By पं. नरेंद्र शर्मा
महाशिवरात्रि, फुलेरा दूज, रंगभरी एकादशी और होली की तिथियां

सनातन वैदिक काल गणना में फाल्गुन मास संपूर्ण चांद्र संवत्सर का द्वादश एवं अंतिम मास माना गया है। यह मास संपूर्ण ब्रह्मांडीय ऊर्जा के एक वार्षिक चक्र की पूर्णता और नवीन संवत्सर के प्राकट्य के मध्य का महा संधिकाल है। वैदिक पंचांग के अनुसार यह कालखंड सूर्य देव के मकर से कुंभ और तदुपरांत कुंभ से मीन राशि में गमन का साक्षी बनता है। इस अवधि में उत्तरायण सूर्य की रश्मियां पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध पर प्रखर होने लगती हैं, जिससे शीत ऋतु का अवसान और वसंत ऋतु का पूर्ण साम्राज्य स्थापित होता है।
वैदिक पंचांग की संरचना पांच प्रमुख अंगों-तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण-पर आधारित होती है। फाल्गुन मास में इन पांचों अंगों का संतुलन अत्यंत दुर्लभ और फलदायी माना गया है। इस मास में पड़ने वाले व्रत और त्योहार केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं हैं, अपितु वे खगोलीय ऊर्जा के साथ मानव चेतना को एकाकार करने के वैज्ञानिक सोपान हैं। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में जहाँ भगवान शिव की परम पावन महारात्रि 'महाशिवरात्रि' और 'विजया एकादशी' जैसे आत्म शोधक पर्व आते हैं, वहीं शुक्ल पक्ष में 'फुलेरा दूज', 'रंगभरी एकादशी', 'होलिका दहन', 'लक्ष्मी जयंती' और 'धुलेंडी' जैसे उल्लासमय एवं तांत्रिक पर्व संपन्न होते हैं।
| पंचांग घटक | शास्त्रीय विवरण |
|---|---|
| मास एवं संवत्सर क्रम | फाल्गुन मास, चांद्र संवत्सर का द्वादश (अंतिम) मास |
| अंग्रेजी कैलेंडर कालखंड | प्रायः 15 फरवरी से 20 मार्च के मध्य |
| सौर संक्रांति संयोग | कुंभ संक्रांति का प्रभाव एवं मीन संक्रांति का शुभारंभ |
| नक्षत्र संचरण | मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा से रेवती तक |
| अधिष्ठाता मुख्य देव | देवाधिदेव महादेव शिव, भगवान भुवन भास्कर सूर्य, श्री राधा कृष्ण |
| मुख्य तात्विक स्वरूप | आग्नेय और जलीय ऊर्जा का समन्वय, ऋतु परिवर्तन संधिकाल |
| मुख्य आध्यात्मिक फल | संचित कर्मों का शोधन, नव संवत्सर की पूर्व तैयारी, मोक्ष व उल्लास |
फाल्गुन मास के संपूर्ण तीस दिनों का पूर्ण आध्यात्मिक और ज्योतिषीय लाभ प्राप्त करने के लिए साधक को विशिष्ट वैदिक आचार संहिताओं का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
फाल्गुन मास का कृष्ण पक्ष संवत्सर के अंतिम पखवाड़े का आरंभ होता है। यह पक्ष मुख्य रूप से तप, वैराग्य, शिव आराधना और पितृ शांति को समर्पित माना गया है। इस पक्ष की सभी 15 तिथियों का प्रामाणिक विवरण निम्नलिखित तालिका में प्रस्तुत है:
| तिथि | शास्त्रीय पर्व व व्रत | अधिष्ठाता देवता | ज्योतिषीय नक्षत्र व योग प्रभाव | मुख्य आध्यात्मिक अनुष्ठान व नियम |
|---|---|---|---|---|
| प्रतिपदा (१) | कृष्ण प्रतिपदा, वसंत उत्सव विस्तार | अग्नि देव व कामदेव | मघा अथवा पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र | पितरों का तर्पण व सात्विक आहार नियम |
| द्वितीया (२) | फाल्गुन कृष्ण द्वितीया | ब्रह्मा जी व चंद्र देव | पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र, शुभ योग | भाई बहन के संबंधों में सौहार्द हेतु पूजन |
| तृतीया (३) | फाल्गुन संकष्टी तृतीया | भगवती गौरी व शिव | उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र | दांपत्य जीवन के क्लेश निवारण हेतु व्रत |
| चतुर्थी (४) | द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी | विघ्नहर्ता भगवान गणेश | हस्त नक्षत्र, सौभाग्य योग | गणेश जी को 21 दूर्वा दल व मोदक अर्पण |
| पंचमी (५) | फाल्गुन कृष्ण पंचमी | नाग देवता व वायु देव | चित्रा नक्षत्र, शोभन योग | नाग पूजन, मानसिक चंचलता पर नियंत्रण |
| षष्ठी (६) | फाल्गुन कृष्ण षष्ठी (स्कंद षष्ठी) | भगवान कार्तिकेय | स्वाति नक्षत्र, अतिगंड योग | संतान रक्षा व चर्म रोग निवारण हेतु ध्यान |
| सप्तमी (७) | जानकी जयंती (सीता अष्टमी पूर्व) | माता जानकी व श्री राम | विशाखा नक्षत्र, सुकर्मा योग | पतिव्रत धर्म, पारिवारिक शांति व अन्न दान |
| अष्टमी (८) | सीता जयंती व कृष्ण अष्टमी | भगवती सीता व काल भैरव | अनुराधा नक्षत्र, धृति योग | भैरव उपासना, नकारात्मक शक्तियों का शमन |
| नवमी (९) | फाल्गुन कृष्ण नवमी | मां दुर्गा व दिकपाल | ज्येष्ठा नक्षत्र, शूल योग | नवार्ण मंत्र जप व शक्ति आराधना |
| दशमी (१०) | फाल्गुन कृष्ण दशमी | यमराज व धर्मराज | मूल नक्षत्र, गंड योग | पितृ शांति, अकाल मृत्यु भय निवारण |
| एकादशी (११) | विजया एकादशी महापर्व | भगवान श्री लक्ष्मीनारायण | पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र, वृद्धि योग | समुद्र विजय संकल्प, व्रत व रात्रि जागरण |
| द्वादशी (१२) | विजया एकादशी पारण व द्वादशी | भगवान श्री हरि विष्णु | उत्तराषाढ़ा नक्षत्र, ध्रुव योग | ब्राह्मण भोजन, आंवला व वस्त्र दान |
| त्रयोदशी (१३) | फाल्गुन कृष्ण प्रदोष (शिव आराधना) | देवाधिदेव महादेव शिव | श्रवण नक्षत्र, व्याघात योग | प्रदोष काल में शिवलिंग पर कच्चा दूध अर्पण |
| चतुर्दशी (१४) | महाशिवरात्रि महापर्व (महारात्रि) | देवाधिदेव महादेव व पार्वती | धनिष्ठा अथवा शतभिषा नक्षत्र | चार प्रहर पूजन, निर्जल व्रत व रुद्राभिषेक |
| अमावस्या (१५) | फाल्गुन दर्श अमावस्या (पितृ पर्व) | पितृ गण व भगवान सूर्य | शतभिषा अथवा पूर्वाभाद्रपद | तीर्थ स्नान, तर्पण, छाया दान व पीपल पूजन |
फाल्गुन मास का शुक्ल पक्ष वसंत के उल्लास, रंगों के उत्सव, श्री कृष्ण की महारास लीला और तांत्रिक सिद्धियों के प्राकट्य का समय होता है। इस पक्ष की सभी 15 तिथियों का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण निम्नलिखित है:
| तिथि | शास्त्रीय पर्व व व्रत | अधिष्ठाता देवता | ज्योतिषीय नक्षत्र व योग प्रभाव | मुख्य आध्यात्मिक अनुष्ठान व नियम |
|---|---|---|---|---|
| प्रतिपदा (१) | शुक्ल प्रतिपदा, नूतन चंद्र दर्शन | चंद्र देव व अग्नि देव | पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र, शिव योग | चंद्र अर्घ्य, नव संवत्सर की पूर्व तैयारी |
| द्वितीया (२) | फुलेरा दूज (अति पावन अबूझ मुहूर्त) | श्री राधा कृष्ण युगल | उत्तराभाद्रपद नक्षत्र, सिद्ध योग | राधा कृष्ण पर गुलाल अर्पण, विवाह दोष मुक्ति |
| तृतीया (३) | फाल्गुन शुक्ल तृतीया | मां पार्वती व शिव | रेवती नक्षत्र, साध्य योग | सौभाग्य वृद्धि, गौरी तृतीया पूजन |
| चतुर्थी (४) | विनायक चतुर्थी व्रत | भगवान श्री गणेश | अश्विनी नक्षत्र, शुभ योग | ज्ञान व बुद्धि संवर्धन हेतु गणेश अथर्वशीर्ष पाठ |
| पंचमी (५) | फाल्गुन शुक्ल पंचमी | मां सरस्वती व लक्ष्मी | भरणी नक्षत्र, शुक्ल योग | विद्या साधना, पुस्तकों का पूजन व सात्विक व्रत |
| षष्ठी (६) | फाल्गुन शुक्ल षष्ठी | भगवान सूर्य व कार्तिकेय | कृत्तिका नक्षत्र, ब्रह्म योग | नेत्र ज्योति रक्षा, सूर्य नमस्कार के 12 चक्र |
| सप्तमी (७) | भानु सप्तमी (सूर्य पर्व) | भुवन भास्कर सूर्य देव | रोहिणी नक्षत्र, इंद्र योग | तांबे के पात्र से सूर्य अर्घ्य, नमक का त्याग |
| अष्टमी (८) | होलाष्टक प्रारंभ (मांगलिक कार्य निषेध) | उग्र ग्रह शक्तियां व प्रह्लाद | मृगशिरा नक्षत्र, वैधृति योग | नवीन मांगलिक कार्य वर्जित, नृसिंह मंत्र जप |
| नवमी (९) | फाल्गुन शुक्ल नवमी | मां भगवती व लक्ष्मी | आर्द्रा नक्षत्र, विष्कुंभ योग | दुर्गा सप्तशती पाठ, आंतरिक शुद्धि |
| दशमी (१०) | फाल्गुन शुक्ल दशमी | भगवान श्री हरि विष्णु | पुनर्वसु नक्षत्र, प्रीति योग | विष्णु सहस्रनाम पाठ, पीले वस्त्र धारण करना |
| एकादशी (११) | रंगभरी (आमलकी) एकादशी | भगवान शिव व आंवला वृक्ष | पुष्य नक्षत्र, आयुष्मान योग | आंवला वृक्ष पूजन, काशी विश्वनाथ गुलाल अर्पण |
| द्वादशी (१२) | गोविंद द्वादशी व एकादशी पारण | भगवान श्री कृष्ण व गोविंद | आश्लेषा नक्षत्र, सौभाग्य योग | तिल व दक्षिणा दान, तुलसी महारानी पूजन |
| त्रयोदशी (१३) | फाल्गुन शुक्ल प्रदोष व्रत | देवाधिदेव महादेव शिव | मघा नक्षत्र, शोभन योग | संध्या वेला में पलाश जल से शिव अभिषेक |
| चतुर्दशी (१४) | होलिका दहन पूर्व संध्या | अग्नि देव व प्रह्लाद | पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र, सुकर्मा योग | होलिका पूजन की पूर्व तैयारी, भस्म संग्रह संकल्प |
| पूर्णिमा (१५) | होलिका दहन, दारुण रात्रि, लक्ष्मी जयंती | भगवान नृसिंह, अग्नि व लक्ष्मी | उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र, धृति योग | भद्रा रहित काल में दहन, तंत्र काट, नवधान्य हवन |
फाल्गुन मास के तीस दिनों में चार पर्व ऐसे आते हैं जो संपूर्ण सनातन पंचांग के मेरुदंड माने जाते हैं। इन पर्वों की शास्त्रीय महत्ता और उनके पूजन का सटीक विधान जानना प्रत्येक साधक के लिए अनिवार्य है।
यह संपूर्ण वर्ष की सबसे बड़ी शिव रात्रि मानी जाती है। मान्यता है कि इसी पावन तिथि पर देवाधिदेव महादेव ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए थे और माता पार्वती के साथ उनका पावन विवाह संपन्न हुआ था। इस दिन चार प्रहर की पूजा का विधान है:
फुलेरा दूज को सनातन धर्म में वर्ष का सबसे बड़ा 'अबूझ मुहूर्त' माना गया है। इस दिन किसी भी शुभ कार्य, विवाह, सगाई अथवा गृह प्रवेश के लिए पंचांग शुद्धि अथवा ग्रह गोचर देखने की आवश्यकता नहीं होती। इस दिन ब्रज मंडल में भगवान श्री राधा कृष्ण पर फूलों की होली खेली जाती है। जो जातक प्रेम विवाह अथवा दांपत्य सुख में बाधा का सामना कर रहे हैं, वे इस दिन राधा कृष्ण को पीले पुष्प और गुलाल अर्पित करके अपने मनोरथ सिद्ध करते हैं।
यह एकमात्र ऐसी एकादशी है जिसका संबंध भगवान विष्णु के साथ साथ देवाधिदेव महादेव से भी है। मान्यता है कि इस पावन तिथि पर भगवान शिव माता पार्वती का गौना कराकर पहली बार काशी की पावन नगरी में पधारे थे। काशी विश्वनाथ मंदिर में इस दिन भगवान शिव को गुलाल अर्पित किया जाता है। इसके साथ ही इस दिन आंवले के वृक्ष की विधिवत पूजा करके उसके नीचे बैठकर भोजन करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि सनातन तंत्र शास्त्र में 'दारुण रात्रि' कहलाती है। इस रात होलिका दहन सदैव भद्रा रहित काल में ही किया जाता है। होलिका की पवित्र अग्नि में नए पके हुए गेहूं और चने की बालियों (होल्हा) की आहुति दी जाती है। इस अग्नि की भस्म को घर लाकर रखने से वर्षभर किसी भी प्रकार की नकारात्मक शक्ति, नजर दोष अथवा वास्तु दोष का प्रभाव नहीं पड़ता।
| महापर्व नाम | शास्त्रीय तिथि व पक्ष | मुख्य साधना काल | प्रयुक्त अनिवार्य पूजन सामग्री | अभीष्ट आध्यात्मिक फल |
|---|---|---|---|---|
| विजया एकादशी | फाल्गुन कृष्ण एकादशी | संपूर्ण दिन व्रत व रात्रि जागरण | पीले पुष्प, तुलसी दल, पंचामृत, फल | कठिन चुनौतियों व शत्रुओं पर विजय |
| महाशिवरात्रि | फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी | निशीथ काल व चार प्रहर | बेलपत्र, धतूरा, भांग, गंगाजल, भस्म | काम जय, अकाल मृत्यु मुक्ति, मोक्ष |
| फुलेरा दूज | फाल्गुन शुक्ल द्वितीया | प्रातः व गोधूलि वेला | ताजे सुगंधित पुष्प, मिश्री, अबीर गुलाल | दांपत्य प्रेम, समस्त शुभ कार्यों की सिद्धि |
| रंगभरी एकादशी | फाल्गुन शुक्ल एकादशी | प्रातः व प्रदोष काल | आंवला फल, अबीर, कच्चा दूध, बेलपत्र | अक्षय धन संपदा, आरोग्य व शिव कृपा |
| होलिका दहन | फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा | भद्रा रहित निशीथ काल | नारियल, रोली, अक्षत, गेहूं की बालियां | दारुण बाधा निवारण, सुख शांति, तंत्र काट |
फाल्गुन मास का पंचांग कैलेंडर केवल तिथियों की सारणी नहीं है, अपितु यह मानव जीवन के संपूर्ण आध्यात्मिक विकास का एक सुव्यवस्थित मानचित्र है। यह मास हमें सिखाता है कि वर्ष के अंत में किस प्रकार अपने भौतिक और आध्यात्मिक कर्मों का संतुलन स्थापित किया जाए।
कृष्ण पक्ष का वैराग्य और महाशिवरात्रि का आत्म संयम हमें यह प्रेरणा देता है कि सांसारिक सुखों की अंतिम सीमा मोक्ष और ईश्वर समर्पण है। वहीं शुक्ल पक्ष का वसंतोत्सव और रंगभरी एकादशी हमें यह सिखाती है कि धर्म के दायरे में रहकर जीवन का उल्लास मनाना भी प्रभु की ही सेवा है।
जब साधक फाल्गुन मास की पूर्णिमा पर अपने अहंकार और पुरानी कड़वाहटों को होलिका की पावन अग्नि में जलाकर भस्म कर देता है, तभी वह चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को उदित होने वाले सनातन नव संवत्सर का स्वागत करने के योग्य बन पाता है। यह पंचांग कैलेंडर हमें अंधकार से प्रकाश की ओर, संशय से विश्वास की ओर और नश्वरता से अमरता की ओर अग्रसर होने का दिव्य मार्ग दिखाता है।
फाल्गुन मास के पंचांग में वर्ष का सबसे बड़ा अबूझ मुहूर्त कौन सा माना गया है?
फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि अर्थात 'फुलेरा दूज' को वर्ष का सबसे बड़ा अबूझ मुहूर्त माना गया है, जिसमें बिना मुहूर्त देखे विवाह व मांगलिक कार्य संपन्न किए जा सकते हैं।
महाशिवरात्रि का पर्व फाल्गुन मास की किस तिथि को मनाया जाता है?
महाशिवरात्रि का महापर्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को निशीथ व्यापिनी वेला में अत्यंत श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।
होलाष्टक की अवधि कब से कब तक मानी जाती है?
होलाष्टक फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से प्रारंभ होकर फाल्गुन पूर्णिमा (होलिका दहन) तक पूरे आठ दिनों तक चलता है।
रंगभरी एकादशी का क्या महत्व है?
रंगभरी (आमलकी) एकादशी पर भगवान शिव माता पार्वती का गौना कराकर काशी पधारे थे, इस दिन शिवलिंग पर गुलाल चढ़ाने और आंवले के वृक्ष के पूजन का विधान है।
होलिका दहन सदैव भद्रा रहित काल में ही क्यों किया जाता है?
शास्त्रों के अनुसार भद्रा में होलिका दहन करने से संपूर्ण राष्ट्र और जनमानस में भारी अनिष्ट, दुर्भिक्ष और युद्ध का भय उत्पन्न होता है, अतः भद्रा रहित काल अनिवार्य है।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएं
अनुभव: 20
इनसे पूछें: Family Planning, Career
इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें
WELCOME TO
Right Decisions at the right time with ZODIAQ