व्यवस्था करें तथा किसी अत्यंत निर्धन परिवार को गर्म भोजन और ऊनी वस्त्र उपलब्ध कराएं। जब कोई असहाय जीव शीतकाल में आपके द्वारा तृप्त होता है, तो उससे निकलने वाला आशीर्वाद जन्म कुंडली के समस्त अनिष्टकारी ग्रहों के प्रभाव को तत्काल शांत कर देता है।

सौर संचरण और मानवीय प्रारब्ध का शाश्वत संदेश क्या है?

सनातन वैदिक ज्योतिष का परम सत्य यह है कि आकाश मंडल में भ्रमण करने वाले नवग्रह केवल निर्जीव और तटस्थ भौतिक पिंड मात्र नहीं हैं बल्कि वे उस सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा की परम न्याय व्यवस्था के सजीव, चैतन्य और अत्यंत निष्पक्ष प्रशासक हैं। भगवान सूर्य देव का देवगुरु बृहस्पति की धनु राशि से निकलकर शनि देव की मकर राशि में प्रवेश करना हमें यह गहरा आध्यात्मिक संदेश देता है कि मानव जीवन केवल ऊंचे दार्शनिक सिद्धांतों और हवाई आदर्शों में खोए रहने का नाम नहीं है बल्कि उन आदर्शों को समाज के यथार्थ धरातल पर अपने कठोर परिश्रम, अनुशासन और निस्वार्थ सेवा के माध्यम से साकार करने का नाम है। धनु राशि जहां हमें धर्म, सत्य, उच्च ज्ञान और ईश्वर भक्ति की पावन प्रेरणा देती है, वहीं मकर राशि हमें यह सिखाती है कि बिना कठिन श्रम, उत्तरदायित्व और धैर्य के कोई भी ज्ञान समाज के लिए कल्याणकारी नहीं बन सकता। जब कोई विवेकशील मनुष्य पौष मास के इस शीतल, गंभीर और तपोमय वातावरण में अपने संकीर्ण अहंकार का विसर्जन करके सूर्य देव के इस खगोलीय संदेश को अपने आचरण में उतार लेता है, तो उसकी कुंडली की समस्त ग्रह बाधाएं स्वतः शांत हो जाती हैं और वह इस नश्वर संसार के समस्त सुखों को भोगता हुआ अंत में परम पद को प्राप्त करता है।

FAQ

पौष मास में सूर्य का मकर राशि में प्रवेश किस दिन होता है और इसका क्या महत्व है? पौष मास के अंतिम चरण में सूर्य देव धनु राशि की अपनी यात्रा समाप्त करके मकर राशि में प्रवेश करते हैं। यह खगोलीय संक्रांति सामान्यतः प्रतिवर्ष 14 अथवा 15 जनवरी को घटित होती है जिसे संपूर्ण भारतवर्ष में मकर संक्रांति अथवा पोंगल के महापर्व के रूप में बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है और इसी दिन से सूर्य देव की उत्तरायण यात्रा का पावन शुभारंभ होता है।

धनु संक्रांति अर्थात खरमास में कौन से कार्य पूरी तरह वर्जित माने गए हैं? पौष मास के उस पखवाड़े में जब सूर्य धनु राशि में रहते हैं, जिसे खरमास कहा जाता है, विवाह, मुंडन, यज्ञोपवीत, नए गृह में प्रवेश, नए व्यापार का औपचारिक उद्घाटन और नए भवन निर्माण की नींव डालने जैसे सांसारिक मांगलिक उत्सव पूरी तरह वर्जित माने जाते हैं, यद्यपि नित्य पूजा पाठ, मंत्र जप और साधना के लिए यह समय अत्यंत श्रेष्ठ होता है।

सूर्य के अशुभ प्रभाव को शांत करने के लिए सबसे सरल और अचूक उपाय कौन सा है? सूर्य के अशुभ प्रभाव को मिटाने के लिए प्रतिदिन प्रातः काल तांबे के पात्र से उगते हुए सूर्य को जल अर्पित करना, अपने पिता के चरण स्पर्श करके उनका नित्य आशीर्वाद लेना तथा शांत बैठकर गायत्री मंत्र अथवा 'ॐ घृणिः सूर्याय नमः' का 108 बार स्पष्ट उच्चारण के साथ जाप करना सबसे सरल और अचूक उपाय है।

पौष मास में किन राशियों को अपने स्वास्थ्य के प्रति सर्वाधिक सजग रहना चाहिए? पौष मास के दौरान विशेष रूप से वृषभ, कन्या, वृश्चिक और मकर राशि के जातकों को अपने स्वास्थ्य के प्रति अत्यधिक सतर्क रहना चाहिए। इन राशियों को कड़ाके की ठंड से बचते हुए जोड़ों के दर्द, पाचन की खराबी, रक्तचाप के उतार चढ़ाव और मौसमी कफ जनित विकारों से अपनी रक्षा करनी चाहिए।

क्या पौष मास में सूर्य अर्घ्य के जल में काले तिल मिलाए जा सकते हैं? सामान्य दिनों में सूर्य देव को कुमकुम, रोली और लाल पुष्प मिश्रित जल का अर्घ्य दिया जाता है, परंतु पौष मास के शनिवार के दिन अथवा मकर संक्रांति के पावन पर्व पर तांबे के पात्र के जल में थोड़े से काले तिल मिलाकर अर्घ्य देने से सूर्य और शनि दोनों ग्रहों के दोष एक साथ शांत हो जाते हैं।

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

पं. अमिताभ शर्मा (63)


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इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

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