फाल्गुन पूर्णिमा की दारुण रात्रि क्या है?

By पं. अमिताभ शर्मा

वर्ष की सबसे बड़ी दारुण रात्रि और तांत्रिक सिद्धियों का समय

दारुण रात्रि साधना: फाल्गुन पूर्णिमा, तंत्र उपाय और नृसिंह पूजा

पंचांग विवरण और वर्ष की चार महारात्रियों की तांत्रिक तुलना

सनातन वैदिक तंत्र शास्त्र और आगम संहिताओं में संपूर्ण संवत्सर के 365 दिनों में से केवल चार रात्रियों को परम सिद्ध महारात्रि का गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है। ये चार रात्रियां ब्रह्मांडीय ऊर्जा के विशिष्ट संचरण और ग्रहों के दुर्लभ कोणीय संयोग के कारण सामान्य रात्रियों की तुलना में कोटि गुना अधिक शक्तिशाली मानी जाती हैं। तंत्र ग्रंथों में इन चारों को क्रमशः कालरात्रि (दीपावली अथवा कार्तिक अमावस्या), महारात्रि (महाशिवरात्रि अथवा फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी), मोहरात्रि (श्रीकृष्ण जन्माष्टमी अथवा भाद्रपद कृष्ण अष्टमी) और दारुण रात्रि (होलिका दहन अथवा फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा) की संज्ञा दी गई है।

संस्कृत वांग्मय में दारुण शब्द का मूल अर्थ अत्यंत तीव्र, प्रचंड, उग्र और कठोर होता है। वैदिक पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि संपूर्ण हिन्दू चांद्र वर्ष की अंतिम पूर्णिमा होती है। इसके पश्चात वर्ष का चक्र पूर्ण हो जाता है और चैत्र मास के साथ नवीन संवत्सर का शुभारंभ होता है। अतः इस संधिकाल की रात्रि में संपूर्ण ब्रह्मांड की स्थूल और सूक्ष्म शक्तियां अत्यंत तीव्र वेग से गतिशील होती हैं। इस पावन निशा पर प्रज्वलित की जाने वाली होलिका की अग्नि केवल एक भौतिक अलाव नहीं है, अपितु यह एक अत्यंत जाग्रत तांत्रिक वेदी है जो अंतरिक्ष में स्थित अदृश्य तरंगों को आकर्षित करने का केंद्र बन जाती है।

महारात्रि नाम पंचांग तिथि व मास अधिष्ठाता शक्ति तात्विक स्वरूप प्रमुख अभीष्ट सिद्धि
कालरात्रि कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष अमावस्या भगवती महाकाली व कमला तामसिक व पार्थिव ऊर्जा ऋण मुक्ति, शत्रु संहार व अखंड लक्ष्मी
महारात्रि फाल्गुन मास, कृष्ण पक्ष चतुर्दशी देवाधिदेव महादेव शिव आध्यात्मिक व आत्मिक ऊर्जा काम जय, लिंग भेदन व मोक्ष प्राप्ति
मोहरात्रि भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष अष्टमी योगमाया व श्री कृष्ण आकर्षण व सम्मोहन ऊर्जा माया विजय, आकर्षण व भक्ति सिद्धि
दारुण रात्रि फाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष पूर्णिमा भगवान नृसिंह व अग्नि देव प्रचंड आग्नेय व शोधक ऊर्जा समस्त बाधा निवारण, तंत्र काट व रक्षा

दारुण रात्रि के पावन और प्रचंड अवसर पर साधक को किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षित रहते हुए ईश्वरीय कृपा प्राप्त करने हेतु विशिष्ट शास्त्रीय आचार संहिता का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।

  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर तीर्थ जल अथवा शुद्ध शीतल जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करना और श्वेत अथवा पीत वस्त्र धारण करना।
  • पूर्णिमा तिथि के उपलक्ष्य में भगवान श्री सत्यनारायण अथवा भगवान उग्र नृसिंह देव के सम्मुख अखंड उपवास का संकल्प लेना।
  • दिनभर मौन अथवा सीमित वाणी का प्रयोग करते हुए अपने मन को ईश्वर के नाम संकीर्तन में लीन रखना।
  • सूर्यास्त के पश्चात प्रदोष काल में होलिका दहन के स्थान से दूर रहकर अपने गृह मंदिर में शुद्ध घी का अखंड दीपक जलाना।
  • भद्रा काल की पूर्ण समाप्ति की प्रतीक्षा करना और भद्रा रहित निशीथ काल में ही अपनी साधना का आरंभ करना।
  • मध्यरात्रि में किसी भी निर्जन स्थान, श्मशान भूमि अथवा चौराहे पर जाने से पूरी तरह बचना।
  • घर के मुख्य द्वार और चारों कोनों में गंगाजल और हल्दी मिश्रित जल का छिड़काव करके सुरक्षा घेरा बनाना।
  • रात्रि जागरण के समय गायत्री महामंत्र, नृसिंह मंत्र अथवा श्री सूक्त का मानसिक या उपांशु जप करना।
  • अगले दिन प्रातः काल होलिका की शीतल भस्म लाकर अपने मस्तक पर धारण करने के पश्चात ही व्रत का पारण करना।

दारुण रात्रि का रहस्य और मंत्र सिद्धि का विज्ञान

तंत्र शास्त्र के अनुसार दारुण रात्रि को मंत्रों की प्राण प्रतिष्ठा और उनकी सुप्त शक्तियों को जाग्रत करने का सर्वश्रेष्ठ काल माना गया है। सामान्य दिनों में जिस मंत्र के एक लाख जप करने पर भी सिद्धि प्राप्त नहीं होती, दारुण रात्रि के निशीथ काल में उस मंत्र की केवल 11 अथवा 21 माला का एकाग्रचित्त जप करने से वह मंत्र पूर्णतः जाग्रत और चैतन्य हो जाता है।

इस रात्रि को दारुण इसलिए कहा गया है क्योंकि इस समय प्रकृति के आवरण अत्यंत क्षीण हो जाते हैं। सूर्य और चंद्रमा का कोणीय संबंध मानव मन की ग्रंथियों को उधेड़ कर रख देता है। चंद्रमा जो मन का कारक है, वह अपनी सोलह कलाओं से युक्त होकर पूर्णिमा के आकाश में प्रकाशित होता है, जबकि सूर्य देव कुंभ अथवा मीन राशि के संधिकाल में स्थित होते हैं। इस समय जल तत्त्व और अग्नि तत्त्व का एक महा-टकराव होता है। जो साधक इस आग्नेय और जलीय ऊर्जा के मध्य अपनी सुषुम्ना नाड़ी को जाग्रत कर लेता है, उसकी वाणी में वाक् सिद्धि का वास हो जाता है।

इस रात्रि में उच्च कोटि के साधक अपने ईष्ट मंत्रों का पुनश्चरण करते हैं। होलिका की प्रचंड अग्नि से उत्पन्न होने वाली तापीय तरंगे वातावरण में उपस्थित समस्त तामसिक और अपवित्र जीवाणुओं को जलाकर भस्म कर देती हैं, जिससे एक विशुद्ध और शक्तिशाली ऊर्जा क्षेत्र का निर्माण होता है। इसी ऊर्जा क्षेत्र का लाभ उठाकर साधक अपनी चेतना को निम्न चक्रों मूलाधार और स्वाधिष्ठान से उठाकर आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र की ओर अग्रसर करता है।

भगवान नृसिंह और मां बगलामुखी की विशेष आग्नेय साधना

दारुण रात्रि की अधिष्ठात्री शक्तियों में भगवान श्री नृसिंह और दस महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या माता बगलामुखी का स्थान सर्वोपरि है। भगवान नृसिंह अग्नि तत्त्व के परम अवतार हैं जिन्होंने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए स्तंभ को फाड़कर हिरण्यकश्यप का संहार किया था। वहीं माता बगलामुखी शत्रुओं की वाणी, बुद्धि और गति को स्तंभित करने वाली साक्षात पीतांबरा शक्ति हैं।

जिन जातकों के जीवन में निरंतर अज्ञात शत्रुओं का भय बना रहता है, जिन पर झूठे मुकदमे थोपे गए हों, अथवा जिनका व्यापार किसी गुप्त तांत्रिक क्रिया के कारण बांध दिया गया हो, उनके लिए दारुण रात्रि में की जाने वाली निम्नलिखित साधनाएं संजीवनी सिद्ध होती हैं।

साधना विधान प्रयुक्त माला व साधन मुख्य वैदिक व तांत्रिक मंत्र प्राप्त होने वाला आध्यात्मिक फल
नृसिंह रक्षा साधना रक्त चंदन अथवा तुलसी माला ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥ अकाल मृत्यु से रक्षा, भय मुक्ति व अभय
बगलामुखी स्तंभन जप हल्दी की अभिमंत्रित माला ॐ ह्लीं बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा॥ मुकदमों में विजय, शत्रु षड्यंत्र का समूल नाश
महामृत्युंजय अनुष्ठान शुद्ध रुद्राक्ष की माला ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ असाध्य रोगों का शमन व जीवन ऊर्जा वृद्धि
श्री सूक्त संपूट पाठ कमलगट्टे की माला ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं नमः (संपुटित ऋचाएं) दारिद्र्य का नाश व वर्षभर अखंड धन वर्षा

इस रात्रि में भगवान नृसिंह के सम्मुख शुद्ध गाय के घी का चौमुखी दीपक जलाकर नृसिंह कवच का तीन बार पाठ करने से साधक के चारों ओर एक अत्यंत सुदृढ़ सुरक्षा चक्र निर्मित हो जाता है जिसे संसार की कोई भी नकारात्मक शक्ति भेद नहीं सकती।

गृहस्थों के लिए सुरक्षित और सात्विक सुरक्षा कवच निर्माण

तंत्र शास्त्र में साधना के दो मार्ग बताए गए हैं: वाम मार्ग और दक्षिण मार्ग। वाम मार्ग अत्यंत कठिन, उग्र और गृहस्थों के लिए सर्वथा निषिद्ध माना गया है। दारुण रात्रि में गृहस्थ साधकों को केवल दक्षिण मार्ग अर्थात विशुद्ध सात्विक और वेदोक्त नियमों का ही आश्रय लेना चाहिए। किसी भी प्रकार के श्मशानी प्रयोग अथवा तामसिक बलि से गृहस्थ को सदा दूर रहना चाहिए।

गृहस्थ साधक अपने परिवार और भवन की सुरक्षा के लिए दारुण रात्रि में एक अत्यंत दिव्य सुरक्षा गुटिका अथवा रक्षा सूत्र का निर्माण कर सकते हैं।

  • दारुण रात्रि की संध्या को एक स्वच्छ तांबे की थाली में एक भोजपत्र रखें।
  • अष्टगंध अथवा लाल चंदन की स्याही बनाकर अनार की कलम से उस भोजपत्र पर नृसिंह यंत्र अथवा ॐ का पावन चिन्ह अंकित करें।
  • उस भोजपत्र के ऊपर एक शुद्ध एकाक्षी नारियल, सात गोमती चक्र और सात पीली कौड़ियां स्थापित करें।
  • उसके सम्मुख बैठकर 108 बार गायत्री महामंत्र अथवा विष्णु सहस्रनाम का शांत चित्त से पाठ करें।
  • पाठ पूर्ण होने के उपरांत उस समस्त सामग्री को एक लाल रेशमी वस्त्र में लपेटकर मौली से सात गांठें लगाकर बांध दें।
  • इस रक्षा पोटली को अपने पूजा घर में स्थापित कर दें अथवा घर के मुख्य द्वार के भीतरी भाग में लटका दें।
  • यह सात्विक रक्षा कवच पूरे वर्ष आपके घर को नजर दोष, बुरी आत्माओं, व्यापारिक मंदी और पारिवारिक कलह से पूर्णतः सुरक्षित रखेगा।

दारुण रात्रि पर किए जाने वाले 5 अचूक तांत्रिक टोटके

फाल्गुन पूर्णिमा की इस पावन निशा पर किए जाने वाले कुछ अत्यंत सरल परंतु अचूक लोक तांत्रिक प्रयोग जीवन की जटिल से जटिल समस्याओं को सुलझाने में सक्षम माने गए हैं।

  • असाध्य रोग निवारण: यदि परिवार का कोई सदस्य लंबे समय से बीमार हो और दवाइयां असर न कर रही हों, तो एक सूखा जटा वाला नारियल लेकर उसे रोगी के सिर से पैर तक सात बार घड़ी की सुई की दिशा में उसारें। इसके पश्चात उस नारियल को होलिका की प्रज्वलित अग्नि में यह प्रार्थना करते हुए समर्पित कर दें कि रोगी के समस्त रोग अग्नि में भस्म हो जाएं।
  • व्यापारिक बंधन मुक्ति: यदि व्यापार अचानक ठप हो गया हो, तो पीली सरसों, काले तिल और एक चुटकी होलिका भस्म को एक तांबे के पात्र में रखकर धूप दें और उसे अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार पर छिड़क दें।
  • दांपत्य कलह शांति: पति और पत्नी के बीच यदि निरंतर विवाद रहता हो, तो एक सफेद कागज पर लाल चंदन से दोनों का नाम लिखें और उसके ऊपर थोड़ा सा शहद लगाकर होलिका की अग्नि के सम्मुख भगवान लक्ष्मीनारायण से प्रार्थना करें।
  • राहु केतु पीड़ा शमन: जन्म कुंडली में राहु अथवा केतु के कारण यदि निरंतर दुर्घटनाएं हो रही हों, तो दारुण रात्रि में एक सूखा गोला (नारियल) काटकर उसमें काले तिल, जौ और बूरा भरकर होलिका दहन के समय अर्पित करें।
  • ऋण मुक्ति टोटका: सवा किलो साबुत मसूर की दाल को लाल कपड़े में बांधकर अपने सामने रखें और ॐ ऋणमुक्ताय नमः का जप करके अगले दिन किसी सफाई कर्मचारी अथवा निर्धन को दान कर दें।

तांत्रिक मर्यादाएं, निषेध और आत्मरक्षा के नियम

दारुण रात्रि जितनी अधिक फलदायी है, असावधानी बरतने पर यह उतनी ही संवेदनशील भी सिद्ध हो सकती है। तंत्र ग्रंथों में इस रात्रि के लिए कुछ अत्यंत कठोर निषेध बताए गए हैं जिनका उल्लंघन करने पर मनुष्य को भारी मानसिक और शारीरिक कष्ट सहना पड़ सकता है।

  • इस पावन रात्रि में किसी भी पराये व्यक्ति द्वारा दी गई सफेद मिठाई, खीर, इलायची अथवा लौंग का सेवन कदापि न करें, क्योंकि तांत्रिक क्रियाएं प्रायः इन्हीं वस्तुओं के माध्यम से स्थानांतरित की जाती हैं।
  • गर्भवती स्त्रियों, सुकोमल नवजात शिशुओं और गंभीर रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों को होलिका दहन के स्थान पर जाने से बचना चाहिए, क्योंकि वहां सूक्ष्म ऊर्जाओं का तीव्र टकराव होता है।
  • रात्रि में चौराहे, निर्जन कुएं, पुराने बरगद और पीपल के वृक्षों के समीप से गुजरते समय अपने सिर को कपड़े से ढंक कर रखें।
  • इस रात्रि में मदिरा, मांस, तंबाकू और समस्त प्रकार के तामसिक पदार्थों का सेवन साक्षात विनाश को आमंत्रण देने के समान है।
  • साधना करते समय मन में कभी भी किसी का अहित करने, बदला लेने अथवा दूसरों को कष्ट पहुंचाने की भावना न लाएं; अन्यथा वह ऊर्जा लौटकर साधक का ही संहार कर देती है।

दारुण रात्रि का दार्शनिक संदेश और परम प्रकाश का उदय

दारुण रात्रि हमें यह सर्वोच्च आध्यात्मिक सत्य सिखाती है कि संसार में अंधकार कितना भी सघन, भीषण और दारुण क्यों न हो, वह ज्ञान और भक्ति की एक छोटी सी ज्योति के सम्मुख कभी टिक नहीं सकता। होलिका का अभिमान दारुण था, हिरण्यकश्यप का अत्याचार दारुण था, परंतु बालक प्रह्लाद की निष्काम भक्ति ने उस संपूर्ण दारुणता को शीतलता में रूपांतरित कर दिया।

यह महारात्रि मनुष्य के भीतर उपस्थित भय और अज्ञान की आसुरी शक्तियों के अंत का उद्घोष है। जब साधक इस पावन निशा पर अपने आंतरिक विकारों काम, क्रोध, लोभ और अहंकार की समिधा बनाकर परमात्मा के नाम रूपी अग्नि में समर्पित कर देता है, तो उसकी चेतना का कायाकल्प हो जाता है। दारुण रात्रि का अंधकार समाप्त होते ही चैत्र मास के नववर्ष का स्वर्णिम सूर्य उदित होता है जो मनुष्य को अमरता, शांति और परम कल्याण का मार्ग दिखाता है।

FAQ

दारुण रात्रि किस तिथि को कहा जाता है?
फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि अर्थात होलिका दहन की रात्रि को सनातन तंत्र शास्त्र में दारुण रात्रि कहा जाता है।

वर्ष की चार महारात्रियां कौन सी मानी गई हैं?
दीपावली की कालरात्रि, महाशिवरात्रि की महारात्रि, जन्माष्टमी की मोहरात्रि और होलिका दहन की दारुण रात्रि ये चार महारात्रियां हैं।

दारुण रात्रि में किन देवी देवताओं की साधना सबसे प्रभावशाली होती है?
इस पावन रात्रि में भगवान उग्र नृसिंह, दस महाविद्याओं में माता बगलामुखी, अग्नि देव और भगवान भैरव की साधना सबसे प्रभावशाली मानी जाती है।

दारुण रात्रि में मंत्र जप करने से क्या विशेष लाभ होता है?
इस रात्रि में मंत्र अत्यंत शीघ्र चैतन्य और सिद्ध हो जाते हैं, तथा सामान्य दिनों की तुलना में सहस्त्रों गुना अधिक आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करते हैं।

गृहस्थों को इस रात्रि में किस मार्ग की साधना से बचना चाहिए?
गृहस्थ साधकों को वाम मार्गी तांत्रिक साधनाओं, श्मशानी प्रयोगों और तामसिक बलि से पूरी तरह दूर रहकर केवल सात्विक वेदोक्त साधना ही करनी चाहिए।

पाएं अपनी सटीक कुंडली

कुंडली बनाएं

क्या आपको यह पसंद आया?

लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

पं. अमिताभ शर्मा (63)


अनुभव: 20

इनसे पूछें: Family Planning, Career

इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें

WELCOME TO

ZODIAQ

Right Decisions at the right time with ZODIAQ