By पं. नीलेश शर्मा
कड़ाके की ठंड में उपवास के वैज्ञानिक नियम, आहार चयन और सावधानियां

पौष मास वैदिक काल गणना के अनुसार हेमंत और शिशिर ऋतु का वह परम पावन, गंभीर और आत्मिक संधिकाल माना जाता है जब भुवन भास्कर भगवान सूर्य देव दक्षिणायन के अंतिम चरण की सीमांत परिधि में संचरण करते हैं। सामान्य जनमानस में प्रायः यह भ्रांति गहराई से व्याप्त रहती है कि केवल ग्रीष्म ऋतु के तपन भरे दिनों में ही उपवास का निर्वाह करना एक कठिन तपस्या है, परंतु आयुर्वेद के प्राचीन संहिताकार, अष्टांग योग के मनीषी और आधुनिक शरीर क्रिया वैज्ञानिक इस सत्य को निर्विवाद रूप से प्रमाणित करते हैं कि पौष मास की हाड़ कंपाने वाली ठंड में उपवास का सम्यक पालन करना मानव शरीर के लिए कहीं अधिक जटिल, गंभीर, संवेदनशील और सूक्ष्म शारीरिक संतुलन की मांग करने वाली परीक्षा सिद्ध होता है। शीत ऋतु के इस चरम कालखंड में बाह्य वातावरण का तापमान अत्यंत न्यून हो जाने के कारण मानव शरीर को अपने आंतरिक तापमान को सैंतीस डिग्री सेल्सियस के स्वाभाविक जैविक स्तर पर स्थिर बनाए रखने के लिए अत्यधिक मात्रा में शारीरिक ऊर्जा, ग्लूकोज और कैलोरी की खपत करनी पड़ती है। जब बाह्य परिवेश में चलने वाली बर्फीली हवाएं शरीर की त्वचा को छूती हैं तो रक्त की सूक्ष्म नलिकाएं सिकुड़ जाती हैं और शरीर का संपूर्ण तंत्र केवल अपने मुख्य अंगों को गर्म रखने के लिए दोगुनी गति से कार्य करने लगता है।
इस विशिष्ट खगोलीय और मौसमी स्थिति में जब कोई श्रद्धालु पौष मास के अंतर्गत आने वाले पावन व्रतों जैसे सफला एकादशी, पुत्रदा एकादशी, भौम प्रदोष अथवा संकष्टी गणेश चतुर्थी का व्रत रखता है और नियमित अन्न तथा जल का पूर्ण अथवा आंशिक त्याग करता है, तो शरीर के भीतर चयापचय अर्थात मेटाबॉलिज्म की प्राकृतिक प्रक्रिया अत्यंत तीव्र दबाव में आ जाती है। यदि उपवास के दौरान परंपरागत अंधानुकरण करते हुए केवल ठंडी तासीर वाले फलों, शीतल जल अथवा अत्यधिक स्टार्च युक्त भारी पदार्थों का असंतुलित सेवन किया जाए तो शरीर की आंतरिक जठराग्नि तत्क्षण मंद पड़ जाती है जिसके कारण वात और कफ दोष का भीषण प्रकोप उत्पन्न होता है। इसके परिणामस्वरूप साधक को भयंकर कंपकंपी, मांसपेशियों में जकड़न, जोड़ों में असहनीय दर्द, अचानक रक्तचाप में भारी गिरावट, सिरदर्द, चक्कर आना और पेट में गैस व अपच जैसी व्याधियों का तत्काल सामना करना पड़ता है। अतएव पौष मास के दौरान किए जाने वाले उपवास को केवल एक हठयोग अथवा यांत्रिक धार्मिक कर्मकांड के रूप में न देखकर उसे आयुर्वेद, योग शास्त्र और आधुनिक शरीर विज्ञान के संयुक्त नियमों के आधार पर संचालित करना चाहिए। इस विशिष्ट शीतकालीन उपवास के प्रमुख घटक, अनुशंसित आहार, जल संतुलन और शास्त्रीय सावधानियों का विस्तृत तुलनात्मक विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।
| उपवास घटक | सामान्य नियम एवं सामान्य त्रुटि | शीतकालीन वैज्ञानिक संशोधन | ज्योतिषीय एवं आयुर्वेदिक लाभ |
|---|---|---|---|
| जल सेवन विधि | ठंडा अथवा सामान्य मटके का जल पीना | तांबे के पात्र में रखा हल्का गुनगुना जल और शहद | वात दोष का पूर्ण शमन, कफ का निष्कासन और रक्त संचार का संतुलन |
| फल एवं आहार चयन | केला, संतरा, मौसमी जैसे ठंडे फल | भुनी हुई मूंगफली, मखाना, बादाम, अखरोट और खजूर | शरीर में निरंतर ऊष्मा, धातु पोषण और स्थिर ऊर्जा का संचय |
| मुख्य फलाहार | केवल तली हुई साबूदाने की खिचड़ी | सिंघाड़े अथवा कुट्टू के आटे का देसी घी में बना हलवा | जठराग्नि को निरंतर बल, आंतों की सुरक्षा और शारीरिक दुर्बलता से रक्षा |
| पेय पदार्थ | शीतल लस्सी, मट्ठा अथवा सादा जल | अदरक, तुलसी, मुलेठी और दालचीनी का हर्बल काढ़ा | फेफड़ों की रक्षा, रोग प्रतिरोधक क्षमता का विस्तार और स्फूर्ति |
| पारण का नियम | भारी, तला भुना और गरिष्ठ भोजन | मूंग दाल की पतली खिचड़ी, गाय का घी और भुना जीरा | आंतों पर अचानक दबाव की मुक्ति और पाचन तंत्र की प्राकृतिक बहाली |
| ध्यान एवं साधना | ठंडे फर्श पर बैठकर लंबे समय पूजन | मोटे ऊनी आसन और गर्म कंबल का अनिवार्य उपयोग | मेरुदंड की सुरक्षा, तंत्रिका तंत्र की स्थिरता और प्राण ऊर्जा का संरक्षण |
आधुनिक शरीर क्रिया विज्ञान के अनुसार जब मानव शरीर अत्यधिक ठंडे वातावरण के संपर्क में आता है तो जीवित ऊतकों को जमने से बचाने के लिए शरीर 'थर्मोजेनेसिस' अर्थात आंतरिक ताप उत्पादन की एक स्वचालित और निरंतर जैव रासायनिक प्रक्रिया प्रारंभ करता है। इस जटिल प्रक्रिया के अंतर्गत शरीर अपनी कोशिकाओं में संचित वसा, ग्लाइकोजन और शर्करा को तीव्र गति से जलाकर आंतरिक ऊष्मा उत्पन्न करता है ताकि मस्तिष्क, हृदय, यकृत और गुर्दे जैसे जीवन रक्षक आंतरिक अंग निर्बाध रूप से कार्य करते रहें। जब कोई श्रद्धालु पौष मास में पूर्ण निर्जला अथवा दीर्घकालिक उपवास का संकल्प लेता है, तो उसके रक्त में ग्लूकोज का स्तर सामान्य दिनों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से नीचे गिरने लगता है क्योंकि शरीर की उपलब्ध ऊर्जा का एक बहुत बड़ा हिस्सा केवल और केवल शरीर के तापमान को गिरने से रोकने में लगातार खर्च हो रहा होता है।
यदि इस संवेदनशील समय पर उपवास करने वाले व्यक्ति के शरीर को संतुलित पोषण और प्राकृतिक ऊष्मा प्रदान करने वाले सात्विक तत्व न मिलें, तो शरीर की मांसपेशियां अपनी ही प्रोटीन का भक्षण करने लगती हैं जिससे तीव्र थकावट, दृष्टि में धुंधलापन और कंपकंपी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। आयुर्वेद के आधारभूत ग्रंथों चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में यह स्पष्ट सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है कि शीत ऋतु में बाह्य शीतलता के संकोच प्रभाव के कारण मनुष्य के आमाशय के भीतर स्थित जठराग्नि अत्यधिक प्रदीप्त और तीक्ष्ण हो जाती है। यह प्रचंड जठराग्नि यदि उचित ईंधन अर्थात उपयुक्त आहार न पाए तो वह शरीर की सप्त धातुओं अर्थात रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र का ही दहन करने लगती है जिससे शरीर भीतर से सूखने लगता है। यही कारण है कि शीतकाल में उपवास रखने वाले साधकों को ग्रीष्मकाल की तुलना में कहीं अधिक सजग रहकर ऐसे पोषक पदार्थों का चयन करना पड़ता है जो पचने में अत्यंत सुपाच्य हों परंतु जिनकी तासीर उष्ण और पोषण क्षमता अत्यंत समृद्ध हो।
पौष मास के उपवास में साधकों द्वारा की जाने वाली सबसे घातक भूल यह होती है कि वे ग्रीष्मकालीन नवरात्रियों अथवा भाद्रपद मास के उपवासों में खाए जाने वाले शीतल फलाहार का ही इस कड़ाके की ठंड में भी अंधानुकरण करने लगते हैं। केला, संतरा, मौसमी, अंगूर, तरबूज, कच्चा खीरा, ककड़ी और बर्फ डालकर बनाई गई ठंडे दूध की लस्सी का सेवन पौष मास के उपवास में शरीर के लिए अत्यंत विषैला प्रभाव उत्पन्न करता है। ये सभी फल और पेय पदार्थ अपनी प्राकृतिक तासीर में अत्यधिक ठंडे होते हैं जो आमाशय में पहुंचते ही पहले से प्रदीप्त जठराग्नि पर बर्फ का पानी डालने जैसा कार्य करते हैं जिससे पाचन क्रिया तत्काल ठप हो जाती है। इनके अनियंत्रित सेवन से रक्त वाहिकाएं सिकुड़ जाती हैं और शरीर में कफ दोष का भारी संचय होने लगता है जो कुछ ही घंटों में गले में तीव्र खराश, फेफड़ों में बलगम का जमाव और श्वास नलिकाओं में अवरोध पैदा कर देता है।
इसके साथ ही सीधे नल से आने वाला अत्यंत शीतल जल अथवा प्रशीतक अर्थात फ्रिज में रखा गया ठंडा पानी उपवास के समय भूलकर भी होंठों से नहीं लगाना चाहिए। जब कोई उपवासी व्यक्ति अत्यधिक ठंडा जल पीता है तो पेट की स्वाभाविक जैविक गर्मी उस जल को शरीर के तापमान के बराबर लाने में अपनी अमूल्य आंतरिक ऊर्जा का एक विशाल भाग व्यर्थ ही नष्ट कर देती है जिससे यकृत और प्लीहा की कार्यप्रणाली सुस्त पड़ जाती है। उपवास के दौरान केवल उन्हीं फलों का चयन करना चाहिए जो प्रकृति से उष्ण पोषक तत्वों से भरपूर हों। उदाहरण के लिए पके हुए ताजे पपीते का सीमित सेवन, मीठे सेब को छिलका उतारकर खाना, नरम खजूर, मुनक्का, सूखे अंजीर और छुहारे का सेवन पौष मास में अमृत के समान फलदायी होता है। ये फल शरीर को तुरंत प्राकृतिक फ्रुक्टोज प्रदान करते हैं जो बिना जठराग्नि को बुझाए मस्तिष्क की तंत्रिकाओं को निरंतर ऊर्जा की आपूर्ति करता रहता है।
पौष मास में उपवास के दौरान शरीर की आंतरिक ऊर्जा और जैविक ताप को निरंतर बनाए रखने के लिए फलाहार का चयन अत्यंत वैज्ञानिक और विवेकपूर्ण दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए ताकि शरीर दुर्बल हुए बिना साधना में लीन रह सके।
प्रथम स्थान पर मखाने की सुपाच्य और पौष्टिक खीर आती है। मखाना मूल रूप से कमल के बीजों का परिष्कृत रूप होता है जो पूर्णतः सात्विक होने के साथ साथ कैल्शियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस और उच्च गुणवत्ता वाले वनस्पति प्रोटीन का उत्कृष्ट भंडार माना गया है। शुद्ध देशी गाय के ताजे दूध में मखाने को धीमी आंच पर पकाकर उसमें थोड़ी सी धागे वाली मिश्री, हरी इलायची और कश्मीरी केसर की कुछ पंखुड़ियां मिलाकर बनाई गई गर्म खीर उपवास के दौरान शरीर को तुरंत आंतरिक ताप और दीर्घकालिक पोषण प्रदान करती है। यह खीर हृदय की मांसपेशियों को शक्ति प्रदान करती है और लंबे समय तक भूखे रहने के कारण होने वाली घबराहट और दुर्बलता को पूरी तरह रोकती है।
द्वितीय स्थान पर सिंघाड़े और कुट्टू के आटे का पारंपारिक प्रयोग आता है। कुट्टू की तासीर प्राकृतिक रूप से अत्यंत गर्म होती है और इसमें प्रचुर मात्रा में आहार फाइबर तथा आवश्यक अमीनो एसिड पाए जाते हैं जो मांसपेशियों को टूटने से बचाते हैं। शुद्ध गाय के देशी घी में कुट्टू अथवा सिंघाड़े के आटे को धीमी आंच पर सुनहरा भूनकर बनाया गया हलवा शरीर की जठराग्नि को निरंतर आवश्यक ईंधन देता रहता है। गाय के घी में भुना हुआ यह हलवा शरीर के सभी जोड़ों को चिकनाई प्रदान करता है जिससे कड़ाके की ठंड में घुटनों, रीढ़ की हड्डी और गर्दन में वात जनित अकड़न की समस्या बिल्कुल उत्पन्न नहीं होती।
तृतीय स्थान पर भुनी हुई देशी मूंगफली और शुद्ध गन्ने के गुड़ का सेवन आता है। मूंगफली को आयुर्वेद में निर्धनों का बादाम कहा गया है क्योंकि इसमें प्रचुर मात्रा में स्वास्थ्यवर्धक प्राकृतिक वसा और खनिज लवण विद्यमान होते हैं। उपवास के दौरान थोड़ी सी भुनी हुई कच्ची मूंगफली के साथ शुद्ध जैविक गुड़ चबाकर खाने से शरीर में हीमोग्लोबिन और आयरन का स्तर पूरी तरह स्थिर रहता है और रक्त की धमनियों में प्रवाह सुचारु बना रहता है। गुड़ शरीर के आंतरिक तापमान को प्राकृतिक रूप से बढ़ाता है और उपवास के समय यकृत में जमा होने वाले विषाक्त तत्वों को बाहर निकालने में असाधारण सहायता करता है।
चतुर्थ स्थान पर अदरक, तुलसी और दालचीनी के गुनगुने काढ़े का सेवन अत्यंत अनिवार्य माना गया है। उपवास के दिन प्रातः काल और संध्या समय एक कप जल में थोड़ा सा कुचला हुआ ताजा अदरक, पांच श्याम तुलसी के पत्ते और एक चुटकी दालचीनी का चूर्ण डालकर धीमी आंच पर उबालें और उसे छानकर हल्का गुनगुना घूंट घूंट करके पिएं। यह पावन औषधीय पेय शरीर की रक्त नलिकाओं को चौड़ा करता है, शीतकालीन थक्के जमने की आशंका को पूरी तरह समाप्त करता है और उपवास के कारण शरीर पर छाने वाले भारी आलस्य और उनींदेपन को क्षण भर में दूर भगा देता है।
शीतकाल में पसीने का अभाव होने और प्यास की अनुभूति अत्यंत मंद पड़ जाने के कारण अधिकांश उपवासी पर्याप्त जल नहीं पीते, जिसके कारण शरीर में आंतरिक निर्जलीकरण और गंभीर विषाक्तता उत्पन्न होने लगती है।
नियमित अंतरालों पर हल्के गुनगुने जल का घूंट घूंट सेवन: उपवास के दिन पूरे 24 घंटों की अवधि में कम से कम 2 से ढाई लीटर हल्का गुनगुना जल नियमित अंतराल पर थोड़ा थोड़ा करके पीना चाहिए। कभी भी एक साथ दो तीन गिलास जल पीने की भूल न करें। गुनगुना जल पीने से आंतों की स्वाभाविक क्रमानु narrow गतिशीलता बनी रहती है और गुर्दे शरीर से यूरिक एसिड, यूरिया और अतिरिक्त लवणों को बिना किसी दबाव के सुगमता से बाहर निकालते रहते हैं।
शुद्ध शहद और नींबू के गुनगुने जल का संजीवनी प्रयोग: प्रातः काल पूजन प्रारंभ करने से पूर्व एक गिलास हल्के गर्म जल में एक चम्मच शुद्ध कच्चा शहद मिलाकर उसका सेवन करना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को पित्त या अम्लपित्त की समस्या न हो तो उसमें दो बूंद ताजे नींबू का रस भी मिलाया जा सकता है। शहद प्राकृतिक सुपाच्य ग्लूकोज का भंडार है जो उपवास के दौरान रक्त शर्करा के स्तर को अचानक नीचे गिरने से रोकता है और शरीर में दिन भर स्फूर्ति बनाए रखता है।
ताम्र पात्र में संचित जल का संतुलित और सुरक्षित उपयोग: रात्रि को विश्राम से पूर्व तांबे के एक शुद्ध लोटे अथवा जग में सामान्य जल भरकर लकड़ी के पाटे पर ढक कर रख दें और प्रातः काल उस जल को किसी बर्तन में डालकर हल्का सा गुनगुना करके ही पिएं। तांबे का जल शरीर के तीनों दोषों को प्राकृतिक रूप से शांत करता है और आंतों में उपस्थित हानिकारक रोगाणुओं को समाप्त करके उपवास के दौरान पेट में भारी गैस और अफारा बनने की संभावना को पूरी तरह समाप्त कर देता है।
अत्यधिक चाय और कैफीन युक्त पेयों पर पूर्ण शास्त्रीय प्रतिबंध: उपवास में बहुत से लोग भूख को दबाने और ठंड से बचने के लोभ में दिन में पांच से छह बार दूध वाली तेज मीठी चाय अथवा कॉफी का निरंतर सेवन करने लगते हैं। यह आदत शरीर के लिए अत्यंत घातक और विनाशकारी होती है। कैफीन युक्त पेय मूत्रवर्धक होते हैं जो शरीर की कोशिकाओं से जीवन रक्षक जल को तेजी से बाहर खींच लेते हैं जिससे भयंकर डिहाइड्रेशन, घबराहट और आमाशय में तेजाब का अत्यधिक निर्माण होने लगता है।
नारियल पानी को सदैव सामान्य तापमान पर ही ग्रहण करना: ताजा नारियल पानी इलेक्ट्रोलाइट्स, पोटेशियम और खनिजों का सर्वोत्तम प्राकृतिक भंडार माना गया है, परंतु पौष मास में इसे सीधे खोलकर तुरंत पीने की भूल न करें। नारियल को पहले कुछ घंटों के लिए कमरे के सामान्य तापमान पर रखें और दोपहर के समय जब सूर्य की मीठी धूप खिली हो तब बैठकर इसका सेवन करें ताकि शरीर का इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बिना किसी शीत जनित विकार के सुरक्षित रह सके।
पौष मास में पड़ने वाले विभिन्न पावन व्रतों के अपने अपने विशिष्ट शास्त्रीय विधान और खगोलीय संरेखण होते हैं जिनका अनुपालन शीतकाल में अपनी व्यक्तिगत शारीरिक क्षमता को पहचान कर ही किया जाना चाहिए।
पौष मास के कृष्ण पक्ष की सफला एकादशी और शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी के दिन यदि कोई साधक पूर्ण निर्जला उपवास रखने का कठोर संकल्प लेता है, तो उसे निष्पक्षता से यह विचार करना चाहिए कि क्या उसका शरीर इस कड़ाके की ठंड में इस कठोर तप को सहन करने में सक्षम है। गर्भवती महिलाओं, दूध पिलाने वाली माताओं, अस्सी वर्ष से अधिक के वृद्धजनों, दमा व श्वास के रोगियों और मधुमेह से पीड़ित व्यक्तियों को पौष मास में निर्जला व्रत रखने से पूरी तरह बचना चाहिए। सनातन शास्त्रों की स्पष्ट आज्ञा है कि 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' अर्थात धर्म के समस्त कर्मों को संपन्न करने का प्रथम और मूल साधन यह शरीर ही है, अतः शरीर को विकृत या रुग्ण करके किया गया कोई भी व्रत कभी भी पूर्ण आध्यात्मिक फल प्रदान नहीं करता। ऐसे साधकों को गुनगुना जल, दूध और हल्के फलाहार के आधार पर ही एकादशी व्रत का पालन करना चाहिए।
इसी प्रकार भौम अथवा सोम प्रदोष का व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को दिन भर निराहार रहने के उपरांत सायंकाल गोधूलि वेला में भगवान उमामहेश्वर का षोडशोपचार पूजन करने के पश्चात ही फलाहार ग्रहण करना चाहिए। प्रदोष काल में सूर्यास्त के समय अचानक तापमान में भारी गिरावट दर्ज की जाती है। अतः सायंकालीन पूजा संपन्न होते ही गाय के हल्के गर्म दूध में एक चुटकी सोंठ का चूर्ण, केसर और मिश्री डालकर पीना चाहिए जिससे शरीर का तापमान संतुलित रहे और रात में ठंड न लगे। संकष्टी गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन तक निर्जल अथवा निराहार रहने का विधान है। पौष मास में घने कोहरे के कारण चंद्र देव प्रायः अत्यंत विलंब से उदित होते हैं और उस समय भयंकर पाला गिर रहा होता है, अतः चंद्रमा को तांबे के पात्र से दूध मिश्रित जल का अर्घ्य देने के तत्काल बाद पहले दो घूंट गुनगुने जल का आचमन करना चाहिए और उसके उपरांत ही फलाहार अथवा सात्विक अन्न ग्रहण करना चाहिए।
वैदिक परंपरा में उपवास रखने का जितना आध्यात्मिक महत्व प्रतिपादित किया गया है, उससे कहीं अधिक महत्व उपवास को वैज्ञानिक रीति से पूर्ण करने अर्थात पारण की प्रक्रिया का स्वीकार किया गया है। पौष मास के उपवास के अगले दिन प्रातः काल जब व्रत का पारण किया जाए, तो उस समय सबसे बड़ी सावधानी यह रखनी चाहिए कि आमाशय में जाने वाला प्रथम भोजन कभी भी अत्यंत भारी, तला भुना, चिकनाई युक्त और तीखे मसालों से भरा हुआ नहीं होना चाहिए। चौबीस घंटों तक पूर्ण विश्राम की स्थिति में रहने के कारण आमाशय की आंतरिक श्लेष्मा झिल्ली और पाचन ग्रंथियां अत्यंत सुकोमल और संवेदनशील हो चुकी होती हैं।
पारण के दिन प्रातः काल नित्य कर्मों से निवृत्त होकर सर्वप्रथम एक गिलास गुनगुने जल में आधा चम्मच भुने हुए जीरे का चूर्ण और चुटकी भर सेंधा नमक मिलाकर धीरे धीरे पीना चाहिए। इसके लगभग आधे घंटे के पश्चात मूंग की पीली धुली दाल और नए चावल से बनी अत्यंत पतली, सुपाच्य और गर्म खिचड़ी का सेवन करना चाहिए जिसमें एक चम्मच शुद्ध गाय का देशी घी और एक चुटकी हींग का तड़का लगा हो। यह सात्विक खिचड़ी आंतों पर बिना कोई अतिरिक्त भार डाले शरीर को तत्काल आवश्यक कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और चिकनाई प्रदान करती है और शरीर के त्रिदोषों को शांत रखती है। पारण के भोजन में पूरी, कचौड़ी, पराठे, बाजार की मिठाइयों अथवा खट्टे आचार का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए अन्यथा उपवास से शरीर के भीतर जो विषैले तत्वों का निष्कासन हुआ था, वह प्रक्रिया बाधित हो जाती है और व्यक्ति को गंभीर उदर विकार घेर लेते हैं।
सनातन वैदिक अध्यात्म में उपवास का वास्तविक अर्थ केवल शरीर को भोजन से वंचित रखना अथवा भूखा रहकर कष्ट सहना कदापि नहीं है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार 'उप' का अर्थ समीप होता है और 'वास' का अर्थ निवास करना होता है, जिसका संयुक्त अर्थ है अपनी संपूर्ण ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों को सांसारिक विषयों से समेटकर अंतरात्मा में स्थित परमात्मा के समीप निवास करना। पौष मास की यह कठोर, गंभीर और निस्तब्ध शीत ऋतु हमें यह अमर संदेश देती है कि जिस प्रकार प्रकृति अपने समस्त पत्तों, फूलों और बाह्य आडंबरों को त्यागकर शीतकाल में अपने मूल तने और जड़ों में सिमटकर अंतर्मुखी हो जाती है, ठीक उसी प्रकार प्रत्येक विवेकशील साधक को भी अपनी बाह्य इच्छाओं, जिह्वा के क्षणिक स्वादों और शारीरिक आसक्तियों को नियंत्रित करके अपनी आत्मा के प्रकाश में प्रवेश करना चाहिए। कड़ाके की ठंड में जब हम अपने शरीर को संतुलित, सचेत और वैज्ञानिक नियमों के अनुसार उपवास की पावन अग्नि में तपाते हैं, तो हमारे भीतर एक असीम आत्मिक बल, अटूट संकल्प शक्ति और गहन मानसिक शांति का प्राकट्य होता है। यह संयम साधक के मन से काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के समस्त सूक्ष्म विकारों को भस्म करके उसकी चेतना को कुंदन की भांति चमका देता है। जब शारीरिक विज्ञान की समझ और आध्यात्मिक निष्ठा का ऐसा दिव्य समन्वय जीवन में घटित होता है, तो वह उपवास केवल शरीर को ही समस्त रोगों से मुक्त नहीं करता, अपितु आत्मा को परम चेतना के उस प्रकाश से भर देता है जहां कोई कष्ट, कोई संताप और कोई अंधकार कभी शेष नहीं रहता।
क्या पौष मास की कड़ाके की ठंड में निर्जला व्रत रखना शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से सुरक्षित है? पौष मास में बाह्य तापमान अत्यंत कम होने के कारण शरीर को निरंतर आंतरिक ऊष्मा बनाए रखने के लिए जल और ऊर्जा की अनिवार्य आवश्यकता होती है। अतः जब तक साधक का स्वास्थ्य पूरी तरह सुदृढ़ न हो और वह कठिन योग साधनाओं में अभ्यस्त न हो तब तक निर्जला व्रत रखने से बचना चाहिए और गुनगुना जल, दूध अथवा हर्बल काढ़ा लेकर सजल उपवास करना ही स्वास्थ्य की दृष्टि से पूर्णतः सुरक्षित माना गया है।
सर्दियों में उपवास के दौरान ठंड लगने और कंपकंपी से बचने का सबसे प्रभावी उपाय क्या है? उपवास के दौरान शरीर का तापमान स्थिर रखने के लिए ठंडी तासीर वाले फलों का त्याग करें और दिन में कम से कम दो बार अदरक, तुलसी और दालचीनी का गुनगुना काढ़ा पिएं। इसके साथ ही शाम के समय फलाहार में भुनी हुई मूंगफली, मखाने की खीर और गाय के शुद्ध घी में बना सिंघाड़े का हलवा अवश्य शामिल करें जो शरीर को प्राकृतिक ऊष्मा प्रदान करता है।
पौष एकादशी के व्रत में कौन से फल खाना सबसे अधिक स्वास्थ्यवर्धक और शास्त्र सम्मत होता है? पौष मास की एकादशी में केला, संतरा, मौसमी और तरबूज जैसे शीतल फलों से पूरी तरह परहेज करना चाहिए। इसके स्थान पर पके हुए पपीते, मीठे छिले हुए सेब, खजूर, मुनक्का और सूखे मेवों जैसे बादाम व अखरोट का सेवन करना चाहिए जो शरीर की जठराग्नि को बुझाए बिना आवश्यक पोषण और प्राकृतिक गर्मी प्रदान करते हैं।
क्या उपवास के दिन बार बार चाय या कॉफी पीना शरीर के लिए हितकर माना जा सकता है? उपवास के दिन बार बार कैफीन युक्त चाय अथवा कॉफी का सेवन करना अत्यंत हानिकारक होता है। यह आदत शरीर की कोशिकाओं से जल को तेजी से बाहर खींचकर गंभीर निर्जलीकरण पैदा करती है, यूरिक एसिड बढ़ाती है और पेट में भयंकर जलन व एसिडिटी का निर्माण करती है। इसकी जगह केवल गुनगुना नींबू पानी या अदरक का काढ़ा ही लेना चाहिए।
शीतकालीन व्रत का पारण करते समय सबसे पहला आहार क्या होना चाहिए और क्या सावधानी रखें? व्रत खोलने अर्थात पारण के समय सबसे पहले हल्के गुनगुने जल का आचमन करना चाहिए। उसके उपरांत मूंग की पीली दाल और चावल से बनी अत्यंत पतली व सुपाच्य खिचड़ी, जिसमें गाय का शुद्ध देशी घी और हींग का तड़का लगा हो, का सेवन करना सबसे उत्तम और सुरक्षित विधान माना गया है तथा तले भुने गरिष्ठ भोजन से पूर्ण परहेज रखना चाहिए।
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