महाशिवरात्रि का गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य क्या है?

By पं. अमिताभ शर्मा

लिंगोद्भव काल, शिव पार्वती विवाह, चारों प्रहर पूजा और कुंडलिनी जागरण

महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व: पूजा विधि और रहस्य

महाशिवरात्रि का पंचांग विवरण और चारों प्रहर की पूजा विधि

महाशिवरात्रि का पावन पर्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार यह तिथि संपूर्ण वर्ष की सबसे शक्तिशाली आध्यात्मिक रात्रि मानी जाती है। इसी पावन निशा में परब्रह्म शिव का प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में प्राकट्य हुआ था जिसे लिंगोद्भव काल कहा जाता है। इसके साथ ही इसी रात्रि को वैराग्य के स्वामी भगवान शिव और शक्ति स्वरूपा माता पार्वती का दिव्य विवाह संपन्न हुआ था। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह महापर्व प्रतिवर्ष फरवरी के अंतिम सप्ताह अथवा मार्च के प्रथम सप्ताह में पड़ता है।

पंचांग घटकशास्त्रीय विवरण
मास एवं पक्षफाल्गुन मास, कृष्ण पक्ष
पावन तिथिकृष्ण चतुर्दशी (निशीथ काल व्यापिनी)
नक्षत्र संबंधश्रवण अथवा धनिष्ठा नक्षत्र का दुर्लभ योग
मुख्य कालनिशीथ काल मध्य रात्रि व्यापिनी वेला
प्रधान साधनापार्थिव शिवलिंग निर्माण, चार प्रहर अभिषेक, रात्रि जागरण
नैवेद्य द्रव्यपंचामृत, बेलपत्र, भांग, धतूरा, मदार पुष्प, भस्म
मुख्य फलसंचित कर्मों का क्षय, कुंडलिनी जागरण और मोक्ष प्राप्ति

महाशिवरात्रि के दिन प्रत्येक साधक को अपने जीवन के कल्याण और आत्मिक उत्थान के लिए शास्त्रों में बताए गए विशिष्ट नियमों का पालन करना चाहिए।

  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर तीर्थ जल अथवा शुद्ध शीतल जल से स्नान करके श्वेत अथवा पीत वस्त्र धारण करना।
  • मन, वचन और कर्म से पूर्ण शुद्धि रखते हुए दिनभर निराहार अथवा फलाहार व्रत का दृढ़ संकल्प लेना।
  • शुद्ध पवित्र मिट्टी, गाय के गोबर और भस्म के संयोग से श्रद्धापूर्वक पार्थिव शिवलिंग का निर्माण करना।
  • रात्रि के चारों प्रहरों में निरंतर जागते हुए देवाधिदेव महादेव का अलग अलग द्रव्यों से अभिषेक करना।
  • भगवान शिव को तीन पत्तियों वाले अखंडित बेलपत्र, धतूरा, आक के पुष्प और भस्म अत्यंत श्रद्धा से अर्पित करना।
  • महामृत्युंजय मंत्र अथवा पंचाक्षर मंत्र ॐ नमः शिवाय का बिना रुके कम से कम 108 बार या उससे अधिक जप करना।
  • किसी भी व्यक्ति की निंदा, कटु वचन, क्रोध, कामुक विचार और आलस्य का मन से पूर्ण परित्याग करना।
  • अगले दिन प्रातः काल सूर्योदय के पश्चात स्नान और दान करके ही शास्त्रीय विधि से व्रत का पारण करना।

महाशिवरात्रि की संपूर्ण रात्रि को चार प्रहरों में विभाजित करके साधना करने का विधान है। प्रत्येक प्रहर की पूजा का अपना विशेष द्रव्य, मंत्र और आध्यात्मिक प्रतिफल होता है।

पूजा प्रहरशास्त्रीय समयप्रमुख अभिषेक द्रव्यवैदिक मंत्रअभीष्ट आध्यात्मिक फल
प्रथम प्रहरसायंकाल 6 बजे से 9 बजेशुद्ध देशी गाय का कच्चा दूधॐ सद्योजाताय नमःशारीरिक आरोग्य, शांति और धर्म की सिद्धि
द्वितीय प्रहररात्रि 9 बजे से 12 बजेदेशी गाय के दूध का ताजा दहीॐ वामदेवाय नमःआर्थिक शुद्धि, मानसिक स्थिरता और अर्थ सिद्धि
तृतीय प्रहरमध्य रात्रि 12 बजे से 3 बजेदेशी गाय का शुद्ध घृतॐ अघोराय नमःकाम वासना का शमन, तेज और आत्मबल
चतुर्थ प्रहरभोर 3 बजे से प्रातः 6 बजेशुद्ध प्राकृतिक मधु अर्थात शहदॐ तत्पुरुषाय नमःमोक्ष की प्राप्ति और जन्म मरण से मुक्ति

लिंगोद्भव काल और निराकार से साकार का प्राकट्य

महाशिवरात्रि का सबसे गूढ़ और तात्विक पक्ष लिंगोद्भव का रहस्य है। शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता में यह पावन आख्यान आता है कि सृष्टि के आरंभ में जब भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के मध्य अपने अपने बड़प्पन को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ, तब उन दोनों के अहंकार को शांत करने के लिए उस परम अंधकारमय अंतरिक्ष में एक असीम, तेजोमय और अनादि अनंत अग्नि स्तंभ प्रकट हुआ। उस ज्योतिर्मय स्तंभ का न तो कोई आदि दिखाई देता था और न ही कोई अंत।

ब्रह्मा जी हंस का रूप धारण करके ऊपर की ओर गए और भगवान विष्णु वराह का रूप धारण करके उस ज्योतिर्लिंग के तल की खोज में नीचे की ओर पाताल में गए। हजारों वर्षों की यात्रा के पश्चात भी दोनों में से कोई भी उस दिव्य प्रकाश स्तंभ की सीमा को न पा सका। अंततः भगवान विष्णु ने अपनी पराजय स्वीकार कर ली जबकि ब्रह्मा जी ने केतकी के पुष्प से असत्य गवाही दिलवाकर यह दावा किया कि उन्होंने ज्योतिर्लिंग का शिखर देख लिया है। उसी क्षण उस विशाल ज्योतिर्मय स्तंभ के मध्य से सदाशिव प्रकट हुए। उन्होंने असत्य भाषण के कारण ब्रह्मा जी की पूजा का निषेध कर दिया और विष्णु जी की सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर उन्हें अपने समान पूज्य बनाया।

जिस पावन रात्रि को यह अनंत प्रकाश स्तंभ प्रकट हुआ, वह फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की ही निशा थी। इसलिए महाशिवरात्रि पर शिवलिंग की पूजा वस्तुतः उस निराकार, अजन्मा और सर्वव्यापी चेतना की ही पूजा है जो समस्त ब्रह्मांड को अपने भीतर धारण किए हुए है। शिवलिंग किसी व्यक्ति की मूर्ति नहीं है, बल्कि यह अनंत ब्रह्मांड और शून्य से अनंत तक फैली हुई ऊर्जा का प्रत्यक्ष प्रतीक है।

शिव और पार्वती का अलौकिक विवाह तथा पुरुष प्रकृति मिलन

महाशिवरात्रि की दूसरी सबसे लोकप्रसिद्ध और मंगलकारी कथा देवाधिदेव महादेव और जगज्जननी माता पार्वती के पावन परिणय की है। पूर्व जन्म में माता पार्वती ही राजा दक्ष की पुत्री सती थीं। उन्होंने अपने पिता के यज्ञ कुंड में अपने पति शिव के अपमान को सहन न कर पाने के कारण अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। इसके पश्चात उन्होंने पर्वतराज हिमालय और मैना के घर पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया।

माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की। उन्होंने हजारों वर्षों तक केवल वायु और सूखे पत्तों का सेवन करते हुए अपर्णा नाम धारण किया। उनकी निष्काम भक्ति और तप से द्रवित होकर वैराग्य के स्वामी भगवान शिव ने विवाह की सहमति दी। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को भगवान शिव नंदी पर सवार होकर अपने समस्त गणों, भूतों, पिशाचों, यक्षों, गंधर्वों और देवताओं के साथ बारात लेकर हिमालय के द्वार पहुंचे।

आध्यात्मिक दृष्टि से यह विवाह केवल दो पौराणिक चरित्रों का मिलन नहीं है। यह सांख्य दर्शन और वेदांत में वर्णित पुरुष और प्रकृति का परम तात्विक संयोग है। भगवान शिव शांत, अक्रिय और सर्वव्यापी चेतना पुरुष के प्रतीक हैं, जबकि माता पार्वती गतिमान, सृजनशील और जागतिक ऊर्जा प्रकृति की प्रतीक हैं। जब तक चेतना ऊर्जा से नहीं मिलती, तब तक सृष्टि का कोई भी कार्य संचालित नहीं हो सकता। महाशिवरात्रि की रात चेतना और ऊर्जा का यही महामिलन घटित होता है, जिससे संपूर्ण ब्रह्मांड में नवसृजन की तरंगे प्रवाहित होने लगती हैं।

कुंडलिनी जागरण और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का उर्ध्वगमन

आधुनिक विज्ञान और योग शास्त्र दोनों ही इस सत्य को स्वीकार करते हैं कि महाशिवरात्रि की रात्रि को पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में एक अत्यंत विलक्षण खगोलीय घटना घटित होती है। इस पावन रात्रि को ग्रहों की चाल और पृथ्वी का चुंबकीय झुकाव इस प्रकार संरेखित होता है कि संपूर्ण प्रकृति में ऊर्जा का एक अत्यंत शक्तिशाली प्राकृतिक उर्ध्वगामी प्रवाह उत्पन्न होता है। यह ऊर्जा नीचे से ऊपर की ओर बहने लगती है।

योग परंपरा में इस बात पर विशेष बल दिया जाता है कि महाशिवरात्रि की रात्रि को व्यक्ति को अपनी रीढ़ की हड्डी को बिल्कुल सीधा रखकर जागते रहना चाहिए। जब कोई साधक सीधा बैठकर ध्यान करता है, तो उसके शरीर के भीतर स्थित मूलाधार चक्र में सुप्त पड़ी हुई कुंडलिनी शक्ति को जागने में प्राकृतिक ब्रह्मांडीय ऊर्जा से भारी सहायता मिलती है। जो व्यक्ति इस रात्रि को लेटकर सो जाता है, वह इस दिव्य प्राकृतिक उभार का लाभ उठाने से वंचित रह जाता है।

मानव शरीर का चक्रचक्र की स्थितिशिव साधना का प्रभावसाधक की चेतना का विकास
मूलाधार चक्ररीढ़ का आधारभय और भौतिक आसक्ति का नाशस्थिरता और आधारभूत शुद्धि
स्वाधिष्ठान चक्रजननांग के पीछेकामुक वासना और लोलुपता का शमनसृजनात्मक ऊर्जा का रूपांतरण
मणिपुर चक्रनाभि केंद्रपाचन अग्नि और प्राण का संतुलनअदम्य इच्छाशक्ति और आत्मबल
अनाहत चक्रहृदय का मध्यद्वेष, ईर्ष्या और अहंकार का विसर्जननिष्काम प्रेम और वैश्विक करुणा
विशुद्ध चक्रकंठ का भागवाणी दोषों का शमन, विष का रूपांतरणसत्यवादिता और आत्म नियंत्रण
आज्ञा चक्रदोनों भौंहों के मध्यद्वैत का अंत, त्रिनेत्र का उद्घाटनअंतर्ज्ञान और दिव्य दृष्टि की प्राप्ति
सहस्रार चक्रमस्तक का शीर्षशिव और शक्ति का परम तात्विक मिलनसमाधि और मोक्ष का साक्षात्कार

जब कुंडलिनी शक्ति इन सातों चक्रों को भेदती हुई सहस्रार चक्र में स्थित शिव तत्व से मिलती है, तब साधक को मोक्ष का प्रत्यक्ष अनुभव होता है। महाशिवरात्रि की रात यह प्रक्रिया किसी भी अन्य दिन की तुलना में सैकड़ों गुना अधिक सहज हो जाती है।

पार्थिव शिवलिंग का निर्माण और तांत्रिक साधना विधान

शिव महापुराण में समस्त प्रकार के शिवलिंगों में मिट्टी से बने पार्थिव शिवलिंग की पूजा को सर्वश्रेष्ठ और तुरंत फल देने वाला बताया गया है। पार्थिव शिवलिंग की पूजा से करोड़ों जन्मों के संचित पापों का तत्काल नाश हो जाता है और साधक को मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है।

पार्थिव शिवलिंग बनाने के लिए किसी पवित्र नदी का किनारा, बेल के वृक्ष की जड़ अथवा किसी स्वच्छ भूमि से मिट्टी लानी चाहिए। उस मिट्टी को अच्छी तरह छानकर उसमें थोड़ा सा गाय का गोबर, भस्म, थोड़ा सा गंगाजल और सुगंधित चंदन मिलाकर गूंथना चाहिए। इसके पश्चात पूर्वाभिमुख होकर ॐ नमः शिवाय मंत्र का उच्चारण करते हुए अंगूठे के पोर से बड़े आकार का सुंदर शिवलिंग और उसकी वेदी बनानी चाहिए।

पार्थिव शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा करके उस पर षोडशोपचार विधि से पूजा की जाती है। सबसे पहले जल, दूध, दही, घी, शहद और शर्करा से बने पंचामृत से स्नान कराया जाता है। इसके पश्चात गंध, अक्षत, तीन दल वाले बिना कटे फटे बेलपत्र, धतूरे का फल, भांग की पत्तियां और नीले या सफेद पुष्प अर्पित किए जाते हैं। तंत्र शास्त्र के अनुसार महाशिवरात्रि की महारात्रि कालरात्रि, मोहरात्रि और वीररात्रि के समान ही एक परम सिद्ध रात्रि है। इस रात में किया गया कोई भी तांत्रिक अनुष्ठान, मंत्र जप अथवा रुद्राभिषेक कभी निष्फल नहीं जाता। जो व्यक्ति अपनी जन्म कुंडली में स्थित भयंकर कालसर्प दोष, शनि की साढ़ेसाती अथवा मार्केश के अशुभ प्रभाव से पीड़ित हैं, उन्हें इस रात पार्थिव शिवलिंग के समक्ष महामृत्युंजय मंत्र का संपुटित पाठ अवश्य करना चाहिए।

संचित कर्मों का क्षय और परम चेतना में विलय

महाशिवरात्रि का पर्व केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं है, इसका वास्तविक लक्ष्य आत्मा की मुक्ति और कर्म बंधनों का टूटना है। मनुष्य अपने अनेक जन्मों में तीन प्रकार के कर्म संचित करता है, जिन्हें संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म और क्रियमाण कर्म कहा जाता है। संचित कर्म हमारे अंतःकरण के भीतर बीजों के रूप में छिपे रहते हैं जो अनुकूल अवसर मिलते ही दुख और व्याधि बनकर प्रस्फुटित होते हैं।

भगवान शिव को संहारक कहा जाता है, परंतु वे केवल भौतिक जगत के संहारक नहीं हैं बल्कि वे जीवों के अज्ञान, पाप और कर्म बंधनों के संहारक हैं। महाशिवरात्रि की रात जब साधक अपने मन की संपूर्ण वृत्तियों को समेटकर शिव के चरणों में समर्पित कर देता है, तो ज्ञान रूपी तीसरी आंख के खुलते ही उसके संचित कर्मों के बीज उसी प्रकार जलकर राख हो जाते हैं जैसे अग्नि के संपर्क में आने पर घास का ढेर भस्म हो जाता है।

यह रात क्षमा मांगने और पुरानी कड़वाहटों को भूल जाने की रात है। भगवान शिव नीलकंठ कहलाते हैं क्योंकि उन्होंने समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को अपने कंठ में धारण करके संपूर्ण जगत की रक्षा की थी। महाशिवरात्रि हमें यही संदेश देती है कि संसार से मिलने वाले अपमान, कटुता और विष को दूसरों पर उगलने के स्थान पर अपने विवेक रूपी कंठ में रोक लेना चाहिए और केवल अमृत ही बाहर बांटना चाहिए। जब साधक इस भाव को आत्मसात कर लेता है, तब वह संसार में रहते हुए भी संसार से मुक्त हो जाता है।

FAQ

महाशिवरात्रि और मासिक शिवरात्रि में क्या अंतर है?
प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि आती है, परंतु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को आने वाली शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है क्योंकि इस दिन लिंगोद्भव और शिव पार्वती विवाह हुआ था।

महाशिवरात्रि पर रात्रि जागरण का क्या महत्व है?
इस रात ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रवाह प्राकृतिक रूप से ऊपर की ओर होता है, इसलिए सीधे बैठकर जागरण करने से कुंडलिनी शक्ति का जागरण सहज हो जाता है।

पार्थिव शिवलिंग की पूजा का क्या विशेष फल मिलता है?
पार्थिव शिवलिंग की पूजा करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है, कालसर्प दोष दूर होता है और करोड़ों जन्मों के संचित पाप नष्ट हो जाते हैं।

महाशिवरात्रि के चार प्रहर की पूजा का क्या लाभ है?
चार प्रहर की पूजा करने से मनुष्य के जीवन के चारों पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सिद्ध होते हैं तथा मन की समस्त अशांति दूर होती है।

शिवलिंग पर कौन सी वस्तुएं कभी नहीं चढ़ानी चाहिए?
शिवलिंग पर केतकी का फूल, तुलसी दल, रोली या कुमकुम, हल्दी और शंख से जल कभी भी अर्पित नहीं करना चाहिए।

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

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