सफला एकादशी से अटके कार्य कैसे सिद्ध होंगे?

By पं. अभिषेक शर्मा

अच्युत पूजन, पौराणिक कथा, रात्रि जागरण और कार्य सिद्धि उपाय

सफला एकादशी: अटके कार्यों की सिद्धि, व्रत कथा और पूजा विधि

सफला एकादशी का शास्त्रीय स्वरूप और अनिवार्य नियम

सनातन धर्म की अत्यंत प्राचीन और प्रामाणिक एकादशी परंपरा में पौष मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली तिथि को 'सफला एकादशी' के नाम से संबोधित किया जाता है। जैसा कि इसके पावन नाम से ही स्पष्ट परिलक्षित होता है, यह एकादशी मनुष्य के संपूर्ण जीवन में सफलता, अभीष्ट सिद्धि और सौभाग्य का संचार करने वाली मानी गई है। पद्म पुराण के उत्तर खंड में भगवान श्री कृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिर के संवाद में इस महाव्रत की महिमा का विशद वर्णन प्राप्त होता है। जब जातक अपने कर्मक्षेत्र, व्यवसाय, आजीविका अथवा पारिवारिक दायित्वों में बारंबार असफलताओं का सामना कर रहा हो तब सफला एकादशी का व्रत उसके संचित प्रारब्ध के अवरोधों को नष्ट करने वाला सिद्ध होता है।

इस पावन तिथि पर जगत के पालनहार भगवान श्री विष्णु के दिव्य 'अच्युत' स्वरूप की विधिवत अर्चना की जाती है। अच्युत शब्द का अर्थ है जो कभी अपने स्वरूप से च्युत अर्थात विचलित नहीं होता और जो अपने शरणागत भक्तों को कभी पतन के गर्त में गिरने नहीं देता। शीत ऋतु के चरम प्रभाव वाले पौष मास में जब वातावरण अत्यंत शांत और अंतर्मुखी होता है तब यह व्रत साधक के आत्मबल को हिमालय की भांति सुदृढ़ बना देता है।

व्रत एवं साधना आयामशास्त्रीय विवरण एवं नियमआध्यात्मिक व व्यावहारिक प्रतिफल
नियमविधानविधान
प्रधान तिथिपौष मास कृष्ण पक्ष एकादशीअटके हुए कार्यों की निर्विघ्न सिद्धि और भाग्योदय
अधिष्ठाता देव स्वरूपभगवान श्री विष्णु (अच्युत स्वरूप)स्थिरता, संकट मुक्ति, आत्मबल और मोक्ष की प्राप्ति
व्रत का मुख्य स्वरूपपूर्ण निर्जला अथवा सात्विक फलाहारशरीर शुद्धि, जठराग्नि संतुलन और मानसिक एकाग्रता
विशिष्ट पूजन द्रव्यश्रीफल (नारियल), सुपारी, लौंग, अनार, तुलसी दलपंचतत्वों की तृप्ति और दरिद्रता का समूल नाश
प्रधान धूप एवं दीपशुद्ध गोघृत का अखंड दीपक, गुग्गल व कर्पूर धूपवास्तु शुद्धि, सकारात्मक ऊर्जा और तमस का निवारण
रात्रि साधना नियमरात्रि जागरण, हरि कीर्तन और द्वादश अक्षर मंत्रसहस्त्र वर्षों की तपस्या और सहस्र गोदान के समान पुण्य
पारण का समयद्वादशी तिथि के सूर्योदय उपरांत शुभ मुहूर्त मेंव्रत की पूर्णता, पाप क्षय और वैकुंठ धाम की प्राप्ति

सफला एकादशी के अनुष्ठान का संकल्प दशमी तिथि की संध्या से ही आरंभ हो जाता है। दशमी की रात्रि में सात्विक और अल्पाहार ग्रहण करके साधक को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। एकादशी के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में शय्या त्यागकर शुद्ध जल से स्नान करके पीले अथवा श्वेत वस्त्र धारण किए जाते हैं। पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके भगवान अच्युत के सम्मुख व्रत का संकल्प लिया जाता है। इस व्रत में केवल भूखे रहना उपवास नहीं है बल्कि अपनी समस्त ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों को सांसारिक विकारों से समेटकर प्रभु के चरणों में स्थापित करना ही वास्तविक उपवास माना गया है।


पद्म पुराण में वर्णित सफला एकादशी की पावन कथा

पद्म पुराण में सफला एकादशी के महात्म्य से जुड़ी एक अत्यंत मार्मिक और शिक्षाप्रद कथा वर्णित है। प्राचीन काल में चंपावती नगरी में राजा माहिष्मान राज्य करते थे। उनके चार पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़ा पुत्र लुम्पक अत्यंत दुराचारी, पापी और अधर्मी था। वह निरंतर मदिरापान, परस्त्री गमन, द्यूतक्रीड़ा और वेश्यागमन जैसे घृणित कृत्यों में लिप्त रहता था। उसने अपने पिता के धन को अपव्यय में उड़ा दिया और निरंतर साधु-संतों तथा देवताओं की निंदा करता रहता था।

जब राजा माहिष्मान ने देखा कि उसका ज्येष्ठ पुत्र किसी भी प्रकार से सुधरने योग्य नहीं है, तो उन्होंने भारी मन से उसे अपने राज्य से निष्कासित कर दिया। बंधु-बांधवों द्वारा त्यागे जाने के बाद लुम्पक घने जंगल में जाकर रहने लगा। वह दिन के समय वन के निर्दोष पशुओं का वध करता और रात्रि में नगर में जाकर निर्धन प्रजा के घरों में चोरी करता था। जिस वन में वह रहता था, वह वन साक्षात भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय था और वहां एक अत्यंत विशाल व प्राचीन पीपल (अश्वत्थ) का वृक्ष स्थित था। लुम्पक उसी पीपल के वृक्ष के नीचे निवास करता था।

  • पौष कृष्ण पक्ष की भीषण शीत: पौष मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि की रात्रि में कड़ाके की ठंड और शीतलहर के कारण लुम्पक पूरी रात ठिठुरता रहा। ठंड के तीव्र प्रभाव से वह मूर्छित हो गया और वस्त्रहीन होने के कारण मृत्यु के निकट पहुँच गया।
  • एकादशी के दिन अनजाने में उपवास: अगले दिन जब सफला एकादशी का सूर्योदय हुआ तब दोपहर तक वह अचेत पड़ा रहा। दोपहर के समय जब उसे होश आया, तो अत्यधिक दुर्बलता और अंगों में जकड़न के कारण वह शिकार करने में सर्वथा असमर्थ था।
  • फलों का समर्पण और रात्रि जागरण: भूख से व्याकुल होकर उसने वन में नीचे गिरे हुए कुछ जंगली फलों को एकत्र किया। जब वह सायंकाल पीपल के वृक्ष के मूल में लौटा, तो भूख और अत्यधिक ठंड के कारण वह उन फलों को खा न सका। उसने अश्रुपूर्ण नेत्रों से उन फलों को पीपल की जड़ में रख दिया और विलाप करते हुए कहा कि हे प्रभु! ये फल आपके ही चरणों में समर्पित हैं, मुझ पापी की रक्षा करें।
  • अखंड जागरण और प्रभु की कृपा: उस पूरी रात लुम्पक भूख और असहनीय ठंड के कारण एक क्षण के लिए भी सो नहीं सका और भगवान का नाम लेकर क्रंदन करता रहा। अनजाने में ही उससे सफला एकादशी का पूर्ण निर्जला व्रत, फलाहार का समर्पण और रातभर का अखंड जागरण संपन्न हो गया।

इस अनजाने में किए गए व्रत के प्रभाव से भगवान अच्युत अत्यंत प्रसन्न हो गए। सफला एकादशी के दिव्य पुण्य से लुम्पक के जन्म-जन्मांतरों के समस्त संचित महापाप तत्काल भस्म हो गए। द्वादशी के प्रातःकाल एक दिव्य आकाशवाणी हुई और एक अलौकिक अश्व उसके सम्मुख उपस्थित हुआ। प्रभु की कृपा से उसकी बुद्धि सात्विक हो गई, उसका शरीर दिव्य कांति से युक्त हो गया और वह पुनः अपने पिता के राज्य में लौटा। राजा माहिष्मान ने अपने पुत्र में यह आमूलचूल परिवर्तन देखकर उसे संपूर्ण राज्य का भार सौंप दिया। लुम्पक ने आजीवन धर्मपूर्वक शासन किया और अंत समय में सपरिवार भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त हुआ।


भगवान अच्युत की पंचोपचार व षोडशोपचार पूजा का शास्त्रीय विधान

सफला एकादशी के दिन भगवान विष्णु के अच्युत स्वरूप की पूजा का विशेष शास्त्रीय क्रम निर्धारित है। शीत ऋतु का काल होने के कारण इस दिन भगवान को अर्पित की जाने वाली सामग्रियों में उष्ण और पोषक तत्वों की प्रधानता होती है।

पूजा स्थल को गंगाजल और गोमूत्र से पवित्र करके एक सुंदर काष्ठ की चौकी पर पीत रेशमी वस्त्र बिछाएं। उस पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा अथवा शालिग्राम शिला को विराजमान करें। एक तांबे अथवा पीतल के कलश में शुद्ध जल, गंगाजल, सुपारी और अक्षत डालकर चौकी के ईशान कोण में स्थापित करें और उस पर नारियल रखें।

क्रमपूजन उपचारशास्त्रीय द्रव्य एवं सामग्रीआध्यात्मिक भाव एवं उद्देश्य
नियमविधानविधानविधान
प्रथमपाद्य एवं अर्घ्यतांबे के पात्र में गंगाजल, चंदन, तुलसी पत्रभगवान के श्रीचरणों का प्रक्षालन और सम्मान
द्वितीयपंचामृत स्नानगोदुग्ध, दही, गोघृत, मधु और शर्करास्थूल और सूक्ष्म देह के विकारों का परिमार्जन
तृतीयवस्त्र एवं उपवीतपीत रेशमी वस्त्र और शुद्ध कपास का यज्ञोपवीतसात्विक चेतना और मर्यादा का वरण
चतुर्थगंध एवं तिलकगोपीचंदन, मलयगिरि श्वेत चंदन और कुमकुमआज्ञा चक्र की शीतलता और अंतःकरण की शुद्धि
पंचमविशिष्ट फल अर्पणश्रीफल (नारियल), दाड़िम (अनार), बिजौरा नींबूकर्मफल की परिपक्वता और अटके कार्यों की सिद्धि
षष्ठसुगंधित द्रव्यसाबुत लौंग, सुपारी, जायफल, इलायचीमुख शुद्धि, वाणी प्रभाव और नवग्रह अनुकूलता
सप्तमदीप एवं धूपगाय के घी का नौ बत्तियों वाला अथवा अखंड दीपकअज्ञान के अंधकार का नाश और ज्ञान का प्रकाश

पूजा के समय भगवान को तुलसी की मंजरी और पीले गेंदे अथवा पीले कनेर के पुष्प अवश्य अर्पित करें। तुलसी के बिना भगवान विष्णु किसी भी नैवेद्य को स्वीकार नहीं करते। पूजा करते समय निरंतर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' अथवा 'ॐ अच्युताय नमः' मंत्र का उच्चारण करते रहना चाहिए।

नैवेद्य के रूप में ऋतु फल, माखन-मिश्री, सिंघाड़े का आटा और खोए की सात्विक मिठाइयां अर्पित की जाती हैं। पूजा के अंत में कपूर से भगवान की आरती उतारें और शंख की गंभीर ध्वनि करें। शंख की ध्वनि से पूजा स्थल के आसपास का संपूर्ण वातावरण निष्पाप और शुद्ध हो जाता है।


अटके हुए कार्यों की सिद्धि और दुर्भाग्य निवारण के अचूक उपाय

सफला एकादशी का दिन उन लोगों के लिए एक दिव्य अवसर है जिनके कार्य अंतिम क्षण में आकर बिगड़ जाते हैं, व्यापार में लगातार घाटा हो रहा हो अथवा आजीविका में अनचाहे संकट खड़े हो रहे हों। पद्म पुराण और वैदिक ज्योतिष के अनुसार इस दिन कुछ विशेष अनुष्ठानों को करने से दुर्भाग्य का नाश होकर सौभाग्य का द्वार खुलता है।

  • श्रीफल (नारियल) का विशेष संपुट विधान: सफला एकादशी के दिन एक पानी वाला जटा नारियल लें। उस पर मौली (कलावा) लपेटें और रोली से उस पर स्वस्तिक का निर्माण करें। भगवान अच्युत के चरणों में बैठकर 108 बार 'ॐ अच्युताय नमः' मंत्र का जप करते हुए अपनी मनोकामना का स्मरण करें। इसके पश्चात उस नारियल को किसी प्राचीन विष्णु मंदिर में अर्पित कर दें अथवा बहते जल में प्रवाहित करें। यह प्रयोग वर्षों से अटके हुए कानूनी विवाद और आर्थिक गतिरोध को तत्काल समाप्त करता है।
  • पीपल वृक्ष की सेवा और दीपदान: चूंकि सफला एकादशी की कथा में अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष का विशेष महत्व है, अतः इस दिन दोपहर के समय किसी प्राचीन पीपल के वृक्ष की जड़ में कच्चा दूध, जल और काले तिल अर्पित करें। संध्या के समय पीपल की जड़ में शुद्ध सरसों के तेल अथवा तिल के तेल का चौमुखा दीपक प्रज्वलित करें और ग्यारह परिक्रमा करें। इससे कुंडली के समस्त पितृ दोष और शनि-राहु की क्रूर दशाएं शांत होती हैं।
  • अनार और लौंग का अर्पण: व्यापार में आ रही मंदी को दूर करने के लिए भगवान अच्युत को सात साबुत लौंग और एक पका हुआ लाल अनार अर्पित करें। पूजा के उपरांत उन लौंगों को एक लाल कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी अथवा व्यापारिक गल्ले में रख लें। इससे धन का अनावश्यक अपव्यय रुकता है और ग्राहकों की आवक बढ़ती है।
  • तुलसी नामाष्टक का पाठ: इस दिन संध्या के समय तुलसी के पौधे के समीप गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाकर 'तुलसी नामाष्टक' का ग्यारह बार पाठ करने से घर का वास्तु दोष मिटता है और परिवार के सदस्यों के मध्य वैचारिक सामंजस्य स्थापित होता है।

यह उपाय साधक के भीतर एक अभूतपूर्व आत्मविश्वास का संचार करते हैं, जिससे वह हर प्रकार के संकट का सामना करने में सक्षम हो जाता है।


एकादशी की रात्रि में जागरण का तात्विक व यौगिक विज्ञान

शास्त्रों का यह अटल सिद्धांत है कि एकादशी का व्रत रात्रि जागरण के बिना पूर्ण फल प्रदान नहीं करता। सफला एकादशी की रात्रि में किए जाने वाले जागरण को 'महाजागरण' कहा गया है। पद्म पुराण में भगवान श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं कि एकादशी के दिन जो पुण्य सहस्रों वर्षों तक कठिन तपस्या करने से अथवा सहस्र गोदान करने से मिलता है, वह पुण्य सफला एकादशी की रात्रि में जागरण करने मात्र से सुलभ हो जाता है।

यौगिक दृष्टि से रात्रि का समय तमोगुण का काल होता है। शीत ऋतु की लंबी और शांत रात्रियों में मानव शरीर स्वाभाविक रूप से गहरी निद्रा और आलस्य में डूब जाना चाहता है। जब साधक इस प्राकृतिक सुस्ती और तमस को अपनी इच्छाशक्ति से पराजित करके रात्रि में जागता है, तो उसकी प्राण ऊर्जा मूलाधार से ऊर्ध्वगामी होकर सहस्रार चक्र की ओर गतिशील होने लगती है।

पहररात्रि जागरण का चरणअनुष्ठानिक विधानतात्विक फल
नियमविधानविधानविधान
प्रथम पहररात्रि 8 से 11 बजेविष्णु सहस्त्रनाम एवं श्रीमद्भगवद्गीता पाठवाणी की शुद्धि, मानसिक शांति और एकाग्रता
द्वितीय पहररात्रि 11 से 2 बजेअच्युताष्टकम एवं द्वादश अक्षर मंत्र जपहृदय चक्र का शोधन और भय व चिंताओं का नाश
तृतीय पहररात्रि 2 से 4 बजेमौन ध्यान और श्वासों पर अजपा-जपआज्ञा चक्र का जागरण और दिव्य अंतर्दृष्टि
चतुर्थ पहरप्रातः 4 से 6 बजे (ब्रह्म मुहूर्त)मंगला आरती, सूर्य स्तुति और नारायण वंदनसंचित प्रारब्ध कर्मों का क्षय और ओज की वृद्धि

रात्रि जागरण के समय सांसारिक प्रपंचों, मोबाइल फोन अथवा व्यर्थ की चर्चाओं में समय नष्ट नहीं करना चाहिए। इस समय भगवान के दिव्य नामों का संकीर्तन करना चाहिए। यदि संभव हो तो सामूहिक रूप से ढोलक, मंजीरे के साथ हरि कीर्तन करें। कीर्तन की दिव्य ध्वनि तरंगें वातावरण में उपस्थित नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट कर देती हैं और घर में एक अलौकिक सुरक्षा कवच का निर्माण करती हैं।


सफला एकादशी पारण का शास्त्रीय नियम और विधि

एकादशी व्रत का संपूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसका पारण (व्रत खोलना) शास्त्रों द्वारा निर्धारित नियमों और शुभ मुहूर्त के भीतर किया जाए। यदि पारण के नियमों में त्रुटि हो जाए, तो व्रत का फल क्षीण हो जाता है।

द्वादशी तिथि के दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर नित्य क्रियाओं से निवृत्त हों और स्नान करें। इसके उपरांत भगवान अच्युत की संक्षिप्त पूजा करें और उन्हें ताजे भोजन का भोग लगाएं। पारण सदैव 'हरिवासर' समाप्त होने के उपरांत ही किया जाना चाहिए। द्वादशी तिथि का प्रथम चौथाई भाग हरिवासर कहलाता है, जिसमें पारण करना सर्वथा वर्जित माना गया है।

  • ब्राह्मण अथवा निर्धन को भोजन: स्वयं पारण करने से पूर्व किसी योग्य ब्राह्मण अथवा किसी जरूरतमंद व्यक्ति को घर बुलाकर श्रद्धापूर्वक भोजन कराएं अथवा भोजन की कच्ची सामग्री (सीधा) दान करें।
  • गौमाता और पशु-पक्षियों का भाग: भोजन में से प्रथम ग्रास गाय के लिए, दूसरा कौवे के लिए और तीसरा श्वान के लिए निकालना चाहिए।
  • पारण द्रव्य का चयन: सफला एकादशी के व्रत का पारण भगवान के चरणामृत, तुलसी पत्र अथवा आंवले से करना अत्यंत शुभ माना गया है। इसके पश्चात ही सात्विक अन्न ग्रहण करना चाहिए।
  • वर्जित भोजन: पारण के दिन भी प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा और मसूर की दाल का पूर्ण त्याग होना चाहिए। भोजन अत्यंत सात्विक और सुपाच्य होना चाहिए ताकि उपवास के बाद पाचन तंत्र पर भारी दबाव न पड़े।

जो साधक इस विधि से सफला एकादशी का व्रत संपन्न करता है, उसके जीवन की समस्त बाधाएं तिनके की भांति उड़ जाती हैं और वह इस लोक में संपूर्ण सुख भोगकर अंत में वैकुंठ को प्राप्त होता है।


FAQ

सफला एकादशी का व्रत किस देवता को समर्पित है? सफला एकादशी का पावन व्रत भगवान श्री विष्णु के 'अच्युत' स्वरूप को समर्पित है, जो भक्तों को कभी पतन के गर्त में नहीं गिरने देते।

इस एकादशी को सफला एकादशी क्यों कहा जाता है? यह एकादशी मनुष्य के जीवन के समस्त अटके हुए कार्यों को सफल करने वाली और दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने वाली मानी गई है, इसलिए इसे सफला कहते हैं।

सफला एकादशी की पूजा में किन फलों का अर्पण अनिवार्य माना गया है? इस दिन भगवान अच्युत को नारियल (श्रीफल), अनार, सुपारी, लौंग और बिजौरा नींबू अर्पित करना अत्यंत फलदायी माना गया है।

क्या सफला एकादशी के दिन रात्रि जागरण करना आवश्यक है? हाँ, पद्म पुराण के अनुसार सफला एकादशी की रात्रि में जागरण और हरि कीर्तन करने से सहस्र वर्षों की तपस्या और सहस्र गोदान के समान पुण्य प्राप्त होता है।

सफला एकादशी का पारण किस समय और किस प्रकार करना चाहिए? पारण द्वादशी तिथि के दिन हरिवासर समाप्त होने के पश्चात शुभ मुहूर्त में ब्राह्मण को अन्नदान देकर और तुलसी पत्र व चरणामृत से करना चाहिए।

पाएं अपनी सटीक कुंडली

कुंडली बनाएं

क्या आपको यह पसंद आया?

लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

पं. अभिषेक शर्मा (63)


अनुभव: 20

इनसे पूछें: Family Planning, Career

इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें

WELCOME TO

ZODIAQ

Right Decisions at the right time with ZODIAQ