By पं. अभिषेक शर्मा
भगवान विष्णु के नृसिंह स्वरूप का ध्यान और कोटि यज्ञ फल

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को सनातन वैदिक पंचांग में गोविंद द्वादशी अथवा नृसिंह द्वादशी के पावन नाम से जाना जाता है। यह पावन तिथि रंगभरी आमलकी एकादशी के ठीक अगले दिन आती है और होलिका दहन से पूर्व भगवान श्री हरि विष्णु के गोविंद तथा उग्र नृसिंह स्वरूप की साधना का सर्वोच्च केंद्र मानी जाती है। वैदिक ज्योतिष के प्राचीन गणितीय सूत्रों के अनुसार जब फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को पुष्य नक्षत्र का पावन संयोग निर्मित होता है तब इस तिथि को सामान्य द्वादशी न कहकर महा गोविंद द्वादशी की संज्ञा दी जाती है। यह खगोलीय योग कई दशकों अथवा शताब्दियों के अंतराल पर एक बार आता है। इस दुर्लभ योग में किया गया एक ही दिन का अनुष्ठान सहस्रों वाजपेय यज्ञों, कोटि अश्वमेध यज्ञों और संपूर्ण जीवन के तप के समान अक्षय फल प्रदान करता है।
| पंचांग घटक | शास्त्रीय विवरण |
|---|---|
| मास एवं पक्ष | फाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष |
| पावन तिथि | शुक्ल पक्ष द्वादशी तिथि |
| अधिष्ठाता देवता | भगवान गोविंद, लक्ष्मी नृसिंह व श्री हरि विष्णु |
| नक्षत्र संबंध | पुष्य अथवा अश्लेषा नक्षत्र का विशेष संयोग |
| प्रधान अनुष्ठान | ब्रह्म मुहूर्त नदी स्नान, पंचामृत अभिषेक, नृसिंह कवच पाठ |
| प्रमुख नैवेद्य द्रव्य | पंचामृत, तुलसी दल, ऋतु फल, माखन मिश्री, पीले पुष्प |
| अभीष्ट फल | करोड़ों यज्ञों का फल, पितृ मुक्ति, शत्रु नाश और मोक्ष |
गोविंद द्वादशी के दिन भगवान श्री हरि विष्णु की परम कृपा प्राप्त करने और अपने कुल को समस्त अमंगलों से सुरक्षित रखने हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही विशिष्ट वैदिक नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
गोविंद द्वादशी केवल एक नियमित पंचांग तिथि नहीं है, अपितु यह भक्त शिरोमणि प्रह्लाद की रक्षा हेतु भगवान विष्णु द्वारा लिए गए उस परम संकल्प का साक्षी दिन है जिसके परिणामस्वरूप नृसिंह अवतार का प्राकट्य हुआ था। श्रीमद्भागवत महापुराण के सप्तम स्कंध में यह आख्यान विस्तार से मिलता है कि फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से लेकर चतुर्दशी तक दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को कालकोठरी में बंद करके अनेक प्रकार के असहनीय कष्ट दिए थे।
द्वादशी तिथि के दिन हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को खौलते हुए तेल के कड़ाह में डालने और पर्वत के शिखर से खाई में फेंकने का आदेश दिया था। उस संकट काल में प्रह्लाद ने अपने नेत्र बंद करके केवल गोविंद नाम का आश्रय लिया था। जब कोई जीव संसार के संपूर्ण संबल को मिथ्या मानकर केवल परमात्मा की सत्ता पर अनन्य विश्वास कर लेता है तब भगवान का सिंहासन कंपित हो उठता है। द्वादशी तिथि की इसी वेला में भगवान विष्णु ने वैकुंठ में अपने सुदर्शन चक्र और योगमाया को प्रह्लाद की अदृश्य रक्षा का आदेश दिया था और स्वयं खंभे से नृसिंह रूप में प्रकट होने की तैयारी की थी।
गोविंद नाम का अर्थ है जो इंद्रियों का रक्षक है, जो वेदों का उद्धारक है और जो संकट में फंसे हुए शरणागत जीवों की पुकार सुनकर दौड़ा चला आता है। जब प्रह्लाद ने गोविंद का स्मरण किया, तो खौलता हुआ तेल उनके लिए शीतल चंदन बन गया और पर्वत से गिरते समय पृथ्वी माता ने उन्हें अपनी गोद में फूलों की भांति थाम लिया। गोविंद द्वादशी पर किया गया नृसिंह स्वरूप का ध्यान मनुष्य के भीतर के संपूर्ण भय, असुरक्षा की भावना और संशय को समूल नष्ट करके उसमें अदम्य आत्मिक साहस का संचार करता है।
वैदिक संहिताओं में द्वादशाक्षर मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय को समस्त मंत्रों का सम्राट माना गया है। गोविंद द्वादशी के दिन इस मंत्र का किया गया अनुष्ठान साधारण दिनों की तुलना में कोटि गुना अधिक शक्तिशाली हो जाता है। पद्म पुराण में महर्षि वेदव्यास स्पष्ट उल्लेख करते हैं कि इस पावन तिथि पर जो साधक निराहार रहकर अथवा केवल दुग्धाहार रहकर इस मंत्र का 1008 बार अथवा 11 माला जप संपन्न करता है, उसे वेदों में वर्णित वाजपेय यज्ञ, राजसूय यज्ञ और पुंडरीक यज्ञ का संयुक्त पुण्य फल सहज रूप से प्राप्त हो जाता है।
| अनुष्ठान घटक | अनुशंसित विधि व संख्या | प्रयुक्त साधन व माला | प्राप्त होने वाला आध्यात्मिक फल |
|---|---|---|---|
| द्वादशाक्षर मंत्र जप | 1008 बार अथवा 11 माला | तुलसी अथवा चंदन की माला | समस्त संचित पापों का क्षय व आत्म शुद्धि |
| पंचामृत अभिषेक | शंख के माध्यम से सतत धारा | देशी गाय का दूध, दही, घी, शहद, शर्करा | शारीरिक आरोग्य व मानसिक शांति |
| नृसिंह कवच पाठ | 3 बार शुद्ध उच्चारण के साथ | शुद्ध घी का अखंड दीपक | शत्रुओं के षड्यंत्र का नाश व अभय |
| विष्णु सहस्रनाम पाठ | 1 बार तुलसी दल अर्पण सहित | 1000 तुलसी पत्र | अखंड ऐश्वर्य, पद प्रतिष्ठा व वंश वृद्धि |
मंत्र जप के समय साधक को अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर बैठना चाहिए और अपना ध्यान हृदय चक्र अथवा आज्ञा चक्र पर केंद्रित करना चाहिए। इस दिन तुलसी की माला से किया गया जप भगवान गोविंद के अंतःकरण को अत्यंत प्रिय लगता है। जो साधक आर्थिक तंगी अथवा भारी ऋण के बोझ से दबे हुए हैं, वे यदि इस दिन नृसिंह ऋणमोचन स्तोत्र का पाठ करें, तो उनके समस्त आर्थिक संकट शीघ्र ही समाप्त हो जाते हैं।
वैदिक ज्योतिष में द्वादशी तिथि के स्वामी स्वयं भगवान विष्णु हैं। जब यह तिथि फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में आती है, तो सूर्य और चंद्रमा के मध्य की कोणीय दूरी जीव के चित्त को सांसारिक वासनाओं से ऊपर उठाकर वैकुंठ की ओर मोड़ने में सहायता करती है। शास्त्रों में मान्यता है कि यदि किसी परिवार में पितरों की मुक्ति न हुई हो और वे सूक्ष्म लोकों में भटक रहे हों, जिसके कारण परिवार में संतान हीनता, असाध्य रोग अथवा निरंतर दरिद्रता बनी रहती हो, तो गोविंद द्वादशी पर किया गया पिंडदान और तर्पण इक्कीस पीढ़ियों के पूर्वजों को तत्काल मोक्ष प्रदान कर देता है।
इसके अतिरिक्त जन्म कुंडली में यदि राहु और केतु के कारण कालसर्प योग का निर्माण हो रहा हो अथवा गुरु चांडाल योग बन रहा हो, तो इस दिन भगवान गोविंद की विशेष पूजा इन समस्त दोषों को निष्प्रभावी कर देती है। भगवान गोविंद की कृपा से देवगुरु बृहस्पति अत्यंत बलवान हो जाते हैं जिससे जातक के ज्ञान, बुद्धि, विवेक और सामाजिक प्रतिष्ठा में अप्रत्याशित वृद्धि होती है। इस दिन किसी पवित्र नदी में स्नान करने के पश्चात तांबे अथवा कांसे के पात्र में तिल, गुड़ और पीले वस्त्र रखकर दान करने से शनि देव की साढ़ेसाती और ढैया के अशुभ प्रभाव भी पूरी तरह शांत हो जाते हैं।
गोविंद द्वादशी की पूजा का संपूर्ण फल प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में एक अत्यंत सुव्यवस्थित और पवित्र पूजा पद्धति का विधान किया गया है।
गोविंद द्वादशी हमें यह सर्वोच्च आध्यात्मिक संदेश देती है कि संसार का कोई भी संकट, कोई भी विपत्ति और कोई भी क्रूर शक्ति उस जीव का बाल भी बांका नहीं कर सकती जिसने स्वयं को संपूर्ण रूप से परमात्मा के चरणों में समर्पित कर दिया है। हिरण्यकश्यप भौतिक बल, सांसारिक वरदानों और आसुरी शक्तियों का प्रतीक था, जबकि प्रह्लाद विशुद्ध प्रेम, निष्काम भक्ति और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास का प्रतीक थे। अंततः विजय भौतिक शक्ति की नहीं, अपितु आत्मिक सत्य और निष्काम भक्ति की ही हुई।
यह पावन पर्व मनुष्य को सिखाता है कि जीवन में जब भी अधर्म, अन्याय और क्रूरता का अंधकार बढ़ता हुआ दिखाई दे तब निराश होने की आवश्यकता नहीं है। परमात्मा प्रत्येक क्षण अपने भक्तों की रक्षा के लिए उपस्थित रहते हैं। आवश्यकता केवल इस बात की है कि मनुष्य अपने भीतर प्रह्लाद जैसा अडिग विश्वास और मीरा जैसी अनन्य लगन उत्पन्न करे। जो साधक गोविंद द्वादशी के दिन अपने अहंकार, काम, क्रोध और लोभ रूपी हिरण्यकश्यप की प्रवृत्तियों को भगवान नृसिंह के नखों से विदीर्ण करवा लेता है, उसका अंतःकरण सदा के लिए पवित्र हो जाता है। ऐसा निष्कलंक साधक इस नश्वर संसार में धर्म, अर्थ और काम का मर्यादापूर्वक उपभोग करता हुआ अंत समय में भगवान श्री हरि विष्णु के परम पद वैकुंठ को प्राप्त कर लेता है, जहां से पुनः इस दुखमय संसार में लौटना नहीं पड़ता।
गोविंद द्वादशी किस तिथि को मनाई जाती है?
यह पावन तिथि प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जाती है।
महा गोविंद द्वादशी का निर्माण कब होता है?
जब फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि के दिन पुष्य नक्षत्र का पावन संयोग निर्मित होता है तब उसे महा गोविंद द्वादशी कहा जाता है।
गोविंद द्वादशी पर किस भगवान की पूजा मुख्य रूप से की जाती है?
इस दिन भगवान श्री हरि विष्णु के गोविंद स्वरूप और उनके उग्र तथा कल्याणकारी लक्ष्मी नृसिंह स्वरूप की पूजा की जाती है।
इस दिन किस मंत्र का जप करने से कोटि यज्ञों का फल मिलता है?
इस दिन द्वादशाक्षर मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का कम से कम 1008 बार तुलसी की माला से जप करने से कोटि यज्ञों का फल मिलता है।
क्या गोविंद द्वादशी का व्रत करने से पितरों को मुक्ति मिलती है?
हाँ, इस पावन तिथि पर किया गया स्नान, तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन इक्कीस पीढ़ियों के पूर्वजों को पितृ दोष से मुक्त करके वैकुंठ प्रदान करता है।
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