होलाष्टक का ज्योतिषीय रहस्य क्या है?

By पं. संजीव शर्मा

आठ दिनों में क्यों उग्र होते हैं नवग्रह और उपाय

होलाष्टक का ज्योतिषीय रहस्य: 8 उग्र ग्रह और उपाय

होलाष्टक का खगोलीय संधिकाल और नवग्रहों की उग्रता

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से लेकर पूर्णिमा तिथि तक का कालखंड वैदिक ज्योतिष और खगोल विज्ञान में एक अत्यंत उग्र और संवेदनशील संधिकाल माना जाता है। इस अवधि को सनातन पंचांग में होलाष्टक के नाम से जाना जाता है। सामान्य दृष्टि से देखने पर यह केवल होलिका दहन से पूर्व के 8 दिन प्रतीत होते हैं, परंतु ज्योतिषीय सूत्रों के अनुसार यह वह विशिष्ट समय है जब सौरमंडल के प्रमुख ग्रह अपनी सामान्य शांत अवस्था को त्यागकर उग्र और प्रकुपित अवस्था में प्रवेश करते हैं। ग्रहों के इस तीव्र और उद्विग्न रश्मि संचरण के कारण पृथ्वी का चुंबकीय मंडल और समस्त प्राणियों का अंतःस्रावी तंत्र गहराई से प्रभावित होता है।

होलाष्टक दिवस पंचांग तिथि उग्र ग्रह स्वामी ग्रह का तात्विक स्वभाव मानव शरीर और मन पर प्रभाव
प्रथम दिवस शुक्ल पक्ष अष्टमी चंद्र देव जल तत्त्व व मानस कारक अत्यधिक मानसिक चंचलता, अनिद्रा, भ्रम व भावुकता
द्वितीय दिवस शुक्ल पक्ष नवमी सूर्य देव अग्नि तत्त्व व आत्मा कारक अहंकार की वृद्धि, क्रोध, पित्त प्रकोप व सिरदर्द
तृतीय दिवस शुक्ल पक्ष दशमी शनि देव वायु तत्त्व व कर्म कारक शारीरिक आलस्य, जोड़ों में जकड़न, अवसाद व विलंब
चतुर्थ दिवस शुक्ल पक्ष एकादशी शुक्र देव जल तत्त्व व काम कारक कामुक भटकाव, आकर्षण में अंधापन व व्यसनों की ओर झुकाव
पंचम दिवस शुक्ल पक्ष द्वादशी देवगुरु बृहस्पति आकाश तत्त्व व विवेक कारक निर्णय हीनता, तर्क शक्ति में भ्रम व बड़ों से मतभेद
षष्ठ दिवस शुक्ल पक्ष त्रयोदशी बुध देव पृथ्वी तत्त्व व बुद्धि कारक वाणी दोष, संचार में गलतफहमियां, व्यापार में घबराहट
सप्तम दिवस शुक्ल पक्ष चतुर्दशी मंगल देव अग्नि तत्त्व व रक्त कारक आक्रामकता, रक्त विकार, दुर्घटना का भय व विवाद
अष्टम दिवस शुक्ल पक्ष पूर्णिमा राहु ग्रह छाया तत्त्व व भ्रम कारक भय, मतिभ्रम, षड्यंत्र का शिकार होना व मानसिक असुरक्षा

ग्रहों के इस दैनिक उग्र प्रभाव को शांत करने और अपनी आंतरिक चेतना को स्थिर बनाए रखने के लिए साधक को प्रतिदिन सूर्योदय के समय से ही अनुशासित दिनचर्या का पालन करना अनिवार्य है।

  • नित्य प्रातः सूर्योदय से पूर्व उठकर शीतल जल में गंगाजल और काले तिल मिलाकर स्नान करना।
  • उदीयमान सूर्य देव को तांबे के पात्र से तीन बार जल का अर्घ्य देकर गायत्री मंत्र का शांत मन से जप करना।
  • प्रतिदिन उस विशिष्ट तिथि के उग्र ग्रह के मंत्रों का कम से कम 108 बार मानसिक जप करना।
  • किसी भी प्रकार के नए सांसारिक अनुबंध, साझेदारी अथवा बहुमूल्य क्रय विक्रय से बचना।
  • घर के ईशान कोण में शुद्ध देशी गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करके नवग्रह शांति स्तोत्र का पाठ करना।
  • सात्विक और हल्का भोजन ग्रहण करना तथा अत्यधिक नमक, खटाई और मिर्च मसालों से दूरी बनाना।
  • वाणी पर पूर्ण संयम रखना और किसी भी प्रकार के विवाद अथवा वाद विवाद में अपनी ऊर्जा नष्ट न करना।
  • सायंकाल के समय कपूर और लोबान का धूप जलाकर घर के प्रत्येक कक्ष में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करना।

अष्टमी से पूर्णिमा तक ग्रहों के दैनिक उग्र रूप का सूक्ष्म विज्ञान

होलाष्टक के दौरान प्रतिदिन एक विशिष्ट ग्रह का उग्र होना केवल एक मान्यता नहीं है, अपितु यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्रवाह में आने वाले विचलन का वैज्ञानिक विवरण है। अष्टमी तिथि को चंद्रमा के अत्यधिक उग्र और क्षुब्ध होने से मनुष्य का मन सबसे अधिक अस्थिर हो जाता है। चंद्रमा जल तत्त्व का कारक है और पृथ्वी तथा मानव शरीर दोनों में लगभग 70 प्रतिशत जल उपस्थित है। जब चंद्रमा अपनी किरणों के माध्यम से जल तत्त्व को आंदोलित करता है, तो साधक के अवचेतन में दबी हुई पुरानी पीड़ाएं और चिंताएं अचानक उभर आती हैं। इस दिन लिया गया कोई भी भावनात्मक निर्णय प्रायः आगे चलकर दुख का कारण बनता है।

नवमी तिथि को ग्रहों के अधिपति सूर्य देव का प्रकोप बढ़ता है। सूर्य का सीधा संबंध मनुष्य के अहंकार, हृदय और आत्मबल से होता है। नवमी के दिन सूर्य की प्रखर रश्मियां साधक के भीतर बिना किसी कारण के क्रोध और श्रेष्ठता की भावना उत्पन्न करती हैं, जिससे पारिवारिक संबंधों में टकराव की संभावना बढ़ जाती है। दशमी तिथि को कर्म फल दाता शनि देव उग्र हो जाते हैं। शनि का वायु तत्त्व जब दूषित होता है, तो व्यक्ति के भीतर निराशा, भय, कार्यों में अत्यधिक विलंब और भाग्यहीनता की भावना घर करने लगती है।

एकादशी तिथि को शुक्र ग्रह की उग्रता मानवीय इंद्रियों को अनियंत्रित करने का प्रयास करती है। इस दिन काम वासना और भोग विलास की इच्छाएं चरम पर पहुंच जाती हैं, जिससे साधक के आध्यात्मिक पथ से विचलित होने का भय रहता है। द्वादशी तिथि को देवगुरु बृहस्पति का प्रभाव विक्षिप्त होता है। गुरु ज्ञान और विवेक के प्रतीक हैं, परंतु इस तिथि पर गुरु का विवेक धूमिल हो जाने के कारण व्यक्ति अनुचित सलाह को भी उचित मान बैठता है। त्रयोदशी को बुध का उग्र होना व्यापारिक सौदों में धोखाधड़ी और वाणी में कटुता लाता है। चतुर्दशी को मंगल का रक्त पर प्रभाव व्यक्ति को हिंसक और आक्रामक बना देता है, जबकि पूर्णिमा को राहु का अंतिम प्रहार संपूर्ण वातावरण में एक गहरा भ्रम और अज्ञात भय उत्पन्न कर देता है।

मानव मन, हार्मोन्स और स्नायु तंत्र पर ग्रहों का जैविक प्रभाव

आधुनिक न्यूरोबायोलॉजी और मनोदैहिक चिकित्सा विज्ञान इस बात को स्पष्ट रूप से प्रमाणित करते हैं कि वायुमंडलीय विद्युत चुंबकीय तरंगों में आने वाला कोई भी परिवर्तन मानव मस्तिष्क के न्यूरोट्रांसमीटर्स को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। होलाष्टक के 8 दिनों में जब सौरमंडल के ग्रह अपनी उग्र कक्षा में संचरण करते हैं, तो मानव मस्तिष्क की पीनियल ग्रंथि और पिट्यूटरी ग्रंथि से होने वाले स्राव में तेजी से उतार चढ़ाव आता है।

ग्रहों के इस उपद्रव के कारण मस्तिष्क में कोर्टिसोल और एड्रेनालाईन जैसे तनाव उत्पन्न करने वाले हार्मोन्स का स्तर अचानक बढ़ जाता है। इसके विपरीत, मानसिक शांति और उल्लास प्रदान करने वाले सेरोटोनिन और डोपामाइन का संतुलन बिगड़ जाता है। इसी जैविक और रासायनिक असंतुलन का परिणाम होता है कि इन 8 दिनों में सामान्य व्यक्ति भी चिड़चिड़ा, शक्की, भयभीत और अनिद्रा का शिकार हो जाता है। स्नायु तंत्र की इस संवेदनशीलता के कारण मनुष्य की निर्णय लेने की क्षमता लगभग 90 प्रतिशत तक क्षीण हो जाती है। जब चित्त ही स्थिर नहीं होगा, तो उस समय किए गए विवाह, गृह प्रवेश अथवा नवीन व्यापारिक समझौतों का भविष्य अंधकारमय ही होगा। इसलिए वैदिक ऋषियों ने इस अवधि में बाह्य कर्मों को विराम देकर अंतर्मुखी साधना का विधान बनाया था।

मांगलिक कार्यों में विफलता और पंचांगीय निषेध का तर्क

सनातन धर्म का कोई भी नियम अंधविश्वास पर आधारित नहीं है। होलाष्टक में 16 संस्कारों और नवीन कार्यों के निषेध के पीछे अत्यंत ठोस तर्क उपस्थित हैं। जब नवग्रह ही उग्र हों, तो किसी भी शुभ कार्य के लिए आवश्यक शुभ लग्न, स्थिर नक्षत्र और शुभ मुहूर्त की प्राप्ति हो ही नहीं सकती। विवाह दो आत्माओं का ऐसा स्थायी मिलन है जिसके लिए वर और वधू दोनों की मानसिक शांति, दीर्घायु और भावनात्मक परिपक्वता आवश्यक होती है। यदि होलाष्टक के दौरान विवाह संपन्न किया जाए, तो चंद्रमा और शुक्र की उग्रता के कारण दांपत्य जीवन में सदैव कलह, अविश्वास और विच्छेद की आशंका बनी रहती है।

मांगलिक कार्य होलाष्टक में आरंभ का परिणाम पंचांगीय व ज्योतिषीय कारण
विवाह संस्कार दांपत्य कलह, अविश्वास, विच्छेद का भय शुक्र और चंद्रमा की उग्रता से आकर्षण का क्षरण
नवीन गृह प्रवेश घर में अशांति, रोग, वास्तु ऊर्जा में दोष शनि और राहु के कारण नकारात्मक तरंगों का वास
नवीन व्यापार आरंभ आकस्मिक घाटा, साझेदारों में विवाद बुध और गुरु की उग्रता से व्यापारिक विवेक हीनता
मुंडन व नामकरण बालक के स्वास्थ्य में निरंतर विकार सूर्य और मंगल के प्रभाव से जीवन शक्ति का क्षरण

इसी प्रकार जब कोई व्यक्ति होलाष्टक के दौरान नए घर में प्रवेश करता है, तो शनि और राहु की उग्र ऊर्जा उस भवन की दीवारों और नींव में समा जाती है, जिससे उस घर में रहने वाले सदस्यों को निरंतर रोग, अशांति और आर्थिक हानि का सामना करना पड़ता है। नए व्यापार की शुरुआत करने पर बुध और गुरु के दोष के कारण पूंजी डूबने की आशंका प्रबल रहती है। इसलिए इन आठ दिनों में अपने धन और श्रम को जोखिम में डालने के स्थान पर यथास्थिति बनाए रखना ही बुद्धिमानी मानी गई है।

होलाष्टक में ग्रहों की उग्रता शांत करने के सुरक्षात्मक ज्योतिषीय उपाय

होलाष्टक का समय जहां एक ओर सांसारिक कार्यों के लिए वर्जित है, वहीं दूसरी ओर यह समय ग्रहों के अशुभ प्रभावों को काटकर अपनी जन्म कुंडली को बलवान बनाने का स्वर्णिम अवसर भी प्रदान करता है। जो व्यक्ति इस अवधि में विशिष्ट वैदिक और तांत्रिक उपाय करते हैं, उनके जीवन के समस्त ग्रह दोष अमृत में परिवर्तित हो जाते हैं।

  • अष्टमी के दिन चंद्रमा को शांत करने के लिए शिवलिंग पर कच्चा दूध और मिश्री अर्पित करें तथा ॐ सों सोमाय नमः का जप करें।
  • नवमी के दिन सूर्य देव की कृपा प्राप्त करने के लिए तांबे के लोटे से जल चढ़ाएं और गाय को गुड़ व गेहूं खिलाएं।
  • दशमी के दिन शनि देव के प्रकोप से बचने के लिए पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं और छाया दान करें।
  • एकादशी के दिन शुक्र ग्रह की अनुकूलता के लिए श्री सूक्त का पाठ करें और कन्याओं को दूध की बनी खीर का दान करें।
  • द्वादशी के दिन देवगुरु बृहस्पति को प्रसन्न करने के लिए भगवान विष्णु को पीले फूल और चने की दाल अर्पित करें।
  • त्रयोदशी के दिन बुध ग्रह के दोष निवारण के लिए गणेश जी को 21 दूर्वा चढ़ाएं और मूंग की दाल का दान करें।
  • चतुर्दशी के दिन मंगल की शांति के लिए हनुमान चालीसा अथवा सुंदरकांड का पाठ करें और सिंदूर का लेप लगाएं।
  • पूर्णिमा के दिन राहु के भ्रम से बचने के लिए एक सूखा नारियल अपने सिर से 7 बार उतारकर होलिका की पावन अग्नि में समर्पित कर दें।

उग्र ऊर्जा का आध्यात्मिक रूपांतरण और आत्मिक जागृति

होलाष्टक हमें यह सिखाता है कि ब्रह्मांड की कोई भी ऊर्जा वस्तुतः बुरी या विनाशकारी नहीं होती, केवल उसका उपयोग करने की विधि सही होनी चाहिए। जब समुद्र में तूफान आता है, तो एक कुशल नाविक अपनी नाव को किनारे पर बांधकर शांत बैठ जाता है, वह समुद्र से लड़ने का प्रयास नहीं करता। उसी प्रकार होलाष्टक के दिनों में जब ब्रह्मांडीय ऊर्जा का तूफान चल रहा हो तब सांसारिक गतिविधियों को रोककर अपनी आत्मा की नाव को ईश्वर के चरणों के खूंटे से बांध देना चाहिए।

इन 8 दिनों में किया गया ध्यान, प्राणायाम, मंत्र जप और स्वाध्याय मनुष्य की चेतना को भौतिक स्तर से उठाकर आध्यात्मिक स्तर पर पहुंचा देता है। जब उग्र ग्रह अपनी रश्मियां फेंकते हैं तब उस ऊर्जा को अपनी कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करने के लिए ईंधन की भांति उपयोग किया जा सकता है। भक्त प्रह्लाद ने ठीक यही किया था। उन्होंने बाहर की यातनाओं की चिंता नहीं की, उन्होंने अपनी संपूर्ण ऊर्जा को भीतर नारायण के स्मरण में लगा दिया और अंततः विजयी हुए। होलाष्टक प्रत्येक साधक को प्रह्लाद की भांति निष्काम, निर्भय और अखंड आत्मिक बल से संपन्न होने का पावन निमंत्रण देता है।

FAQ

होलाष्टक में नवग्रह क्यों उग्र माने जाते हैं?
फाल्गुन के इस संधिकाल में सौरमंडल का संतुलन बदलता है जिससे प्रतिदिन एक विशिष्ट ग्रह अपनी अत्यंत तीव्र और प्रतिकूल कक्षा में संचरण करता है।

होलाष्टक के दौरान कौन से ग्रह किस दिन उग्र होते हैं?
अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहु उग्र रहते हैं।

ग्रहों की उग्रता का मानव मस्तिष्क पर क्या जैविक प्रभाव पड़ता है?
ग्रहों की उग्रता से कोर्टिसोल जैसे तनाव हार्मोन बढ़ते हैं, सेरोटोनिन घटता है और निर्णय लेने की क्षमता अत्यंत कमजोर हो जाती है।

होलाष्टक के 8 दिनों में नए कार्यों को शुरू करने से क्या हानि होती है?
इन दिनों में ग्रहों की प्रतिकूलता के कारण नए कार्यों में विफलता, आर्थिक हानि, कानूनी बाधाएं और मानसिक तनाव की संभावना 90 प्रतिशत बढ़ जाती है।

होलाष्टक में ग्रहों की शांति के लिए सबसे अचूक उपाय क्या है?
प्रतिदिन महामृत्युंजय मंत्र का जप करना, तिथि अनुसार ग्रह दान करना और होलिका दहन में नारियल अर्पित करना सबसे अचूक उपाय है।

पाएं अपनी सटीक कुंडली

कुंडली बनाएं

क्या आपको यह पसंद आया?

लेखक

पं. संजीव शर्मा

पं. संजीव शर्मा (63)


अनुभव: 20

इनसे पूछें: Family Planning, Career

इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें

WELCOME TO

ZODIAQ

Right Decisions at the right time with ZODIAQ