By पं. नीलेश शर्मा
जब शिवजी के तीसरे नेत्र की क्रोधाग्नि से भस्म हुए कामदेव

सनातन वैदिक पंचांग और काल गणना में फाल्गुन मास का कालखंड प्रकृति के गहनतम तात्विक परिवर्तनों की वेला माना जाता है। यह समय शिशिर ऋतु की कठोर जड़ता के अवसान और वसंत ऋतु के मदमस्त यौवन के पूर्ण प्रस्फुटन का संधिकाल होता है। खगोलीय दृष्टि से उत्तरायण के सूर्य की रश्मियां पृथ्वी के समस्त जड़ और चेतन पदार्थों में एक नवीन प्राण रस का संचार करने लगती हैं। सनातन तंत्र शास्त्र और पुराणों में इस प्राकृतिक मादकता और सृजन ऊर्जा को साक्षात प्रेम, सौंदर्य, आकर्षण और वासना के अधिष्ठाता देवता भगवान कामदेव (मन्मथ) के रूप में निरूपित किया गया है।
शिव पुराण के रुद्र संहिता अंतर्गत सती खंड और कुमार खंड में कामदेव दहन का अत्यंत विस्तृत, गूढ़ और दार्शनिक आख्यान प्राप्त होता है। जब तारकासुर नामक महादैत्य ने ब्रह्मा जी से यह दुर्लभ वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसका संहार केवल भगवान शिव के औरस पुत्र के हाथों ही संभव होगा तब तीनों लोकों में भीषण हाहाकार मच गया था। उस समय माता सती के दक्ष यज्ञ में आत्मदाह के पश्चात देवाधिदेव महादेव शिव सांसारिक संबंधों से विरक्त होकर हिमालय के उत्तुंग शिखर पर अखंड समाधि में लीन थे। देवता इस बात से अत्यंत भयभीत थे कि यदि महादेव की समाधि नहीं टूटी, तो माता पार्वती के साथ उनका पावन परिणय कैसे संभव होगा और तारकासुर का वध करने वाले स्कंद (कार्तिकेय) का जन्म कैसे होगा। इस संकट के निवारण हेतु देवराज इंद्र ने वसंत ऋतु और कामदेव को भगवान शिव की समाधि भंग करने का आदेश दिया था।
| पंचांग व दार्शनिक घटक | शास्त्रीय विवरण |
|---|---|
| मास एवं ऋतु संधिकाल | फाल्गुन मास का संधिकाल एवं वसंत ऋतु का चरमोत्कर्ष |
| ऐतिहासिक स्थल | गंगावतरण तीर्थ, कनखल, हरिद्वार व हिमालय की तपोभूमि |
| मुख्य पात्र | देवाधिदेव महादेव शिव, कामदेव, देवी रति, वसंत और देवगण |
| दहन का मुख्य कारण | समाधि भंग का दुस्साहस और काम ऊर्जा का अवांछित प्रदर्शन |
| प्रयुक्त अस्त्र | कामदेव का पुष्प धनुष और भगवान शिव का तीसरा नेत्र |
| ज्योतिषीय ग्रह संबंध | शुक्र देव (कामुकता/वासना) और सूर्य-मंगल (ज्ञान व तपोबल) |
| मुख्य आध्यात्मिक फल | वासना पर विवेक की विजय, अनंग स्वरूप का बोध और चित्त शुद्धि |
कामदेव दहन के इस पावन आख्यान से अपनी इंद्रियों को वश में करने और अपनी काम ऊर्जा को आध्यात्मिक ओज में रूपांतरित करने हेतु साधक को विशिष्ट शास्त्रीय आचार नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
पौराणिक इतिहास के अनुसार तारकासुर ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया था और यह चतुर वरदान मांगा था कि उसकी मृत्यु केवल उसी बालक से हो सके जो भगवान शिव के तेज से उत्पन्न हुआ हो। तारकासुर भली भांति जानता था कि माता सती के देहत्याग के पश्चात भगवान शिव अखंड वैराग्य और महासमाधि में लीन हो चुके हैं। वे दोबारा कभी विवाह नहीं करेंगे, अतः वह अमर हो चुका है। इस वरदान के अहंकार में मदमस्त होकर तारकासुर ने अमरावती पर आक्रमण कर दिया, देवताओं को उनके पदों से च्युत कर दिया और ऋषि मुनियों के यज्ञों को विध्वंस करना प्रारंभ कर दिया।
व्याकुल होकर समस्त देवता ब्रह्मा जी और भगवान श्री हरि विष्णु की शरण में पहुंचे। भगवान विष्णु ने देवताओं को समझाया कि माता सती ने हिमालय राज के घर माता पार्वती के रूप में पुनर्जन्म ले लिया है और वे भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या कर रही हैं। परंतु भगवान शिव इतने गहन ध्यानावस्थित हैं कि वे माता पार्वती की सेवा और तपस्या की ओर तनिक भी ध्यान नहीं दे रहे हैं।
उस समय देवराज इंद्र ने एक अत्यंत कुटिल और अविवेकी निर्णय लिया। उन्होंने कामदेव को बुलाया और आदेश दिया कि तुम वसंत ऋतु को साथ लेकर तुरंत हिमालय जाओ और अपने पुष्प बाणों से देवाधिदेव महादेव के हृदय में माता पार्वती के प्रति काम वासना का संचार करो। कामदेव इस कार्य के भयंकर परिणाम को जानते थे। उन्होंने इंद्र से कहा कि हे देवराज, भगवान शिव महाकाल और काल के भी काल हैं; उन पर काम का प्रहार करना साक्षात मृत्यु को आमंत्रण देना है। परंतु इंद्र के दबाव और देव कार्य की दुहाई देने पर कामदेव भारी मन से वसंत को साथ लेकर महादेव की तपोभूमि की ओर प्रस्थान कर गए।
जैसे ही कामदेव ने वसंत ऋतु के साथ भगवान शिव की पावन तपोभूमि में प्रवेश किया, प्रकृति के समस्त प्राकृतिक नियम एकाएक छिन्न भिन्न हो गए। उस घोर बर्फीले और शांत वातावरण में असमय ही वसंत का उन्माद छा गया।
सूखे और बर्फ से ढके वृक्षों पर अचानक हरे पल्लव, रंग बिरंगे पुष्प और आम की मंजरियां खिल उठीं। भ्रमर गुंजार करने लगे, कोकिलाएं मधुर स्वर में कूकने लगीं और समस्त पशु पक्षी अपनी मर्यादाओं को त्यागकर काम क्रीड़ा में लीन होने लगे। शीतल, मंद और सुगंधित वायु बहने लगी जो संन्यासियों के मन को भी विचलित कर देने वाली थी। उसी समय माता पार्वती भगवान शिव की पूजा के लिए ताजे कमल के पुष्प और बेलपत्र की माला लेकर महादेव के सम्मुख उपस्थित हुईं।
कामदेव ने देखा कि यह सबसे उपयुक्त क्षण है। वे एक विशाल आम के वृक्ष की शाखा के पीछे छिप गए। कामदेव के हाथ में गन्ने का बना हुआ धनुष था, जिसकी डोरी भौरों की पंक्ति से बनी थी। उनके तरकश में पांच सम्मोहक बाण थे:
कामदेव ने अत्यंत सावधानी से अपने धनुष पर आम्र मंजरी और नीलकमल के बाण चढ़ाए और सीधे ध्यानमग्न देवाधिदेव महादेव के वक्ष स्थल को लक्ष्य बनाकर छोड़ दिया।
| कामदेव का पुष्प बाण | तात्विक स्वभाव | मानव चेतना पर प्रभाव | यौगिक दृष्टि से चक्र आघात |
|---|---|---|---|
| अरविन्द (श्वेत कमल) | जल व वायु तत्त्व | चित्त में चंचलता व आकर्षण | स्वाधिष्ठान चक्र का क्षोभ |
| अशोक (रक्त पुष्प) | अग्नि व जल तत्त्व | हृदय में व्याकुलता व विरह पीड़ा | अनाहत चक्र का असंतुलन |
| चूत (आम्र मंजरी) | तेज व पृथ्वी तत्त्व | शरीर में कामुक ज्वर व स्वेद | मूलाधार चक्र की ऊर्जा का पतन |
| नवमल्लिका (चमेली) | वायु व आकाश तत्त्व | विवेक का हरण व उन्माद | विशुद्ध चक्र में कंपन |
| नीलोत्पल (नीलकमल) | सर्व तत्त्व सम्मोहक | पूर्ण सम्मोहन व समाधि का भंजन | आज्ञा चक्र की एकाग्रता का नाश |
जैसे ही वह पुष्प बाण भगवान शिव के हृदय को स्पर्श कर गया, महादेव के परम शांत चित्त में एक क्षण के लिए हलचल उत्पन्न हुई। उन्होंने अपने नेत्र खोले और सम्मुख अत्यंत सुंदर रूप में खड़ी माता पार्वती को देखा। परंतु अगले ही क्षण महादेव ने अपने ज्ञान और विवेक से विचार किया कि मेरे इस शांत और निर्विकार मन में यह काम वासना का विकार असमय कैसे उत्पन्न हुआ।
जब भगवान शिव ने अपनी योग दृष्टि को चारों ओर घुमाया, तो उन्होंने देखा कि दक्षिण दिशा में एक आम के वृक्ष की शाखा के पीछे कामदेव अपना धनुष ताने खड़े हैं और मुस्कुरा रहे हैं। महादेव समझ गए कि यह समस्त उपद्रव कामदेव की धृष्टता के कारण हुआ है।
भगवान शिव देवाधिदेव हैं, वे योगेश्वर हैं। कामदेव ने सोचा था कि पुष्प बाण के लगते ही महादेव वासना के वशीभूत होकर काम क्रीड़ा में प्रवृत्त हो जाएंगे, परंतु महादेव ने सिद्ध कर दिया कि काम की सत्ता केवल नश्वर शरीरों पर चल सकती है, सत्य और समाधि पर नहीं।
भगवान शिव का मुखमंडल प्रचंड क्रोध से तमतमा उठा। उनके मस्तक के मध्य में स्थित वह तीसरा नेत्र, जो प्रलय और ज्ञान की अग्नि का भंडार है, अचानक प्रस्फुटित हो गया। उस तीसरे नेत्र के खुलते ही उसमें से प्रलयंकारी ज्वालाएं, करोड़ों सूर्यों के समान तेज और विद्युत का प्रवाह बाहर निकला।
कामदेव को संभलने अथवा भागने का एक पल भी अवसर नहीं मिला। उस प्रचंड क्रोधाग्नि ने कामदेव को चारों ओर से घेर लिया और देखते ही देखते तीनों लोकों को सम्मोहित करने वाला वह परम सुंदर कामदेव जलकर राख की एक मुट्ठी भर ढेरी में परिवर्तित हो गया। संपूर्ण हिमालय उस दिव्य नाद और अग्नि से गूंज उठा। देवता आकाश से यह दृश्य देखकर थर थर कांपने लगे और वसंत ऋतु भयभीत होकर वहां से पलायन कर गई।
कामदेव के भस्म होते ही उनकी परम सुंदरी पत्नी देवी रति वहां पहुंची। अपने पति को केवल भस्म की ढेरी के रूप में देखकर रति के पैरों तले से भूमि खिसक गई। रति उस भस्म को अपने हृदय से लगाकर करुण क्रंदन करने लगी। उसका विलाप इतना हृदय विदारक था कि वहां उपस्थित समस्त पशु पक्षी और पर्वत भी रोने लगे। रति ने उसी क्षण अपनी देह को भी उसी चिता भस्म में जलाकर सती होने का निर्णय लिया।
उस समय समस्त देवता हाथ जोड़कर भगवान आशुतोष के चरणों में गिर पड़े। देवताओं ने रोते हुए क्षमा याचना की: "हे देवाधिदेव, हे करुणानिधान, कामदेव का इसमें कोई व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं था। यह सब हम देवताओं के कहने पर तारकासुर के संहार हेतु आपके और माता पार्वती के मिलन के लिए किया गया था। रति सर्वथा निर्दोष है, कृपा कर कामदेव को पुनः जीवन दान दीजिए।"
भगवान शिव का एक नाम 'आशुतोष' भी है, जिसका अर्थ है जो अत्यंत शीघ्र प्रसन्न हो जाता है। देवी रति के अनन्य पातिव्रत्य और देवताओं की सच्ची प्रार्थना से महादेव का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने अमृतमयी दृष्टि से रति की ओर देखा और कहा:
हे रति, मेरे तीसरे नेत्र से निकली अग्नि का प्रभाव निष्फल नहीं हो सकता। कामदेव का यह स्थूल भौतिक शरीर तो नष्ट हो चुका है, परंतु तुम्हारी सच्ची प्रीति के कारण कामदेव अब भी जीवित रहेगा। वह अब बिना शरीर के 'अनंग' (अंग विहीन) रहकर संपूर्ण चराचर जगत के प्राणियों के हृदय में सूक्ष्म रूप से वास करेगा। जब तक द्वापर युग नहीं आता तब तक वह अनंग रूप में ही रहेगा। द्वापर युग के अंत में जब भगवान श्री कृष्ण द्वारका में अवतार लेंगे तब कामदेव उनके और देवी रुक्मिणी के प्रथम पुत्र 'प्रद्युम्न' के रूप में पुनः सुंदर शरीर धारण करके जन्म लेगा और तुम्हारा उसके साथ पुनः पावन मिलन होगा।
भगवान शिव के इस वरदान से देवी रति को परम शांति प्राप्त हुई। तब से कामदेव संपूर्ण ब्रह्मांड में एक अदृश्य ऊर्जा, आकर्षण और प्रेम के रूप में संचरण करने लगे।
कामदेव दहन की यह पावन कथा केवल एक पौराणिक घटना नहीं है, अपितु यह प्रत्येक मनुष्य के भीतर नित्य चलने वाले आंतरिक महाभारत का सबसे बड़ा रूपक है।
मनुष्य का शरीर ही हिमालय है। इस शरीर के भीतर जो विशुद्ध आत्मा है, वही भगवान शिव हैं। हमारी सांसारिक इच्छाएं, वासनाएं, कामुक प्रवृत्तियां और शारीरिक आकर्षण ही कामदेव हैं। कामदेव का धनुष गन्ने का है, जो यह दर्शाता है कि वासना का आरंभ अत्यंत मीठा और सुखद प्रतीत होता है। उसके बाण फूलों के हैं, जो यह बताते हैं कि वासना का आकर्षण अत्यंत कोमल और सुहावना लगता है।
परंतु जब मनुष्य की साधना और ध्यान की अवस्था में यह काम रूपी वासना बाधा डालने का प्रयास करती है, तो मनुष्य को भी अपने भीतर के तीसरे नेत्र को खोलना पड़ता है।
वैदिक ज्योतिष में कामदेव दहन का प्रसंग ग्रहों के तात्विक संघर्ष और उनके शोधन को समझने की सर्वोच्च कुंजी है। जन्म कुंडली में कामदेव के कारक ग्रह दैत्यगुरु शुक्र देव हैं, जो आकर्षण, वीर्य, कामुकता और भौतिक सुखों के स्वामी हैं। वहीं भगवान शिव का तीसरा नेत्र साक्षात सूर्य (आत्मा का तेज) और मंगल (अग्नि तत्त्व व पराक्रम) के संयुक्त ऊर्जा का प्रतीक है।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में शुक्र ग्रह राहु अथवा केतु से पीड़ित होकर लग्न, पंचम अथवा सप्तम भाव में बैठा हो, तो ऐसा व्यक्ति काम वासना का दास बन जाता है। उसका विवेक नष्ट हो जाता है और वह काम के आवेग में आकर अपने चरित्र, धन और सामाजिक प्रतिष्ठा का सर्वनाश कर बैठता है।
फाल्गुन मास में कामदेव दहन का यह पावन प्रसंग हमें यह अमर संदेश देता है कि वासना को कभी भी बलपूर्वक दबाया नहीं जा सकता; वासना को केवल ज्ञान और विवेक की अग्नि में जलाकर प्रेम में रूपांतरित किया जा सकता है। दबाया हुआ काम एक दिन भयंकर विस्फोट बनकर मनुष्य का पतन कर देता है, परंतु ज्ञान की दृष्टि से देखा गया काम शांत होकर भस्म हो जाता है।
भगवान शिव ने कामदेव को भस्म करके यह सिद्ध किया कि जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों का स्वामी है, वही वास्तविक ईश्वर है। जो व्यक्ति काम के वशीभूत है, वह चक्रवर्ती सम्राट होकर भी एक भिक्षुक और दास के समान है। फाल्गुन मास का यह आध्यात्मिक चिंतन मनुष्य को अपनी पाशविक प्रवृत्तियों को जलाकर एक विशुद्ध, तेजस्वी और संयमी आत्मा बनने की प्रेरणा प्रदान करता है, ताकि वह आगामी चैत्र मास के नव संवत्सर में वासना मुक्त होकर दिव्यता के साथ प्रवेश कर सके।
भगवान शिव ने कामदेव को क्यों भस्म किया था?
कामदेव ने देवताओं के कहने पर ध्यानमग्न भगवान शिव पर पुष्प बाण चलाकर उनकी समाधि भंग करने का दुस्साहस किया था, जिससे कुपित होकर महादेव ने उन्हें भस्म कर दिया था।
कामदेव के तरकश में कौन से पांच पुष्प बाण होते हैं?
कामदेव के पांच पुष्प बाण कमल, अशोक, आम्र मंजरी, चमेली और नीलकमल हैं जो मनुष्य की पांचों ज्ञानेंद्रियों में काम का संचार करते हैं।
कामदेव को अनंग नाम क्यों दिया गया?
भगवान शिव के तीसरे नेत्र की अग्नि से स्थूल शरीर भस्म हो जाने के बाद वे बिना शरीर (अंग विहीन) के केवल अदृश्य प्रेम के रूप में व्याप्त रहे, इसलिए उन्हें अनंग कहा गया।
द्वापर युग में कामदेव ने किस रूप में पुनर्जन्म लिया था?
शिवजी के वरदान के अनुसार कामदेव ने द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण और माता रुक्मिणी के ज्येष्ठ पुत्र 'प्रद्युम्न' के रूप में सुंदर शरीर धारण करके पुनर्जन्म लिया था।
कामदेव दहन की कथा का मूल आध्यात्मिक संदेश क्या है?
इसका मूल संदेश यह है कि मनुष्य को अपनी काम वासनाओं और इंद्रियों पर ज्ञान व विवेक के तीसरे नेत्र (आज्ञा चक्र) के द्वारा विजय प्राप्त करनी चाहिए।
पाएं अपनी सटीक कुंडली
कुंडली बनाएंअनुभव: 20
इनसे पूछें: Family Planning, Career
इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi
इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें
WELCOME TO
Right Decisions at the right time with ZODIAQ