ब्रज मंडल की विभिन्न होलियों का रहस्य क्या है?

By पं. अभिषेक शर्मा

नंदगांव, गोकुल, बांके बिहारी और दाऊजी का चालीस दिवसीय होलिकोत्सव

ब्रज की होली: नंदगांव, गोकुल, बांके बिहारी और हुरंगा

पंचांग विवरण और ब्रज के चालीस दिवसीय होलिकोत्सव की सारणी

फाल्गुन मास का संपूर्ण शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष ब्रज भूमि में आनंद, भक्ति और रस का ऐसा सागर प्रवाहित करता है जिसकी तुलना तीनों लोकों में नहीं मिलती। सनातन वैदिक पंचांग के अनुसार ब्रज में होली केवल पूर्णिमा के एक दिन का उत्सव नहीं है, अपितु यह वसंत पंचमी से लेकर चैत्र कृष्ण प्रतिपदा तक चलने वाला चालीस दिनों का अखंड महा-महोत्सव है। इस पावन कालखंड में भगवान श्री राधा कृष्ण के लीला स्थलों-नंदगांव, बरसाना, गोकुल, वृंदावन, मथुरा, दाऊजी और बांके बिहारी मंदिर-में प्रतिदिन अलग अलग स्वरूपों में होली संपन्न होती है। यह उत्सव जीव और परमात्मा के मिलन की पराकाष्ठा है, जहां प्रत्येक उत्सव का अपना विशिष्ट शास्त्रीय और भावुक विधान है।

पंचांग तिथि उत्सव स्वरूप प्रमुख तीर्थ स्थल प्रमुख उपादान व साधन आध्यात्मिक भाव
माघ शुक्ल पंचमी होली का प्रथम डांडा रोपण संपूर्ण ब्रज मंडल गुलाल व वसंत पूजन काम वासना का रूपांतरण
फाल्गुन शुक्ल द्वितीया फुलेरा दूज पुष्प होली श्री बांके बिहारी मंदिर सुगंधित प्राकृतिक पुष्प पंखुड़ियां निर्दोष वात्सल्य व माधुर्य
फाल्गुन शुक्ल नवमी विश्वप्रसिद्ध लठमार होली श्रीजी मंदिर, बरसाना पलाश रंग, लाठी व चमड़े की ढाल शक्ति के सम्मुख अहंकार विसर्जन
फाल्गुन शुक्ल दशमी नंदगांव लठमार होली नंद भवन, नंदगांव टेसू रंग, ढाल व समाज गायन सख्य भाव और गोपी प्रेम
फाल्गुन शुक्ल एकादशी रंगभरी व आमलकी एकादशी बांके बिहारी व विश्वनाथ चांदी की पिचकारी व हर्बल गुलाल युगल सरकार का वैवाहिक आनंद
फाल्गुन शुक्ल द्वादशी छड़ी मार होली गोकुल धाम, मथुरा सुगंधित जल व छोटी छड़ियां बाल गोपाल का वात्सल्य संरक्षण
फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी विधवा माताओं की होली गोपीनाथ मंदिर, वृंदावन अबीर, गुलाल व भजन संकीर्तन सामाजिक रूढ़ि मुक्ति व कृष्ण समर्पण
चैत्र कृष्ण द्वितीया हुरंगा महोत्सव दाऊजी मंदिर, बल्देव कपड़े फाड़ना, रंग के कुएं, लाठियां श्री बलराम व रेवती का दिव्य उल्लास

ब्रज की इस अखंड होली परिक्रमा और दर्शन का पुण्य प्राप्त करने के लिए साधक को संपूर्ण यात्रा के दौरान विशिष्ट वैदिक और आध्यात्मिक नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना आवश्यक होता है।

  • प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में यमुना जी के पावन जल में अथवा तीर्थ जल में स्नान करके शुद्ध श्वेत अथवा पीत वस्त्र धारण करना।
  • ब्रज की पावन रज को अपने मस्तक, कंठ और हृदय पर लगाकर प्रार्थना करना कि मन का समस्त कलुष और वासना दूर हो जाए।
  • किसी भी मंदिर में दर्शन के समय रासायनिक अथवा कृत्रिम रंगों का प्रयोग न करना, केवल प्राकृतिक अबीर और गुलाल ही अर्पित करना।
  • ब्रजवासियों को सामान्य मनुष्य न मानकर उन्हें साक्षात श्री राधा और श्री कृष्ण के नित्य परिकर के रूप में आदर देना।
  • संपूर्ण यात्रा के समय "राधे राधे" अथवा "हरे कृष्ण" महामंत्र का अविरल मानसिक जप करना।
  • ब्रज के पारंपरिक फाग गायन, रसिया और समाज गायन को शांत चित्त से श्रवण करना।
  • पराई स्त्रियों के प्रति मातृवत अथवा गोपी भाव रखना और किसी भी प्रकार के अभद्र आचरण से दूर रहना।
  • रात्रि के समय हरि कथा और संकीर्तन का श्रवण करके सात्विक प्रसादम ग्रहण करना।

नंदगांव की लठमार होली और सखा भाव का प्रत्युत्तर

बरसाना की लठमार होली के ठीक अगले दिन अर्थात फाल्गुन शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को यह दिव्य उत्सव नंदगांव में पहुंचता है। बरसाना के हुरियारों पर जब नवमी को लाठियों का प्रहार होता है तब दशमी के दिन बरसाना के हुरियारे (राधा पक्ष के सखा) कृष्ण के गांव नंदगांव पहुंचते हैं। इसे न्योता होली और प्रत्युत्तर होली कहा जाता है।

नंदगांव के नंद भवन मंदिर में दोनों पक्षों का समाज गायन होता है। नंदगांव की हुरियारिनें (गोपियां) बरसाना के हुरियारों पर लाठियों से प्रहार करती हैं और बरसाना के गोप अपनी मजबूत ढालों से उनका बचाव करते हैं। इस उत्सव में सखा भाव और गोपी भाव का ऐसा अद्भुत तादात्म्य देखने को मिलता है कि उपस्थित जनसमुदाय अपनी देह सुध खो बैठता है। नंदगांव की गलियों में उड़ता हुआ पीला और लाल गुलाल यह संदेश देता है कि राधा और कृष्ण में कोई भेद नहीं है, जो बरसाना है वही नंदगांव है और जो प्रेम बरसाना में लाठी बनकर बरसता है वही नंदगांव में ढाल बनकर उस प्रेम को धारण करता है।

बांके बिहारी मंदिर की अलौकिक होली और चांदी की पिचकारी

वृंदावन का विश्वविख्यात श्री ठाकुर बांके बिहारी मंदिर होलिकोत्सव का वह पावन केंद्र है जहां भक्त और भगवान के बीच की समस्त औपचारिकताएं समाप्त हो जाती हैं। फाल्गुन शुक्ल एकादशी अर्थात रंगभरी एकादशी के दिन से बांके बिहारी जी के गर्भगृह के कपाट खुलते ही एक स्वर्णिम दृश्य उपस्थित होता है।

ठाकुर जी श्वेत वस्त्र धारण करते हैं जिन पर सोने और चांदी के गोटे टंके होते हैं। उनके हाथ में विशुद्ध ठोस चांदी की प्राचीन पिचकारी सुशोभित होती है। मंदिर के गोस्वामियों द्वारा उस चांदी की पिचकारी में केवड़ा, गुलाब, चंदन और पलाश के उबाले हुए सुगंधित जल को भरकर सीधे भक्तों के ऊपर छिड़का जाता है। जब वह दिव्य रंग रूपी चरणामृत भक्तों के मस्तक और शरीर पर पड़ता है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं बांके बिहारी अपने करकमलों से भक्तों के जन्म जन्मांतर के पापों को धो रहे हों।

इस उत्सव में मंदिर के प्रांगण में क्विंटल भर सूखा अबीर और गुलाल उड़ाया जाता है। बांके बिहारी जी के सम्मुख गाये जाने वाले रसिया के पदों पर जब भक्त झूमते हैं, तो वहां न कोई धनी रहता है न कोई निर्धन, केवल राधा कृष्ण का रस ही शेष रहता है।

मंदिर व तीर्थ स्थल मुख्य उत्सव तिथि प्रधान दर्शन समय प्रयुक्त विशिष्ट सामग्री
श्री बांके बिहारी, वृंदावन फाल्गुन शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा प्रातः 9 बजे से दोपहर 1 बजे चांदी की पिचकारी, केवड़ा जल, अबीर
राधा वल्लभ मंदिर, वृंदावन फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा प्रातः 10 बजे से दोपहर 12 बजे गुलाब जल, चंदन चूर्ण, पीला गुलाल
नंद भवन, नंदगांव फाल्गुन शुक्ल दशमी अपराह्न 2 बजे से शाम 6 बजे चमड़े की ढाल, तेल पकी लाठियां, टेसू
गोकुल नंद किला, गोकुल फाल्गुन शुक्ल द्वादशी पूर्वाह्न 11 बजे से शाम 4 बजे छोटी छड़ियां, दही, हल्दी व माखन
दाऊजी मंदिर, बल्देव चैत्र कृष्ण द्वितीया दोपहर 12 बजे से शाम 5 बजे रंग के हौज, कपड़े की कोड़ेदार लाठियां

गोकुल की छड़ी मार होली और बाल स्वरूप का वात्सल्य

फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को यमुना पार गोकुल धाम में एक अत्यंत अनूठी और कोमल परंपरा निभाई जाती है जिसे 'छड़ी मार होली' कहा जाता है। गोकुल वह पावन तीर्थ है जहां भगवान श्री कृष्ण ने अपने शैशव काल और बाल्यकाल की अठखेलियां की थीं।

गोकुल की मान्यता है कि कान्हा अभी अत्यंत छोटे बालक हैं, इसलिए उन पर अथवा उनके सखाओं पर भारी लाठियों से प्रहार नहीं किया जा सकता क्योंकि इससे बाल गोपाल को चोट लग सकती है। अतः गोकुल की गोपियां अपने हाथों में सुसज्जित छोटी और हल्की छड़ियां लेती हैं। वे इन छड़ियों पर फूलों की मालाएं लपेटती हैं और हुरियारों पर केवल प्रतीकात्मक और अत्यंत धीमे प्रहार करती हैं।

इस दिन गोकुल में बाल कृष्ण को माखन, मिश्री और हल्दी मिले दूध का भोग लगाया जाता है। इसके पश्चात हुरियारों और गोपियों के बीच माखन और दही की होली खेली जाती है। यह उत्सव वात्सल्य रस की पराकाष्ठा है जो यह सिखाता है कि भगवान को केवल ऐश्वर्य और पराक्रम से नहीं बल्कि एक छोटे बालक की भांति लाड़ लड़ाकर भी रिझाया जा सकता है।

वृंदावन में विधवा माताओं की होली और सामाजिक मुक्ति

वृंदावन के प्राचीन गोपीनाथ मंदिर और राधा वल्लभ मंदिर में खेली जाने वाली विधवा माताओं की होली आधुनिक सनातन समाज का अत्यंत संवेदनशील, मानवीय और क्रांतिकारी अध्याय है। भारतीय समाज में शताब्दियों से यह दुर्भाग्यपूर्ण रूढ़ि चली आ रही थी कि विधवा स्त्रियों को रंग, उत्सव और मांगलिक कार्यों से पूरी तरह बहिष्कृत कर दिया जाता था।

परंतु वृंदावन की पावन भूमि पर आकर यह रूढ़ि सदा के लिए टूट गई। श्री चैतन्य महाप्रभु और सनातन गोस्वामी के अद्वैत दर्शन से प्रेरित होकर विगत कई वर्षों से वृंदावन के विभिन्न आश्रमों में रहने वाली हजारों परित्यक्ता और निराश्रित माताएं एकत्र होकर होली खेलती हैं।

फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी के दिन जब श्वेत वस्त्र धारण किए हुए ये वृद्ध माताएं अपने हाथों में लाल, पीला और नारंगी गुलाल लेकर ठाकुर गोपीनाथ जी के विग्रह पर अर्पित करती हैं और एक दूसरे के मुख पर रंग लगाती हैं, तो उनके अश्रुपूरित नेत्रों में कृष्ण प्रेम का अविरल सागर उमड़ पड़ता है। यह दृश्य यह सिद्ध करता है कि भगवान की दृष्टि में कोई भी त्याज्य नहीं है। जिसका संसार में कोई नहीं होता, उसके बांके बिहारी होते हैं। यह होली केवल रंगों का खेल नहीं है, यह सामाजिक उपेक्षा से मुक्त होकर परमात्मा की शरण में परम शांति पाने का जीवंत प्रमाण है।

दाऊजी का हुरंगा और श्री बलराम जी का अलौकिक उत्सव

होलिका दहन और धुलेंडी के समाप्त होने के पश्चात जब संपूर्ण भारत में रंगोत्सव शांत हो जाता है तब मथुरा के समीप बल्देव (दाऊजी) नगर में चैत्र कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को 'दाऊजी का हुरंगा' प्रारंभ होता है। हुरंगा शब्द होली का एक अत्यंत उग्र, विशाल और विशालकाय रूप माना जाता है।

दाऊजी भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई और शेषनाग के साक्षात अवतार श्री बलराम जी का प्रधान तीर्थ है। मान्यता है कि होली की संपूर्ण लीलाओं के बाद श्री बलराम जी और उनकी धर्मपत्नी माता रेवती के सानिध्य में यह भव्य हुरंगा खेला जाता है। इस उत्सव के लिए मंदिर प्रांगण में तांबे और पीतल के विशाल कुओं में टेसू के फूलों का हजारों लीटर लाल और पीला रंग भरा जाता है।

दाऊजी के हुरंगे में एक अत्यंत विचित्र और रोमांचक परंपरा निभाई जाती है। यहां की गोपियां (महिलाएं) पुरुषों के ऊपरी वस्त्रों (कुरतों) को फाड़कर उनसे मजबूत कोड़े बनाती हैं। इसके पश्चात वे उन कपड़ों को बाल्टी भर रंगों में भिगोकर पुरुषों की नंगी पीठ पर प्रेमपूर्वक मारती हैं। पुरुष उन मारों को हंसते हुए सहन करते हैं और विशाल पिचकारियों से महिलाओं पर रंगों की मूसलाधार बौछार करते हैं। यह उत्सव ब्रज के वीर रस और माधुर्य रस का ऐसा दुर्लभ संगम है जिसे देखने के लिए देश विदेश से लाखों श्रद्धालु खिंचे चले आते हैं।

ब्रज रसिया, फाग गायन और आध्यात्मिक चेतना का रूपांतरण

ब्रज की होली का कोई भी स्वरूप तब तक पूर्ण नहीं हो सकता जब तक कि उसमें ब्रज रसिया और फाग के शास्त्रीय पदों का गायन न हो। "आज बिरज में होरी रे रसिया", "होरी खेल रहे नंदलाल बिरज की कुंजन में" और "उड़त अबीर गुलाल लाल भए बदरा" जैसे पद केवल सामान्य लोकगीत नहीं हैं, अपितु ये महाकवि सूरदास, रसखान, स्वामी हरिदास और कुंभनदास जैसे सिद्ध संतों द्वारा समाधि अवस्था में रचित वेदतुल्य ऋचाएं हैं।

जब इन पदों को ढोलक, झांझ, मंजीरा और मृदंग की लय पर अत्यंत उच्च स्वर में गाया जाता है, तो उत्पन्न होने वाली नाद ब्रह्म की तरंगे साधक के सुषुम्ना नाड़ी को झंकृत कर देती हैं। रंगों का स्पर्श त्वचा को शुद्ध करता है और संकीर्तन की ध्वनि मन के अवसाद को मिटा देती है। ब्रज की होली मनुष्य को यह सिखाती है कि यह नश्वर संसार परमात्मा की एक रंगशाला है। जब तक मनुष्य इस रंगशाला में अहंकार को धारण किए रहता है तब तक वह दुखी रहता है; परंतु जिस क्षण वह अपने समस्त अस्तित्व को श्री राधा रानी और श्री कृष्ण के चरणों में सौंप देता है, उस क्षण उसका प्रत्येक श्वास एक पावन होली बन जाता है।

FAQ

ब्रज में होली कितने दिनों तक मनाई जाती है?
ब्रज मंडल में होलिकोत्सव वसंत पंचमी से प्रारंभ होकर चैत्र कृष्ण द्वितीया (दाऊजी का हुरंगा) तक पूरे चालीस दिनों तक चलता है।

गोकुल की होली को छड़ी मार होली क्यों कहा जाता है?
गोकुल में भगवान श्री कृष्ण बाल रूप में पूजे जाते हैं, इसलिए बाल गोपाल को चोट न लगे, इस भाव से गोपियां लाठी के स्थान पर फूलों से लिपटी छोटी छड़ियों से होली खेलती हैं।

बांके बिहारी मंदिर में होली की शुरुआत किस दिन से होती है?
श्री बांके बिहारी मंदिर में होली का मुख्य उत्सव फाल्गुन शुक्ल एकादशी (रंगभरी एकादशी) से प्रारंभ होता है, जब ठाकुर जी चांदी की पिचकारी से रंग डालते हैं।

दाऊजी का हुरंगा कब और कहाँ आयोजित होता है?
दाऊजी का विश्वप्रसिद्ध हुरंगा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को मथुरा के समीप बल्देव धाम में अत्यंत भव्य रूप से आयोजित होता है।

वृंदावन में विधवा माताओं की होली का क्या आध्यात्मिक महत्व है?
यह उत्सव सामाजिक रूढ़ियों को तोड़कर निराश्रित माताओं को भगवान कृष्ण के प्रेम में रंगने और उन्हें सम्मानपूर्वक सामाजिक मुख्यधारा से जोड़ने का प्रतीक है।

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लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

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