By पं. सुव्रत शर्मा
फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी पर 32 गणपति स्वरूपों में छठे स्वरूप की पूजा

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को सनातन पंचांग में द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के पावन नाम से जाना जाता है। संकष्टी का शाब्दिक अर्थ संकटों का हरण करने वाली तिथि होता है। भगवान श्री गणेश के 32 शास्त्रीय स्वरूपों में से छठा स्वरूप द्विजप्रिय कहलाता है। द्विज का अर्थ है जिसका दूसरा जन्म हुआ हो अर्थात जो वेदों के अध्ययन, ज्ञान, गायत्री साधना और आत्मनिरीक्षण से पुनः संस्कारित हुआ हो। यह पावन व्रत शीत ऋतु के समापन और वसंत के संधिकाल में आता है, जब मनुष्य की चेतना को भौतिक जड़ता से मुक्त होकर बौद्धिक प्रखरता की आवश्यकता होती है।
| पंचांग घटक | शास्त्रीय विवरण |
|---|---|
| मास एवं पक्ष | फाल्गुन मास, कृष्ण पक्ष |
| पावन तिथि | कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि |
| अधिष्ठाता देवता | भगवान श्री गणेश का छठा स्वरूप द्विजप्रिय गणपति |
| स्वरूप लक्षण | चार भुजाएं, गदा, कमंडल, अक्षमाला और मोदक धारण किए हुए |
| मुख्य अनुष्ठान | दिनभर उपवास, संकटनाशन स्तोत्र पाठ, रात्रि चंद्र अर्घ्य |
| पारण समय | रात्रि में चंद्रोदय के दर्शन और अर्घ्य के तुरंत बाद |
| मुख्य आध्यात्मिक फल | बुद्धि का विकास, दरिद्रता का नाश और विघ्नों से मुक्ति |
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए साधक को सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक कठोर शास्त्रीय मर्यादाओं का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
मुद्गल पुराण और गणेश पुराण में भगवान श्री गणेश के 32 कल्याणकारी स्वरूपों का अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक विवरण मिलता है। इन स्वरूपों में छठा स्वरूप द्विजप्रिय गणपति कहलाता है। द्विजप्रिय का शाब्दिक और दार्शनिक अर्थ है जो आत्मज्ञानियों, वेदपाठी ब्राह्मणों, सत्य के साधकों और अंतर्मुखी विचारकों के परम प्रिय हैं। सनातन परंपरा में द्विज शब्द केवल जन्म आधारित जाति का द्योतक नहीं है, अपितु यह उस साधक का प्रतीक है जिसने अपनी पाशविक वृत्तियों को त्यागकर साधना के माध्यम से दूसरा आध्यात्मिक जन्म प्राप्त किया है।
द्विजप्रिय स्वरूप में भगवान गणेश की चार भुजाएं हैं। उनके प्रथम हस्त में ब्रह्मचर्य और न्याय का प्रतीक गदा सुशोभित है, जो अज्ञान और अधर्म के नाश का संकेत करती है। दूसरे हस्त में कमंडल है, जो आंतरिक शुद्धि, संयम और ज्ञान के जल से चित्त को सींचने का प्रतीक है। तीसरे हस्त में अक्षमाला अर्थात रुद्राक्ष या स्फटिक की जपमाला है, जो निरंतर ईश्वर स्मरण, एकाग्रता और मंत्र साधना का संदेश देती है। चतुर्थ हस्त में मोदक है, जो ब्रह्मानंद, परम तृप्ति और समस्त सिद्धियों के अंतिम फल का द्योतक है। यह चतुर्भुज स्वरूप मनुष्य की चारों अवस्थाओं जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय को संतुलित करके उसे परमतत्व की ओर ले जाता है।
आयुर्वेद और ज्योतिष दोनों इस बात को स्वीकार करते हैं कि फाल्गुन मास का कृष्ण पक्ष शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर एक बड़ा संक्रमण काल होता है। शिशिर ऋतु की ठिठुरन के कारण मानव शरीर में संचित कफ इस समय सूर्य की किरणों से पिघलने लगता है। कफ के इस द्रवीकरण से न केवल पाचन अग्नि मंद पड़ती है, बल्कि मस्तिष्क में भी भारीपन, आलस्य, विस्मृति और अवसाद के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। जब मस्तिष्क में कफ की अधिकता होती है, तो व्यक्ति की निर्णय क्षमता क्षीण हो जाती है।
भगवान द्विजप्रिय गणेश बुद्धि और विवेक के अधिष्ठाता देवता हैं। ज्योतिष शास्त्र में गणेश जी का संबंध बुध और केतु ग्रह से माना गया है। बुध ग्रह तार्किक बुद्धि, विश्लेषण क्षमता, व्यापार और वाणी का स्वामी है, जबकि केतु मोक्ष, वैराग्य और अंतर्ज्ञान का कारक है। फाल्गुन की संकष्टी चतुर्थी पर जब साधक उपवास रखकर ध्यान करता है, तो उसके शरीर के भीतर प्राण ऊर्जा का प्रवाह मूलाधार चक्र से उठकर आज्ञा चक्र की ओर होने लगता है। उपवास से शरीर का कफ दोष शांत होता है और गणेश जी की साधना से तंत्रिका तंत्र सक्रिय हो जाता है, जिससे विस्मृति और आलस्य का नाश होकर प्रखर मेधा शक्ति का उदय होता है।
| आयुर्वेद व ज्योतिष घटक | शीतकालीन प्रभाव | फाल्गुन संकष्टी का प्रभाव | बौद्धिक व शारीरिक रूपांतरण |
|---|---|---|---|
| कफ दोष की स्थिति | स्रोतों में जमा हुआ व गाढ़ा | उपवास से द्रवित व शांत | मस्तिष्क का हल्कापन और ताजगी |
| जठराग्नि व चयापचय | भारी भोजन से मंद | फलाहार से प्रदीप्त व शुद्ध | स्फूर्ति और ऊर्जा का संचरण |
| बुध ग्रह का प्रभाव | चंचलता व निर्णय में भ्रम | मंत्र जप से संतुलित व तीव्र | तार्किक क्षमता और वाणी में तेज |
| केतु ग्रह का प्रभाव | भटकाव व मानसिक भय | साधना से अंतर्ज्ञान में रूपांतरित | आत्मिक शांति और एकाग्रता |
नारद पुराण में महर्षि नारद द्वारा रचित संकटनाशन गणेश स्तोत्र को संपूर्ण संसार के समस्त कष्टों का अचूक निवारक माना गया है। इस स्तोत्र में भगवान गणेश के 12 पावन नामों का स्मरण किया गया है: वक्रतुंड, एकदंत, कृष्णपिंगाक्ष, गजवक्त्र, लंबोदर, विकट, विघ्नराज, धूम्रवर्ण, भालचंद्र, विनायक, गणपति और गजानन। इन नामों का प्रतिदिन तीनों कालों में पाठ करने से मनुष्य को किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के दिन संकटनाशन स्तोत्र का पाठ करने से जीवन के तीन प्रमुख संकटों का तत्काल समाधान होता है:
संकष्टी चतुर्थी का व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक कि रात्रि में उदित होने वाले चंद्रमा को विधिवत अर्घ्य न दे दिया जाए। ज्योतिष में चतुर्थी तिथि के स्वामी भगवान गणेश हैं और चंद्रमा मन के कारक ग्रह हैं। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार चंद्र देव को अपने रूप और सौंदर्य पर अत्यंत अहंकार हो गया था और उन्होंने गणेश जी के गजमुख स्वरूप को देखकर उनका उपहास उड़ाया था। भगवान गणेश ने चंद्रमा के उस अहंकार को नष्ट करने के लिए उन्हें शाप दे दिया था कि जो भी व्यक्ति चतुर्थी के दिन तुम्हारा दर्शन करेगा, उस पर मिथ्या कलंक लगेगा।
कालांतर में जब चंद्रमा ने अपनी भूल स्वीकार की और पश्चाताप करते हुए क्षमा याचना की, तब दयालु गणेश जी ने उन्हें वरदान दिया कि चतुर्थी का यह कलंक संकष्टी व्रत के प्रभाव से दूर होगा। जो साधक दिनभर संकष्टी का व्रत रखकर रात में चंद्रमा को अर्घ्य देगा, उसके जीवन से समस्त प्रकार के कलंक, अपयश, मानसिक तनाव और ग्रह दोष समाप्त हो जाएंगे। चंद्रमा मन का प्रतीक है और गणेश बुद्धि के प्रतीक हैं। जब बुद्धि मन को अपनी शरण में ले लेती है, तब मानव जीवन में किसी भी प्रकार का भटकाव शेष नहीं रहता। तांबे के पात्र में दूध और जल मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य देने से कुंडली का चंद्र दोष शांत हो जाता है और साधक को संपूर्ण वर्ष के लिए मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का क्या अर्थ है?
द्विजप्रिय भगवान गणेश का छठा स्वरूप है जो आत्मसाधकों, ज्ञानियों और वेदों के मर्मज्ञों को अत्यंत प्रिय है तथा बुद्धि का विकास करता है।
द्विजप्रिय चतुर्थी पर चंद्रमा को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?
चंद्रमा मन का कारक है और गणेश जी के वरदान के अनुसार चतुर्थी पर चंद्र अर्घ्य देने से मानसिक तनाव, अपयश और समस्त संकट दूर होते हैं।
इस दिन गणेश जी को कितनी दूर्वा अर्पित करनी चाहिए?
इस पावन दिन पर भगवान द्विजप्रिय गणेश को 21 दूर्वा की गांठें बनाकर अर्पित करना सर्वोत्तम फलदायी माना गया है।
संकटनाशन स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
द्विजप्रिय चतुर्थी के दिन संकटनाशन गणेश स्तोत्र का कम से कम 11 बार एकाग्रचित्त होकर पाठ करना चाहिए।
क्या संकष्टी चतुर्थी का व्रत बिना चंद्र दर्शन के खोला जा सकता है?
शास्त्रों के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत रात्रि में चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर ही खोला जाना अनिवार्य है।
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