होलिका भस्म के चमत्कारी प्रयोग क्या हैं?

By पं. नरेंद्र शर्मा

नजर दोष, तंत्र बाधा और वास्तु दोष निवारण के गुप्त टोटके

होलिका भस्म के उपाय: नजर दोष, वास्तु और धन लाभ

भस्म का तात्विक उद्भव और वैदिक पंचांग पृष्ठभूमि

फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि पर संपन्न होने वाला होलिका दहन केवल एक पारंपरिक अनुष्ठान नहीं है अपितु यह तंत्र और मंत्र शास्त्र की एक परम सिद्ध निशा है। शास्त्रों में फाल्गुन पूर्णिमा की महारात्रि को कालरात्रि और मोहरात्रि के समान ही ऊर्जावान स्वीकार किया गया है। जब सहस्रों वैदिक ऋचाओं, औषधीय समिधाओं, गाय के गोबर से बने बड़कुल्लों और जनसामान्य की आस्था के संयोग से होलिका की ज्वाला प्रज्वलित होती है तब वह साधारण अग्नि न रहकर एक दिव्य ब्रह्मांडीय शोधक बन जाती है। इस पावन अग्नि के शांत होने के पश्चात जो राख शेष बचती है, उसे सनातन तंत्र में होलिका भस्म अथवा सिद्ध भस्म कहा जाता है।

पंचांग घटक शास्त्रीय विवरण
मास एवं पक्ष फाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष
पावन तिथि पूर्णिमा तिथि के उपरांत चैत्र कृष्ण प्रतिपदा प्रभात
भस्म संग्रहण वेला सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त काल
अधिष्ठाता शक्तियां अग्नि देव, भगवान नृसिंह, भैरव और कुलदेवता
तात्विक स्वरूप अग्नि तत्त्व और पृथ्वी तत्त्व का संयुक्त सार
मुख्य उपयोग नजर दोष निवारण, वास्तु शुद्धि, धन आकर्षण, अकाल मृत्यु रक्षा
आध्यात्मिक फल समस्त तामसिक तरंगों का भस्म होना और आत्मबल का विस्तार

इस सिद्ध भस्म का संपूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए साधक को होलिका दहन की अगली सुबह अर्थात धुलेंडी के ब्रह्म मुहूर्त में ही विशिष्ट शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।

  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व शुद्ध शीतल जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करना और सात्विक वस्त्र धारण करना।
  • किसी स्वच्छ ताम्र पात्र अथवा नवीन मिट्टी के कलश को लेकर होलिका दहन स्थल पर मौन रहकर जाना।
  • अग्नि स्थल को प्रणाम करके सात बार ॐ अग्नये नमः मंत्र का उच्चारण करते हुए भूमि को स्पर्श करना।
  • शांत चित्त से केवल वही भस्म एकत्रित करना जो शीतल हो चुकी हो और जिसमें औषधीय काष्ठ का अंश हो।
  • भस्म को घर लाते समय पीछे मुड़कर न देखना और मार्ग में किसी से अनावश्यक वार्तालाप न करना।
  • घर के मुख्य द्वार पर पहुंचकर उस भस्म पात्र पर गंगाजल की कुछ बूंदें छिड़ककर शुद्धिकरण करना।
  • पूजा घर में भगवान लक्ष्मीनारायण अथवा नृसिंह देव के चरणों के समीप इस भस्म को स्थापित करना।
  • संपूर्ण वर्ष इस भस्म को किसी पवित्र और स्वच्छ स्थान पर सुरक्षित रखना ताकि आवश्यकता पड़ने पर इसका उपयोग किया जा सके।

नजर दोष और बाल रक्षा हेतु तांबे के ताबीज का विधान

अथर्ववेद और तंत्र ग्रंथों में नकारात्मक दृष्टि अर्थात नजर दोष को एक अत्यंत घातक सूक्ष्म ऊर्जा माना गया है। जब किसी ईर्ष्यालु व्यक्ति की नकारात्मक तरंगें किसी सुकोमल बालक, गर्भवती स्त्री अथवा उन्नति करते हुए व्यक्ति पर पड़ती हैं, तो उसका आभामंडल क्षत विक्षत हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप बालक अकारण रोने लगता है, दूध पीना छोड़ देता है और उसकी पाचन क्रिया बिगड़ जाती है। प्रौढ़ व्यक्तियों में नजर दोष के कारण कार्य व्यवसाय में आकस्मिक रुकावटें और गंभीर सिरदर्द उत्पन्न होने लगता है।

होलिका की पवित्र भस्म नकारात्मक ऊर्जा को सोखने का सबसे अचूक साधन मानी गई है। इस भस्म से बाल रक्षा कवच बनाने का विधान अत्यंत सरल और प्रामाणिक है।

  • चैत्र कृष्ण प्रतिपदा अथवा किसी भी शुभ मंगलवार के दिन एक शुद्ध तांबे का ताबीज लेकर आएं।
  • उस ताबीज को पंचामृत और गंगाजल से धोकर पूजा वेदी पर स्थापित करें।
  • होलिका की भस्म में एक चुटकी पीली सरसों, एक छोटा टुकड़ा श्वेत अर्क की जड़ और एक बूंद शुद्ध गाय का घी मिलाएं।
  • इस मिश्रण को तांबे के ताबीज के भीतर श्रद्धापूर्वक भरें और ऊपर से तांबे का ढक्कन बंद कर दें।
  • ताबीज के सम्मुख बैठकर 108 बार ॐ नृसिंहाय नमः अथवा ॐ हं हनुमते नमः मंत्र का स्पष्ट जप करें।
  • इसके पश्चात उस ताबीज को लाल अथवा काले रेशमी धागे में पिरोकर पीड़ित बालक अथवा व्यक्ति के गले में धारण करा दें।
  • इस ताबीज के स्पर्श मात्र से शरीर के चारों ओर एक सुरक्षा कवच निर्मित हो जाता है जो किसी भी प्रकार की तंत्र बाधा, ऊपरी हवा और नजर दोष को पास नहीं आने देता।

गृह वास्तु दोष और नकारात्मक ऊर्जा का समूल शमन

वास्तु शास्त्र के अनुसार जिस भवन में भूमिगत ऊर्जा दूषित होती है अथवा दिशाओं का संतुलन बिगड़ा होता है, वहां निवास करने वाले प्राणी निरंतर मानसिक तनाव, असाध्य रोगों और आर्थिक तंगी से घिरे रहते हैं। कई बार गृह निर्माण के समय हुए वास्तु दोषों को तोड़फोड़ किए बिना ठीक करना असंभव प्रतीत होता है। ऐसी स्थिति में होलिका की भस्म एक दिव्य वास्तु शोधक औषधि के रूप में कार्य करती है।

वास्तु दिशा संभावित दोष लक्षण भस्म उपयोग का शास्त्रीय उपाय अपेक्षित सकारात्मक फल
ईशान कोण पूर्वोत्तर बुद्धि भ्रम, पूजा में मन न लगना, वंश वृद्धि में बाधा भस्म मिश्रित गंगाजल का कलश स्थापित करना सात्विक ऊर्जा का प्रवाह व शांति
आग्नेय कोण दक्षिण पूर्व अकारण क्रोध, अग्नि भय, स्त्रियों का निरंतर रोग भस्म को तांबे के पात्र में रखकर स्थापित करना कलह का अंत व शारीरिक स्वास्थ्य
नैऋत्य कोण दक्षिण पश्चिम अकाल मृत्यु भय, स्थिरता की कमी, भारी आर्थिक घाटा भस्म को मिट्टी के सकोरे में दबाकर भूमि में रखना पितृ शांति, स्थायित्व व सुरक्षा
वायव्य कोण उत्तर पश्चिम संबंध विच्छेद, व्यापार में धोखा, कानूनी विवाद भस्म और कपूर की धूनी निरंतर देना मित्रों का सहयोग व विवाद मुक्ति

भवन की संपूर्ण नकारात्मकता को नष्ट करने के लिए एक अन्य अत्यंत प्रभावशाली प्रयोग किया जाता है। पूर्णिमा के अगले दिन प्रातः काल एक बाल्टी शुद्ध जल में दो चुटकी होलिका भस्म और थोड़ा सा सेंधा नमक मिला लें। इस जल से संपूर्ण घर के फर्श पर पोछा लगाएं। इसके साथ ही घर के चारों मुख्य कोनों में एक एक चुटकी भस्म डालकर ॐ वास्तुपुरुषाय नमः मंत्र का उच्चारण करें। यह प्रयोग भवन के भीतर वर्षों से संचित प्रेत बाधा, अशांति और नकारात्मक तरंगों को तत्काल निष्कासित कर देता है।

आर्थिक समृद्धि और तिजोरी में भस्म रखने का गुप्त तंत्र

दरिद्रता और निरंतर होने वाले धन के अपव्यय से मुक्ति पाने के लिए होलिका भस्म का प्रयोग सनातन तंत्र में अत्यंत गोपनीय और फलदायी स्वीकार किया गया है। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में धन भाव अर्थात दूसरा भाव और लाभ भाव अर्थात 11वां भाव पाप ग्रहों से पीड़ित हो, तो व्यक्ति के पास धन टिकता नहीं है। अनावश्यक खर्चे और आकस्मिक विपत्तियां संचित पूंजी को नष्ट कर देती हैं।

होलिका भस्म धन को बांधने और तिजोरी में लक्ष्मी के स्थायी वास को सुनिश्चित करने की अद्भुत क्षमता रखती है। इस अनुष्ठान को चैत्र कृष्ण प्रतिपदा अथवा आगामी किसी भी शुक्रवार के दिन संपन्न किया जा सकता है।

  • एक सवा मीटर शुद्ध लाल रेशमी अथवा सूती वस्त्र लेकर उसे गंगाजल से पवित्र करें।
  • उस वस्त्र के मध्य में होलिका की थोड़ी सी पवित्र भस्म रखें।
  • उस भस्म के ऊपर 7 गोमती चक्र, 7 पीली कौड़ियां, 1 तांबे का सिक्का और 1 हल्दी की साबुत गांठ स्थापित करें।
  • माता महालक्ष्मी के सम्मुख बैठकर कनकधारा स्तोत्र अथवा श्री सूक्त का कम से कम 3 बार पाठ करें।
  • पाठ के उपरांत उस लाल वस्त्र को एक सुंदर पोटली का रूप देकर मौली के धागे से सात गांठें लगाकर बांध दें।
  • इस पोटली को धूप और दीप दिखाकर अपने व्यापार स्थल के गल्ले अथवा घर की मुख्य तिजोरी में उत्तर दिशा की ओर मुख करके रख दें।
  • यह तांत्रिक उपाय तिजोरी के भीतर कुबेर और लक्ष्मी के सूक्ष्म तत्त्व को आकर्षित करता है जिससे अनावश्यक व्यय तुरंत रुक जाता है और व्यापार में अप्रत्याशित वृद्धि होने लगती है।

अकाल मृत्यु भय निवारण और महामृत्युंजय तिलक विधान

गरुड़ पुराण और शिव महापुराण में वर्णन मिलता है कि भगवान शिव को भस्म अत्यंत प्रिय है क्योंकि भस्म इस नश्वर संसार के अंतिम सत्य का प्रतीक है। होलिका की भस्म को साक्षात भगवान शिव के तीसरे नेत्र की क्रोधाग्नि से उत्पन्न भस्म के समान माना जाता है। जो जातक निरंतर अज्ञात भय, दुःस्वप्न, अकाल मृत्यु की आशंका अथवा गंभीर रोगों से त्रस्त रहते हैं, उनके लिए इस भस्म का तिलक एक संजीवनी कवच सिद्ध होता है।

प्रतिदिन प्रातः काल स्नान करने के पश्चात तांबे अथवा चांदी की डिबिया में रखी होलिका भस्म में से एक चुटकी भस्म अपनी अनामिका उंगली पर लें। उस भस्म को अपने बाएं हाथ की हथेली पर रखकर उसमें थोड़ा सा शुद्ध गंगाजल मिलाएं। इसके पश्चात ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् मंत्र का तीन बार उच्चारण करते हुए अपने मस्तक पर त्रिपुंड अथवा एक गोल तिलक लगाएं। इसी भस्म का स्पर्श अपने कंठ और दोनों भुजाओं पर भी करें।

यह तिलक साधक के आज्ञा चक्र को शांत करता है और मस्तिष्क की उत्तेजना को नियंत्रित करता है। जो व्यक्ति इस भस्म का तिलक धारण करके किसी महत्वपूर्ण कार्य, न्यायिक विवाद अथवा साक्षात्कार के लिए जाता है, उसका व्यक्तित्व सम्मोहक बन जाता है और उसे सर्वत्र विजय प्राप्त होती है। तंत्र शास्त्र के अनुसार इस भस्म का तिलक धारण करने वाले मनुष्य के समीप कोई भी पिशाच, डाकनी अथवा मारक शक्ति फटक भी नहीं सकती।

भस्म के प्रयोग में रखी जाने वाली सावधानियां और मर्यादाएं

होलिका भस्म कोई साधारण वस्तु नहीं है, यह एक जाग्रत तांत्रिक द्रव्य है। अतः इसका प्रयोग करते समय साधक को कुछ मूलभूत सावधानियों का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है।

  • यह भस्म केवल उसी होलिका की होनी चाहिए जिसका दहन पूर्णतः शास्त्र सम्मत विधि से और भद्रा रहित काल में हुआ हो।
  • जिस होलिका में प्लास्टिक, टायर, रबर अथवा अपवित्र वस्तुएं जलाई गई हों, उसकी राख का तांत्रिक प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए क्योंकि वह नकारात्मक फल दे सकती है।
  • भस्म को सदैव भूमि से ऊपर किसी शुद्ध काष्ठ की चौकी अथवा पूजा घर की अलमारी में ही रखना चाहिए, इसे कभी अपवित्र हाथों से न छुएं।
  • यदि किसी कारणवश भस्म दूषित हो जाए अथवा लंबे समय तक रखी रहे, तो उसे कूड़े में फेंकने के स्थान पर किसी बहती हुई पवित्र नदी अथवा पीपल के वृक्ष की जड़ में विसर्जित कर देना चाहिए।
  • इन प्रयोगों को करते समय मन में पूर्ण सात्विकता, प्राणी मात्र के प्रति दया और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास होना अनिवार्य है।

FAQ

होलिका दहन की भस्म को घर लाने का सबसे सही समय कौन सा है?
होलिका दहन के अगले दिन प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में जब अग्नि शांत हो जाए तब मौन रहकर भस्म लाना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

क्या होलिका भस्म का तिलक प्रतिदिन लगाया जा सकता है?
हाँ, प्रतिदिन स्नान के पश्चात महामृत्युंजय मंत्र का उच्चारण करते हुए इस भस्म का तिलक मस्तक और कंठ पर लगाने से भय और नकारात्मकता दूर रहती है।

वास्तु दोष दूर करने के लिए भस्म का उपयोग कैसे किया जाता है?
घर के चारों कोनों में एक एक चुटकी भस्म डालने और पोछे के पानी में भस्म व सेंधा नमक मिलाकर घर की सफाई करने से वास्तु दोष शांत होते हैं।

बच्चों के नजर दोष के लिए ताबीज में भस्म के साथ क्या भरना चाहिए?
तांबे के ताबीज में होलिका भस्म के साथ पीली सरसों, श्वेत अर्क की जड़ और एक बूंद गाय का घी भरकर धारण कराना चाहिए।

क्या तिजोरी में भस्म रखने से सचमुच धन लाभ होता है?
हाँ, लाल कपड़े में भस्म के साथ गोमती चक्र और पीली कौड़ियां बांधकर तिजोरी में रखने से धन का अपव्यय रुकता है और आर्थिक स्थिरता आती है।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

पं. नरेंद्र शर्मा (63)


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इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

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