By अपर्णा पाटनी
सनातन धर्म की जल पूजा, हर्बल रंग और जीव दया का संदेश

सनातन वैदिक पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की शुक्ल पक्षीय पूर्णिमा तिथि और चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि का यह पावन संधिकाल संपूर्ण सृष्टि में अग्नि और जल के संतुलन का दिव्य उत्सव माना गया है। फाल्गुन पूर्णिमा की पावन निशा पर जहाँ होलिका दहन की प्रज्वलित अग्नि के माध्यम से शीत ऋतु के संचित कफ, वायुमंडल के सूक्ष्म विषाणुओं और तमोगुणी नकारात्मक तरंगों का दहन किया जाता है, वहीं उसके ठीक अगले प्रभात पर चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को धुलेंडी के रूप में जल और रंगों का पावन उत्सव संपन्न होता है।
वैदिक काल गणना में जल को केवल एक भौतिक द्रव नहीं, अपितु साक्षात 'वरुण देव' और संपूर्ण जीवन का प्राण माना गया है। ऋग्वेद के दशम मंडल के आपः सूक्त में जल की स्तुति करते हुए ऋषियों ने उद्घोष किया है: 'आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन' अर्थात हे दिव्य जलों, आप साक्षात सुख और ऊर्जा के प्रदाता हैं, हमें नवजीवन प्रदान करें।
दुर्भाग्यवश आधुनिक युग में उपभोक्तावादी विकृतियों के कारण इस पावन आध्यात्मिक पर्व ने एक भयानक पर्यावरणीय संकट का रूप ले लिया है। होली के नाम पर न केवल लाखों लीटर शुद्ध पीने योग्य भूजल को निर्ममता से व्यर्थ बहा दिया जाता है, अपितु बाजारों में बिकने वाले घातक रासायनिक रंगों के प्रयोग से भूमि, जल और वायुमंडल को गंभीर रूप से विषाक्त किया जा रहा है। सनातन धर्म कभी भी प्रकृति के विनाश पर आधारित उत्सव का समर्थन नहीं करता। प्राचीन वैदिक परंपरा सदैव पर्यावरण अनुकूल, प्राकृतिक और पूर्णतः अहिंसक रंगों के साथ जल संरक्षण का पावन संदेश देती है।
| पंचांग व पर्यावरणीय घटक | शास्त्रीय व वैज्ञानिक विवरण |
|---|---|
| मास एवं तिथि संयोग | फाल्गुन पूर्णिमा से चैत्र कृष्ण प्रतिपदा |
| वैदिक देवता | साक्षात जल के अधिष्ठाता वरुण देव और अग्नि देव |
| शास्त्रीय स्वरूप | वसंतोत्सव, धूली वंदन, मदनोत्सव और कामदेव पूजन |
| मुख्य प्राकृतिक द्रव्य | पलाश पुष्प जल, कस्तूरी, श्वेत चंदन, अबीर, हल्दी |
| आधुनिक विकृति | घातक रासायनिक रंग, प्लास्टिक गुब्बारे, जल अपव्यय |
| गंभीर पर्यावरणीय प्रभाव | भूजल का दूषित होना, जलीय जीवों की मृत्यु, मिट्टी का क्षरण |
| मुख्य आध्यात्मिक फल | प्रकृति रक्षा, वरुण देव की कृपा, आरोग्य और सामाजिक समरसता |
पर्यावरण अनुकूल होली मनाकर वरुण देव और प्रकृति का आशीर्वाद प्राप्त करने तथा अपने अंतःकरण को कलुष से मुक्त रखने के लिए प्रत्येक साधक को विशिष्ट शास्त्रीय मर्यादाओं का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
आधुनिक बाज़ारों में अत्यधिक कम मूल्य पर मिलने वाले चटक और चमकीले रंग वास्तव में किसी वनस्पति से नहीं, अपितु पेट्रोलियम उप-उत्पादों, औद्योगिक रसायनों, भारी धातुओं और एस्बेस्टस के अत्यंत घातक मिश्रण से तैयार किए जाते हैं। जब ये रासायनिक रंग मानव त्वचा के संपर्क में आते हैं, तो वे त्वचा के सूक्ष्म रोमछिद्रों को जलाकर रक्त वाहिकाओं के भीतर प्रवेश कर जाते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और त्वचा रोग विशेषज्ञों के अनुसार रासायनिक रंगों में उपस्थित विभिन्न घातक तत्व मानव शरीर और पर्यावरण को निम्नलिखित प्रकार से स्थायी क्षति पहुंचाते हैं:
| रासायनिक रंग का प्रकार | उपस्थित मुख्य घातक विषैला रसायन | त्वचा व मानव शरीर पर दुष्प्रभाव | पर्यावरण व भूजल पर प्रभाव |
|---|---|---|---|
| चमकीला काला रंग | लेड ऑक्साइड (सीसा यौगिक) | गुर्दों की विफलता, मस्तिष्क विकार, दृष्टि हानि | भूजल में घुलकर पेयजल को स्थायी विषाक्त करना |
| गहरा हरा रंग | कॉपर सल्फेट (तांबा सल्फेट) | आंखों में अंधापन, त्वचा का गलना, एलर्जी | मिट्टी की उर्वरा शक्ति को नष्ट करना |
| रुपहला व चमकीला सिल्वर | एल्युमिनियम ब्रोमाइड | त्वचा का कैंसर, श्वसन नलिकाओं में छाले | जलीय वनस्पतियों और मछलियों का संहार |
| गहरा नीला रंग | प्रशियन ब्लू (फेरिक फेरोसाइनाइड) | कांटैक्ट डर्मेटाइटिस, त्वचा पर फफोले पड़ना | जल स्रोतों के ऑक्सीजन स्तर को शून्य करना |
| गहरा सिंदूरी व लाल रंग | मरकरी सल्फाइट (पारा यौगिक) | त्वचा का कैंसर, पक्षाघात, भ्रूण को भारी क्षति | भूमि में भारी धातुओं का संचय व मिट्टी क्षरण |
| चमकदार सूखा अबीर | एस्बेस्टस और अभ्रक (माइका) चूर्ण | फेफड़ों में सिलिकोसिस, आंखों की कॉर्निया क्षति | वायु में मिलकर श्वास के गंभीर रोग उत्पन्न करना |
जब होली खेलने के पश्चात करोड़ों लोग इन रासायनिक रंगों को धोने के लिए स्नान करते हैं, तो करोड़ों लीटर विषैला झागदार जल नालियों के माध्यम से हमारी पवित्र नदियों, सरोवरों और अंततः भूमिगत जल स्रोतों में समाहित हो जाता है। यह सीसा, पारा और तांबा कई सौ वर्षों तक नष्ट नहीं होता और फसलों के माध्यम से हमारे भोजन की थाली में पहुंचकर कैंसर जैसी असाध्य बीमारियों का कारण बनता है। क्या किसी धार्मिक पर्व का परिणाम इतना भयानक और प्रकृति द्रोही हो सकता है? यह विचारणीय प्रश्न है।
हमारे प्राचीन ऋषियों ने सहस्रों वर्ष पूर्व होली के लिए ऐसे रंगों की खोज की थी जो न केवल प्रकृति को सुरक्षित रखते थे, अपितु मानव शरीर के लिए औषधीय रसायन का कार्य करते थे। घर पर ही विशुद्ध, सुगंधित और औषधीय हर्बल रंग तैयार करने की वैदिक विधियां अत्यंत सरल, सुरक्षित और पर्यावरण पूरक हैं:
प्राकृतिक पीला गुलाल:
दिव्य लाल व सिंदूरी रंग:
औषधीय हरा रंग:
केसरिया व नारंगी जल (पलाश अर्क):
नीला और बैंगनी रंग:
सनातन संस्कृति में जल को ब्रह्म का साक्षात रूप माना गया है। यजुर्वेद का शांति पाठ उद्घोष करता है: 'शं न आपो धन्वन्याः शमनः सन्तु नूप्याः' अर्थात हमारे वनों का जल, कुओं का जल और नदियों का जल हमारे लिए शांतिदायक और कल्याणकारी हो।
भारतवर्ष के अनेक राज्य आज भीषण भूजल संकट और सूखे की मार झेल रहे हैं। जब ग्रीष्म ऋतु के आगमन के समय किसान अपने खेतों में सिंचाई के लिए और नगरों के नागरिक एक एक बूंद पीने के पानी के लिए तरस रहे होते हैं, उस समय होली पर एक ही दिन में करोड़ों लीटर शुद्ध पेयजल को नालियों में बहा देना एक अक्षम्य आध्यात्मिक और सामाजिक अपराध है।
होलिकोत्सव को 'सूखी होली' (ड्राई होली) अथवा केवल तिलक होली के रूप में मनाना ही सच्ची धर्म निष्ठा है।
| जल उपयोग की स्थिति | पारंपरिक जल बर्बादी | पर्यावरण अनुकूल तिलक होली | जल व प्रकृति संरक्षण लाभ |
|---|---|---|---|
| प्रति व्यक्ति जल की खपत | 150 से 300 लीटर (नहलाने व धोने में) | मात्र 1 से 2 लीटर (हाथ मुंह धोने में) | करोड़ों लीटर शुद्ध भूजल की बचत |
| भूमिगत जल का स्तर | दूषित रसायनों के रिसाव से क्षरण | भूमिगत जल पूरी तरह शुद्ध व सुरक्षित | भावी पीढ़ियों के लिए जल की रक्षा |
| नदियों व सरोवरों की स्थिति | घातक सीसा व पारे से जलीय जीवों की मृत्यु | शून्य प्रदूषण, जल धाराओं की पवित्रता | जलीय पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण |
| त्वचा स्वास्थ्य की स्थिति | त्वचा पर जलन, सूखापन व एलर्जी | त्वचा को हर्बल पोषण व प्राकृतिक चमक | चिकित्सा व्यय व दवाओं की बचत |
भगवान श्री कृष्ण ने ब्रज में जब होली की लीला रचाई थी, तो उन्होंने कभी भी यमुना के जल को दूषित नहीं किया था। वे पलाश के फूलों के अर्क से और सुगंधित अबीर गुलाल से ही गोपियों के साथ प्रेम का उत्सव मनाते थे। जल को बचाना साक्षात नारायण की सेवा है, क्योंकि नारायण शब्द का अर्थ ही है 'नार' अर्थात जल में वास करने वाला।
सनातन धर्म का आधारभूत स्तंभ 'अहिंसा परमो धर्मः' है। महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा गया है कि जो व्यक्ति अपने सुख के लिए निर्दोष और असहाय प्राणियों को कष्ट पहुंचाता है, वह कभी सद्गति प्राप्त नहीं कर सकता।
होली के हुड़दंग में अत्यंत क्रूरतापूर्वक गली के मूक श्वानों, गायों और पक्षियों पर पक्के रासायनिक रंग और ग्रीस पोत दिया जाता है। यह अत्यंत घृणित और पाप कर्म है। पशु अपनी त्वचा पर लगे रंग को अपनी जिह्वा से चाटकर साफ करने का प्रयास करते हैं। जब वह सीसा और पारा उनकी आंतों में पहुंचता है, तो उनके आंतरिक अंग गल जाते हैं, वे भयंकर उल्टियां करने लगते हैं और कुछ ही दिनों में तड़प तड़प कर मर जाते हैं। रासायनिक रंगों के कारण अनेक पक्षी अपनी आंखों की ज्योति खो देते हैं और उड़ने में असमर्थ होकर दम तोड़ देते हैं।
पर्यावरण अनुकूल होली केवल प्रकृति की रक्षा का उपाय नहीं है, अपितु यह मनुष्य के आत्मिक नवजागरण का महा अनुष्ठान है। जब हम अपनी उत्सव प्रियता को प्रकृति की मर्यादा के साथ जोड़ते हैं, तो हमारा पर्व साक्षात यज्ञ बन जाता है।
होली का वास्तविक रंग प्रेम का रंग है, आत्मीयता का रंग है और करुणा का रंग है। जब हम किसी व्यक्ति के मस्तक पर पलाश के फूलों से बना एक चुटकी गुलाल लगाकर उसे गले लगाते हैं, तो उसमें कोई जल व्यर्थ नहीं बहता, किसी की त्वचा नहीं जलती, परंतु दो हृदयों के मध्य की वर्षों पुरानी दूरियां उसी क्षण मिट जाती हैं।
आइए इस फाल्गुन मास में यह पावन संकल्प लें कि हम अपनी सनातन संस्कृति के गौरव को पुनर्स्थापित करेंगे। हम रसायनों के विषैले व्यापार को नकारेंगे, अपनी जीवनदायिनी नदियों और भूजल की एक एक बूंद की रक्षा करेंगे और हर्बल रंगों के साथ एक पवित्र, सुरक्षित और पर्यावरण अनुकूल होली मनाकर इस पृथ्वी को रहने योग्य एक सुंदर स्वर्ग बनाएंगे। यही होली का वास्तविक, शाश्वत और अमर संदेश है।
पर्यावरण अनुकूल (इको फ्रेंडली) होली खेलने के क्या मुख्य लाभ हैं?
यह त्वचा को रासायनिक जलन से बचाती है, करोड़ों लीटर शुद्ध पेयजल का संरक्षण करती है और भूमिगत जल को सीसा व पारे के जहर से सुरक्षित रखती है।
बाजार के रासायनिक रंगों में कौन से घातक तत्व मिले होते हैं?
इनमें लेड ऑक्साइड (सीसा), कॉपर सल्फेट, मरकरी सल्फाइट (पारा), एल्युमिनियम ब्रोमाइड और एस्बेस्टस जैसे कैंसरकारक रसायन मिले होते हैं।
घर पर प्राकृतिक पीला रंग बनाने की सबसे सरल विधि क्या है?
शुद्ध हल्दी में बराबर मात्रा में बेसन अथवा अरारोट मिलाकर और उसमें थोड़ा सा चंदन व कपूर मिलाकर अत्यंत सुवासित पीला गुलाल बनाया जा सकता है।
पलाश (टेसू) के फूलों का रंग त्वचा के लिए क्यों लाभकारी होता है?
पलाश के फूलों में एंटी फंगल और एंटी एलर्जिक गुण होते हैं जो वसंत ऋतु के चर्म रोगों, खुजली और शरीर की आंतरिक जलन को पूरी तरह शांत करते हैं।
मूक पशुओं पर रंग डालना सनातन धर्म में क्यों वर्जित माना गया है?
पशु उस रंग को चाटते हैं जिससे उनके आंतरिक अंग विषाक्त होकर फेल हो जाते हैं, अतः 'अहिंसा परमो धर्मः' के अनुसार मूक जीवों को पीड़ा देना घोर पाप है।
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