By पं. संजीव शर्मा
फाल्गुन कृष्ण अष्टमी पर सीता प्राकट्य और अखंड सौभाग्य

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को सनातन पंचांग में जानकी जयंती अथवा सीता अष्टमी के नाम से जाना जाता है। वाल्मीकि रामायण और विभिन्न पुराणों के अनुसार इसी पावन तिथि पर मिथिला नरेश परम ज्ञानी राजा जनक को हल जोतते समय भूमि के गर्भ से साक्षात माता सीता एक दिव्य स्वर्ण मंजूषा में प्राप्त हुई थीं। माता जानकी साक्षात पराशक्ति महालक्ष्मी और पृथ्वी तत्त्व की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। यह पावन पर्व महाशिवरात्रि से ठीक छह दिन पूर्व आता है, जो साधक के जीवन में त्याग, पतिव्रत धर्म, सहिष्णुता और अखंड सौभाग्य का संचार करता है।
| पंचांग घटक | शास्त्रीय विवरण |
|---|---|
| मास एवं पक्ष | फाल्गुन मास, कृष्ण पक्ष |
| पावन तिथि | कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि |
| अधिष्ठाता शक्ति | जगज्जननी माता जानकी व मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम |
| तत्त्व संबंध | पृथ्वी तत्त्व व साक्षात महालक्ष्मी स्वरूप |
| मुख्य अनुष्ठान | भूमि वंदना, पीत वस्त्र अर्पण, जानकी स्तोत्र पाठ |
| नैवेद्य द्रव्य | खीर, ऋतु फल, पंचामृत और सुगंधित श्वेत मिष्ठान्न |
| व्रत का मुख्य फल | अखंड सौभाग्य, दांपत्य शांति और शीघ्र विवाह |
जानकी जयंती के दिन सुहागिन स्त्रियों और विवाह योग्य कन्याओं को शास्त्रों में बताए गए विशिष्ट नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
वाल्मीकि रामायण के बालकांड में माता जानकी के प्राकट्य का अत्यंत मनोहारी और दार्शनिक आख्यान प्राप्त होता है। एक बार मिथिला नगरी में लगातार कई वर्षों तक भयंकर अकाल पड़ा जिससे प्रजा त्राहि त्राहि करने लगी। ऋषियों और मुनियों ने विदेह राजा जनक को परामर्श दिया कि यदि राजा स्वयं अपनी रानी के साथ यज्ञ भूमि में स्वर्ण का हल चलाएं, तो इंद्र देव प्रसन्न होकर अमृतमयी वर्षा करेंगे। राजा जनक ने समस्त प्रजा के कल्याण के लिए इस विधान को स्वीकार किया।
जब राजा जनक यज्ञ मंडप की भूमि को स्वर्ण के हल से जोत रहे थे, तब हल का अग्र भाग जिसे संस्कृत में सीत कहा जाता है, वह भूमि के भीतर किसी ठोस वस्तु से टकराया। राजा जनक ने जब उस स्थान की मिट्टी को सावधानीपूर्वक हटाया, तो वहां से एक अत्यंत दिव्य और तेजोमय संदूक प्रकट हुआ। उस संदूक को खोलते ही उसके भीतर से कमल के समान खिली हुई एक अत्यंत सुंदर, तेजस्वी नवजात कन्या मुस्कुराती हुई दिखाई दी। हल के अग्र भाग सीत से टकराकर प्रकट होने के कारण उस कन्या का नाम सीता रखा गया। राजा जनक की पुत्री होने के कारण वे जानकी कहलाईं और मिथिला की राजकुमारी होने के कारण वैदेही नाम से विख्यात हुईं। उनके प्राकट्य के साथ ही आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी और मिथिला की धरती पर मूसलाधार वर्षा प्रारंभ हो गई जिससे समस्त अकाल और दरिद्रता समाप्त हो गई।
वैदिक दर्शन में माता सीता केवल एक ऐतिहासिक नारी पात्र नहीं हैं, बल्कि वे साक्षात मूल प्रकृति और महालक्ष्मी का सगुण अवतार हैं। जिस प्रकार भगवान नारायण संपूर्ण जगत के पालनकर्ता हैं, उसी प्रकार माता सीता उनकी अंतर्भूता आह्लादिनी शक्ति हैं। सीता जी का पृथ्वी के गर्भ से प्रकट होना और लीला संवरण के समय पुनः पृथ्वी की गोद में समा जाना यह प्रमाणित करता है कि वे पृथ्वी तत्त्व की साक्षात अधिष्ठात्री देवी हैं।
पृथ्वी तत्त्व का मूल गुण क्षमा, धैर्य, सहनशीलता और धारण शक्ति है। माता सीता ने अपने संपूर्ण लौकिक जीवन में इन चारों गुणों का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत किया। राजमहलों के असीम ऐश्वर्य को त्यागकर 14 वर्षों का वनवास सहना, लंका की अशोक वाटिका में रावण के भयंकर दबाव और राक्षसनियों की प्रताड़ना के बीच भी अपने सतीत्व पर अटल रहना और जीवन के उत्तरार्ध में महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहकर लव और कुश जैसे तेजस्वी बालकों को संस्कारवान बनाना माता सीता के अगाध आत्मबल को दर्शाता है। जानकी जयंती की पूजा वस्तुतः उसी असीम सहनशीलता और नैतिक बल की पूजा है जो आज के अशांत पारिवारिक जीवन में अत्यंत अनिवार्य हो चुकी है।
ज्योतिष शास्त्र में माता सीता की पूजा को कुंडली के चतुर्थ भाव अर्थात गृह सुख, सप्तम भाव अर्थात वैवाहिक जीवन और नवम भाव अर्थात भाग्य की शुद्धि के लिए अचूक माना गया है। जिन युवक युवतियों की कुंडली में मांगलिक दोष, राहु केतु का अशुभ प्रभाव अथवा सप्तमेश के निर्बल होने के कारण विवाह में अनावश्यक विलंब हो रहा हो, उनके लिए जानकी जयंती का दिन किसी सिद्ध योग के समान फलदायी होता है।
| वैवाहिक या पारिवारिक समस्या | शास्त्रीय ज्योतिषीय अनुष्ठान | अभीष्ट आध्यात्मिक फल |
|---|---|---|
| विवाह में अत्यधिक विलंब | माता सीता को पीली चुनरी व 16 श्रृंगार अर्पित कर जानकी स्तोत्र पाठ | शीघ्र और गुणवान जीवनसाथी की प्राप्ति |
| दांपत्य जीवन में निरंतर कलह | राम जानकी विग्रह पर कच्चा दूध व इत्र मिश्रित जल अर्पण | कटुता का शमन और पारस्परिक प्रेम |
| पति की अकाल मृत्यु का भय | माता सीता को सिंदूर चढ़ाकर स्वयं की मांग में धारण करना | अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु |
| परिवार में दरिद्रता व क्लेश | श्री जानकी चालीसा का 11 बार पाठ और कन्या को खीर खिलाना | गृह लक्ष्मी की प्रसन्नता और अटूट सुख |
जो कन्याएं शीघ्र विवाह की कामना रखती हैं, उन्हें इस पावन तिथि पर सुनहरी गोटे वाली पीली चुनरी में हल्दी की दो गांठें, चांदी का एक छल्ला और सिंदूर की डिबिया रखकर माता सीता के चरणों में समर्पित करना चाहिए। इस दिन जानकी स्तोत्र का 7 बार नियमित पाठ करने से विवाह के मार्ग में आने वाली समस्त सूक्ष्म बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं।
जानकी जयंती की पूजा में षोडशोपचार पद्धति का पालन किया जाता है। पूजा स्थल पर एक स्वच्छ चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर अक्षत की ढेरी बनाकर कलश स्थापित किया जाता है। कलश के सम्मुख श्री राम और माता सीता की युगल प्रतिमा स्थापित की जाती है। सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करके कलश का पूजन किया जाता है। इसके पश्चात माता जानकी को गंगाजल से स्नान कराकर नवीन पीले अथवा लाल वस्त्र पहनाए जाते हैं।
पूजा में माता सीता को 16 श्रृंगार की सामग्री अर्पित करने का विशेष महत्व है। इस सामग्री में लाल चुनरी, सिंदूर, महावर, काजल, मेहंदी, चूड़ियां, बिछिया, नथ, कंघी, शीशा, सुगंधित तेल, इत्र, बिंदी, रिबन, कुमकुम और दक्षिणा सम्मिलित होती है। यह संपूर्ण सामग्री अर्पित करते समय ॐ जानक्यै नमः मंत्र का उच्चारण किया जाता है। पूजा संपन्न होने के उपरांत इस श्रृंगार सामग्री में से थोड़ा सा सिंदूर सुहागिन स्त्री को अपनी मांग में लगाना चाहिए और शेष सामग्री किसी योग्य और सदाचारिणी ब्राह्मणी को ससम्मान दान कर देनी चाहिए। ऐसा करने से कुल में किसी भी प्रकार का अमंगल प्रवेश नहीं कर पाता और घर में सदैव सुख शांति बनी रहती है।
माता सीता का संपूर्ण जीवन भारतीय नारी की गरिमा, पवित्रता और आत्मगौरव का जीवंत शिलालेख है। आधुनिक युग में जहां संबंधों में धैर्य की कमी और अहंकार का टकराव तेजी से बढ़ रहा है, वहां जानकी जयंती हमें यह स्मरण कराती है कि सच्चा प्रेम त्याग और समर्पण की भित्ति पर ही टिकता है। माता जानकी ने संकट के घोर अंधकार में भी कभी धर्म का दामन नहीं छोड़ा।
वे दुख में कभी विचलित नहीं हुईं और सुख में कभी अहंकारी नहीं बनीं। जानकी जयंती का पर्व हमें केवल बाह्य पूजा करने की प्रेरणा नहीं देता, बल्कि वह हमारे अंतःकरण में माता जानकी जैसे उदात्त चरित्र, क्षमा भाव और कर्तव्य निष्ठा को धारण करने का पावन आह्वान करता है। जिस घर में नारी का सम्मान होता है और जहां माता सीता के आदर्शों का पालन किया जाता है, वहां साक्षात नारायण का वास होता है और उस कुल पर कभी भी विपत्तियों की छाया नहीं पड़ती।
जानकी जयंती किस तिथि को मनाई जाती है?
यह पावन पर्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।
माता सीता का प्राकट्य किस प्रकार हुआ था?
मिथिला के राजा जनक जब अकाल मुक्ति हेतु यज्ञ भूमि में स्वर्ण हल जोत रहे थे, तब भूमि के भीतर से एक कलश में माता सीता प्रकट हुई थीं।
जानकी जयंती पर 16 श्रृंगार अर्पित करने का क्या महत्व है?
माता सीता को 16 श्रृंगार अर्पित करने से सुहागिन स्त्रियों को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और वैवाहिक कलह समाप्त होता है।
शीघ्र विवाह के लिए जानकी जयंती पर कौन सा पाठ करना चाहिए?
शीघ्र विवाह की बाधाएं दूर करने के लिए इस दिन जानकी स्तोत्र अथवा श्री रामचरितमानस के बालकांड में वर्णित सीता स्वयंवर प्रसंग का पाठ करना चाहिए।
माता सीता को पृथ्वी तत्त्व की अधिष्ठात्री क्यों कहा जाता है?
माता सीता का प्राकट्य भूमि के गर्भ से हुआ था और वे पृथ्वी के समान ही असीम धैर्य, सहनशीलता और क्षमा का साक्षात स्वरूप मानी जाती हैं।
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