दक्षिण भारत में पोंगल कैसे मनाते हैं?

By पं. नरेंद्र शर्मा

चार दिवसीय पोंगल, मट्टू पोंगल की परंपरा और शबरीमला मकरविलक्कु रहस्य

पोंगल पर्व और मकरविलक्कु: दक्षिण भारत की संक्रांति परंपराएं

पौष मास के परम पावन संधिकाल पर जब भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव धनु राशि की अपनी शीतकालीन परिधि को पूर्ण करके मकर राशि के नक्षत्र मंडल में प्रवेश करते हैं तब संपूर्ण भारतवर्ष की पावन भूमि पर एक साथ खगोलीय ऋतु परिवर्तन, सौर नवजागरण और कृषि उत्सव का महासंगम उदित होता है। उत्तर भारत के विशाल मैदानी भागों में जिस खगोलीय संक्रांति को मकर संक्रांति अथवा माघी के नाम से अत्यंत श्रद्धा, गंगा स्नान और खिचड़ी दान के साथ मनाया जाता है, वही विशिष्ट कालखंड दक्षिण भारत के विस्तृत भूभाग, विशेषकर तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक की शस्य श्यामला भूमि पर अपनी अनुपम सांस्कृतिक भव्यता, सहस्रों वर्ष पुरानी कृषि परंपरा और गहन दार्शनिक चेतना के साथ प्रकट होता है। तमिलनाडु की प्राचीन द्रविड़ एवं वैदिक समन्वयवादी संस्कृति में यह महापर्व तमिल पंचांग के सर्वाधिक शुभ मास 'थाई' के प्रथम दिन से प्रारंभ होकर लगातार चार दिनों तक चलने वाले लोकोत्सव 'पोंगल' के रूप में अभूतपूर्व हर्षोल्लास, सामूहिक भक्ति और सामाजिक समरसता के साथ आयोजित किया जाता है। तमिल भाषा में पोंगल का शाब्दिक और शास्त्रीय अर्थ 'उबलना', 'उफान पर आना' अथवा 'समृद्धि का छलकना' होता है, जो नवोत्पन्न कृषि संपदा, गोवंश के दुग्ध वैभव और गृहस्थ जीवन में सुख शांति के निरंतर विस्तार का साक्षात प्रतीक माना गया है।

उसी पावन संक्रांति की गोधूलि वेला में जब सूर्य देव अस्ताचल की ओर प्रस्थान करते हैं तब केरल के सघन सह्याद्रि पर्वतमालाओं के मध्य स्थित पंपा नदी के पावन तट पर बसे शबरीमला के विश्वप्रसिद्ध धाम में लाखों श्रद्धालु स्वामी अयप्पा के परम पावन गर्भगृह के सम्मुख उपस्थित होकर आकाश में उदित होने वाली 'मकरा ज्योति' और सामने स्थित दुर्गम पोन्नम्बलमेडु पर्वत पर तीन बार प्रज्वलित होने वाली दिव्य ज्योति 'मकरविलक्कु' के दर्शन करके अपने संपूर्ण जीवन को कृतार्थ करते हैं। उत्तर में हिमालय की तलहटी से लेकर दक्षिण में हिंद महासागर के तटों तक फैली यह सनातन परंपरा इस ऐतिहासिक सत्य का सजीव और निर्विवाद प्रमाण प्रस्तुत करती है कि बाह्य भाषा, खानपान, वेशभूषा और क्षेत्रीय रीतियों के नाना प्रकार के भेदों के उपरांत भी भारत की अंतरात्मा केवल और केवल प्रकृति पूजा, पंचमहाभूतों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन और सूर्य नारायण के प्रति एकनिष्ठ आध्यात्मिक समर्पण से युगों युगों से बंधी हुई है। दक्षिण भारत के इस चार दिवसीय महापर्व के समस्त प्रमुख घटक, शास्त्रीय विधान, पारंपरिक नैवेद्य और विशिष्ट सांस्कृतिक अनुष्ठानों का विस्तृत विवरण नीचे दी गई तालिका में सुव्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया गया है।

पोंगल दिवसतमिल नाम और तिथिअधिष्ठाता देवता और प्रकृति तत्वमुख्य परंपरा और विशिष्ट नैवेद्य
प्रथम दिवसभोगी पोंगल (पौष मास का अंतिम दिन)देवराज इंद्र (वर्षा और मेघ तत्व)पुरानी व अनुपयोगी वस्तुओं का अग्नि में दहन और घर की पूर्ण शुद्धि
द्वितीय दिवससूर्य पोंगल (थाई मास का प्रथम दिन)भुवन भास्कर सूर्य देव (अग्नि और तेज तत्व)खुले प्रांगण में नए मिट्टी के पात्र में शक्करई पोंगल का मंगलमय उफान
तृतीय दिवसमट्टू पोंगल (संक्रांति का अगला दिन)नंदीश्वर और गोवंश (पशुधन और धरित्री)बैलों का भव्य श्रृंगार, पूजन, धूप दीप आरती और जल्लीकट्टू खेल
चतुर्थ दिवसकाणुम पोंगल (पारिवारिक मिलन का दिन)कुल देवी देवता और पितृगण (संबंध और समाज)हल्दी के पत्तों पर अन्न अर्पण, पक्षियों को आहार और बंधु बांधवों से भेंट
शबरीमला पर्वमकरविलक्कु (मकर संक्रांति संध्या)भगवान धर्म शास्ता स्वामी अयप्पापोन्नम्बलमेडु पर्वत पर दिव्य ज्योति दर्शन, मंडलम व्रत पूर्णता और दीपदान

चार दिवसीय पोंगल महोत्सव का शास्त्रीय स्वरूप क्या है?

तमिलनाडु की पावन भूमि पर पोंगल केवल एक सामान्य औपचारिक पर्व नहीं है बल्कि यह सनातन जीवन शैली के पंचमहाभूतों अर्थात पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के प्रति पूर्ण नतमस्तक होने का एक अत्यंत वैज्ञानिक और चार दिवसीय दिव्य आध्यात्मिक अनुष्ठान है। इस महोत्सव के प्रत्येक दिवस का अपना एक स्वतंत्र, गंभीर, दार्शनिक और पर्यावरणीय महत्व शास्त्रों में निर्धारित किया गया है जो मानव जाति को संपूर्ण जीव जगत और प्रकृति के साथ पूर्ण संतुलन बनाकर जीने की शाश्वत प्रेरणा प्रदान करता है।

पोंगल के प्रथम दिन को 'भोगी पोंगल' के नाम से जाना जाता है, जो समस्त मेघों, बादलों और जीवनदायिनी वर्षा के अधिपति देवराज इंद्र को पूर्णतः समर्पित होता है। इस दिन कृषक समाज वर्ष भर हुई उत्तम वर्षा और लहलहाती हरी भरी फसलों के लिए इंद्र देव के चरणों में कृतज्ञता ज्ञापित करता है। इस दिन की सबसे प्रमुख और व्यापक सामाजिक प्रथा 'भोगी कोट्टू' कहलाती है, जिसके अंतर्गत परिवार के सभी सदस्य अपने घरों से समस्त टूटी फूटी, सड़ी गली, अनुपयोगी और पुरानी वस्तुओं को बाहर निकालते हैं और प्रातः काल मोहल्ले के चौराहे पर काष्ठ अग्नि प्रज्वलित करके उसमें उन सभी वस्तुओं को भस्म कर देते हैं। इस शास्त्रीय विधान का गहरा आध्यात्मिक संकेत यह है कि मनुष्य को अपने अंतःकरण के भीतर संचित समस्त पुरानी कुंठाओं, दुर्भावनाओं, आलस्य और तामसिक विकारों का दहन करके जीवन में नवीन सात्विक विचारों, पवित्र संकल्पों और नई चेतना का सहर्ष स्वागत करना चाहिए। इस दिन घरों की दीवारों को चूने से पोतकर स्वच्छ किया जाता है और देहरी को ताजे पिसे हुए कच्चे चावल के आटे की लेई और प्राकृतिक रंगों से बनी अत्यंत सुरुचिपूर्ण रंगोलियों से सजाया जाता है, जिन्हें तमिल संस्कृति में 'कोलम' कहा जाता है।

द्वितीय दिन को 'सूर्य पोंगल' अथवा 'पेरुम पोंगल' कहा जाता है, जो इस संपूर्ण चार दिवसीय अनुष्ठान का केंद्रीय, सर्वोच्च और सर्वाधिक महत्वपूर्ण दिन माना गया है। यह पावन दिन चराचर जगत के एकमात्र प्रत्यक्ष दृश्य देवता भगवान सूर्य नारायण के प्रति संपूर्ण समर्पण का दिन होता है। परिवार की गृहणियां प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र स्नान करती हैं और पारंपरिक पट्टू रेशमी साड़ियां धारण करके घर के खुले प्रांगण अथवा छत पर पूर्व दिशा की ओर ईंटों और चिकनी मिट्टी से एक सुंदर पारंपरिक चूल्हा बनाती हैं। इस अवसर पर उपयोग में लाई जाने वाली नई मिट्टी अथवा पीतल की हांडी के कंठ पर ताजी हरी कच्ची हल्दी की गांठें और अदरक के पौधे पवित्र पीले धागे से बांधे जाते हैं। उस पावन पात्र में शुद्ध देशी गाय का ताजा दूध, नए कटे हुए धान का अक्षत, गन्ने का शुद्ध गुड़, हरी इलायची, जायफल, शुद्ध घी में तले हुए काजू और सुनहरी किशमिश डालकर उसे धीमी काष्ठ अग्नि पर पकाया जाता है। जब वह दूध और चावल का मधुर मिश्रण उबलकर पात्र के चारों किनारों से बाहर गिरने लगता है तब परिवार के समस्त वृद्ध, युवा और बच्चे शंख ध्वनि बजाते हुए 'पोंगोलो पोंगल' का गगनभेदी जयघोष करते हैं। इस दूधिया उफान को आगामी वर्ष में घर में धन धान्य, भौतिक ऐश्वर्य, उत्तम स्वास्थ्य और सौभाग्य के निरंतर छलकते रहने का अत्यंत मंगलकारी शकुन माना जाता है। इस दिव्य मिष्ठान्न को 'शक्करई पोंगल' कहा जाता है, जिसे नए केले के पत्ते पर रखकर सर्वप्रथम सूर्य नारायण को भोग लगाया जाता है।

मट्टू पोंगल और काणुम पोंगल की लोक परंपराएं क्या हैं?

पोंगल का तीसरा पावन दिन 'मट्टू पोंगल' के नाम से विख्यात है, जो भारत की सनातन कृषि संस्कृति के सच्चे आधार स्तंभ, मानव जाति के मूक सेवक और हलधर गोवंश व बलिष्ठ बैलों के प्रति अगाध कृतज्ञता और वात्सल्य व्यक्त करने का अत्यंत भावुक दिन है। भारतीय ग्रामीण चेतना में गोवंश को केवल पशु नहीं माना जाता बल्कि उन्हें साक्षात भगवान शिव के वाहन नंदीश्वर और परिवार के अभिन्न सदस्य के रूप में पूजा जाता है। इस दिन प्रातः काल बैलों, गायों और बछड़ों को स्थानीय नदियों, नहरों अथवा सरोवरों में ले जाकर अत्यंत प्रेमपूर्वक नहलाया जाता है। इसके पश्चात उनके नुकीले सींगों को घिसकर उन पर लाल, नीले और पीले चमकीले प्राकृतिक रंग रंगे जाते हैं, उनके गलों में पीतल की मधुर घंटियां, रंग बिरंगे घुंघरू और ताजे गेंदे के फूलों की मालाएं पहनाई जाती हैं तथा उनके चौड़े माथे पर शुद्ध कुमकुम, गोपी चंदन और हल्दी का तिलक लगाया जाता है। परिवार के सभी सदस्य धूप, दीप और कपूर से गोमाता और बैलों की आरती उतारते हैं और उन्हें वही पवित्र शक्करई पोंगल, हरा चारा और रसदार गन्ने अपने हाथों से खिलाते हैं। तमिलनाडु के मदुरै, अलंगनल्लूर और तिरुचिरापल्ली जैसे ऐतिहासिक ग्रामीण क्षेत्रों में इसी दिन 'जल्लीकट्टू' नामक प्राचीन शौर्य प्रदर्शन खेल का आयोजन होता है, जिसमें साहसी तमिल युवक धावक बैलों के कूबड़ को पकड़कर उनके सींगों पर बंधी स्वर्ण मुद्राओं और उपहारों की पोटली को प्राप्त करने का पुरुषार्थ दिखाते हैं, जो मनुष्य और पशु के मध्य आपसी विश्वास, पराक्रम और सम्मान का अप्रतिम प्रतीक है।

इस लोकोत्सव का चौथा और अंतिम दिन 'काणुम पोंगल' के पावन नाम से संपूर्ण दक्षिण भारत में मनाया जाता है। तमिल भाषा के शब्दकोश में 'काणुम' शब्द का वास्तविक अर्थ दर्शन करना, अवलोकन करना अथवा सगे संबंधियों से आत्मीय भेंट करना होता है। यह दिन शुद्ध रूप से सामाजिक समरसता, पारिवारिक रिश्तों की प्रगाढ़ता और प्रकृति के छोटे बड़े समस्त जीव जंतुओं के प्रति असीम दया भाव का दिन माना गया है। इस दिन प्रातः काल घर की सभी बहनें और महिलाएं हल्दी के ताजे हरे पत्तों पर सफेद चावल, हल्दी मिले पीले चावल और कुमकुम मिले लाल चावल के छोटे छोटे पिंड बनाकर खुले प्रांगणों, छतों अथवा बगीचों में कौवों, गोरैया, मैना और गिलहरियों के भोजन हेतु श्रद्धापूर्वक रखती हैं। इसके पीछे शास्त्रों की यह उदात्त भावना निहित होती है कि जिस प्रकार पक्षी सदा झुंड में रहकर एक दूसरे का संबल बनते हैं, उसी प्रकार हमारा संपूर्ण परिवार और समाज भी आपसी मतभेदों को भुलाकर सदा एक सूत्र में बंधा रहे। इस अनुष्ठान के संपन्न होने के उपरांत सभी लोग नवीन वस्त्र धारण करके अपने कुल के वयोवृद्ध जनों, आदरणीय गुरुओं और संबंधियों के घर जाते हैं, उनके चरण स्पर्श करके दीर्घायु और कल्याण का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं तथा एक दूसरे को मिष्ठान्न और उपहार भेंट करके आपसी सौहार्द को चिरस्थायी बनाते हैं।

शबरीमला का मकरविलक्कु और मकरा ज्योति का रहस्य क्या है?

केरल के घने वर्षा वनों, सह्याद्रि की दुर्गम पर्वत श्रेणियों और पवित्र पंपा नदी के सुरम्य तट पर अवस्थित शबरीमला का श्री अयप्पा स्वामी धाम मकर संक्रांति के दिन संपूर्ण ब्रह्मांडीय ऊर्जा के पराकाष्ठा केंद्र के रूप में परिवर्तित हो जाता है। इस परम पावन तिथि पर भगवान धर्म शास्ता अयप्पा के दर्शन का पुण्य लाभ प्राप्त करने हेतु देश विदेश से लाखों निष्ठावान श्रद्धालु 41 दिनों का अत्यंत कठोर, दुष्कर और सात्विक 'मंडलम' व्रत धारण करके नंगे पैर पैदल चलकर इस दुर्गम तीर्थ पर पहुंचते हैं। इस कठिन साधना काल में प्रत्येक भक्त काले अथवा गहरे नीले रंग के वस्त्र धारण करता है, भूमि पर शयन करता है, दिन में केवल एक बार सात्विक कंदमूल या फलाहार ग्रहण करता है, निरंतर पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करता है और अपने मुख से केवल 'स्वामीये शरणम अयप्पा' का ही उच्चारण करता है। अपने शीश पर 'इरुमुडी' अर्थात शुद्ध देशी घी से भरा हुआ त्रिनेत्र नारियल, कपूर और पूजा सामग्री की दोहरी पोटली संतुलित करके भक्त भगवान परशुराम द्वारा प्रतिष्ठित अठारह पावन स्वर्ण सीढ़ियों को पार करके स्वामी अयप्पा के मूल गर्भगृह के समक्ष पहुंचते हैं।

मकर संक्रांति की संध्या वेला में जब भगवान भुवन भास्कर अस्ताचल की गोद में विश्राम करने लगते हैं, ठीक उसी समय भगवान अयप्पा के दिव्य विग्रह को त्रावणकोर के प्राचीन राजपरिवार द्वारा पारंपरिक सुरक्षा में भेजी गई तीन विशाल पेटियों में रखे 'तिरुवाभरणम' अर्थात अलौकिक स्वर्ण आभूषणों से नख शिख तक अलंकृत किया जाता है। ठीक उसी समय गर्भगृह के ठीक ऊपर खुले आकाश में एक अत्यंत विशाल, देदीप्यमान और अलौकिक तारा उदित होता है जिसे सनातन पंचांग में 'मकरा ज्योति' कहा जाता है। इसके कुछ ही क्षणों के पश्चात गर्भगृह के ठीक सम्मुख स्थित अत्यंत सघन और दुर्गम 'पोन्नम्बलमेडु' पर्वत के शिखर पर घने अंधकार के बीच तीन बार एक अलौकिक दिव्य ज्योति अत्यंत तीव्र वेग से प्रज्वलित होती हुई दिखाई देती है, जिसे संपूर्ण विश्व में 'मकरविलक्कु' के नाम से जाना जाता है। जैसे ही यह पावन ज्योति प्रज्वलित होती है, संपूर्ण पर्वत कंदराएं, वन प्रदेश और लाखों भक्तों का जनसमूह आंसुओं से भरे नेत्रों के साथ दोनों हाथ उठाकर 'स्वामीये शरणम अयप्पा' के गगनभेदी महाघोष से संपूर्ण वातावरण को कंपित कर देता है। यह दिव्य दर्शन प्रत्येक साधक के अंतर्मन को यह प्रत्यक्ष अनुभूति कराता है कि जब मनुष्य अपने संपूर्ण शारीरिक अहंकार, वासनाओं और सांसारिक विकारों का विसर्जन कर देता है, तभी उसकी जीवात्मा को परमात्मा के उस परम ज्योतिर्मय दिव्य प्रकाश के साक्षात्कार का परम सौभाग्य प्राप्त हो पाता है।

दक्षिण भारतीय संक्रांति के 5 प्रमुख आध्यात्मिक और वास्तु सूत्र कौन से हैं?

दक्षिण भारत की इस सहस्रों वर्ष पुरानी संक्रांति परंपरा में कुछ अत्यंत गूढ़, वैज्ञानिक और वैदिक वास्तु सम्मत नियम अंतर्निहित हैं जो मानव जीवन को रोगमुक्त, ऐश्वर्यशाली और मानसिक शांति से परिपूर्ण बनाए रखने में सक्षम हैं।

  1. चावल के ताजे आटे के कोलम द्वारा नकारात्मक ऊर्जा का पूर्ण अवरोध: पोंगल के चारों दिनों में प्रातः काल घर की देहरी और मुख्य प्रवेश द्वार पर शुद्ध चावल के महीन पिसे हुए सूखे आटे से अत्यंत जटिल ज्यामितीय आकृतियों वाले कोलम अर्थात रंगोली बनाई जाती है। प्राचीन वास्तु शास्त्र के अनुसार चावल का शुद्ध आटा घर की चौखट से भीतर प्रवेश करने वाली दूषित, भारी और नकारात्मक वायु को पूरी तरह सोख लेता है। इसके साथ ही यह भूमि पर विचरण करने वाली नन्ही चींटियों, कीड़ों और पक्षियों के लिए एक सहज और अहिंसक आहार बनता है जो वैदिक धर्म के पंच महायज्ञों में से एक 'भूत यज्ञ' का साक्षात और सुंदर आचरण है।

  2. ताम्र और मृत्तिका पात्रों में भोजन पकाने का वैज्ञानिक विधान: सूर्य पोंगल के दिन पवित्र नैवेद्य तैयार करने के लिए केवल नई मिट्टी से बनी हांडी अथवा शुद्ध पीतल और तांबे के पात्र का ही उपयोग अनिवार्य किया गया है। आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार मिट्टी के पात्र में धीमी मंद आंच पर पकने वाले अन्न के भीतर उपस्थित सभी आवश्यक सूक्ष्म खनिज और जीवन रक्षक तत्व शत प्रतिशत सुरक्षित रहते हैं, जिसके सेवन से शीत ऋतु के संधिकाल में मानव शरीर की जठराग्नि सुदृढ़ होती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि होती है।

  3. कच्ची हल्दी और ताजे अदरक के पौधों का मांगलिक बंधन: पोंगल पकाने वाले पात्र के गले में कच्ची हल्दी की हरी गांठें और ताजे अदरक के पौधे पीले धागे से बांधे जाते हैं। यह विधान केवल एक बाह्य मांगलिक सजावट नहीं है बल्कि यह अत्यंत शक्तिशाली औषधीय वनस्पति वातावरण में उपस्थित शीतकालीन विषाणुओं और जीवाणुओं को नष्ट करती है तथा भोजन की वाष्प को प्राकृतिक रूप से एंटीबैक्टीरियल गुणों से संपृक्त कर देती है।

  4. गोमाता की त्रिगुणात्मक परिक्रमा और पितृ ऋण से मुक्ति: मट्टू पोंगल के पावन दिन गोमाता और नंदी बैल की तीन बार श्रद्धापूर्वक परिक्रमा करके उन्हें शुद्ध गुड़, हरा चारा और भीगे हुए चने खिलाने से जातक की जन्म कुंडली के समस्त क्रूर ग्रह दोष शांत हो जाते हैं। सनातन धर्म की यह दृढ़ मान्यता है कि इस दिन गोवंश की सेवा करने से अतृप्त पितरों की आत्मा को परम तृप्ति प्राप्त होती है और उस परिवार में कभी भी अकाल मृत्यु अथवा गंभीर वंश दोष का संकट उत्पन्न नहीं होता।

  5. मानसिक त्याग और क्षमाशीलता का अंतर्मुखी संकल्प: भोगी के दिन केवल बाह्य भौतिक कबाड़ और पुरानी वस्तुओं को जलाना ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि साधक को अपने हृदय से दूसरों के प्रति पाल रखी गई पुरानी कड़वाहट, ईर्ष्या, क्रोध और प्रतिशोध की भावनाओं की आहुति भी देनी पड़ती है। सौर संक्रांति के नए चक्र में प्रवेश करने से पूर्व अपने अंतःकरण को पूरी तरह स्वच्छ और क्षमाशील बनाना ही इस पर्व का वास्तविक आध्यात्मिक रहस्य माना गया है।

उत्तर और दक्षिण की सांस्कृतिक एकात्मकता का संदेश क्या है?

यदि कोई प्रबुद्ध साधक भारतवर्ष के समग्र सांस्कृतिक मानचित्र का निष्पक्ष और गंभीर दृष्टि से अवलोकन करे, तो उसे यह देखकर परम विस्मय और आनंद की अनुभूति होगी कि उत्तर में पंजाब की पावन लोहड़ी, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश की मकर संक्रांति व तिलवा संक्रांति, असम का माघ बिहू, बंगाल का गंगासागर मेला और दक्षिण में तमिलनाडु का पोंगल तथा केरल का मकरविलक्कु बाह्य स्वरूप, भाषा और खानपान में भिन्न दिखाई देते हुए भी अपनी आंतरिक आध्यात्मिक चेतना में शत प्रतिशत एक ही प्राण से स्पंदित हो रहे हैं। उत्तर में जहां कड़ाके की ठंड के बीच पतित पावनी मां गंगा के शीतल जल में डुबकी लगाकर भगवान सूर्य को तांबे के लोटे से अर्घ्य दिया जाता है और काले तिल व गुड़ की आहुति अग्नि में दी जाती है, वहीं दक्षिण में पवित्र कावेरी, गोदावरी और पंपा के पावन तटों पर नए धान के चावल और ताजे गन्ने के रस से बनी शक्करई पोंगल का नैवेद्य सूर्य नारायण के चरणों में समर्पित किया जाता है। उत्तर में जहां इस संक्रांति पर उड़द की दाल और चावल की खिचड़ी का दान करके दरिद्रता का नाश किया जाता है, वहीं दक्षिण भारत में उसी नए चावल और मूंग की दाल से बने वेण पोंगल का प्रसाद बनाकर संपूर्ण समाज में वितरित किया जाता है।

यह पावन पर्व संपूर्ण भारत राष्ट्र को एक अत्यंत सुदृढ़, अदृश्य और अविनाशी आध्यात्मिक सूत्र में पिरोकर खड़ा कर देता है। यह पर्व हमें यह अमर संदेश देता है कि भारत की सांस्कृतिक और भाषाई विविधता उसकी कोई आंतरिक दुर्बलता नहीं है बल्कि वह सनातन वैदिक वटवृक्ष की वे विभिन्न शाखाएं हैं जो एक ही मूल तने और जड़ों से जीवन रस ग्रहण कर रही हैं। जब तमिलनाडु के किसी सुदूर गांव का एक साधारण कृषक अपनी पकी हुई सुनहरी फसल को देखकर हाथ जोड़कर सूर्य नारायण के आगे अपनी आंखें मूंदता है, तो उसके अंतर्मन में ठीक वही कृतज्ञता और ईश्वरीय प्रेम का भाव हिलोरे ले रहा होता है जो उत्तर प्रदेश अथवा हरियाणा के उस किसान के हृदय में स्पंदित होता है जो अपने लहलहाते गेहूं के खेतों को देखकर भगवान भास्कर के प्रति नतमस्तक होता है। यह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकात्मकता ही हमारी सनातन भारतीय संस्कृति की वह अमर संजीवनी शक्ति है जिसने सहस्रों वर्षों के आक्रमणों, परिवर्तनों और काल के थपेड़ों के उपरांत भी इस राष्ट्र की आत्मा को अखंड और अमर बनाए रखा है।

प्रकृति वंदना और संक्रांति पर्व का शाश्वत संदेश क्या है?

पोंगल और मकर संक्रांति का यह पावन महापर्व केवल कुछ दिन का उत्सव मनाकर पुनः सांसारिक भागदौड़ में खो जाने का माध्यम नहीं है बल्कि यह संपूर्ण मानव जाति को अपनी मूल जड़ों, अपनी पोषक प्रकृति और अपने पर्यावरण की ओर लौटने का एक अत्यंत विनम्र और गंभीर वैदिक आह्वान है। इक्कीसवीं सदी के इस आधुनिक, यांत्रिक और भौतिकता की अंधी दौड़ वाले युग में जब मनुष्य अपनी जड़ों से कटकर सीमेंट के जंगलों में प्रकृति से सर्वथा विमुख होकर जीने लगा है तब यह महापर्व हमें झकझोर कर यह शाश्वत सत्य याद दिलाता है कि हमारा क्षणिक अस्तित्व इस धरती की उपजाऊ मिट्टी, निर्मल जल, जीवनदायी सूर्य का प्रकाश, शुद्ध वायु और उन मूक पशुओं की निरंतर सेवा पर ही पूरी तरह आश्रित है जो बिना किसी स्वार्थ के दिन रात हमारा पोषण करते हैं। जब तक हम कृतज्ञ भाव से धरती माता, सूर्य देव, गोवंश और अपने संपूर्ण प्राकृतिक परिवेश के प्रति नतमस्तक नहीं होंगे तब तक मानव समाज में न तो स्थायी स्वास्थ्य संभव है और न ही वास्तविक आंतरिक शांति का वास हो सकता है। नए मिट्टी के पात्र में उबलते हुए पोंगल का वह दूधिया उफान हमें यह दिव्य आध्यात्मिक संदेश देता है कि हमारे अंतःकरण को भी संकीर्ण स्वार्थों और ईर्ष्या की सीमाओं को तोड़कर प्रेम, उदारता, परोपकार, करुणा और ईश्वरीय भक्ति के पावन रस से इसी प्रकार निरंतर उफनते रहना चाहिए। भगवान सूर्य देव के उत्तरायण का यह अलौकिक प्रकाश हम सभी के जीवन से अज्ञानता, वैमनस्य और संकीर्णता के घने अंधकार को पूरी तरह मिटाकर हमें सत्य, धर्म, त्याग और विश्व बंधुत्व के सनातन मार्ग पर निरंतर गतिशील बनाए रखे, यही इस दक्षिण भारतीय संक्रांति पर्व की वास्तविक, सर्वोच्च और अमर सार्थकता है।

FAQ

तमिलनाडु में पोंगल का पर्व कितने दिनों तक मनाया जाता है और उनके नाम क्या हैं? तमिलनाडु में पोंगल का महापर्व लगातार चार दिनों तक अत्यंत नियम और निष्ठा के साथ मनाया जाता है। इसके प्रथम दिन को भोगी पोंगल कहा जाता है, दूसरे दिन को मुख्य सूर्य पोंगल कहा जाता है, तीसरे दिन को गोवंश पूजा हेतु मट्टू पोंगल कहा जाता है और चौथे व अंतिम दिन को सामाजिक मिलन हेतु काणुम पोंगल कहा जाता है।

सूर्य पोंगल पर 'पोंगोलो पोंगल' क्यों बोला जाता है और इसका क्या अर्थ है? जब नए मिट्टी के पात्र में ताजा दूध, नया चावल और गुड़ का मिश्रण पूरी तरह पककर उबलता है और पात्र के चारों कोनों से बाहर गिरने लगता है तब परिवार के सभी लोग अत्यंत उल्लास के साथ 'पोंगोलो पोंगल' का उद्घोष करते हैं। इसका वास्तविक अर्थ यह होता है कि जिस प्रकार यह पात्र संपन्नता से उफन रहा है, ठीक उसी प्रकार हमारे घर में भी सुख, धन, अन्न और समृद्धि का निरंतर विस्तार होता रहे।

मट्टू पोंगल के दिन बैलों और गायों की विशेष पूजा क्यों की जाती है? सनातन कृषि संस्कृति में गाय और बैल केवल पशु नहीं माने गए हैं बल्कि वे परिवार के पालनहार और साक्षात नंदीश्वर के स्वरूप स्वीकार किए गए हैं। पूरे वर्ष भर खेतों में अथक परिश्रम करके मानव जाति के लिए अन्न उपजाने वाले इन मूक पशुओं के प्रति कृतज्ञता, आदर और वात्सल्य व्यक्त करने के लिए ही मट्टू पोंगल पर उनका श्रृंगार, पूजन और आरती की जाती है।

शबरीमला में मकरविलक्कु ज्योति के दर्शन का क्या आध्यात्मिक महत्व है? मकर संक्रांति की पावन संध्या को शबरीमला के सामने पोन्नम्बलमेडु पर्वत पर घने अंधकार के बीच दिखाई देने वाली पावन मकरविलक्कु ज्योति को भगवान स्वामी अयप्पा का साक्षात चैतन्य और दिव्य तेज माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार 41 दिनों के कठोर मंडलम व्रत का पालन करके इस दिव्य ज्योति के दर्शन करने से साधक के जन्म जन्मांतर के पाप कट जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

पोंगल के पावन अवसर पर घरों के मुख्य द्वार पर चावल के आटे का कोलम क्यों बनाया जाता है? पोंगल पर घर की चौखट और आंगन में पिसे हुए सूखे चावल के आटे से बनाई जाने वाली कोलम अर्थात पारंपरिक रंगोली घर के भीतर माता महालक्ष्मी और सकारात्मक दैवीय ऊर्जा का स्वागत करती है। इसके साथ ही यह वास्तु दोषों का शमन करती है और भूमि पर विचरण करने वाली चींटियों व सूक्ष्म जीवों को बिना मांगे सात्विक भोजन उपलब्ध कराती है जो सनातन धर्म का परम पुनीत कर्तव्य माना गया है।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

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