पौष मास में शनि शांति कैसे करें?

By पं. अभिषेक शर्मा

पुष्य नक्षत्र का प्रभाव, छाया दान विधि और पीपल दीपदान के शास्त्रीय उपाय

पौष मास में शनि दोष निवारण: साढ़ेसाती व ढैय्या के अचूक उपाय

सनातन वैदिक पंचांग और काल गणना के अत्यंत गूढ़, गंभीर तथा वैज्ञानिक नियमों के अनुसार पौष मास का नामकरण सत्ताईस नक्षत्रों के मुकुटमणि, पोषणकर्ता तथा कर्मफल दाता भगवान शनि देव के पूर्ण स्वामित्व वाले पुष्य नक्षत्र के आधार पर निर्धारित हुआ है। वैदिक ज्योतिष के प्रामाणिक संहिताओं का यह अकाट्य नियम है कि जिस पूर्णिमा तिथि के संधिकाल पर चंद्रमा जिस विशिष्ट नक्षत्र मंडल में अपनी संपूर्ण सोलह कलाओं के साथ गोचर करते हैं, उसी पावन नक्षत्र के नाम पर उस पूरे सौर चांद्र मास की संज्ञा स्थापित की जाती है और पौष पूर्णिमा के पावन संधिकाल पर चंद्रमा पुष्य नक्षत्र में स्थित होकर अपनी पूर्णता को प्राप्त करते हैं। खगोलीय, ऋतुचर्या और तात्विक दृष्टिकोण से यदि अत्यंत सूक्ष्मता से देखा जाए तो पौष मास की यह हाड़ कंपाने वाली भीषण शीत ऋतु, चारों ओर छाया रहने वाला घना कुहासा, सूर्य रश्मियों की मंदता और बर्फीली हवाएं वास्तव में नवग्रह मंडल में दंडाधिकारी शनि देव के परम शीतल, शुष्क, गंभीर और तीक्ष्ण वायु तत्व के चराचर जगत पर चरम प्रभुत्व को पूर्णतः रेखांकित करती हैं। जब बाह्य प्रकृति में भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव का तेज दक्षिणायन के अंतिम चरण में होने के कारण अत्यंत तिरछा और मंद पड़ जाता है तथा चारों ओर एक निस्तब्ध शांति, घना कोहरा और चुभने वाली ठंडक व्याप्त हो जाती है तब उस समय अंतरिक्षीय ऊर्जा मंडल में मंदगामी शनि देव की सूक्ष्म विद्युत चुंबकीय तरंगें संपूर्ण भूमंडल पर सर्वाधिक शक्तिशाली, संवेदनशील, जागृत और प्रभावी हो जाती हैं।

ज्योतिष शास्त्र के अमर और कालजयी ग्रंथों बृहत्पाराशर होराशास्त्र, फलदीपिका, सारावली और जातक पारिजात में महर्षियों ने यह अत्यंत स्पष्ट उल्लेख किया है कि पौष का यह संपूर्ण महीना शनि देव की कृपा दृष्टि प्राप्त करने, पूर्व जन्मों के क्रूर कर्म बंधनों को काटने और उनकी पीड़ादायक दशाओं से स्थायी मुक्ति पाने का सबसे अनुकूल, गोपनीय और सिद्ध कालखंड है। जिन व्यक्तियों की जन्म कुंडली में इस समय शनि देव की साढ़ेसाती का प्रथम, द्वितीय अथवा तृतीय चरण चल रहा हो, जिन पर अढ़ैया अर्थात ढैय्या का मारक प्रभाव प्रभावी हो अथवा जिनकी जन्म पत्रिका में शनि देव की महादशा, अंतर्दशा या प्रत्यंतर्दशा के कारण जीवन में लगातार आर्थिक अवरोध, मुकदमों का तनाव, मानसिक अवसाद, अचानक दुर्घटनाएं और आजीविका की अस्थिरता बनी हुई हो, उनके लिए पौष मास में की जाने वाली शास्त्रीय आराधना साक्षात संजीवनी के समान कार्य करती है। इस पावन महीने में किए जाने वाले छाया दान, पीपल दीपदान, उड़द और काले तिल के महादान से शनि देव की क्रूर दृष्टि शांत होकर अत्यंत शुभ फलदायिनी बन जाती है। इस मास में शनि शांति के समस्त प्रमुख घटक, तात्विक संबंध, शास्त्रीय सामग्री और ज्योतिषीय उपचारों का प्रामाणिक विवरण नीचे प्रस्तुत तालिका में सुव्यवस्थित रूप से दिया गया है।

साधना एवं शांति घटक शास्त्रीय नियम और आवश्यक पूजन सामग्री ज्योतिषीय आधार और तांत्रिक महत्व
प्रमुख दिन और काल पौष मास के समस्त शनिवार एवं शनि प्रदोष (गोधूलि वेला) शनि देव के वायु तत्व और संधिकाल की चरम एकाग्रता
छाया दान विधान लोहे अथवा कांसे के पात्र में शुद्ध सरसों का तेल जातक के सूक्ष्म नकारात्मक प्रारब्ध और छाया का निष्कासन
प्रधान वृक्ष सेवा प्राचीन पीपल वृक्ष की जड़ में जल और कच्चा दूध अर्पण ब्रह्मा, विष्णु और शिव के संयुक्त तेज से शनि शमन
दीपदान का नियम सरसों के तेल का चौमुखा दीपक और काले तिल अंधकार, अकाल मृत्यु के भय और दृष्टि दोष का नाश
मुख्य रक्षा मंत्र ॐ शं शनैश्चराय नमः अथवा ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः वैदिक और तांत्रिक बीज मंत्रों द्वारा स्नायु तंत्र की स्थिरता
महादान सामग्री काले तिल, साबुत उड़द, काला कंबल और लोहे का तवा शनि देव के क्रूर कारक द्रव्यों का सात्विक विसर्जन
वर्जित आचरण मदिरा, तामसिक मांसाहार, असहायों का अपमान और असत्य शनि के दंड विधान से आत्मरक्षा और शुचिता का पालन

पौष मास और पुष्य नक्षत्र का शनि देव से क्या खगोलीय संबंध है?

वैदिक नक्षत्र मंडल में पुष्य नक्षत्र को सभी सत्ताईस नक्षत्रों में सबसे अधिक कल्याणकारी, पोषण करने वाला और 'अमृत योग' का प्रदाता माना गया है। पुष्य का शाब्दिक अर्थ ही होता है पोषण करने वाला अथवा पुष्पित करने वाला। इस नक्षत्र के अधिष्ठाता देवता देवताओं के गुरु बृहस्पति हैं परंतु इसके स्वामी और अधिपति ग्रह स्वयं मंदगामी शनि देव हैं। जब पौष मास में चंद्रमा इस नक्षत्र पर भ्रमण करते हुए अपनी पूर्ण कलाओं से संपन्न होते हैं तब गुरु के ज्ञान और शनि के कठोर न्याय का एक अत्यंत दुर्लभ, रहस्यमयी और आध्यात्मिक संगम आकाश मंडल में घटित होता है।

खगोल शास्त्र और ज्योतिष विज्ञान का यह अटूट मत है कि शीतकाल की यह शुष्क ठंडक कोई सामान्य मौसमी घटना नहीं है बल्कि यह शनि ग्रह के मूल स्वभाव अर्थात उसके वात प्रकृति, रूखेपन और शीतलता का पृथ्वी पर सीधा प्रकटीकरण है। जब मनुष्य पौष मास में शनि देव की आराधना करता है, तो वह प्रकृति के उस तात्कालिक गुण धर्म के साथ पूरी तरह तालमेल स्थापित कर लेता है। शनि देव कालपुरुष के चक्र में दशम भाव अर्थात कर्म और एकादश भाव अर्थात लाभ व संचित आय के स्वामी हैं। पौष मास में जब कोई साधक शनि देव के चरणों में नतमस्तक होता है, तो उसके कर्मों की अशुद्धियां जलकर भस्म होने लगती हैं और उसके व्यापार, नौकरी और भाग्य में आने वाले अवरोध स्वतः दूर होने लगते हैं। इसके प्रभाव से जातक के अंतःकरण में धैर्य, गंभीरता, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा का ऐसा गहरा भाव उत्पन्न होता है जो उसे सांसारिक थपेड़ों के बीच भी अडिग बनाए रखता है।

छाया दान का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य क्या है?

सनातन ज्योतिष में छाया दान को शनि की पीड़ा से मुक्ति का सबसे अचूक और शक्तिशाली तांत्रिक व वैदिक उपाय स्वीकार किया गया है। शास्त्रों के अनुसार शनि देव साक्षात सूर्य पुत्र हैं और उनकी माता का नाम 'छाया' है। इसी कारण शनि देव को छायापुत्र भी कहा जाता है। मानव के सूक्ष्म शरीर और उसके संचित प्रारब्ध का सीधा संबंध उसकी छाया और उसके चेहरे के तेज से जुड़ा हुआ होता है। जब कोई व्यक्ति किसी गंभीर संकट, शनि की साढ़ेसाती अथवा असाध्य रोग से पीड़ित होता है, तो उसका आभामंडल अत्यधिक मलिन हो जाता है और उसके चेहरे पर एक काली छाया मंडराने लगती है। यह काली छाया वास्तव में शरीर के आभा मंडल में फंसे हुए विषाक्त तमो गुण का बाह्य प्रकटीकरण होती है जो जातक के निर्णय लेने की क्षमता को पंगु बना देती है।

छाया दान करने की प्रामाणिक विधि यह है कि पौष मास के किसी भी शनिवार को प्रातः काल अथवा दोपहर के समय एक लोहे, कांसे अथवा मिट्टी के गोल पात्र में शुद्ध कच्ची घानी का सरसों का तेल भरें। इसके उपरांत उस तेल के पात्र को अपने दोनों हाथों में उठाकर उसमें अपने संपूर्ण मुख, दोनों नेत्रों और मस्तक का स्पष्ट प्रतिबिंब देखें। अपने चेहरे की उस छाया को देखते समय मन ही मन यह प्रार्थना करें कि हे छायापुत्र भगवान शनैश्चर, मेरे इस भौतिक शरीर और अंतःकरण पर छाई हुई समस्त नकारात्मकता, अज्ञान, रोग, ऋण और संचित पापों को इस तेल में समाहित कर लीजिए। अपने चेहरे का पूर्ण दर्शन करने के उपरांत उस तेल और उस पात्र को किसी शनि मंदिर में अथवा शनि का दान लेने वाले जरूरतमंद डाकौत या निर्धन व्यक्ति को पूर्ण श्रद्धा के साथ दान कर देना चाहिए। यह वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध है कि सरसों के तेल में व्यक्ति के शरीर से निकलने वाले सूक्ष्म बायो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक विकिरणों को अवशोषित करने की अद्भुत क्षमता होती है। जब वह तेल दान के माध्यम से घर की परिधि से बाहर चला जाता है, तो जातक के ऊपर से शनि का भयंकर मारक दोष उसी क्षण समाप्त हो जाता है और उसकी अवरुद्ध चेतना पुनः निर्मल होकर कार्य करने लगती है।

पीपल वृक्ष के नीचे संध्या दीपदान से पीड़ा 90% तक कैसे घटती है?

श्रीमद्भगवद्गीता में साक्षात भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि समस्त वृक्षों में मैं 'अश्वत्थ' अर्थात पीपल का वृक्ष हूं। स्कंद पुराण और पद्म पुराण के अनुसार पीपल के वृक्ष की जड़ में भगवान श्री हरि विष्णु, तने में देवाधिदेव महादेव शिव और अग्रभाग में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी का वास होता है। इसके साथ ही भगवान शनि देव को पीपल का वृक्ष अत्यंत प्रिय है क्योंकि पिप्पलाद मुनि की कथा के अनुसार शनि देव ने यह वरदान दिया था कि जो भी मनुष्य पीपल के वृक्ष की सेवा करेगा, उसे मेरी पीड़ा कभी स्पर्श नहीं कर सकेगी। पीपल का वृक्ष दिन और रात दोनों प्रहरों में प्राणवायु का निरंतर उत्सर्जन करने वाला प्रकृति का एक अत्यंत अलौकिक घटक है जिसके सानिध्य में जाने मात्र से मानव का तंत्रिका तंत्र तत्काल शांत हो जाता है।

पौष मास के प्रत्येक शनिवार को गोधूलि वेला अर्थात सूर्यास्त के ठीक समय किसी प्राचीन पीपल के वृक्ष के समीप जाएं। सर्वप्रथम तांबे के पात्र को छोड़कर किसी पीतल अथवा कांसे के लोटे में स्वच्छ जल, थोड़ा सा कच्चा गाय का दूध, काले तिल और चीनी मिलाकर पीपल की जड़ में पूर्व दिशा की ओर मुख करके अर्पित करें। इसके पश्चात मिट्टी अथवा आटे से बना हुआ एक चौमुखा दीपक लें और उसमें शुद्ध सरसों का तेल भरें। उस दीपक में साबुत काले तिल के कुछ दाने डालें और रुई की चार बत्तियां लगाकर उसे पीपल के वृक्ष के नीचे पश्चिम दिशा की ओर मुख करके प्रज्वलित कर दें। दीपक प्रज्वलित करने के उपरांत "ॐ शं शनैश्चराय नमः" मंत्र का जप करते हुए पीपल के वृक्ष की सात बार श्रद्धापूर्वक परिक्रमा करें। परिक्रमा पूर्ण होने के बाद पीपल के तने को दोनों हाथों से स्पर्श करके अपने मस्तक से लगाएं और शनि देव से अपने समस्त कष्टों को हरने की क्षमा याचना करें। यह दिव्य प्रयोग जन्म कुंडली के किसी भी भाव में बैठे हुए शनि के अशुभ प्रभाव, साढ़ेसाती की भयंकर पीड़ा और ढैय्या के मानसिक तनाव को लगभग नब्बे प्रतिशत तक तत्काल शांत कर देता है।

पौष मास में शनि दोष शांति के 5 अचूक शास्त्रीय उपाय कौन से हैं?

पौष मास के इस विशिष्ट नक्षत्र संयोग में शनि देव के क्रूरतम दोषों से रक्षा पाने और जीवन को निष्कंटक बनाने के लिए आचार्यों द्वारा अनुशंसित पांच प्रमुख शास्त्रीय उपाय अत्यंत चमत्कारी प्रभाव दिखाते हैं।

  1. काले तिल, उड़द और लोहे के तवे का गुप्त महादान: पौष मास के शनिवार के दिन किसी अत्यंत निर्धन, असहाय, दिव्यांग अथवा सफाई कर्मचारी को सवा किलो साबुत काले उड़द, सवा सौ ग्राम काले तिल, एक लोहे का तवा अथवा चिमटा और एक मोटा काला कंबल दान करना चाहिए। दान देते समय उस व्यक्ति का कभी उपहास न करें और न ही अपने दान का अहंकार करें। यह महादान कुंडली के आठवें और बारहवें भाव में बैठे शनि के मारक प्रभाव को तत्क्षण समाप्त कर देता है और जातक को अकारण होने वाले धन अपव्यय से सदा के लिए मुक्त करता है।

  2. काले श्वान और पक्षियों को सरसों के तेल की रोटी: प्रतिदिन अथवा विशेष रूप से शनिवार की संध्या को गेहूं के आटे की मोटी रोटी बनाएं और उस पर शुद्ध सरसों का तेल चुपड़कर किसी काले कुत्ते को अपने हाथों से खिलाएं। यदि काला कुत्ता न मिले तो किसी भी श्वान को यह रोटी दी जा सकती है। इसके साथ ही कौवों को भुने हुए काले चने और मीठी पूरी खिलाएं। कुत्ता भगवान भैरव और शनि देव का साक्षात दूत माना जाता है। जब श्वान तृप्त होकर अपनी पूंछ हिलाता है, तो जातक के जीवन से कोर्ट कचहरी के मुकदमे, आकस्मिक दुर्घटनाएं और अकाल मृत्यु का भय तत्काल नष्ट हो जाता है।

  3. शनिवार को दशरथकृत शनि स्तोत्र का 11 बार पाठ: पद्म पुराण के अंतर्गत आने वाला 'दशरथकृत शनि स्तोत्र' शनि पीड़ा निवारण का सबसे प्रामाणिक और शास्त्रीय अमोघ अस्त्र है। जब अयोध्या के चक्रवर्ती राजा दशरथ ने अपनी प्रजा को शनि के रोहिणी शकट भेदन के महाविनाश से बचाने हेतु आकाश में जाकर शनि देव का सामना किया था तब उनके इस पावन स्तुति गान से प्रसन्न होकर शनि देव ने उन्हें कभी भी उनकी प्रजा को कष्ट न देने का वरदान दिया था। पौष मास के प्रत्येक शनिवार को शुद्ध नीले अथवा काले आसन पर बैठकर सरसों के तेल का दीपक जलाकर इस स्तोत्र का 11 बार पाठ करने से व्यापार और नौकरी में आ रही समस्त बाधाएं दूर हो जाती हैं।

  4. शमी वृक्ष की जड़ में जल और शमी पत्र का शिव अर्पण: शास्त्रों में पीपल के समान ही शमी के वृक्ष को साक्षात शनि देव का स्वरूप माना गया है। शनिवार के दिन प्रातः काल शमी के वृक्ष में जल अर्पित करें और उसकी तीन पत्तियां तोड़कर सायंकाल शिवालय में जाकर शिवलिंग पर "ॐ नमः शिवाय" बोलते हुए अर्पित कर दें। भगवान शिव शनि देव के परम गुरु हैं। जब कोई भक्त भगवान शिव को शमी पत्र अर्पित करता है, तो शनि देव उस साधक पर कभी भी रुष्ट नहीं होते और उसकी संपूर्ण दरिद्रता को मिटाकर उसे अपार ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।

  5. शनिवार के दिन पूर्ण सात्विकता और असहायों की सेवा: शनि देव न्याय के अधिपति हैं जो मनुष्य के बाह्य आडंबरों से नहीं बल्कि उसके अंतःकरण की शुचिता और आचरण से प्रसन्न होते हैं। पौष मास में शनिवार के दिन किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों, मदिरा, जुआ, पराई स्त्री गमन और मांसाहार का पूर्ण त्याग रखना चाहिए। अपने घर अथवा कार्यस्थल पर काम करने वाले नौकरों, चालकों और मजदूरों को उनका पारिश्रमिक समय पर दें, उन्हें गर्म चाय और भोजन उपलब्ध कराएं। जब समाज का शोषित और निर्बल वर्ग हृदय से आशीर्वाद देता है, तो शनि देव का क्रोध तत्काल शांत होकर अनुकंपा में बदल जाता है।

शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या का मनोवैज्ञानिक प्रभाव क्या है?

आधुनिक युग में अधिकांश लोग शनि देव के नाम से अकारण ही भयभीत रहते हैं, परंतु वास्तव में शनि देव कोई क्रूर अथवा विनाशकारी ग्रह नहीं हैं, वे तो इस ब्रह्मांड के निष्पक्ष और परम दयालु न्यायाधीश हैं। साढ़ेसाती के साढ़े सात वर्षों का समय अथवा ढैय्या के ढाई वर्ष वास्तव में मनुष्य के अहंकार को गलाने, उसके मिथ्या अभिमान को चूर चूर करने और उसकी आंतरिक चेतना को शुद्ध करने का एक मनोवैज्ञानिक शोधन काल होता है। इस कालखंड में जब व्यक्ति की योजनाएं अचानक असफल होने लगती हैं, जब अपने ही सगे संबंधी मुंह मोड़ लेते हैं और जब धन का अहंकार टूट जाता है तब मनुष्य अंतर्मुखी होकर जीवन के वास्तविक सत्य को समझने का प्रयास करता है। यह अवधि आत्मा को सांसारिक मोह से खींचकर आत्मबोध के धरातल पर स्थापित करने का एक कड़ा आध्यात्मिक प्रशिक्षण बन जाती है।

पौष मास की यह शीत ऋतु हमें यह सिखाती है कि जिस प्रकार वसंत के नवपल्लव आने से पूर्व वृक्षों को अपनी पुरानी, सूखी और सड़ी पत्तियों को गिराना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार शनि देव की यह पीड़ा भी हमारे भीतर संचित अज्ञान, आलस्य और दुर्गुणों को झाड़कर हमें एक नया आध्यात्मिक जीवन प्रदान करने के लिए आती है। जो व्यक्ति पौष मास में शनि के इन उपायों को केवल भय के कारण नहीं बल्कि अपने जीवन के आत्मसुधार और प्रायश्चित की भावना के साथ करता है, उसका भय तत्काल समाप्त हो जाता है। शनि देव ऐसे समर्पित साधक को संसार के समस्त कष्टों से उबारकर उसे समाज में उच्च पद, अटूट प्रतिष्ठा, अखंड कीर्ति और आत्मिक शांति का अमर वरदान प्रदान कर देते हैं।

शनि देव की कृपा और कर्म सिद्धांत का शाश्वत संदेश क्या है?

सनातन धर्म का संपूर्ण भवन 'कर्म सिद्धांत' की सुदृढ़ आधारशिला पर टिका हुआ है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्मयोग का जो उपदेश दिया है, शनि देव उसी उपदेश के साक्षात निष्पक्ष प्रशासक हैं। वे किसी व्यक्ति के साथ न तो पक्षपात करते हैं और न ही बिना कारण किसी को दंडित करते हैं। वे केवल मनुष्य द्वारा अतीत और वर्तमान में किए गए कर्मों का निष्पक्ष लेखा जोखा रखते हैं और उचित समय आने पर उसका फल प्रदान करते हैं। पौष मास हमें यह दिव्य संदेश देता है कि पूजा पाठ और उपायों का वास्तविक लाभ तभी मिलता है जब हमारा दैनिक आचरण सत्य, दया, ईमानदारी और परोपकार से युक्त हो।

यदि कोई मनुष्य पूरे पौष मास में पीपल के नीचे दीपक जलाए और तेल का दान करे, परंतु अपने माता पिता का तिरस्कार करे, असहायों पर अत्याचार करे और बेईमानी से धन कमाए, तो शनि देव उसके किसी भी उपाय को स्वीकार नहीं करते बल्कि उसका दंड और अधिक कठोर कर देते हैं। इसके विपरीत जो व्यक्ति सत्य के मार्ग पर चलता है, अपने पसीने की कमाई खाता है और समाज के अंतिम व्यक्ति के आंसुओं को पोंछने का प्रयास करता है, उस पर शनि देव की अनुकंपा सदैव बरसती रहती है। पौष मास का यह पावन समय हम सभी को अपने कर्मों का आत्मनिरीक्षण करने और अपने जीवन को सन्मार्ग पर ले जाने का एक स्वर्णिम अवसर प्रदान करता है। शनि देव का यह पावन आशीर्वाद हमारे अंतःकरण के समस्त तमस को मिटाकर हमें कर्तव्य परायण, धैर्यवान और तेजस्वी बनाए रखे, यही इस साधना की सर्वोच्च और अमर सार्थकता है।

FAQ

पौष मास में शनि शांति के उपाय करने का सबसे उत्तम समय कौन सा माना गया है? पौष मास में शनि दोष शांति और छाया दान करने का सबसे उत्तम समय शनिवार की दोपहर अथवा गोधूलि वेला अर्थात सूर्यास्त के ठीक समय माना जाता है। सूर्यास्त के समय पीपल के वृक्ष के नीचे चौमुखा दीपक जलाना और मंत्र जाप करना सर्वाधिक चमत्कारी और शीघ्र फलदायी होता है।

छाया दान के लिए किस धातु के पात्र का उपयोग करना शास्त्रों के अनुसार सबसे श्रेष्ठ है? छाया दान करने के लिए लोहे का पात्र सबसे उत्तम और फलदायी माना गया है क्योंकि लोहा सीधे तौर पर शनि देव की धातु है। यदि लोहे का पात्र उपलब्ध न हो तो कांसे के पात्र अथवा ताजे मिट्टी के चौड़े कटोरे का उपयोग भी पूरी तरह शास्त्र सम्मत माना जाता है।

क्या पीपल के वृक्ष की परिक्रमा रात के समय की जा सकती है? सूर्यास्त के ठीक समय गोधूलि वेला में पीपल के वृक्ष की परिक्रमा करना अत्यंत शुभ माना गया है, परंतु रात्रि के गहन अंधकार में अर्थात 8 बजे के बाद पीपल के वृक्ष का स्पर्श करना अथवा परिक्रमा करना शास्त्रों में वर्जित माना गया है क्योंकि उस समय वहां तामसिक ऊर्जाओं का वास होता है।

शनि की साढ़ेसाती के दौरान कौन से रंग के वस्त्र पहनना सबसे अधिक लाभकारी होता है? शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या अथवा महादशा के दौरान गहरे नीले, जामुनी अथवा स्वच्छ काले रंग के वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ होता है। इस काल में बहुत अधिक भड़कीले लाल, चटक गुलाबी अथवा चमकदार वस्त्रों को पहनने से बचना चाहिए क्योंकि ये रंग मंगल और सूर्य का प्रतिनिधित्व करते हैं जो शनि के विरोधी तत्व हैं।

यदि किसी व्यक्ति के पास छाया दान करने हेतु लोहे का पात्र न हो तो क्या करें? यदि लोहे का पात्र उपलब्ध न हो तो एक मिट्टी के नए दीये या सकोरे में सरसों का तेल भरकर उसमें अपना मुख देखें और फिर उस तेल को किसी शनि मंदिर की शिला पर अर्पित कर दें अथवा किसी निर्धन भिक्षुक को दे दें, इससे भी छाया दान का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

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लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

पं. अभिषेक शर्मा (63)


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इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

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