होलिका दहन का तांत्रिक रहस्य क्या है?

By पं. अमिताभ शर्मा

नवान्नेष्टि यज्ञ, भद्रा काल परिहार और भस्म के अचूक प्रयोग

होलिका दहन: मुहूर्त नियम, भद्रा काल, कथा और भस्म के उपाय

पंचांग विवरण और नवान्नेष्टि यज्ञ की वैदिक पृष्ठभूमि

फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि सनातन वैदिक काल गणना में वर्ष की अंतिम और सर्वाधिक ऊर्जावान पूर्णिमा मानी जाती है। इसी पावन निशा पर संपूर्ण भारतवर्ष में होलिका दहन का महापर्व अत्यंत श्रद्धा, उल्लास और वैदिक विधि से संपन्न किया जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार यह तिथि शिशिर ऋतु के विसर्जन और वसंत ऋतु के चरमोत्कर्ष का संधिकाल है। ऋग्वेद और शतपथ ब्राह्मण में इस पर्व का मूल स्वरूप नवान्नेष्टि यज्ञ के रूप में वर्णित मिलता है। नवान्नेष्टि का शाब्दिक अर्थ नवीन अन्न का प्रथम यज्ञीय संस्कार होता है। शीतकाल की प्रमुख रबी फसलें विशेष रूप से गेहूं, चना, जौ और सरसों जब खेतों में पककर तैयार हो जाती हैं तब सनातन परंपरा के अनुसार गृहस्थ उस नवीन धान्य का उपभोग करने से पूर्व उसे देवयज्ञ की पावन अग्नि में समर्पित करता है।

पंचांग घटक शास्त्रीय विवरण
मास एवं पक्ष फाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष
पावन तिथि शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तिथि (प्रदोष व्यापिनी)
नक्षत्र संबंध उत्तराफाल्गुनी अथवा पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र
मुख्य काल भद्रा रहित प्रदोष काल अथवा निशीथ काल
अधिष्ठाता शक्तियां अग्नि देव, भगवान नृसिंह, भक्त प्रह्लाद
प्रमुख आहुति द्रव्य नवीन गेहूं व चने की बालियां, कपूर, काले तिल, सरसों
मुख्य आध्यात्मिक फल आसुरी शक्तियों का नाश, धन धान्य वृद्धि और वास्तु शुद्धि

होलिका दहन के पावन अवसर पर अग्नि देव की कृपा प्राप्त करने और समस्त नकारात्मक शक्तियों से परिवार की रक्षा हेतु साधक को प्रातः काल से ही विशिष्ट शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।

  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगाजल मिले शीतल जल से स्नान करना और श्वेत अथवा पीत वस्त्र धारण करना।
  • पूर्णिमा तिथि के उपलक्ष्य में भगवान लक्ष्मीनारायण अथवा उग्र नृसिंह देव के सम्मुख सत्यनारायण व्रत का संकल्प लेना।
  • होलिका निर्माण स्थल पर जाकर भूमि को गोमय अथवा गंगाजल से पवित्र करके मध्य में गूलर अथवा एरंड की शाखा स्थापित करना।
  • उस शाखा के चारों ओर गाय के गोबर से बने बड़कुल्ले, उपले, सूखे पलाश की समिधा और औषधीय लकड़ियां चुनना।
  • भद्रा काल की समाप्ति की प्रतीक्षा करना और प्रदोष काल में शुभ लग्न उपस्थित होने पर ही अग्नि प्रज्वलित करना।
  • अग्नि प्रज्वलित करने के उपरांत तांबे के पात्र से जल की तीन अथवा सात बार अविरल धारा छोड़ते हुए परिक्रमा करना।
  • पावन ज्वाला में नवीन गेहूं की हरी बालियां, चना, भुनी हुई धान की खील, काले तिल और बताशे समर्पित करना।
  • दहन के पश्चात अग्नि देव को नमन करके प्रार्थना करना कि हमारे भीतर की समस्त तामसिक वृत्तियां जलकर भस्म हो जाएं।

भद्रा काल का परिहार और दहन का सटीक मुहूर्त विज्ञान

वैदिक ज्योतिष में किसी भी मांगलिक अथवा यज्ञीय कार्य के लिए भद्रा का त्याग अनिवार्य माना गया है। भद्रा सूर्य देव की पुत्री और कर्म फल दाता शनि देव की सहोदरा बहन हैं। इनका स्वभाव अत्यंत तीक्ष्ण, उग्र और संहारक माना गया है। मुहूर्त चिंतामणि और निर्णय सिंधु जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में यह स्पष्ट नियम उल्लिखित है कि भद्रा में दो कार्य कभी नहीं करने चाहिए: श्रावणी अर्थात रक्षाबंधन का पर्व और फाल्गुनी अर्थात होलिका का दहन। यदि अज्ञानवश अथवा प्रमादवश भद्रा काल के भीतर होलिका दहन कर दिया जाए, तो उस नगर, समाज और राष्ट्र पर भयंकर अनिष्ट, महामारी, अकाल और युद्ध की विभीषिका टूट पड़ती है।

होलिका दहन के लिए फाल्गुन पूर्णिमा की प्रदोष व्यापिनी तिथि को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। प्रदोष काल सूर्यास्त के ठीक बाद के 2 घंटे 24 मिनट की अवधि को कहा जाता है। यदि प्रदोष काल में भद्रा उपस्थित हो, तो भद्रा के मुख का पूर्ण परित्याग करके भद्रा की पूंछ के समय दहन किया जा सकता है। परंतु यदि भद्रा पूरी रात्रि व्याप्त रहे, तो भद्रा की समाप्ति के पश्चात ही मध्यरात्रि में होलिका प्रज्वलित करने का शास्त्रीय आदेश है। जब शुभ नक्षत्र और भद्रा मुक्त लग्न में अग्नि प्रज्वलित होती है तब वह अग्नि कल्याणकारी और समस्त अमंगलों को हरने वाली बन जाती है।

हिरण्यकश्यप, होलिका और प्रह्लाद की कथा का तात्विक अर्थ

श्रीमद्भागवत महापुराण के सप्तम स्कंध में होलिका दहन का जो ऐतिहासिक आख्यान प्राप्त होता है, वह मानव चेतना के रूपांतरण की एक अत्यंत गहरी आध्यात्मिक गाथा है। दैत्यराज हिरण्यकश्यप स्थूल भौतिकवाद, निरंकुश सत्ता और शारीरिक अहंकार का प्रतीक है। उसकी बहन होलिका, जिसे ब्रह्मा जी से यह दिव्य चादर अथवा वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसे कभी जला नहीं सकती, वह मिथ्या सुरक्षा और अधर्म के बल पर प्राप्त वरदानों के दुरुपयोग का प्रतीक है। इसके विपरीत बालक प्रह्लाद निष्काम प्रेम, निरहंकारिता और ईश्वर के प्रति अनन्य आत्मसमर्पण के जीवंत विग्रह हैं।

फाल्गुन पूर्णिमा के दिन जब हिरण्यकश्यप के आदेश पर होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर प्रज्वलित चिता पर बैठी तब उस समय एक अत्यंत विलक्षण खगोलीय और आध्यात्मिक घटना घटी। प्रह्लाद ने अपनी आंखें बंद करके निरंतर ॐ नमो नारायणाय मंत्र का स्मरण किया। उसी क्षण प्रभु की प्रेरणा से एक तीव्र आंधी चली जिससे होलिका के शरीर से वह दिव्य चादर उड़कर प्रह्लाद के ऊपर आ गिरी।

अधर्म और अहंकार के सहारे बैठी होलिका उसी ज्वाला में जलकर राख का ढेर बन गई, जबकि भगवान के नाम का संकीर्तन करते हुए प्रह्लाद सुरक्षित बाहर निकल आए। यह आख्यान हमें यह सनातन सत्य सिखाता है कि अधर्म के साधन चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, वे अंततः स्वयं के विनाश का कारण बनते हैं। जब कोई साधक परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पित होता है, तो भौतिक प्रकृति के नियम भी उसके कल्याण के लिए अपने स्वभाव को बदल देते हैं।

पौराणिक प्रतीक आध्यात्मिक तत्त्व मानव चेतना का आयाम साधना द्वारा रूपांतरण
दैत्यराज हिरण्यकश्यप स्थूल अहंकार व देह बुद्धि संसार को भोगने की अंधी लालसा वैराग्य द्वारा अहंकार का विसर्जन
पापिनी होलिका मिथ्या सुरक्षा व वरदान का दुरुपयोग अधर्म पर आधारित स्वार्थ सत्य के प्रकाश में दुर्गुणों का दहन
भक्त प्रह्लाद विशुद्ध चित्त व निष्काम शरणागति आत्मा का परमात्मा से अनन्य संबंध अखंड विश्वास व अभय पद की प्राप्ति
पवित्र अग्नि ज्वाला ज्ञान की तीसरी आंख व शोधन तमस से सत्व की ओर आरोहण समस्त संचित कर्मों की पूर्ण भस्म

होलिका भस्म का तांत्रिक विज्ञान और नकारात्मक ऊर्जा निवारण

तंत्र शास्त्र और वास्तु विज्ञान में होलिका दहन की रात्रि को महारात्रियों कालरात्रि, मोहरात्री और शिवरात्रि के समकक्ष एक परम सिद्ध रात्रि स्वीकार किया गया है। होलिका की पावन अग्नि कोई साधारण भौतिक आग नहीं है, यह सहस्रों वैदिक मंत्रों, औषधीय समिधाओं और जनमानस की आस्था से जाग्रत एक दिव्य ऊर्जा पुंज है। इस अग्नि से उत्पन्न होने वाली भस्म को शास्त्रों में अत्यंत चमत्कारी, कीटाणुरोधक और नकारात्मक ऊर्जा का संहारक माना गया है।

दहन के अगले दिन प्रातः काल जब होलिका की अग्नि शांत हो जाए तब स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनकर उस पवित्र भस्म को तांबे अथवा मिट्टी के नए पात्र में घर लाना चाहिए। इस भस्म के शास्त्रीय और तांत्रिक प्रयोग अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध होते हैं।

  • इस पावन भस्म का नियमित रूप से ललाट और कंठ पर त्रिपुंड लगाने से नजर दोष, सम्मोहन, अज्ञात भय और तंत्र बाधाएं तत्काल शांत हो जाती हैं।
  • यदि घर में निरंतर अशांति रहती हो अथवा वास्तु दोष के कारण प्रगति रुकी हो, तो इस भस्म को थोड़ा सा गंगाजल में मिलाकर घर के चारों कोनों में छिड़कना चाहिए।
  • व्यापार स्थल के गल्ले अथवा घर की तिजोरी में इस भस्म को लाल वस्त्र में लपेटकर रखने से धन का अपव्यय रुकता है और बरकत बनी रहती है।
  • जो जातक लंबे समय से किसी अज्ञात अथवा असाध्य रोग से पीड़ित हों, उन्हें तांबे के लोटे में जल भरकर उसमें एक चुटकी भस्म डालकर सूर्य देव का ध्यान करते हुए वह जल ग्रहण करना चाहिए।
  • कुंडली में स्थित कालसर्प दोष अथवा राहु केतु के अशुभ प्रभाव को शांत करने के लिए इस भस्म से शिवलिंग का अभिषेक करना अत्यंत फलदायी होता है।

होलिका अग्नि में आहुति देने की शास्त्रीय विधि और सामग्री

होलिका दहन की अग्नि में केवल लकड़ियां जलाना ही पर्याप्त नहीं होता, अपितु उसमें विशिष्ट औषधीय द्रव्यों की आहुतियां देने का विधान है। यह आहुतियां वायुमंडल को शुद्ध करती हैं और साधक के सूक्ष्म शरीर को आरोग्य प्रदान करती हैं।

  • सर्वप्रथम सात प्रकार के अनाजों गेहूं, जौ, चना, मूंग, उड़द, चावल और तिल को मिलाकर एक पात्र में रखें।
  • जब अग्नि प्रज्वलित हो जाए तब दोनों हाथों से इस सप्तधान्य की अंजलि भरकर ॐ अग्नये स्वाहा मंत्र बोलते हुए आहुति दें।
  • इसके पश्चात एक सूखे नारियल के भीतर थोड़ा सा गाय का शुद्ध घी, काले तिल, जौ और मिश्री भरकर उसे अग्नि के मध्य में समर्पित करें। यह आहुति साधक के संपूर्ण वर्ष के कष्टों को भस्म कर देती है।
  • वातावरण से नकारात्मक जीवाणुओं को नष्ट करने के लिए गाय के उपलों के साथ गूगल, लोबान, कपूर और पीली सरसों की आहुतियां समर्पित करें।
  • अग्नि की परिक्रमा करते समय गेहूं और चने की हरी बालियों को आग की लौ में हल्का सा भून लें।
  • इस भुनी हुई बाली के दानों को घर के सभी सदस्यों में प्रसाद के रूप में बांटें। इसे आयुर्वेद में नवान्न भक्षण कहा जाता है, जो आने वाले ग्रीष्म काल के लिए शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ बनाता है।

आंतरिक विकारों का दहन और चैत्र नववर्ष का स्वागत

होलिका दहन का बाह्य उत्सव वस्तुतः मनुष्य के भीतर चलने वाले आंतरिक संग्राम की परिणति है। प्रत्येक मनुष्य के हृदय में एक हिरण्यकश्यप बैठा है जो अहंकार करता है, एक होलिका बैठी है जो दूसरों का अहित करने की योजना बनाती है और एक प्रह्लाद बैठा है जो प्रभु से जुड़ना चाहता है। होलिका दहन की पावन अग्नि हमें यह आह्वान करती है कि हम बाहर लकड़ियों को जलाने के साथ साथ अपने भीतर की ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ और हीन भावना की आहुति भी उस परम ज्योति में समर्पित कर दें।

जब तक मनुष्य अपने अंतःकरण को इन विकारों से मुक्त नहीं कर लेता तब तक अगले दिन खेले जाने वाले रंगोत्सव का कोई आध्यात्मिक अर्थ नहीं रह जाता। रंग तभी चढ़ता है जब वस्त्र पूरी तरह स्वच्छ हो। उसी प्रकार ईश्वर के प्रेम का रंग भी उसी चित्त पर ठहरता है जो विकारों से मुक्त हो चुका हो। होलिका दहन के साथ ही हिन्दू वर्ष के 12वें मास का संपूर्ण चक्र पूर्ण हो जाता है। यह रात वर्षभर की संपूर्ण मलीनताओं को पीछे छोड़कर एक अत्यंत निर्मल, पवित्र और चैतन्य आत्मा के रूप में चैत्र मास के सनातन नववर्ष में प्रवेश करने का स्वर्णिम द्वार है।

FAQ

होलिका दहन किस समय करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है?
होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा के दिन भद्रा रहित प्रदोष काल अथवा भद्रा समाप्त होने के बाद निशीथ काल में करना ही शास्त्र सम्मत है।

भद्रा काल में होलिका दहन क्यों नहीं किया जाता?
भद्रा उग्र और विनाशकारी स्वभाव वाली मानी जाती है, इसलिए भद्रा में दहन करने से समाज और राष्ट्र पर भारी विपत्ति आने की आशंका रहती है।

होलिका दहन में भुने हुए नए अन्न का क्या महत्व है?
यह ऋग्वैदिक नवान्नेष्टि यज्ञ की परंपरा है जिसमें नए अन्न को भगवान को अर्पित करने के बाद प्रसाद रूप में खाने से वर्षभर आरोग्य बना रहता है।

होलिका की पवित्र भस्म को घर लाने से क्या लाभ होता है?
होलिका की भस्म को घर में छिड़कने से वास्तु दोष दूर होते हैं, नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और माथे पर लगाने से भय दूर होता है।

होलिका दहन का सबसे बड़ा आध्यात्मिक संदेश क्या है?
इसका संदेश यह है कि अहंकार और अधर्म चाहे कितने भी बलवान हों, अंततः निष्काम भक्ति और सत्य के समक्ष पराजित होकर भस्म हो जाते हैं।

पाएं अपनी सटीक कुंडली

कुंडली बनाएं

क्या आपको यह पसंद आया?

लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

पं. अमिताभ शर्मा (63)


अनुभव: 20

इनसे पूछें: Family Planning, Career

इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें

WELCOME TO

ZODIAQ

Right Decisions at the right time with ZODIAQ