महाशिवरात्रि की चार प्रहर पूजा का शास्त्रीय विधान क्या है?

By पं. नरेंद्र शर्मा

जल, दही, घी और शहद के चार चमत्कारी अभिषेक और मंत्र

महाशिवरात्रि चार प्रहर पूजा: समय, अभिषेक सामग्री और मंत्र

चार प्रहर पूजा की खगोलीय समय सारिणी और पंचब्रह्म स्वरूप

महाशिवरात्रि का पावन पर्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। वैदिक शास्त्रों में इस पावन रात्रि को कालरात्रि की संज्ञा दी गई है। इस पूरी रात्रि को चार बराबर भागों में विभाजित किया गया है जिन्हें प्रहर कहा जाता है। प्रत्येक प्रहर की अवधि 3 घंटे की होती है। संध्या काल से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक चलने वाली यह चार प्रहर साधना साधक के संपूर्ण जीवन का आध्यात्मिक और भौतिक कायाकल्प करने में समर्थ मानी गई है। भगवान शिव के पांच प्रमुख मुखों में से चार मुखों के दिव्य स्वरूपों की पूजा इन चार प्रहरों में क्रमशः की जाती है।

पूजा प्रहरकालखंड समयअधिष्ठाता शिव स्वरूपप्रमुख अभिषेक द्रव्यदिशा संबंधपुरुषार्थ सिद्धि
प्रथम प्रहरसायंकाल 6 से 9 बजे तकईशान रूपशुद्ध शीतल जल व कच्चा दूधईशान कोण पूर्वोत्तरधर्म पुरुषार्थ की रक्षा
द्वितीय प्रहररात्रि 9 से 12 बजे तकअघोर रूपदेशी गाय का ताजा दहीदक्षिण दिशाअर्थ शुद्धि व ऐश्वर्य
तृतीय प्रहरमध्यरात्रि 12 से 3 बजे तकवामदेव रूपदेशी गाय का शुद्ध घृतउत्तर दिशाकाम व संतान सुख
चतुर्थ प्रहरब्रह्म मुहूर्त 3 से 6 बजे तकसद्योजात रूपशुद्ध मधु व गन्ने का रसपश्चिम दिशामोक्ष व कर्म मुक्ति

चार प्रहर साधना का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए साधक को सूर्योदय से पूर्व ही स्वयं को मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार करना होता है।

  • नित्य कर्म से निवृत्त होकर गंगाजल मिश्रित शुद्ध शीतल जल से स्नान करके श्वेत अथवा पीत वस्त्र धारण करना।
  • हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर चतुःप्रहर शिव पूजा और रात्रि जागरण का स्पष्ट संकल्प लेना।
  • पूजा स्थल को गोमय अथवा गंगाजल से पवित्र करके पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख होकर वेदी का निर्माण करना।
  • मिट्टी, पारद अथवा स्फटिक के शिवलिंग की षोडशोपचार विधि से प्रतिष्ठा करके दीपक प्रज्वलित करना।
  • प्रत्येक प्रहर के निर्धारित समय पर शिवलिंग का विधिवत अभिषेक करना और उस प्रहर के विशिष्ट मंत्र का निरंतर जप करना।
  • अभिषेक के उपरांत शिवलिंग पर भस्म, त्रिपुंड, चंदन, अक्षत, तीन पत्तियों वाले अखंडित बेलपत्र और धतूरा श्रद्धापूर्वक समर्पित करना।
  • जागरण काल में अनावश्यक बातचीत, कटु वचन, क्रोध और निद्रा का पूर्ण त्याग करके शिव पुराण का श्रवण अथवा पाठ करना।

प्रथम प्रहर: जल और कच्चे दूध से ईशान स्वरूप की आराधना

सायंकाल 6 बजे से रात्रि 9 बजे तक चलने वाला समय प्रथम प्रहर कहलाता है। यह संध्या और रात्रि का संधिकाल है जब वातावरण में रजोगुण का प्रभाव समाप्त होकर तमोगुण की शुरुआत होती है। इस प्रहर में भगवान शिव के ईशान स्वरूप की आराधना का विधान शास्त्रों में प्रस्तुत किया गया है। ईशान रूप आकाश तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है जो समस्त विद्याओं, ज्ञान और धर्म का मूल अधिष्ठान है।

प्रथम प्रहर में शिवलिंग का अभिषेक तांबे अथवा चांदी के पात्र में भरे गंगाजल और देशी गाय के कच्चे दूध से किया जाता है। दूध की धवल धारा जीव के चित्त में सत्वगुण का संचार करती है और उसकी आंतरिक मलीनताओं को धो डालती है। अभिषेक करते समय ऋग्वेद अथवा यजुर्वेद के मंत्रों का पाठ करना चाहिए अथवा ॐ ईशानाय नमः मंत्र का निरंतर जप करना चाहिए।

इस प्रहर की पूजा मनुष्य के जीवन में धर्म पुरुषार्थ को सुदृढ़ करती है। जो व्यक्ति शारीरिक अस्वस्थता, मानसिक चंचलता और धर्म पथ से भटकाव का सामना कर रहे हैं, उनके लिए यह प्रथम प्रहर का अभिषेक संजीवनी बूटी के समान कार्य करता है। दूध से अभिषेक के पश्चात शिवलिंग पर पीला चंदन, श्वेत कनेर के पुष्प और अक्षत अर्पित करने से समाज में मान प्रतिष्ठा का विस्तार होता है।

द्वितीय प्रहर: देशी गाय के दही से अघोर स्वरूप का पूजन

रात्रि 9 बजे से मध्यरात्रि 12 बजे तक का काल द्वितीय प्रहर कहलाता है। इस प्रहर में रात्रि की गहनता बढ़ने लगती है और तमोगुण का प्रभाव अपने चरम की ओर अग्रसर होता है। इस कालखंड में देवाधिदेव महादेव के अघोर स्वरूप की पूजा की जाती है। यद्यपि अघोर शब्द का शाब्दिक अर्थ जो घोर न हो अर्थात अत्यंत शांत और कल्याणकारी होता है, तथापि यह स्वरूप रुद्र के संहारक और तमोगुण नाशक तेज को भी अपने भीतर समेटे हुए है। यह स्वरूप अग्नि तत्त्व का प्रतीक माना गया है।

द्वितीय प्रहर में शिवलिंग का अभिषेक देशी गाय के शुद्ध दूध से जमाए गए ताजे दही से किया जाता है। दही को स्थिरता, पोषण और समृद्धि का कारक द्रव्य माना गया है। दही से अभिषेक करते समय ॐ अघोराय नमः मंत्र का उच्चारण किया जाना चाहिए।

यह अभिषेक मनुष्य के जीवन से आर्थिक संकटों, दरिद्रता, संचित ऋणों और व्यावसायिक बाधाओं को समूल नष्ट कर देता है। दही की शीतलता और उसका स्निग्ध गुण जातक के जीवन में धन के आगमन के नए मार्ग प्रशस्त करता है। इस प्रहर में शिवजी को भांग की पत्तियां, धतूरा और गंध द्रव्य समर्पित करने से शत्रुओं के षड्यंत्र निष्फल हो जाते हैं और साधक को जीवन में अर्थ पुरुषार्थ की संपूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है।

तृतीय प्रहर: शुद्ध देशी गाय के घी से वामदेव स्वरूप का अर्चन

मध्यरात्रि 12 बजे से भोर 3 बजे तक का समय तृतीय प्रहर कहलाता है जिसे शास्त्रों में निशीथ काल की संज्ञा दी गई है। यह संपूर्ण महाशिवरात्रि का सबसे रहस्यमयी और ऊर्जावान कालखंड माना जाता है। इस प्रहर में भगवान शिव के वामदेव स्वरूप की उपासना की जाती है। वामदेव जल तत्त्व के अधिष्ठाता हैं जो सृष्टि के पोषण, संरक्षण, प्रजनन और दांपत्य सुख का संचालन करते हैं। यह स्वरूप अत्यंत सौम्य, सुंदर और वरदान देने वाला है।

तृतीय प्रहर में शिवलिंग का अभिषेक देशी गाय के शुद्ध गुनगुने घृत से किया जाता है। घी साक्षात तेज, ओज और आयु का प्रतीक है। जब शिवलिंग पर घृत की अखंड धारा प्रवाहित की जाती है, तब साधक को ॐ वामदेवाय नमः मंत्र का अखंड जप करना चाहिए।

यह अभिषेक उन जातकों के लिए अत्यंत फलदायी होता है जिनके दांपत्य जीवन में लंबे समय से विवाद चल रहा हो अथवा जो संतान सुख से वंचित हों। घी से किया गया यह रुद्राभिषेक काम पुरुषार्थ को धर्म संगत और पवित्र बनाता है। इससे वंश वृद्धि होती है, शारीरिक दुर्बलताएं समाप्त होती हैं और व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक ओज का संचार होता है। इस प्रहर में भगवान शिव को सफेद आंकड़े के पुष्प, सुगंधित इत्र और बिल्वपत्र की माला अर्पित करने से गृहस्थ जीवन में असीम शांति और सौहार्द स्थापित होता है।

चतुर्थ प्रहर: मधु और गन्ने के रस से सद्योजात स्वरूप की मुक्ति साधना

भोर 3 बजे से प्रातः 6 बजे तक का कालखंड चतुर्थ प्रहर कहलाता है जिसे ब्रह्म मुहूर्त की पावन वेला कहा जाता है। यह वह समय है जब अंधकार छंटने लगता है और सूर्य देव के आगमन की पूर्व सूचना मिलने लगती है। इस अंतिम प्रहर में भगवान शिव के सद्योजात स्वरूप की आराधना की जाती है। सद्योजात स्वरूप पृथ्वी तत्त्व का प्रतीक है जो नव सृजन, पुनर्जन्म और जीवन के अंतिम लक्ष्य मोक्ष का कारक है।

चतुर्थ प्रहर में शिवलिंग का अभिषेक शुद्ध प्राकृतिक शहद अर्थात मधु और ताजे गन्ने के रस से किया जाता है। शहद मिठास, आनंद और परमानंद का प्रतीक है जबकि गन्ने का रस जीवन के संपूर्ण रसों के सार को व्यक्त करता है। अभिषेक के समय ॐ सद्योजाताय नमः मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।

यह अंतिम प्रहर मनुष्य के समस्त संचित कर्म बंधनों को काटने वाला माना गया है। शहद और गन्ने के रस से अभिषेक करने से आत्मा पर चढ़े हुए जन्म जन्मांतर के मलिन संस्कार धुल जाते हैं और साधक को मोक्ष पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है। यह साधना मनुष्य को जन्म और मरण के चक्र से मुक्त करके शिव के परम पद में विलीन होने की योग्यता प्रदान करती है। इस प्रहर की पूजा संपन्न करने के पश्चात ही साधक को महाशिवरात्रि के संपूर्ण व्रत का पारण करने का शास्त्रीय अधिकार प्राप्त होता है।

प्रहर क्रमअभिषेक द्रव्यप्रमुख शास्त्रीय फलज्योतिषीय ग्रह दोष शांति
प्रथम प्रहरजल व कच्चा दूधधर्म रक्षा, मानसिक शांति व विद्या प्राप्तिचंद्रमा व शुक्र ग्रह दोष निवारण
द्वितीय प्रहरदेशी गाय का ताजा दहीधन प्राप्ति, कर्ज मुक्ति व शत्रु दमनमंगल व राहु ग्रह के अशुभ फल शांति
तृतीय प्रहरदेशी गाय का शुद्ध घीसंतान सुख, दांपत्य प्रेम व शारीरिक ओजगुरु व शनि ग्रह की प्रतिकूलता शांति
चतुर्थ प्रहरशुद्ध मधु व गन्ने का रससमस्त पाप क्षय, मोक्ष व आत्मबोधसूर्य व केतु ग्रह से जनित कष्ट निवारण

चतुःप्रहर अभिषेक के ज्योतिषीय और तांत्रिक रहस्य

ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से महाशिवरात्रि की रात सौरमंडल के समस्त ग्रह एक अत्यंत संवेदनशील और विशेष स्थिति में होते हैं। इस रात चंद्रमा अपनी क्षीणतम अवस्था के निकट होता है जिससे मनुष्य का मन अत्यधिक संवेदनशील और अंतर्मुखी हो जाता है। जब साधक इन चार प्रहरों में जागकर चार अलग अलग द्रव्यों से अभिषेक करता है, तो उसकी जन्म कुंडली में बैठे हुए नवग्रहों के समस्त क्रूर प्रभाव शांत हो जाते हैं।

प्रथम प्रहर का दूध अभिषेक चंद्रमा को बलवान बनाता है जिससे अवसाद और मानसिक तनाव दूर होता है। द्वितीय प्रहर का दही अभिषेक शुक्र और मंगल के असंतुलन को ठीक करके सुख संपदा लाता है। तृतीय प्रहर का घृत अभिषेक सूर्य और बृहस्पति को बलवान करके आत्मबल और विवेक प्रदान करता है। चतुर्थ प्रहर का मधु अभिषेक राहु, केतु और शनि के अशुभ कर्म बंधनों को काटकर व्यक्ति को मोक्ष मार्ग पर अग्रसर करता है। इस प्रकार यह चार प्रहर पूजा केवल एक पूजा पद्धति नहीं है बल्कि यह संपूर्ण मानव जीवन को ग्रहों की पीड़ा से मुक्त करके परमात्मा के साथ एकाकार करने का एक पूर्ण वैज्ञानिक और तांत्रिक विधान है।

FAQ

महाशिवरात्रि की चार प्रहर पूजा का क्या महत्व है?
चार प्रहर पूजा करने से मनुष्य के जीवन के चारों पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष एक ही रात की साधना से सिद्ध हो जाते हैं।

प्रथम प्रहर की पूजा में किस देवता स्वरूप की पूजा होती है?
प्रथम प्रहर में भगवान शिव के ईशान स्वरूप की पूजा गंगाजल और कच्चे दूध से की जाती है जो धर्म की रक्षा करता है।

द्वितीय प्रहर में दही से अभिषेक करने का क्या फल मिलता है?
द्वितीय प्रहर में दही से अघोर स्वरूप का अभिषेक करने से दरिद्रता समाप्त होती है और अटूट धन संपदा तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

संतान प्राप्ति और दांपत्य सुख के लिए किस प्रहर में पूजा करनी चाहिए?
संतान और वैवाहिक सुख के लिए तृतीय प्रहर में शुद्ध गाय के घी से वामदेव स्वरूप का अभिषेक करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

चतुर्थ प्रहर की पूजा के बाद व्रत का पारण कैसे किया जाता है?
चतुर्थ प्रहर की पूजा संपन्न करके सूर्योदय के बाद स्नान और ब्राह्मण को दान दक्षिणा देकर ही सात्विक रूप से व्रत का पारण करना चाहिए।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

पं. नरेंद्र शर्मा (63)


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