बरसाना की लठमार होली का रहस्य क्या है?

By अपर्णा पाटनी

राधा कृष्ण के अलौकिक प्रेम और गोपियों के अनुराग का रंग

बरसाना लठमार होली: इतिहास, नियम, टेसू रंग और दर्शन

पंचांग विवरण और बरसाना लठमार होली की समय सारिणी

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को ब्रज मंडल के सुप्रसिद्ध बरसाना गांव में लठमार होली का विश्वप्रसिद्ध उत्सव अत्यंत श्रद्धा, उमंग और पारंपरिक उल्लास के साथ संपन्न किया जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार यह तिथि माता वृषभानु नंदिनी श्री राधा रानी के पावन ग्राम बरसाना में रंगोत्सव का शिखर मानी जाती है। ब्रज संस्कृति के अनुसार यह केवल आमोद प्रमोद का लौकिक उत्सव नहीं है, अपितु यह द्वापर युग से चली आ रही 5000 वर्ष प्राचीन उस दिव्य लीला का साक्षात स्वरूप है जो भगवान श्री कृष्ण और श्री राधा रानी ने अपने सखाओं और सखियों के साथ खेली थी। इस पावन अवसर पर नंदगांव के हुरियारे (गोप रूपी कृष्ण सखा) बरसाना के श्रीजी मंदिर (राधा रानी महल) में ध्वजा चढ़ाने और प्रेम का रंग डालने पहुंचते हैं, जहां बरसाना की हुरियारिनें (गोपियां) उन पर स्नेहपूर्वक सजी हुई लाठियों से प्रहार करती हैं।

पंचांग घटक शास्त्रीय विवरण
मास एवं पक्ष फाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष
पावन तिथि शुक्ल पक्ष नवमी तिथि
मुख्य तीर्थ स्थली श्रीजी मंदिर (लाड़ली जी मंदिर), बरसाना, मथुरा
प्रमुख पात्र नंदगांव के हुरियारे और बरसाना की हुरियारिनें
उत्सव का प्रधान स्वरूप प्रेममयी लठमार होली, ढाल रक्षा, फाग गायन
प्रयुक्त प्रमुख रंग टेसू (पलाश) का प्राकृतिक रंग, शुद्ध अबीर, चंदन और गुलाल
मुख्य आध्यात्मिक फल अहंकार का नाश, राधा कृष्ण प्रेम रस की प्राप्ति और मोक्ष

बरसाना की लठमार होली के पावन दर्शन और उसकी दिव्यता को अनुभव करने के लिए साधक व श्रद्धालु को विशिष्ट पारंपरिक मर्यादाओं का पालन करना चाहिए।

  • प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर राधा कुंड अथवा पवित्र सरोवर के जल से स्नान करके पीले अथवा श्वेत वस्त्र धारण करना।
  • मन में किसी भी प्रकार का काम विकार न रखकर केवल निष्काम सख्य अथवा गोपी भाव का ध्यान करना।
  • बरसाना के श्री लाड़ली जी मंदिर में जाकर श्री राधा रानी के चरणों में शुद्ध प्राकृतिक अबीर और गुलाल समर्पित करना।
  • नंदगांव के हुरियारों द्वारा गाए जाने वाले रसिया और पारंपरिक फाग पदों का श्रद्धापूर्वक श्रवण करना।
  • बरसाना की गोपियों (माताओं व बहनों) को साक्षात राधा जी की सखियां मानकर उनके प्रति आदर भाव रखना।
  • किसी भी प्रकार के रासायनिक और अपवित्र रंगों के स्थान पर केवल पलाश के फूलों से बने रंगों का ही उपयोग करना।
  • दिनभर "राधे राधे" महामंत्र का निरंतर जप करना और ब्रज रज (पवित्र मिट्टी) को अपने मस्तक पर धारण करना।
  • सायंकाल रंगीली गली में होने वाले दिव्य लठमार उत्सव के साक्षी बनकर आत्मिक आनंद का अनुभव करना।

5000 वर्ष प्राचीन पौराणिक इतिहास और राधा कृष्ण की प्रेम लीला

श्रीमद्भागवत, गर्ग संहिता और पद्म पुराण के पाताल खंड में बरसाना की लठमार होली की ऐतिहासिक उत्पत्ति का अत्यंत मनोहारी विवरण मिलता है। द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण अपने सखाओं श्रीदामा, सुबल, मनसुखा आदि के साथ नंदगांव से चलकर बरसाना पहुंचे थे। उनका उद्देश्य श्री राधा रानी और उनकी सखियों ललिता, विशाखा, चित्रा आदि पर रंग डालना और उनके साथ हंसी ठिठोली करना था।

जब भगवान श्री कृष्ण ने राधा रानी पर गुलाल और रंग की पिचकारी छोड़ी तब राधा रानी और उनकी सखियों ने प्रेममयी मान धारण करते हुए कृष्ण और उनके सखाओं को सबक सिखाने के लिए पास में पड़ी लाठियां उठा लीं। गोपियों के इस अचानक आक्रमण से बचने के लिए सखाओं ने अपने पास रखी चमड़े और धातु की ढालों को ऊपर उठा लिया। गोपियों ने प्रेम रस में डूबकर लाठियों से प्रहार किया और सखाओं ने हंसते हुए उन प्रहारों को अपनी ढालों पर झेला। जब सखा पकड़े गए, तो गोपियों ने उन्हें स्त्रियों के वस्त्र पहनाकर, काजल और बिंदी लगाकर नचाया। यही पावन लीला आज भी उसी जीवंत रूप में बरसाना में प्रतिवर्ष फाल्गुन शुक्ल नवमी को दोहराई जाती है।

लठमार होली की अद्भुत परंपरा, नियम और ढाल रक्षा का विधान

बरसाना की लठमार होली में कोई भी साधारण व्यक्ति बिना पूर्व परंपरा के भाग नहीं ले सकता। इसमें केवल नंदगांव के पुरुष और बरसाना की महिलाएं ही मुख्य प्रतिभागी होते हैं। नंदगांव के पुरुषों को हुरियारा और बरसाना की महिलाओं को हुरियारिन कहा जाता है।

  • उत्सव से एक दिन पूर्व फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को बरसाना से एक दूत (पंडा) गुलाल और निमंत्रण लेकर नंदगांव जाता है।
  • नवमी के दिन प्रातः नंदगांव के हुरियारे अपने सिर पर विशेष साफा (पाग) बांधते हैं और कमर में फेंटा कसते हैं तथा हाथों में मजबूत ढालें लेकर बरसाना के लिए प्रस्थान करते हैं।
  • बरसाना की सीमा पर स्थित 'पीली पोखर' पर पहुंचकर हुरियारे विश्राम करते हैं, जहां उनकी पाग को विशेष रूप से बांधा जाता है और वे भांग तथा ठंडाई का प्रसाद ग्रहण करते हैं।
  • इसके पश्चात वे सीधे श्रीजी मंदिर पहुंचते हैं, जहां दोनों पक्षों के बीच रसिया और समाज गायन की अत्यंत मधुर और तीखी नोकझोंक होती है।
  • दोपहर बाद बरसाना की संकरी 'रंगीली गली' में लठमार युद्ध प्रारंभ होता है।
  • हुरियारिनें, जो घूंघट काढ़े होती हैं, दोनों हाथों से मजबूत और भारी लाठियों से हुरियारों के सिर पर तानकर वार करती हैं।
  • हुरियारे घुटनों के बल बैठकर अपनी ढालों से उन प्रहारों को रोकते हैं। नियम यह होता है कि हुरियारा न तो पलटकर हाथ उठा सकता है और न ही गुस्सा हो सकता है, उसे केवल मुस्कुराते हुए वार सहना होता है।
  • यदि किसी हुरियारे की ढाल छूट जाए अथवा वह गिर पड़े, तो उसे प्रतीकात्मक रूप से बंदी बनाकर नचाया जाता है।
उत्सव चरण प्रमुख स्थल प्रयुक्त साधन व सामग्री आध्यात्मिक व पारंपरिक भाव
फाग आमंत्रण नंदगांव मंदिर गुलाल, पान का बीड़ा, निमंत्रण पत्र प्रेम का पावन आह्वान
साफा बंधन व तैयारी पीली पोखर, बरसाना भारी पाग, कमरबंद, चमड़े की ढाल आत्मरक्षा व वीरोचित सख्य भाव
समाज व रसिया गायन श्रीजी मंदिर प्रांगण ढोलक, झांझ, मंजीरा, चौपाई पद राधा कृष्ण प्रेम संवाद व विनोद
मुख्य लठमार होली रंगीली गली, बरसाना तेल में पकी लाठियां, पीतल की ढाल अहंकार का विसर्जन व प्रेम प्रहार

प्रयुक्त होने वाले प्राकृतिक रंग और टेसू के फूलों का निर्माण

बरसाना की लठमार होली की सबसे बड़ी विशेषता इसकी शुद्धता और दिव्यता है। यहां किसी भी प्रकार के रासायनिक रंगों का प्रवेश वर्जित है। लठमार होली के लिए कई सप्ताह पूर्व से ही तैयारियां प्रारंभ हो जाती हैं।

होलिकोत्सव के लिए प्रयुक्त होने वाला मुख्य रंग टेसू अर्थात पलाश के फूलों से तैयार किया जाता है। वनों से ताजे पलाश के फूलों को एकत्र करके बड़े बड़े तांबे और पीतल के कड़ाहों में उबाला जाता है। इस उबाले हुए जल में थोड़ा सा चूना, केसर और हल्दी मिलाने से एक अत्यंत गहरा, चमकदार और सुगंधित केसरिया लाल रंग बनता है। यह रंग न केवल त्वचा के लिए अत्यंत लाभकारी होता है, अपितु यह वातावरण के कीटाणुओं का भी नाश करता है। इसके साथ ही शुद्ध अरारोट और पिसे हुए सूखे पलाश के पत्तों से हर्बल गुलाल तैयार किया जाता है। जब रंगीली गली में हजारों किलो अबीर और टेसू का रंग एक साथ आकाश में उड़ता है, तो संपूर्ण वातावरण गुलाबी और सिंदूरी बादलों से ढंक जाता है।

आध्यात्मिक दर्शन: प्रेम की मार और पुरुष अहंकार का विसर्जन

दार्शनिक दृष्टि से बरसाना की लठमार होली अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक संदेश देती है। सामान्य संसार में पुरुष को बल, पराक्रम और प्रभुत्व का प्रतीक माना जाता है, जबकि स्त्री को कोमल और अबला समझा जाता है। परंतु बरसाना की पावन भूमि पर शक्ति (राधा) का स्थान पुरुष (कृष्ण) से सदैव ऊपर है। ब्रज में कहा जाता है कि "कृष्ण के मन में बसे राधा और राधा के मन में कृष्ण"।

जब नंदगांव के बलिष्ठ पुरुष बरसाना की गोपियों के सामने घुटनों के बल बैठकर उनकी लाठियों के प्रहार सहते हैं, तो वह दृश्य पुरुष के स्थूल शारीरिक अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक होता है। वह लाठी कोई हिंसा की लाठी नहीं है, वह प्रेम और अधिकार की मार है। जीव जब परमात्मा की आह्लादिनी शक्ति श्री राधा रानी के प्रेम की मार को सहना सीख जाता है तब उसके हृदय का समस्त कल्मष, दंभ और विकार चूर चूर हो जाते हैं। यह उत्सव यह सिद्ध करता है कि परमात्मा को बाहुबल अथवा शुष्क ज्ञान से नहीं जीता जा सकता, उन्हें केवल विशुद्ध प्रेम और पूर्ण समर्पण से ही वश में किया जा सकता है।

FAQ

बरसाना की लठमार होली किस तिथि को खेली जाती है?
यह विश्वप्रसिद्ध होली प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को बरसाना गांव में अत्यंत धूमधाम से खेली जाती है।

लठमार होली में लाठियों से प्रहार कौन और किस पर करता है?
बरसाना की महिलाएं (हुरियारिनें) नंदगांव से आए पुरुषों (हुरियारों) पर प्रेमपूर्वक लाठियों से प्रहार करती हैं और पुरुष ढालों से अपना बचाव करते हैं।

लठमार होली में किस वृक्ष के फूलों का रंग मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है?
इस उत्सव में पलाश अर्थात टेसू के फूलों को उबालकर बनाया गया प्राकृतिक केसरिया रंग और शुद्ध हर्बल अबीर गुलाल उपयोग किया जाता है।

हुरियारों द्वारा लाठियों की मार को किस वस्तु से रोका जाता है?
हुरियारे अपने सिर पर भारी पगड़ी (पाग) बांधते हैं और हाथों में धातु या चमड़े की मजबूत ढाल लेकर घुटनों के बल बैठकर लाठियों के प्रहार को रोकते हैं।

बरसाना की लठमार होली का मूल आध्यात्मिक संदेश क्या है?
इसका मूल संदेश प्रेम के सम्मुख पुरुष अहंकार का विसर्जन है, जहां शक्ति स्वरूपा राधा रानी का प्रेम सर्वोपरि स्थान प्राप्त करता है।

पाएं अपनी सटीक कुंडली

कुंडली बनाएं

क्या आपको यह पसंद आया?

लेखक

अपर्णा पाटनी

अपर्णा पाटनी (63)


अनुभव: 20

इनसे पूछें: Family Planning, Career

इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें

WELCOME TO

ZODIAQ

Right Decisions at the right time with ZODIAQ