भानु सप्तमी का आध्यात्मिक रहस्य क्या है?

By पं. नरेंद्र शर्मा

सूर्य उपासना से असाध्य चर्म रोगों और दरिद्रता का नाश

भानु सप्तमी: सूर्य अर्घ्य विधि, कथा, मंत्र और स्वास्थ्य लाभ

भानु सप्तमी का पंचांग परिचय और खगोलीय संधिकाल

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि जब रविवार के दिन पड़ती है, तो उस अत्यंत पावन और दुर्लभ खगोलीय संयोग को वैदिक पंचांग में भानु सप्तमी अथवा सूर्य सप्तमी कहा जाता है। भविष्य पुराण और मत्स्य पुराण में भानु सप्तमी को संपूर्ण वर्ष की सभी सप्तमी तिथियों में सर्वश्रेष्ठ मुकुटमणि स्वीकार किया गया है। रविवार प्रत्यक्ष देवता भगवान सूर्य का अपना दिन है और सप्तमी तिथि उनकी अपनी जन्म तिथि मानी जाती है। जब वार और तिथि दोनों का एक साथ सम्मिलन होता है, तो सौरमंडल में जीवनदायिनी ऊर्जा का एक अत्यंत शक्तिशाली चक्र सक्रिय हो जाता है। फाल्गुन का यह कालखंड शिशिर ऋतु के अवसान और वसंत के पूर्ण प्रस्फुटन का समय होता है, जिसमें सूर्य की किरणें पृथ्वी पर अपनी विशेष औषधीय और हीलिंग क्षमता बिखेरती हैं।

पंचांग घटक शास्त्रीय विवरण
मास एवं पक्ष फाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष
पावन तिथि शुक्ल पक्ष सप्तमी तिथि
दुर्लभ वार संयोग रविवार के दिन सप्तमी का आगमन
अधिष्ठाता देवता भगवान भुवन भास्कर सूर्य नारायण
प्रधान साधना तांबे के लोटे से सूर्य अर्घ्य, आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ
आहार नियम संपूर्ण दिन नमक रहित सात्विक आहार
मुख्य आध्यात्मिक फल असाध्य चर्म रोगों का नाश, तेज, नेत्र ज्योति और आरोग्यता

भानु सप्तमी के पावन अवसर पर सौर ऊर्जा को आत्मसात करने और शारीरिक कांति प्राप्त करने के लिए साधक को सूर्योदय से ही कठोर वैदिक आचार संहिता का पालन करना चाहिए।

  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में शैया त्यागकर शीतल जल में लाल चंदन और गंगाजल मिलाकर स्नान करना।
  • स्नान के पश्चात शुद्ध लाल अथवा श्वेत सूती वस्त्र धारण करके तांबे के पात्र में जल, रोली, अक्षत और लाल कनेर के पुष्प रखना।
  • उदीयमान बाल सूर्य के समक्ष खड़े होकर दोनों हाथों को सिर से ऊपर उठाकर तीन बार श्रद्धापूर्वक अर्घ्य अर्पित करना।
  • अर्घ्य देते समय जल की गिरती हुई धार के मध्य से सूर्य देव के बिंब का दर्शन करना जिससे नेत्र ज्योति का विस्तार होता है।
  • दिनभर नमक का पूर्ण परित्याग करना और केवल मीठे फलाहार अथवा गाय के दूध का सीमित सेवन करना।
  • भगवान सूर्य के बारह दिव्य नामों और सूर्य गायत्री मंत्र का कम से कम 108 बार एकाग्रचित्त होकर जप करना।
  • वाल्मीकि रामायण में वर्णित महातेजस्वी आदित्य हृदय स्तोत्र का तीन बार शुद्ध स्वर में पाठ करना।
  • संध्या वेला में सूर्य नारायण के अस्ताचल जाने से पूर्व उनका मौन ध्यान करके सात्विक भोजन से व्रत का पालन करना।

भविष्य पुराण में वर्णित सूर्य उपासना और श्रीकृष्ण-सांब आख्यान

भविष्य पुराण के ब्राह्म पर्व में भानु सप्तमी की महिमा और उसके अचूक चिकित्सीय प्रभाव का अत्यंत विशद और प्रामाणिक इतिहास मिलता है। द्वारका में भगवान श्री कृष्ण और रानी जाम्बवती के अत्यंत सुंदर और रूपवान पुत्र सांब निवास करते थे। अपने अप्रतिम शारीरिक सौंदर्य के कारण सांब के भीतर धीरे धीरे गहरा अहंकार उत्पन्न हो गया था। एक बार जब महर्षि दुर्वासा द्वारका पधारे, तो सांब ने उनके दुर्बल और तपस्वी शरीर को देखकर उनका उपहास उड़ा दिया। महर्षि दुर्वासा ने अत्यंत कुपित होकर सांब को भयंकर कुष्ठ रोग से पीड़ित होने का शाप दे दिया।

शाप के प्रभाव से सांब का संपूर्ण शरीर गलने लगा और उनकी पूर्व कांति पूरी तरह नष्ट हो गई। व्याकुल होकर जब वे अपने पिता भगवान श्री कृष्ण की शरण में पहुंचे, तो भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें स्पष्ट शब्दों में कहा कि कुष्ठ और त्वचा रोगों के नाश के लिए इस संपूर्ण ब्रह्मांड में प्रत्यक्ष देवता भुवन भास्कर सूर्य के अतिरिक्त कोई अन्य शरण्य नहीं है। भगवान कृष्ण के आदेशानुसार सांब ने चंद्रभागा नदी के तट पर सूर्य देव की घोर तपस्या की और फाल्गुन शुक्ल पक्ष की भानु सप्तमी का विधिवत निर्जला और लवण रहित व्रत संपन्न किया।

सूर्य देव ने प्रसन्न होकर सांब को रोगमुक्त होने का वरदान दिया और सांब ने उस स्थान पर सूर्य देव के एक विशाल मंदिर का निर्माण कराया जिसे आज कोणार्क और मूलस्थान के रूप में जाना जाता है। यह कथा यह प्रमाणित करती है कि जब समस्त आधुनिक चिकित्सा पद्धतियां और सांसारिक उपाय निष्फल हो जाते हैं तब भानु सप्तमी के दिन की गई सूर्य साधना शरीर की मृत कोशिकाओं को पुनः जाग्रत करके असाध्य रोगों को भी समूल नष्ट कर देती है।

असाध्य चर्म रोगों, सोरायसिस और नेत्र रोगों का वैज्ञानिक समाधान

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और क्रोमोपैथी यह प्रमाणित करते हैं कि प्रातः काल के सूर्य की किरणों में पराबैंगनी और अवरक्त किरणों का ऐसा संतुलित अनुपात होता है जो मानव शरीर की त्वचा के भीतर मेलानोसाइट्स कोशिकाओं को तेजी से सक्रिय करता है। फाल्गुन मास की भानु सप्तमी पर जब साधक अर्घ्य देता है, तो तांबे के पात्र से गिरने वाली जलधारा एक प्राकृतिक प्रिज्म की भांति कार्य करती है। सूर्य की सात रंग वाली किरणें जब इस जलधारा से छनकर साधक के मस्तक, हृदय और त्वचा पर पड़ती हैं, तो शरीर के भीतर मौजूद विषाक्त टॉक्सिन्स जलकर भस्म हो जाते हैं।

शारीरिक व्याधि सूर्य रश्मियों का जैविक प्रभाव अनुशंसित शास्त्रीय उपाय अपेक्षित स्वास्थ्य लाभ
श्वेत कुष्ठ व सोरायसिस मेलानिन उत्पादन व रक्त शोधन सूर्य धूप स्नान व मदार पत्र तैल मर्दन त्वचा के प्राकृतिक रंग की पुनर्प्राप्ति
नेत्रों की ज्योति का क्षरण ऑप्टिक नर्व की सक्रियता अर्घ्य जलधारा के मध्य से सूर्य दर्शन चश्मे के नंबर में कमी व तेज दृष्टि
विटामिन डी की न्यूनता कैल्शियम अवशोषण व अस्थि पुष्टि प्रातः 30 मिनट तक सूर्य प्रकाश स्नान जोड़ों के दर्द व दुर्बलता का अंत
अवसाद व मानसिक जड़ता सेरोटोनिन व मेलाटोनिन संतुलन गायत्री मंत्र जप व सूर्य नमस्कार चित्त की स्थिरता व ऊर्जा का संचार

भानु सप्तमी के दिन बिना नमक का भोजन करने का अत्यंत गहरा वैज्ञानिक आधार है। आयुर्वेद के अनुसार नमक का अधिक सेवन शरीर में जल तत्त्व को रोकता है और रक्त को दूषित करके त्वचा में खुजली, चर्म रोग और सूजन को बढ़ावा देता है। जब साधक एक दिन के लिए नमक का पूर्ण त्याग कर देता है, तो शरीर की किडनी और त्वचा के विषाक्त द्रव्य बाहर निकल जाते हैं। इस दिन प्रातः काल उगते हुए सूर्य के प्रकाश में 30 मिनट तक बैठना और सूर्य नमस्कार के 12 चक्रों का अभ्यास करना रक्त संचार को तीव्र करके त्वचा को नया जीवन प्रदान करता है।

तांबे के पात्र से सूर्य अर्घ्य के तांत्रिक व ज्योतिषीय नियम

ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को नवग्रहों का राजा, आत्मा का अधिष्ठाता, मान प्रतिष्ठा का कारक और पिता का प्रतिनिधि ग्रह माना गया है। यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में सूर्य देव नीच राशि तुला में स्थित हों, राहु या केतु से पीड़ित होकर ग्रहण योग बना रहे हों अथवा षष्ठ, अष्टम या द्वादश भाव में बैठकर अपयश और नेत्र विकार दे रहे हों, तो फाल्गुन भानु सप्तमी का दिन उस नीच के सूर्य को भी राजयोग में बदलने का सामर्थ्य रखता है।

सूर्य को अर्घ्य देने के लिए केवल और केवल शुद्ध तांबे के पात्र का ही उपयोग करना चाहिए। तांबा सूर्य की अपनी धातु है जो जल की आणविक संरचना को दिव्य ऊर्जा से भर देती है। अर्घ्य देने का शास्त्रीय क्रम अत्यंत व्यवस्थित होना चाहिए:

  • तांबे के लोटे में शुद्ध जल भरकर उसमें एक चुटकी पिसा हुआ लाल चंदन, 7 दाने अक्षत, थोड़ा सा रोली और एक लाल गुड़हल अथवा कनेर का पुष्प डालें।
  • सूर्य के सम्मुख पूर्व दिशा की ओर खड़े होकर दोनों हाथों को उठाकर लोटे को अपने सिर के ऊपर लाएं ताकि लोटे और मस्तक के बीच कम से कम 12 इंच का अंतर रहे।
  • जल की पतली और अखंड धारा को भूमि पर किसी शुद्ध पात्र अथवा ताम्र परात में धीरे धीरे प्रवाहित करें, यह जल कभी भी पैरों पर नहीं पड़ना चाहिए।
  • जल प्रवाहित करते समय ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः अथवा ॐ घृणि सूर्याय नमः मंत्र का तीन बार स्पष्ट उच्चारण करें।
  • अर्घ्य समाप्त होने के पश्चात उस ताम्र परात के जल को अपनी दोनों अनामिका उंगलियों से छूकर अपने दोनों नेत्रों, ललाट और कंठ पर लगाएं।
  • अंत में उसी स्थान पर खड़े होकर दक्षिणावर्त अर्थात घड़ी की सुई की दिशा में तीन बार घूमकर सूर्य देव की प्रदक्षिणा करें।

आदित्य हृदय स्तोत्र और सूर्य गायत्री की महासाधना

वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में यह प्रसंग आता है कि जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम रावण से युद्ध करते हुए कुछ क्षण के लिए विश्राम कर रहे थे तब रणभूमि में महर्षि अगस्त्य ने प्रकट होकर उन्हें आदित्य हृदय स्तोत्र का उपदेश दिया था। महर्षि अगस्त्य ने कहा था कि हे राम, यह स्तोत्र परम पवित्र, संपूर्ण पापों का नाशक, चिंताओं को मिटाने वाला और आयु को बढ़ाने वाला है। इसके पाठ से तुम युद्ध में रावण पर निश्चित विजय प्राप्त करोगे। श्री राम ने इस स्तोत्र का तीन बार आचमन करके पाठ किया और रावण का वध संपन्न हुआ।

भानु सप्तमी के दिन जो साधक तांबे के दीपक में गाय का शुद्ध घी डालकर सूर्य के सम्मुख इस दिव्य स्तोत्र का तीन बार पाठ करता है, उसके जीवन से दरिद्रता, भय और विरोधियों के षड्यंत्र उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्य के उदय होते ही गहन अंधकार विलीन हो जाता है। इसके साथ ही सूर्य गायत्री मंत्र ॐ आदित्याय विद्महे मार्तण्डाय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् का जप मनुष्य की प्रज्ञा को तीक्ष्ण बना देता है। यह साधना साधक के भीतर नेतृत्व क्षमता, आत्मविश्वास, वाणी का ओज और अदम्य इच्छाशक्ति का विस्तार करती है।

फाल्गुन भानु सप्तमी का आध्यात्मिक संदेश और आत्मबल का उदय

भानु सप्तमी हमें यह सर्वोच्च आध्यात्मिक संदेश देती है कि संपूर्ण संसार को प्रकाशित करने वाला सूर्य केवल आकाश में चमकने वाला तारा नहीं है बल्कि वह प्रत्येक मनुष्य के भीतर आत्म तत्त्व के रूप में विराजमान है। उपनिषद कहते हैं कि जो सूर्य उस अंतरिक्ष में तप रहा है, वही सूर्य तुम्हारी आत्मा के भीतर चेतना बनकर जल रहा है। जब मनुष्य अपने भीतर छिपे अज्ञान, आलस्य, प्रमाद और हीनता की भावना को त्याग देता है तब उसके अंतर्मन का सूर्य जाग्रत हो जाता है।

फाल्गुन की यह सप्तमी शिशिर के अवसाद से निकालकर वसंत के नवसृजन की ओर ले जाने वाला वह पावन सोपान है जो मनुष्य की काया को कंचन जैसा निर्मल और आत्मा को सूर्य जैसा तेजस्वी बना देता है। इस दिन किया गया अन्न दान, गुड़ का दान, तांबे के बर्तनों का दान और रक्त चंदन का दान मनुष्य के समस्त पूर्व संचित पापों को भस्म करके उसे एक विजयी, निरोगी और यशस्वी जीवन का वरदान प्रदान करता है।

FAQ

भानु सप्तमी किसे कहा जाता है?
जब किसी माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि रविवार के दिन पड़ती है, तो उस अत्यंत दुर्लभ और पवित्र संयोग को भानु सप्तमी कहा जाता है।

भानु सप्तमी पर नमक का त्याग क्यों किया जाता है?
नमक का त्याग करने से शरीर के विषाक्त टॉक्सिन्स बाहर निकलते हैं, चर्म रोगों का शमन होता है और सूर्य की हीलिंग ऊर्जा का अवशोषण सुगम हो जाता है।

भगवान कृष्ण के पुत्र सांब को किस स्तुति से कुष्ठ रोग से मुक्ति मिली थी?
सांब ने चंद्रभागा नदी के तट पर भानु सप्तमी का व्रत रखकर भगवान सूर्य की आराधना की थी जिससे उनका असाध्य कुष्ठ रोग पूरी तरह नष्ट हुआ था।

सूर्य अर्घ्य देते समय जल की धार से सूर्य को क्यों देखना चाहिए?
जल की धार एक प्राकृतिक लेंस का कार्य करती है जिससे सूर्य की पराबैंगनी किरणें छनकर आंखों और पीनियल ग्रंथि को उत्तेजित करती हैं, जिससे नेत्र ज्योति बढ़ती है।

नीच के सूर्य को बलवान करने के लिए इस दिन क्या उपाय करना चाहिए?
तांबे के लोटे से सूर्य को जल अर्घ्य दें, आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें, बिना नमक का भोजन करें और गुड़ व तांबे का दान करें।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

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