लक्ष्मी जयंती का आध्यात्मिक रहस्य क्या है?

By पं. संजीव शर्मा

क्षीरसागर मंथन से महालक्ष्मी प्राकट्य और धन वर्षा के उपाय

लक्ष्मी जयंती: प्राकट्य कथा, पूजा विधि और धन प्राप्ति उपाय

पंचांग विवरण और फाल्गुन पूर्णिमा पर महालक्ष्मी प्राकट्य

सनातन धर्म में अधिकांश लोग केवल कार्तिक अमावस्या अर्थात दीपावली को ही माता लक्ष्मी की पूजा का मुख्य पर्व मानते हैं, परंतु वैदिक संहिताओं, लिंग पुराण और मत्स्य पुराण के प्रामाणिक संदर्भों के अनुसार धन, ऐश्वर्य, सौंदर्य और सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी भगवती महालक्ष्मी का मूल अवतरण दिवस फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि ही है। इसी पावन तिथि को शास्त्रोक्त परंपरा में लक्ष्मी जयंती के नाम से जाना जाता है। यह वही पावन तिथि है जब देवताओं और दैत्यों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के दौरान क्षीरसागर के अगाध गर्भ से चौदह दिव्य रत्नों में सर्वश्रेष्ठ रत्न के रूप में माता महालक्ष्मी हाथ में वर मुद्रा और सुवासित श्वेत कमल धारण किए हुए साक्षात प्रकट हुई थीं।

पंचांग घटक शास्त्रीय विवरण
मास एवं पक्ष फाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष
पावन तिथि पूर्णिमा तिथि (संपूर्ण अहोरात्र व्यापिनी)
अधिष्ठाता शक्ति सर्वैश्वर्यमयी माता महालक्ष्मी व भगवान श्री हरि विष्णु
प्राकट्य स्रोत क्षीरसागर मंथन से प्रकट चौदह दिव्य रत्नों में शिरोमणि
प्रधान अनुष्ठान श्री सूक्त पाठ, कनकधारा स्तोत्र, मध्यरात्रि लक्ष्मी साधना
प्रमुख नैवेद्य मखाने की खीर, बताशे, अनार, कमल गट्टा, सिंघाड़ा
मुख्य आध्यात्मिक फल सात जन्मों की दरिद्रता का नाश, स्थिर लक्ष्मी और अखंड सौभाग्य

लक्ष्मी जयंती के पावन अवसर पर माता महालक्ष्मी की स्थिर कृपा प्राप्त करने और अपने परिवार से दरिद्रता के समूल नाश हेतु साधक को ब्रह्म मुहूर्त से ही विशिष्ट शास्त्रीय आचार नियमों का पालन करना चाहिए।

  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में शैया त्यागकर तीर्थ जल अथवा शुद्ध शीतल जल में गंगाजल और कच्चा दूध मिलाकर स्नान करना।
  • स्नान के उपरांत शुद्ध लाल अथवा गुलाबी रेशमी वस्त्र धारण करके पूजा वेदी को गंगाजल और गौमूत्र से पवित्र करना।
  • पूजा वेदी पर एक स्वच्छ चौकी रखकर उस पर लाल रेशमी वस्त्र बिछाना और अक्षत की अष्टदल कमल रूपी ढेरी बनाना।
  • उस अष्टदल कमल पर माता महालक्ष्मी और भगवान नारायण की संयुक्त स्वर्ण, चांदी अथवा पीतल की प्रतिमा स्थापित करना।
  • माता लक्ष्मी के विग्रह के सम्मुख गाय के शुद्ध घी का एक अखंड चौमुखी दीपक और तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करना।
  • माता भगवती को कमल के ताजे पुष्प, कमल गट्टे की माला, गुलाब की पंखुड़ियां, इत्र और सुगंधित श्वेत चंदन श्रद्धापूर्वक समर्पित करना।
  • दिनभर निराहार अथवा केवल दुग्धाहार व्रत का दृढ़ संकल्प लेकर ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं नमः मंत्र का निरंतर मानसिक जप करना।
  • दोपहर अथवा सायंकाल में किसी भी प्रकार की निद्रा, कटु वचन, क्रोध और पारिवारिक कलह से अपनी इंद्रियों को पूर्णतः दूर रखना।
  • मध्यरात्रि के समय निशीथ काल में बैठकर श्री सूक्त, लक्ष्मी सूक्त और कनकधारा स्तोत्र का कम से कम 16 बार एकाग्रचित्त पाठ करना।
  • पूजा की समाप्ति पर गाय के दूध से बनी मखाने की खीर का भोग लगाकर 7 छोटी कन्याओं को आदरपूर्वक भोजन और दक्षिणा प्रदान करना।

क्षीरसागर मंथन और महालक्ष्मी का श्रीहरि वरण

श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध में लक्ष्मी जयंती के प्राकट्य का अत्यंत मनोहारी और दार्शनिक आख्यान प्राप्त होता है। जब देवराज इंद्र के प्रमाद और महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण तीनों लोकों का संपूर्ण वैभव, तेज और श्री समुद्र में विलीन हो गई थी तब देवता अत्यंत निर्बल और श्रीहीन हो गए थे। उस समय भगवान श्री हरि विष्णु के परामर्श पर देवताओं और दैत्यों ने मिलकर मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को नेती बनाकर क्षीरसागर का मंथन प्रारंभ किया।

हलाहल विष, कामधेनु गाय, उच्चैःश्रवा घोड़ा और ऐरावत हाथी के प्रकट होने के पश्चात जब मंथन अपने चरम पर पहुंचा तब फाल्गुन पूर्णिमा की पावन तिथि को क्षीरसागर के जल से एक अत्यंत दिव्य, तेजोमयी और अवर्णनीय सौंदर्य से युक्त देवी का प्राकट्य हुआ। वे साक्षात माता महालक्ष्मी थीं जो एक खिले हुए सहस्रदल कमल पर विराजमान थीं। उनके अंग प्रत्यंग से दिव्य सुवर्ण कांति प्रस्फुटित हो रही थी। उस समय समस्त दिशाओं के दिग्गजों ने अपने स्वर्ण कलशों में पवित्र जल भरकर माता का अभिषेक किया।

उस समय सभा में उपस्थित समस्त देवता, गंधर्व, यक्ष और असुर माता लक्ष्मी के उस अनुपम रूप को देखकर उन्हें प्राप्त करने की तीव्र लालसा करने लगे। परंतु माता महालक्ष्मी ने किसी के बाह्य सौंदर्य, असुरों के बाहुबल अथवा देवताओं के पद की ओर दृष्टि भी नहीं डाली। उन्होंने देखा कि इस संपूर्ण ब्रह्मांड में केवल भगवान श्री हरि विष्णु ही ऐसे परम पुरुष हैं जो समस्त सद्गुणों के सागर हैं, जो काम, क्रोध और लोभ से सर्वथा मुक्त हैं और जो संपूर्ण सृष्टि के निस्वार्थ पालक हैं। माता महालक्ष्मी ने मंद मुस्कुराते हुए अपने हाथ में स्थित दिव्य पारिजात पुष्पों की वरमाला भगवान नारायण के गले में डाल दी। माता लक्ष्मी का यह वरण यह स्पष्ट करता है कि लक्ष्मी केवल उसी स्थान पर स्थिर होकर निवास करती हैं जहां धर्म, सत्य, संयम और नारायण की सत्ता विद्यमान होती है।

कनकधारा स्तोत्र और आदि शंकराचार्य का अलौकिक प्रसंग

लक्ष्मी जयंती के दिन आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से जातक के जीवन से दुर्भाग्य का अंधकार सदा के लिए मिट जाता है। इस स्तोत्र के प्राकट्य का ऐतिहासिक प्रसंग अत्यंत भावुक और चमत्कारिक है। बाल्यावस्था में जब आदि शंकराचार्य भिक्षा मांगते हुए एक अत्यंत निर्धन और जीर्ण शीर्ण कुटिया के द्वार पर पहुंचे, तो उन्होंने भिक्षाम देहि की पुकार लगाई।

उस कुटिया में एक अत्यंत दरिद्र और वृद्धा ब्राह्मणी निवास करती थी। उसके घर में अन्न का एक दाना भी शेष नहीं था। वह कई दिनों से भूखी थी, परंतु द्वार पर आए हुए संन्यासी बालक को खाली हाथ लौटाना उसे धर्म विरुद्ध लगा। उसने पूरे घर में खोजबीन की तो उसे केवल एक सूखा हुआ बासी आंवला मिला। उस ब्राह्मणी ने अत्यंत संकोच और अश्रुपूरित नेत्रों के साथ वह सूखा आंवला बालक शंकर की भिक्षा झोली में डाल दिया।

उस दरिद्र स्त्री के इस अप्रतिम त्याग और अगाध श्रद्धा को देखकर बालक शंकराचार्य का हृदय करुणा से द्रवित हो उठा। उन्होंने उसी क्षण हाथ जोड़कर आकाश की ओर देखा और माता महालक्ष्मी की स्तुति में 21 अत्यंत मधुर और छंदोबद्ध श्लोकों की तत्काल रचना प्रारंभ की। यही रचना आज कनकधारा स्तोत्र के नाम से संपूर्ण विश्व में विख्यात है।

शंकराचार्य की उस निष्काम प्रार्थना और स्तुति से प्रसन्न होकर माता महालक्ष्मी आकाश में साक्षात प्रकट हुईं। माता ने कहा कि हे बालक, इस स्त्री ने अपने पूर्व जन्मों में कोई पुण्य कर्म अथवा दान नहीं किया है, अतः इसके भाग्य में केवल घोर दरिद्रता ही लिखी है। शंकराचार्य ने तर्क दिया कि हे माता, भले ही इसने पूर्व जन्म में कुछ न दिया हो, परंतु इस जन्म में इसने अपने पास बची हुई अंतिम वस्तु भी आपके संन्यासी को समर्पित कर दी है। इसका यह एक दान इसके समस्त पूर्व पापों को भस्म करने के लिए पर्याप्त है। माता लक्ष्मी शंकराचार्य के इस तर्क से अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने उस जीर्ण कुटिया के भीतर सोने के आंवलों की मूसलाधार वर्षा कर दी। लक्ष्मी जयंती के दिन कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से बंद भाग्य के द्वार तत्काल खुल जाते हैं।

अनुष्ठान घटक अनुशंसित विधि व संख्या प्रयुक्त साधन व माला प्राप्त होने वाला आध्यात्मिक फल
कनकधारा स्तोत्र पाठ 16 बार सस्वर पाठ शुद्ध गाय के घी का दीपक ऋण मुक्ति व आकस्मिक धन लाभ
श्री सूक्त का 16 ऋचाओं से जप 16 आहुतियों सहित हवन कमलगट्टा, मखाना, घी, खीर व्यापार में अप्रत्याशित वृद्धि व ऐश्वर्य
महालक्ष्मी तांत्रिक मंत्र जप 11 माला अथवा 1188 बार कमलगट्टे की अभिमंत्रित माला सात जन्मों की दरिद्रता का समूल नाश
अष्टलक्ष्मी स्तोत्र पाठ प्रातः व सायं 3 बार लाल गुलाब व कमल के पुष्प स्थिर संपत्ति, वाहन सुख व कीर्ति

दारिद्र्य नाशक गुप्त तांत्रिक मंत्र और मध्यरात्रि साधना विधान

तंत्र शास्त्र में फाल्गुन पूर्णिमा की मध्यरात्रि को लक्ष्मी साधना के लिए एक सिद्ध मुहूर्त स्वीकार किया गया है। शास्त्रों में उल्लेख आता है कि जो साधक इस रात्रि में निशीथ काल अर्थात मध्यरात्रि 11 बजकर 45 मिनट से लेकर 12 बजकर 40 मिनट के बीच विशेष मंत्र का अनुष्ठान करता है, उसके घर में कुबेर का भंडार भी कम नहीं पड़ता।

मध्यरात्रि में लाल आसन पर उत्तराभिमुख होकर बैठें। अपने सम्मुख ताम्र अथवा चांदी के पात्र में एक श्रीयंत्र स्थापित करें। श्रीयंत्र पर केसर और दूध से अभिषेक करके उस पर लाल चंदन का लेप लगाएं। इसके पश्चात कमलगट्टे की माला से निम्नलिखित गुप्त महालक्ष्मी मंत्र का कम से कम 11 माला जप करें:

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं त्रिभुवन महालक्ष्म्यै अस्मांक दारिद्र्यं नाशय नाशय प्रचुर धनं देहि देहि क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ।

इस मंत्र का जप करते समय अपने मन में यह दृढ़ विश्वास रखें कि माता महालक्ष्मी आपके घर की समस्त दरिद्रता, अभाव और ऋणों का नाश कर रही हैं। मंत्र जप के उपरांत 108 बार इसी मंत्र से हवन कुंड में गाय के घी, कमलगट्टे और मखाने की आहुति दें। यह साधना साधक के संपूर्ण वास्तु और आभामंडल से निर्धनता की नकारात्मक तरंगों को जलाकर भस्म कर देती है।

लक्ष्मी जयंती पर स्थिर लक्ष्मी प्राप्ति के 5 अचूक उपाय

यदि आपके पास धन आता तो है परंतु किसी न किसी कारण से टिकता नहीं है और निरंतर व्यय हो जाता है, तो लक्ष्मी जयंती का दिन स्थिर लक्ष्मी को अपने घर में बांधने का सर्वश्रेष्ठ दिन माना गया है।

  • 7 पीले रंग की कौड़ियों और 7 गोमती चक्रों को एक तांबे की थाली में रखें और उन पर केसर का तिलक लगाकर श्री सूक्त का पाठ करें। इसके पश्चात इन्हें एक पीले रेशमी वस्त्र में बांधकर अपनी तिजोरी में रख दें।
  • दक्षिणावर्ती शंख में शुद्ध गंगाजल और केसर भरकर भगवान नारायण और माता लक्ष्मी का अभिषेक करें। उस जल को घर के प्रत्येक कक्ष में छिड़कने से गृह क्लेश और वास्तु दोष शांत होते हैं।
  • एक ताजे नारियल पर लाल मौली लपेटकर उस पर कामिया सिंदूर लगाएं और माता लक्ष्मी के चरणों में अर्पित करके अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार पर बांध दें।
  • इस पावन दिन किसी सुहागिन ब्राह्मणी को 16 श्रृंगार की सामग्री, लाल साड़ी और खीर का भोजन आदरपूर्वक कराएं।
  • पीपल के वृक्ष में माता लक्ष्मी का वास माना गया है, अतः इस दिन सूर्यास्त के तुरंत बाद पीपल की जड़ में दूध और जल अर्पित करके 7 चौमुखी घी के दीपक प्रज्वलित करें।

माता महालक्ष्मी का दार्शनिक संदेश और धर्म संगत ऐश्वर्य

लक्ष्मी जयंती हमें यह सर्वोच्च आध्यात्मिक संदेश देती है कि सनातन संस्कृति में धन अथवा ऐश्वर्य को कभी त्याज्य या पाप नहीं माना गया है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार पुरुषार्थों में अर्थ को धर्म के ठीक बाद दूसरा स्थान दिया गया है। इसका अर्थ यह है कि धन का उपार्जन सदैव धर्म की मर्यादा में रहकर ही किया जाना चाहिए। जो धन अनीति, शोषण, असत्य और छल कपट से अर्जित किया जाता है, वह अपने साथ विनाश, रोग और अशांति लेकर आता है।

माता महालक्ष्मी को चंचला कहा जाता है क्योंकि वे किसी एक स्थान पर सदा नहीं ठहरतीं। परंतु जब धन का उपयोग परोपकार, निर्धनों की सेवा, ज्ञान के प्रसार और ईश्वरीय कार्यों में किया जाता है तब वही चंचला लक्ष्मी उस साधक के घर में स्थिर लक्ष्मी बनकर सदा के लिए निवास करने लगती हैं। लक्ष्मी जयंती का यह पावन पर्व हमें अपने अंतःकरण को क्षीरसागर की भांति निर्मल, शांत और भक्ति भाव से पूर्ण बनाने की प्रेरणा देता है, ताकि साक्षात महालक्ष्मी हमारे हृदय रूपी कमल पर सदा के लिए विराजमान हो सकें।

FAQ

लक्ष्मी जयंती किस तिथि को मनाई जाती है?
लक्ष्मी जयंती प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को अत्यंत श्रद्धा और वैदिक विधि विधान से मनाई जाती है।

माता महालक्ष्मी का प्राकट्य किस प्रकार हुआ था?
फाल्गुन पूर्णिमा के दिन देवताओं और असुरों द्वारा किए गए क्षीरसागर मंथन के दौरान चौदह दिव्य रत्नों में सर्वश्रेष्ठ रत्न के रूप में माता लक्ष्मी प्रकट हुई थीं।

लक्ष्मी जयंती पर किस स्तोत्र का पाठ सबसे प्रभावशाली माना गया है?
इस पावन दिन आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित कनकधारा स्तोत्र और ऋग्वैदिक श्री सूक्त का पाठ करना सबसे चमत्कारी माना जाता है।

कनकधारा स्तोत्र के पाठ से क्या फल प्राप्त होता है?
कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से असाध्य दरिद्रता नष्ट होती है, संचित ऋण समाप्त होते हैं और आकस्मिक धन संपदा के मार्ग खुलते हैं।

स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए इस दिन क्या उपाय करना चाहिए?
तिजोरी में 7 पीली कौड़ियां और गोमती चक्र लाल कपड़े में बांधकर रखना चाहिए तथा दक्षिणावर्ती शंख से श्री हरि और लक्ष्मी का अभिषेक करना चाहिए।

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लेखक

पं. संजीव शर्मा

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