चैतन्य महाप्रभु जयंती का रहस्य क्या है?

By पं. सुव्रत शर्मा

फाल्गुन पूर्णिमा पर गौरहरि का प्राकट्य और संकीर्तन

चैतन्य महाप्रभु जयंती: गौर पूर्णिमा, शिक्षाष्टकम और संकीर्तन

पंचांग विवरण और गौर पूर्णिमा का पावन प्राकट्य काल

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि सनातन भक्ति आंदोलन के इतिहास में एक परम पावन और स्वर्णिम तिथि मानी जाती है। इसी पावन निशा पर सन् 1486 ईस्वी में पश्चिम बंगाल के प्रसिद्ध ज्ञान केंद्र नवद्वीप अर्थात नादिया जनपद में गौड़ीय वैष्णव परंपरा के प्राण प्रतिष्ठाता, साक्षात श्री राधा और श्री कृष्ण के संयुक्त अवतारी स्वरूप भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु का प्राकट्य हुआ था। इस पावन तिथि को संपूर्ण विश्व में स्थित वैष्णव समुदाय, विशेष रूप से गौड़ीय वैष्णव और इस्कॉन के साधक, गौर पूर्णिमा के पावन महोत्सव के रूप में मनाते हैं। उनके शरीर की द्युति तपाये हुए कंचन अर्थात पिघले हुए सोने के समान अत्यंत तेजस्वी थी, जिसके कारण उन्हें गौरहरि अथवा गौरांग कहा गया। नीम के वृक्ष के नीचे जन्म लेने के कारण उनकी माता ने उनका वात्सल्य नाम निमाई रखा था, जबकि उनका मूल नाम विश्वंभर था।

पंचांग घटक शास्त्रीय विवरण
मास एवं पक्ष फाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष
पावन तिथि शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तिथि
प्राकट्य संवत 1407 शक संवत तदनुसार 18 फरवरी 1486 ईस्वी
प्राकट्य वेला सायंकाल चंद्रोदय काल (खग्रास चंद्र ग्रहण संयोग)
प्राकट्य तीर्थ नवद्वीप धाम, मायापुर, पश्चिम बंगाल
बाल्यकाल नाम निमाई, विश्वंभर, गौरहरि और गौरांग
माता पिता माता शची देवी और पूज्य पिता जगन्नाथ मिश्र
प्रधान साधना महामंत्र संकीर्तन आंदोलन और प्रेम भक्ति
मुख्य आध्यात्मिक फल अविद्या का नाश, हृदय शुद्धि और कृष्ण प्रेम की प्राप्ति

गौर पूर्णिमा के इस परम पावन अवसर पर चैतन्य महाप्रभु के भक्ति रस को आत्मसात करने के लिए साधक को सूर्योदय से ही कठोर सात्विक और भक्तिमय नियमों का पालन करना चाहिए।

  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगाजल मिले शीतल जल से स्नान करना और वैष्णव तिलक धारण करना।
  • मस्तक, नाभि, वक्ष, कंठ और दोनों भुजाओं पर 12 स्थानों पर शुद्ध गोपी चंदन से विधिवत ऊर्ध्वपुंड्र तिलक लगाना।
  • गृह मंदिर में भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु और श्री नित्यानंद प्रभु के चित्र अथवा विग्रह के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक जलाना।
  • भगवान के विग्रह को सुगंधित पुष्पों, तुलसी दलों और चंदन के लेप से सुसज्जित करके माखन मिश्री का भोग लगाना।
  • संपूर्ण दिन निर्जला अथवा केवल जल और दुग्धाहार व्रत का दृढ़ संकल्प लेकर महामंत्र का निरंतर जप करना।
  • हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे महामंत्र की कम से कम 64 माला का जप करना।
  • किसी भी व्यक्ति के प्रति मन में द्वेष, अहंकार, कटु वाणी और संप्रदाय भेद को स्थान न देना।
  • सायंकाल के समय सामूहिक रूप से मृदंग और करताल की ध्वनि पर हरिनाम संकीर्तन में लीन होकर नृत्य और कीर्तन करना।
  • चंद्रोदय के समय भगवान गौरहरि का पंचामृत से अभिषेक करके सात्विक प्रसादम से व्रत का पारण करना।

चंद्र ग्रहण का खगोलीय संयोग और सामूहिक हरिनाम का शंखनाद

जिस पावन संध्या को चैतन्य महाप्रभु का प्राकट्य हुआ, उस समय आकाश में एक अत्यंत दुर्लभ और अलौकिक खगोलीय घटना घटित हो रही थी। उस रात फाल्गुन पूर्णिमा पर संपूर्ण भारत में पूर्ण चंद्र ग्रहण लगा हुआ था। सनातन धर्म के नियमों के अनुसार ग्रहण के सूतक काल में समस्त भौतिक और कर्मकांडीय कार्य रुक जाते हैं और संपूर्ण प्रजा आत्म शुद्धि हेतु पवित्र नदियों में स्नान करके ईश्वर के नाम का निरंतर जप करती है।

उस संध्या काल में जब चंद्र देव ग्रहण की छाया में आच्छादित हो रहे थे तब नवद्वीप में भागीरथी गंगा के विशाल तटों पर लाखों लोग एकत्र थे। वे सभी अपने हाथों को ऊपर उठाकर अत्यंत ऊंचे स्वर में हरि बोल हरि बोल और नारायण नाम का सामूहिक संकीर्तन कर रहे थे। उसी दिव्य क्षण में जब संपूर्ण दिशाएं हरिनाम के शंखनाद से गूंज रही थीं, शची माता की कुटिया में उस परम तेजोमय बालक का जन्म हुआ।

संतों और विद्वानों ने यह स्पष्ट देखा कि भगवान ने अपने प्राकट्य के प्रथम क्षण में ही बिना किसी प्रयास के समस्त मानवता के मुख से हरि नाम का उच्चारण करवा दिया। चंद्र ग्रहण के कारण अंधकार में डूबे चंद्रमा को देखकर विद्वानों ने भविष्यवाणी की कि इस बालक के शरीर का तेज चंद्रमा के कलंक को धो देगा और इसका नाम विश्वंभर सार्थक होगा क्योंकि यह संपूर्ण विश्व का पालन केवल अन्न और जल से नहीं बल्कि परमात्मा के निष्काम प्रेम रस से करेगा।

श्री राधा और श्री कृष्ण का एकात्म स्वरूप और गौरांग तत्त्व

गौड़ीय वैष्णव दर्शन के अनुसार श्री चैतन्य महाप्रभु कोई साधारण संत, दार्शनिक अथवा समाज सुधारक नहीं थे। वे साक्षात ब्रजेंद्र नंदन भगवान श्री कृष्ण ही थे, जिन्होंने श्री राधा रानी के आंतरिक भाव और उनकी शारीरिक कांति को धारण करके इस धरातल पर अवतार लिया था। चैतन्य चरितामृत के आदिलिला में श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने इस गूढ़ दार्शनिक रहस्य को अत्यंत विशद रूप से स्पष्ट किया है।

भगवान श्री कृष्ण के मन में द्वापर युग की रासलीला के पश्चात तीन तीव्र इच्छाएं अधूरी रह गई थीं। प्रथम, राधारानी के उस अगाध और निष्काम प्रेम का स्वरूप क्या है जिससे वे मुझे इतना सुख प्रदान करती हैं। द्वितीय, मेरे भीतर वह कौन सा अद्भुत माधुर्य और सौंदर्य है जिसका आस्वादन करके राधा इतनी आनंदित होती हैं। तृतीय, मेरे प्रेम का आस्वादन करते समय राधा को किस परम सुख की अनुभूति होती है। इन तीनों आंतरिक अनुभूतियों का व्यक्तिगत साक्षात्कार करने के लिए स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने राधारानी के स्वर्णिम अंग कांति और उनके महाभाव को अपने ऊपर ओढ़ लिया और कलियुग में चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित हुए। इसलिए गौरांग महाप्रभु का बाह्य स्वरूप राधा का है और उनका आंतरिक प्राण तत्व साक्षात श्री कृष्ण का है। जब वे संकीर्तन में मूर्छित होकर गिरते थे, तो उनके मुख से केवल कृष्ण कृष्ण की पुकार निकलती थी, जो राधारानी के विरह की पराकाष्ठा को दर्शाती थी।

दार्शनिक तत्त्व द्वापर युग का स्वरूप कलियुग में गौरांग स्वरूप आध्यात्मिक अनुभूति
आंतरिक चेतना भगवान श्री कृष्ण साक्षात श्री कृष्ण तत्त्व संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल आश्रय
बाह्य अंग कांति श्याम वर्ण मेघ समान तप्त कंचन गौर वर्ण श्री राधा रानी की शारीरिक प्रभा
मानसिक भाव भोक्ता व आस्वाद्य परम भक्त व आश्रय भाव श्री राधा का अनन्य महाभाव
लीला का माध्यम वेणु वादन व रास नृत्य मृदंग वादन व हरि संकीर्तन जीवों को प्रेम दान व मुक्ति

महामंत्र संकीर्तन आंदोलन और सामाजिक क्रांति

पंद्रहवीं शताब्दी का भारत घोर सामाजिक विषमता, जातिगत भेदभाव, शुष्क बौद्धिक वाद विवाद और विदेशी आक्रांताओं के अत्याचारों से त्रस्त था। धर्म केवल कुछ उच्च वर्ग के पंडितों के हाथ की कठपुतली बन चुका था, जहां वेदों के कठिन श्लोकों और जटिल कर्मकांडों के भय से जनसामान्य को भक्ति के अधिकार से वंचित कर दिया गया था। ऐसे संकट काल में चैतन्य महाप्रभु ने एक अत्यंत शांत परंतु महाक्रांतिकारी आंदोलन का सूत्रपात किया जिसे हरिनाम संकीर्तन आंदोलन कहा गया।

महाप्रभु ने कलि संतरण उपनिषद में वर्णित पावन महामंत्र को जन सामान्य के बीच स्थापित किया:

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥

उन्होंने घोषणा की कि कलियुग में योग, यज्ञ, तपस्या और कठिन अनुष्ठानों की कोई आवश्यकता नहीं है। इस युग में केवल परमात्मा के पावन नामों का प्रेमपूर्वक कीर्तन ही भवसागर से पार जाने का एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ साधन है। महाप्रभु ने जाति, वर्ण, पंथ और धन के समस्त कृत्रिम बंधनों को एक ही झटके में तोड़ दिया। उन्होंने यवन कुल में जन्मे हरिदास को नामाचार्य की उपाधि दी और सनातन गोस्वामी तथा रूप गोस्वामी जैसे उच्च प्रशासनिक पदों पर बैठे विद्वानों को वैराग्य का मार्ग दिखाकर वृंदावन की पावन भूमि का पुनरुद्धार करने भेजा।

जब नवद्वीप के तत्कालीन शासक चांद काजी ने संकीर्तन पर प्रतिबंध लगाया और मृदंग तुड़वा दिए तब महाप्रभु ने अहिंसक सविनय अवज्ञा का विश्व का प्रथम उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने लाखों भक्तों के साथ जलती हुई मशालें लेकर काजी के महल को घेर लिया। महाप्रभु के उस अलौकिक प्रेम और संकीर्तन के दिव्य प्रभाव से चांद काजी का हृदय पिघल गया, वह उनके चरणों में गिर पड़ा और उसने सदैव के लिए संकीर्तन की रक्षा का वचन दिया।

शिक्षाष्टकम के आठ श्लोक और भक्ति का सर्वोच्च सोपान

भगवान चैतन्य महाप्रभु ने अपने संपूर्ण जीवन काल में किसी बड़े ग्रंथ की रचना नहीं की। उन्होंने केवल आठ अत्यंत गूढ़, सुंदर और छंदोबद्ध श्लोकों की रचना की, जिन्हें सनातन वांग्मय में शिक्षाष्टकम के नाम से जाना जाता है। ये आठ श्लोक मानव चेतना के क्रमिक विकास और प्रेम भक्ति के सर्वोच्च सोपान का संपूर्ण वैज्ञानिक दर्शन प्रस्तुत करते हैं।

  • प्रथम श्लोक में वे कहते हैं कि हरिनाम संकीर्तन चित्त रूपी दर्पण पर जमी हुई जन्म जन्मांतर की धूल को साफ कर देता है और संसार रूपी दावानल की भीषण अग्नि को तत्काल शांत कर देता है।
  • द्वितीय श्लोक में वे अपनी अयोग्यता व्यक्त करते हैं कि हे प्रभु, आपके नामों में समस्त शक्तियां विद्यमान हैं परंतु मेरा दुर्भाग्य है कि मुझे आपके नाम से अभी तक सच्चा प्रेम नहीं हुआ।
  • तृतीय श्लोक में वे साधक का परम आभूषण बताते हैं: तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः। अर्थात साधक को तिनके से भी अधिक विनम्र, वृक्ष से भी अधिक सहनशील, अपने मान की चिंता न करने वाला और दूसरों को मान देने वाला होकर ही निरंतर हरि नाम का कीर्तन करना चाहिए।
  • चतुर्थ श्लोक में वे सांसारिक कामनाओं का त्याग करते हुए कहते हैं कि हे प्रभु, मुझे न तो धन चाहिए, न सुंदर स्त्री चाहिए और न ही मुक्ति चाहिए, मुझे तो केवल जन्म जन्मांतर में आपकी निष्काम भक्ति चाहिए।
  • पंचम और षष्ठ श्लोक में वे जीवात्मा की व्याकुलता और विरह का वर्णन करते हैं कि कब मेरे नेत्रों से अश्रु बहेंगे और कब मेरा शरीर आपके नाम के उच्चारण मात्र से पुलकित होगा।
  • सप्तम और अष्टम श्लोक में राधा रानी के चरम विरह भाव का प्रकटीकरण है कि गोविंद के दर्शन के बिना मुझे एक पल भी युगों के समान लंबा प्रतीत हो रहा है।

जगन्नाथ पुरी की अंतिम लीलाएं और प्रेमोन्माद

अपने जीवन के उत्तरार्ध में संन्यास ग्रहण करने के पश्चात चैतन्य महाप्रभु ने उड़ीसा के श्री क्षेत्र जगन्नाथ पुरी को अपनी साधना का केंद्र बनाया। वहां उन्होंने गंभीर नामक एक अत्यंत संकीर्ण कक्ष में निवास करते हुए अपने जीवन के अंतिम 18 वर्ष बिताए। यह कालखंड उनके प्रेमोन्माद और दिव्य विरह का शिखर था। भगवान जगन्नाथ के दर्शन करते ही वे भाव समाधि में लीन हो जाते थे।

गरुड़ स्तंभ के पीछे खड़े होकर वे निरंतर अश्रु बहाते हुए जगन्नाथ जी के श्रीमुख को निहारते रहते थे। उनके अश्रुओं के वेग से गरुड़ स्तंभ का पाषाण भी पिघलने लगा था। वे समुद्र की नीली लहरों को देखकर यमुना समझ बैठते थे और उसमें कूद पड़ते थे। पुरी की पावन रथयात्रा के समय जब वे जगन्नाथ जी के रथ के आगे नृत्य करते थे, तो ऐसा प्रतीत होता था मानो साक्षात प्रेम का कोई दिव्य सागर हिलोरें ले रहा हो। उनका यह अलौकिक जीवन यह सिद्ध करता है कि प्रेम कोई विचार नहीं है, प्रेम एक जीवित और जाग्रत चेतना है जो संपूर्ण ब्रह्मांड को परमात्मा के साथ एक सूत्र में बांधने की शक्ति रखती है।

FAQ

गौर पूर्णिमा किस पावन पर्व को कहा जाता है?
फाल्गुन पूर्णिमा के दिन भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राकट्य दिवस को संपूर्ण विश्व में गौर पूर्णिमा के नाम से अत्यंत श्रद्धा से मनाया जाता है।

चैतन्य महाप्रभु को गौरांग अथवा निमाई क्यों कहा जाता है?
पिघले हुए सोने जैसी दिव्य शारीरिक कांति के कारण उन्हें गौरांग कहा गया और नीम के वृक्ष के नीचे जन्म लेने के कारण उन्हें निमाई कहा गया।

चैतन्य महाप्रभु का मूल दार्शनिक स्वरूप क्या माना गया है?
वे साक्षात भगवान श्री कृष्ण ही हैं जिन्होंने श्री राधा रानी के आंतरिक महाभाव और उनकी स्वर्णिम अंग कांति को धारण करके अवतार लिया था।

शिक्षाष्टकम का सबसे प्रसिद्ध और प्रेरणादायक श्लोक कौन सा है?
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना श्लोक सबसे प्रसिद्ध है, जो तिनके जैसी विनम्रता और वृक्ष जैसी सहनशीलता के साथ भजन करने की शिक्षा देता है।

महाप्रभु ने कलियुग में मोक्ष का क्या सर्वोत्तम साधन बताया?
महाप्रभु ने घोषणा की कि कलियुग में हरे कृष्ण महामंत्र का निष्काम और प्रेमपूर्वक संकीर्तन ही समस्त पापों से मुक्ति और प्रभु प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

पं. सुव्रत शर्मा (63)


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इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

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