आमलकी एकादशी का आध्यात्मिक रहस्य क्या है?

By अपर्णा पाटनी

आंवले के वृक्ष की साक्षात विष्णु रूप में पूजा और अमरत्व

आमलकी एकादशी: आंवला वृक्ष पूजा, कथा, विधि और स्वास्थ्य लाभ

पंचांग विवरण और धात्री वृक्ष पूजन की शास्त्रीय सारणी

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को सनातन पंचांग में आमलकी एकादशी के नाम से जाना जाता है। आमलकी शब्द का मूल संस्कृत अर्थ धात्री अथवा आंवला होता है। यह पावन पर्व शिशिर ऋतु के समापन और वसंत के पूर्ण वैभव का संधिकाल माना जाता है। समस्त एकादशियों में आमलकी एकादशी को एक अत्यंत दुर्लभ और उच्च कोटि का आध्यात्मिक स्थान प्राप्त है क्योंकि इस दिन किसी पाषाण अथवा धातु की प्रतिमा के स्थान पर प्रत्यक्ष रूप से एक दिव्य वनस्पति अर्थात आंवले के वृक्ष की साक्षात भगवान विष्णु के रूप में पूजा की जाती है। पद्म पुराण और ब्रह्मांड पुराण में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि जो फल सैकड़ों वाजपेय यज्ञ और सहस्र गोदान करने से प्राप्त होता है, वही अक्षय फल आमलकी एकादशी पर आंवले के वृक्ष की विधिवत पूजा और उपवास से सुलभ हो जाता है।

पंचांग घटक शास्त्रीय विवरण
मास एवं पक्ष फाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष
पावन तिथि शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि
अधिष्ठाता देवता भगवान श्री हरि विष्णु, लक्ष्मी नारायण व धात्री वृक्ष
नक्षत्र संयोग पुष्य अथवा पुनर्वसु नक्षत्र का शुभ योग
प्रधान अनुष्ठान आंवले के वृक्ष की षोडशोपचार पूजा, सात परिक्रमा, अखंड उपवास
प्रमुख नैवेद्य आंवले का फल, पंचामृत, तुलसी दल, ऋतु फल और तिल
मुख्य आध्यात्मिक फल समस्त संचित पापों का क्षय, उत्तम स्वास्थ्य, अमरत्व और वैकुंठ प्राप्ति

आमलकी एकादशी का संपूर्ण आध्यात्मिक और शारीरिक फल प्राप्त करने के लिए साधक को दशमी तिथि की संध्या से ही विशिष्ट सात्विक मर्यादाओं का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।

  • दशमी तिथि की रात्रि में सात्विक और सुपाच्य भोजन ग्रहण करके ब्रह्मचर्य व्रत का पूर्ण पालन करना।
  • एकादशी के दिन प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर शीतल जल में गंगाजल और आंवले का रस मिलाकर स्नान करना।
  • पूजा स्थल पर पीले वस्त्र धारण करके भगवान विष्णु के सम्मुख निराहार अथवा सात्विक फलाहार व्रत का संकल्प लेना।
  • किसी स्वच्छ स्थान पर स्थित आंवले के वृक्ष के समीप जाकर उसके चारों ओर की भूमि को गंगाजल से पवित्र करना।
  • आंवले के वृक्ष की जड़ में तांबे के पात्र से शुद्ध जल, कच्चा दूध, रोली, अक्षत और पीले पुष्प अर्पित करना।
  • वृक्ष के तने पर सात बार कच्चा सूत लपेटते हुए ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का निरंतर जप करना।
  • आंवले के वृक्ष के नीचे घी का दीपक प्रज्वलित करके विष्णु सहस्रनाम अथवा आमलकी एकादशी महात्म्य का श्रवण करना।
  • दिनभर कटु वाणी, ईर्ष्या, क्रोध, असत्य भाषण और आलस्य का मन से पूर्ण परित्याग करना।
  • रात्रि में भगवान श्री हरि के नाम संकीर्तन के साथ जागरण करना और अगले दिन द्वादशी तिथि को ब्राह्मण को दान देकर पारण करना।

ब्रह्मा जी के अश्रुपात से आंवले के वृक्ष का प्राकट्य

ब्रह्मांड पुराण और पद्म पुराण के उत्तराखंड में आमलकी वृक्ष की उत्पत्ति का अत्यंत विस्मयकारी और दार्शनिक आख्यान प्राप्त होता है। जब संपूर्ण चराचर जगत महाप्रलय के अगाध जल में लीन था तब परमपिता परब्रह्म भगवान श्री हरि विष्णु योगनिद्रा में शयन कर रहे थे। कालान्तर में जब नवसृजन की घड़ी निकट आई तब भगवान विष्णु की नाभि से एक अत्यंत दिव्य और तेजोमय सहस्रदल कमल प्रकट हुआ। उस दिव्य कमल के ऊपर समस्त वेदों के ज्ञाता चतुर्मुख ब्रह्मा जी का प्राकट्य हुआ।

सृष्टि निर्माण का अत्यंत जटिल दायित्व प्राप्त होने पर ब्रह्मा जी के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि इस अनंत शून्य में मेरा मूल आधार कौन है और मेरा सृष्टिकर्ता कौन है। अपने जनक की खोज करने के उद्देश्य से ब्रह्मा जी ने उस कमल नाल के मार्ग से हजारों वर्षों तक जल के भीतर उतरने का प्रयास किया, परंतु वे उस मूल आधार का अंत न पा सके। अंततः निराश होकर ब्रह्मा जी उसी कमल के आसन पर बैठ गए और उन्होंने निरंतर हजारों वर्षों तक परम पुरुष भगवान नारायण की घोर तपस्या की।

ब्रह्मा जी की अगाध निष्ठा और कठोर तप से संतुष्ट होकर भगवान विष्णु ने उन्हें अपने शंख, चक्र, गदा और पद्म से सुशोभित चतुर्भुज स्वरूप का साक्षात दर्शन प्रदान किया। प्रभु के उस अत्यंत सुंदर, ज्योतिर्मय और परम कल्याणकारी स्वरूप का दर्शन करते ही ब्रह्मा जी का हृदय अवर्णनीय आनंद से भर गया। उनके नेत्रों से भक्ति और प्रेम के अविरल प्रेमाश्रु बहने लगे। वे दिव्य प्रेमाश्रु जब प्रभु के चरणों से होते हुए पावन धरातल पर गिरे, तो उन अश्रु बिंदुओं से एक अत्यंत सुंदर, अमृतमयी और औषधीय गुणों से संपन्न वृक्ष अंकुरित हुआ।

उस वृक्ष को देखकर भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए कहा कि हे ब्रह्मदेव, आपके आनंद अश्रुओं से उत्पन्न यह वृक्ष समस्त वनस्पतियों में शिरोमणि होगा और इसका नाम आमलकी अथवा धात्री होगा। यह वृक्ष साक्षात मेरा ही स्वरूप माना जाएगा और इसके दर्शन, स्पर्श, स्मरण तथा इसके फल के सेवन मात्र से मनुष्य के जन्म जन्मांतर के पाप उसी क्षण समाप्त हो जाएंगे। इसी कारण आमलकी एकादशी के दिन आंवले के वृक्ष की पूजा साक्षात भगवान विष्णु की पूजा के समान स्वीकार की जाती है।

धात्री वृक्ष के विभिन्न अंगों में देवताओं का दिव्य निवास

सनातन वैदिक दर्शन में प्रकृति और ईश्वर को कभी पृथक नहीं माना गया है। आमलकी वृक्ष को समस्त दिव्य शक्तियों का प्रत्यक्ष निवास स्थान माना गया है। शास्त्रों में वर्णन आता है कि संसार का कोई भी अन्य वृक्ष इतने व्यापक स्तर पर देवताओं की ऊर्जा को अपने भीतर समाहित नहीं करता जितना कि आंवले का वृक्ष करता है।

वृक्ष का पावन अंग अधिष्ठाता दिव्य शक्ति तात्विक ऊर्जा का स्वरूप साधक को प्राप्त फल
वृक्ष का मूल आधार व जड़ भगवान श्री हरि विष्णु स्थिति व पालन की शाश्वत शक्ति जन्म जन्मांतर के पापों का क्षय
वृक्ष का मध्य तना देवाधिदेव महादेव शिव संहार, वैराग्य व कायाकल्प अकाल मृत्यु से रक्षा व दीर्घायु
वृक्ष की शाखाएं व टहनियां चतुर्मुख ब्रह्मा जी व मुनिगण सृजन, ज्ञान व वेद विद्या बुद्धि, विवेक व तेज का विस्तार
वृक्ष के पत्ते समस्त 33 कोटि देवी देवता प्राकृतिक संतुलन व सूक्ष्म शांति कुल की रक्षा व अमंगल निवारण
वृक्ष के पुष्प प्रजापति व मरुद्गण निरंतर गतिशीलता व कर्म शुद्धि व्यापार व आजीविका में उन्नति
वृक्ष का अमृतमयी फल माता महालक्ष्मी व अमृत तत्त्व अखंड ऐश्वर्य, सौंदर्य व आरोग्य धन संपदा, तेज व मोक्ष की प्राप्ति

जब कोई साधक आमलकी एकादशी के दिन आंवले के वृक्ष की छाया में बैठकर साधना करता है, तो वह एक ही समय में त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ संपूर्ण देवमंडल के सूक्ष्म आशीर्वाद के घेरे में आ जाता है। वृक्ष की परिक्रमा करने से साधक के शरीर के आभामंडल में उपस्थित नकारात्मक तरंगें नष्ट हो जाती हैं और उसके भीतर एक नवीन, सात्विक और प्राणवान ऊर्जा का संचार होने लगता है।

शिकारी और आमलकी वृक्ष की पौराणिक कथा का गूढ़ रहस्य

आमलकी एकादशी के महात्म्य में मांधाता और महर्षि वशिष्ठ के संवाद में एक अत्यंत प्रेरक कथा का उल्लेख आता है। प्राचीन काल में वैदिश नामक एक परम समृद्ध और धर्मपरायण नगर था, जहां के राजा चैत्ररथ स्वयं बड़े ज्ञानी और भगवद् भक्त थे। उस नगर में कोई भी व्यक्ति अधर्मी, दरिद्र अथवा नास्तिक नहीं था। फाल्गुन शुक्ल एकादशी के दिन राजा अपनी संपूर्ण प्रजा के साथ नदी तट पर स्थित एक विशाल आंवले के वृक्ष के नीचे पहुंचे और उन्होंने वहां कलश स्थापित करके भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा की तथा रात्रि जागरण का संकल्प लिया।

उसी समय एक अत्यंत क्रूर, हिंसक और पापी शिकारी भूख प्यास से व्याकुल होकर वहां आ पहुंचा। वह जीवनभर केवल निर्दोष पशुओं की हत्या करके अपना पेट भरता था। मंदिर और वृक्ष के चारों ओर जलते दीपकों, बजते शंखों और साधु संतों की भीड़ को देखकर वह एक कोने में छिपकर बैठ गया। उसने विचार किया कि यहां रात्रि में भोजन अवश्य मिलेगा, इसलिए वह रातभर भूखा प्यासा बैठा रहा। भूखे होने के कारण उसका अनजाने में ही निराहार उपवास हो गया और रातभर भक्तों द्वारा किए जा रहे भजन कीर्तन और विष्णु कथा को सुनने के कारण उसका अनजाने में ही रात्रि जागरण संपन्न हो गया।

प्रातः काल जब सभी लोग अपने अपने घर चले गए, तो शिकारी भी भोजन की खोज में निकला। कुछ ही दिनों के पश्चात अपनी स्वाभाविक आयु पूर्ण करके उस शिकारी की मृत्यु हो गई। अनजाने में किए गए आमलकी एकादशी के व्रत और रात्रि जागरण के पुण्य प्रभाव से उस पापी शिकारी का अगला जन्म एक महान और प्रतापी राजा के रूप में हुआ। वह राजा वसूरथ के नाम से विख्यात हुआ।

एक बार जब राजा वसूरथ घने जंगल में शिकार खेलते हुए मार्ग भटक गए और एक वृक्ष के नीचे थककर सो गए तब कुछ जंगली डाकुओं ने उन्हें घेर लिया और उन पर तीक्ष्ण अस्त्रों से प्रहार करना प्रारंभ किया। परंतु आश्चर्य की बात यह हुई कि डाकुओं के समस्त अस्त्र शस्त्र राजा के शरीर को स्पर्श करते ही पुष्पों में बदल गए। उसी समय राजा के हृदय से एक अत्यंत तेजोमयी दिव्य देवी प्रकट हुईं और उन्होंने उन समस्त डाकुओं का संहार कर दिया। जब राजा की आंख खुली, तो आकाशवाणी हुई कि हे राजन, यह तुम्हारी रक्षा किसी अन्य ने नहीं बल्कि पूर्व जन्म में अनजाने में किए गए आमलकी एकादशी व्रत के प्रभाव से स्वयं भगवान विष्णु की योगमाया ने की है। यह कथा यह सिद्ध करती है कि जब अनजाने में किया गया यह व्रत इतना बड़ा रक्षा कवच बन सकता है, तो जो साधक श्रद्धा और विधिपूर्वक इस व्रत का अनुष्ठान करते हैं, उनके सौभाग्य की कोई सीमा नहीं हो सकती।

आंवले का आयुर्वेदिक, रासायनिक और कायाकल्प विज्ञान

सनातन परंपरा के पर्व केवल पौराणिक मान्यताओं पर आधारित नहीं होते बल्कि उनके पीछे एक अत्यंत गहरा वैज्ञानिक और औषधीय आधार कार्य करता है। आयुर्वेद के परम प्रमाणिक ग्रंथ चरक संहिता के चिकित्सा स्थान में रसायन अध्याय के अंतर्गत आंवले को सर्वश्रेष्ठ रसायन द्रव्य स्वीकार किया गया है। रसायन का अर्थ है वह दिव्य औषधि जो शरीर के सातों धातुओं रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र को नया जीवन प्रदान करके वृद्धावस्था और रोगों को दूर रखे।

फाल्गुन मास का यह समय ऋतु संधिकाल का होता है। शीत ऋतु में शरीर के भीतर संचित हुआ कफ इस समय सूर्य की बढ़ती किरणों के प्रभाव से पिघलने लगता है। कफ के पिघलने से पाचन अग्नि मंद पड़ जाती है और शरीर में विषाक्त तत्वों का संचय होने लगता है। आंवला संसार का एकमात्र ऐसा प्राकृतिक फल है जिसके भीतर लवण रस को छोड़कर शेष पांचों रस मधुर, अम्ल, कटु, तिक्त और कषाय प्रचुर मात्रा में विद्यमान होते हैं। इस बहु रस गुण के कारण आंवला वात, पित्त और कफ तीनों दोषों को एक साथ शांत करने की अद्वितीय क्षमता रखता है।

औषधीय व रासायनिक घटक शारीरिक क्रिया पर प्रभाव शास्त्रीय व व्यावहारिक लाभ
प्राकृतिक विटामिन सी का भंडार श्वेत रक्त कोशिकाओं की वृद्धि संक्रामक रोगों से शरीर का पूर्ण बचाव
शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट्स मुक्त कणों का समूल नाश कोशिकाओं का पुनर्जीवन व कायाकल्प
कषाय व तिक्त रस की प्रधानता आमाशय व यकृत का शोधन पिघले हुए कफ का निष्कासन व मंदाग्नि निवारण
लौह व खनिज तत्त्व हीमोग्लोबिन के स्तर में वृद्धि रक्ताल्पता की समाप्ति व चेहरे पर ओज
दीपन व पाचन गुण पाचक एंजाइम्स की सक्रियता भोजन का समुचित पाचन व कब्ज मुक्ति

आमलकी एकादशी के दिन आंवले के फल का सेवन करने, आंवले के जल से स्नान करने और आंवले का दान करने का नियम हमारे पूर्वजों ने इसलिए बनाया था ताकि ऋतु परिवर्तन के इस नाजुक दौर में प्रत्येक व्यक्ति का शरीर आंतरिक रूप से शुद्ध और रोगमुक्त हो सके। आधुनिक शोध भी यह सिद्ध करते हैं कि आंवले में संतरे की तुलना में बीस गुना अधिक विटामिन सी पाया जाता है जो गर्म करने अथवा सुखाने पर भी नष्ट नहीं होता। इस प्रकार आमलकी एकादशी आत्मा के साथ साथ शरीर को भी अमरता और आरोग्य प्रदान करने वाला महापर्व है।

आमलकी एकादशी की षोडशोपचार पूजा विधि और परिक्रमा नियम

आमलकी एकादशी की पूजा का संपूर्ण फल प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में एक अत्यंत सुव्यवस्थित और वैज्ञानिक पूजा पद्धति का विधान किया गया है। यदि संभव हो तो यह पूजा किसी खुले स्थान पर स्थित जीवित आंवले के वृक्ष के नीचे ही संपन्न करनी चाहिए।

  • एकादशी के दिन प्रातः काल स्नान आदि से निवृत्त होकर आंवले के वृक्ष के नीचे की भूमि को गाय के गोबर अथवा गंगाजल से लीपकर पवित्र करें।
  • वृक्ष की पूर्व दिशा में एक वेदी का निर्माण करें और उस पर पीले वस्त्र बिछाकर कलश की स्थापना करें।
  • कलश के भीतर शुद्ध जल, सुपारी, हल्दी की गांठ, दूर्वा, चांदी का सिक्का और आम या अशोक के पल्लव रखें।
  • कलश के ऊपर एक पात्र रखकर उसमें भगवान लक्ष्मीनारायण की सुंदर प्रतिमा स्थापित करें।
  • सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करें और उसके पश्चात भगवान विष्णु तथा आंवले के वृक्ष का संयुक्त षोडशोपचार पूजन प्रारंभ करें।
  • आंवले के वृक्ष की जड़ में कच्चा दूध और गंगाजल अर्पित करें, तने पर पीले चंदन का लेप लगाएं और सुगंधित इत्र छिड़कें।
  • भगवान को पीले पुष्प, तुलसी की मंजरी, मौसमी फल और विशेष रूप से आंवले का नैवेद्य अर्पित करें।
  • एक शुद्ध कच्चा सूत का धागा हाथ में लेकर वृक्ष के तने पर लपेटते हुए दक्षिणावर्त दिशा में सात बार श्रद्धापूर्वक परिक्रमा करें।
  • परिक्रमा करते समय ॐ धात्र्यै नमः अथवा ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का बिना रुके सस्वर उच्चारण करते रहें।
  • पूजा की समाप्ति पर कर्पूर और गाय के घी के दीपक से भगवान की आरती करें और वहीं बैठकर आमलकी एकादशी की पावन कथा का श्रवण करें।
  • अगले दिन द्वादशी को प्रातः पुनः पूजन करके कलश और अन्न वस्त्र का दान किसी योग्य ब्राह्मण को देकर ही व्रत का पारण करें।

मोक्ष और अमरत्व का संदेश देती आमलकी साधना

आमलकी एकादशी केवल सांसारिक सुखों को प्राप्त करने की साधन नहीं है बल्कि यह मानव चेतना को भौतिक नश्वरता से उठाकर आध्यात्मिक अमरत्व की ओर ले जाने वाला पावन सोपान है। आंवले के वृक्ष को शास्त्रों में धात्री कहा गया है। धात्री का अर्थ होता है माता जो बिना किसी स्वार्थ के अपनी संतान का पालन पोषण करती है। जिस प्रकार एक माता अपनी संतान के समस्त कष्टों को स्वयं सहकर उसे अमृत प्रदान करती है, उसी प्रकार आंवले का वृक्ष भी संपूर्ण मानव जाति को बिना किसी भेदभाव के आरोग्य और दीर्घायु प्रदान करता है।

यह एकादशी मनुष्य को यह सिखाती है कि सच्चा आध्यात्मिक जीवन वही है जो प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जिया जाए। जब मनुष्य प्रकृति का दोहन करने के स्थान पर उसका पूजन करता है, तो प्रकृति स्वयं कल्पवृक्ष बनकर उसकी समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण कर देती है। फाल्गुन शुक्ल एकादशी की यह पावन साधना साधक के चित्त को वासना, लोभ और अहंकार के मलों से मुक्त करके उसमें त्याग, सेवा और निष्काम भक्ति का दिव्य रंग भर देती है। इस व्रत का निष्ठापूर्वक पालन करने वाला व्यक्ति इस लोक में उत्तम स्वास्थ्य और अखंड समृद्धि का उपभोग करता हुआ अंत समय में भगवान विष्णु के परम धाम वैकुंठ को प्राप्त होता है।

FAQ

आमलकी एकादशी को किस अन्य नाम से भी जाना जाता है?
आमलकी एकादशी को संपूर्ण भारत में आंवला एकादशी तथा काशी क्षेत्र में रंगभरी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

आमलकी एकादशी पर आंवले के वृक्ष की पूजा क्यों की जाती है?
आंवले का वृक्ष ब्रह्मा जी के आनंद अश्रुओं से उत्पन्न हुआ था और इसके प्रत्येक अंग में त्रिदेवों तथा समस्त देवताओं का वास माना गया है।

क्या आमलकी एकादशी के दिन आंवले का सेवन करना चाहिए?
हाँ, इस पावन दिन आंवले के फल का सेवन करना, आंवले के जल से स्नान करना और आंवले का दान करना अत्यंत पुण्यकारी और आरोग्यवर्धक माना जाता है।

इस व्रत की पूजा में आंवले के वृक्ष की कितनी परिक्रमा की जाती है?
आमलकी एकादशी की पूजा के समय हाथ में कच्चा सूत लेकर आंवले के वृक्ष की सात बार विधिवत परिक्रमा करने का शास्त्रीय नियम है।

इस एकादशी का व्रत रखने से किस यज्ञ के समान फल मिलता है?
पद्म पुराण के अनुसार आमलकी एकादशी का श्रद्धापूर्वक व्रत रखने से सौ वाजपेय यज्ञों और सहस्र गोदान के समान महापुण्य की प्राप्ति होती है।

पाएं अपनी सटीक कुंडली

कुंडली बनाएं

क्या आपको यह पसंद आया?

लेखक

अपर्णा पाटनी

अपर्णा पाटनी (63)


अनुभव: 20

इनसे पूछें: Family Planning, Career

इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें

WELCOME TO

ZODIAQ

Right Decisions at the right time with ZODIAQ