By पं. अमिताभ शर्मा
सूर्य का मीन राशि में प्रवेश और वर्ष के दूसरे खरमास का आरंभ

वैदिक ज्योतिष और काल गणना में संक्रांति उस विशिष्ट खगोलीय घटना को कहा जाता है जब संपूर्ण सौरमंडल के राजा और आत्मा के कारक भगवान सूर्य देव एक राशि चक्र को छोड़कर दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं। फाल्गुन मास के उत्तरार्ध में जब भगवान भुवन भास्कर अपने पुत्र शनि देव की स्थिर वायु तत्त्वीय राशि कुंभ से निकलकर देवगुरु बृहस्पति की द्विस्वभाव जल तत्त्वीय राशि मीन में प्रवेश करते हैं, तो इस पावन खगोलीय परिवर्तन को मीन संक्रांति कहा जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार यह संपूर्ण चांद्र संवत्सर की 12वीं तथा अंतिम संक्रांति होती है। इसके पश्चात सूर्य देव पुनः मेष राशि में प्रवेश करते हैं जिससे नवीन सौर संवत्सर का शुभारंभ होता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह खगोलीय घटना प्रतिवर्ष 14 अथवा 15 मार्च के आसपास घटित होती है।
| पंचांग घटक | शास्त्रीय विवरण |
|---|---|
| मास एवं पक्ष | फाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष संधिकाल |
| खगोलीय घटना | सूर्य देव का कुंभ राशि से मीन राशि में प्रवेश |
| संक्रांति स्वरूप | वर्ष की 12वीं तथा अंतिम सौर संक्रांति |
| राशि स्वामी संबंध | शनि की राशि से निकलकर देवगुरु बृहस्पति के गृह में गमन |
| प्रभाव काल | आगामी एक सौर मास (लगभग 30 दिन) तक खरमास |
| मुख्य तीर्थ | हरिद्वार, प्रयागराज संगम, काशी, उज्जैन शिप्रा तट |
| मुख्य आध्यात्मिक फल | आत्म शुद्धि, पितृ शांति, पाप क्षय और मोक्ष मार्ग प्रशस्त |
मीन संक्रांति के पावन अवसर पर पुण्य काल का संपूर्ण फल प्राप्त करने और सूर्य जनित नकारात्मक प्रभावों को शांत करने के लिए साधक को सूर्योदय से ही विशिष्ट शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।
मीन संक्रांति के घटित होते ही संपूर्ण भारतवर्ष में वर्ष का दूसरा खरमास जिसे जनसाधारण में मलमास भी कहा जाता है, प्रारंभ हो जाता है। वर्ष में दो बार खरमास का निर्माण होता है: प्रथम बार जब सूर्य देव गुरु की आग्नेय राशि धनु में प्रवेश करते हैं (दिसंबर से जनवरी) और द्वितीय बार जब सूर्य देव गुरु की जलीय राशि मीन में प्रवेश करते हैं (मार्च से अप्रैल)। यह स्थिति तब तक बनी रहती है जब तक कि सूर्य देव मीन राशि से निकलकर मेष राशि में उच्च के नहीं हो जाते।
सनातन धर्म की आचार संहिताओं, निर्णय सिंधु और धर्म सिंधु में यह स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि मीन संक्रांति से लेकर मेष संक्रांति तक का एक मास समस्त प्रकार के 16 संस्कारों और नवीन भौतिक विस्तार के लिए पूर्णतः निषिद्ध होता है। इस एक मास की अवधि में निम्नलिखित कार्यों पर पूर्ण विराम लग जाता है:
| मांगलिक कार्य | खरमास में निषेध का कारण | संभावित नकारात्मक परिणाम |
|---|---|---|
| विवाह संस्कार | गुरु ग्रह का तेज सूर्य के सानिध्य से मलिन होना | दांपत्य जीवन में अलगाव व सुख की कमी |
| गृह प्रवेश | वास्तु पुरुष और दिशाओं की ऊर्जा का अंतर्मुखी होना | गृह क्लेश, आर्थिक तंगी व स्वास्थ्य हानि |
| नवीन व्यापार आरंभ | देवगुरु के विवेक और लाभ भाव में अवरोध | पूंजी का डूबना व साझेदारों में विवाद |
| मुंडन व उपनयन | संस्कार ऊर्जा का शारीरिक स्तर पर न ठहरना | बौद्धिक विकास में बाधा व संस्कारों की न्यूनता |
खरमास की उत्पत्ति के पीछे वैदिक ज्योतिष और पौराणिक ग्रंथों में एक अत्यंत प्रतीकात्मक आख्यान मिलता है। भगवान सूर्य देव के रथ में सात घोड़े जुते होते हैं जो प्रकाश की सात किरणों और सप्ताह के सात दिनों के प्रतीक हैं। सूर्य देव निरंतर संपूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा करते हैं और अपनी गति से काल चक्र को संचालित करते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार निरंतर दौड़ते रहने के कारण एक बार सूर्य देव के सातों घोड़े अत्यंत थक गए और उन्हें तीव्र प्यास लगी।
अपने घोड़ों की इस दयनीय स्थिति को देखकर भगवान सूर्य का हृदय करुणा से भर गया। वे अपने रथ को एक शीतल सरोवर के किनारे ले गए ताकि घोड़े जल पी सकें। परंतु सूर्य देव के रथ का रुकना संपूर्ण सृष्टि के काल चक्र के रुक जाने के समान था। अतः सूर्य देव ने उन सातों घोड़ों को विश्राम देने के लिए सरोवर तट पर छोड़ दिया और उस स्थान पर विचरण कर रहे दो गधों (जिन्हें संस्कृत में खर कहा जाता है) को अपने रथ में जोत लिया।
गधों की चाल घोड़ों की तुलना में अत्यंत मंद और अनिश्चित होती है। खर के जुतते ही सूर्य के रथ की गति अत्यंत धीमी हो गई और उनका तेज मंद पड़ गया। सूर्य देव ने पूरे एक मास तक उन गधों के सहारे अपनी यात्रा पूरी की, जिसके कारण उस कालखंड को खरमास कहा जाने लगा। जब एक मास पूर्ण हुआ और सूर्य देव पुनः अपने घोड़ों के साथ जुड़े तब उनका तेज पुनः अपनी स्वाभाविक प्रखरता को प्राप्त हुआ। यह आख्यान खगोलीय दृष्टि से सूर्य की मंद गति और उत्तरायण काल में ऋतु परिवर्तन के उस नाजुक दौर को दर्शाता है जहां प्रकृति को एक विश्राम की आवश्यकता होती है।
वैदिक ज्योतिष में संक्रांति के क्षण का गणितीय विश्लेषण अत्यंत सूक्ष्मता से किया जाता है। जिस निश्चित पल पर सूर्य की किरणें नई राशि की सीमा में प्रवेश करती हैं, उसे संक्रांति क्षण कहा जाता है। उस क्षण से पूर्व और पश्चात की कुछ विशिष्ट घटियों को पुण्य काल और महापुण्य काल की संज्ञा दी जाती है। इन कालखंडों में किया गया स्नान और दान सामान्य दिनों की तुलना में सहस्र गुना अधिक फल प्रदान करता है।
संक्रांति के समय का गणितीय विभाजन निम्नलिखित प्रकार से शास्त्रों में उल्लिखित है:
मीन संक्रांति वर्ष की अंतिम संक्रांति होने के कारण पितरों के तर्पण और संचित पापों के क्षय के लिए एक महा-पर्व मानी गई है। भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है कि जो व्यक्ति मीन संक्रांति पर तीर्थराज प्रयाग के त्रिवेणी संगम, हरिद्वार में हर की पौड़ी अथवा काशी में मणिकर्णिका घाट पर स्नान करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है।
जो साधक तीर्थों पर जाने में असमर्थ हों, वे अपने घर पर ही निम्नलिखित विधि से साधना संपन्न कर सकते हैं:
आधुनिक मनुष्य प्रायः खरमास को एक अशुभ अथवा नकारात्मक समय मान बैठता है, परंतु यह एक भारी भ्रम है। सनातन धर्म में कोई भी काल अशुभ नहीं होता। खरमास भौतिक और सांसारिक भोग विलास के लिए रुकावट का समय हो सकता है, परंतु आध्यात्मिक साधना, आत्मनिरीक्षण, योग, वेदांत अध्ययन और ईश्वर शरणागति के लिए यह वर्ष का सबसे स्वर्णिम काल माना गया है।
सूर्य आत्मा का प्रतीक है और गुरु परमात्मा के ज्ञान के प्रतीक हैं। जब आत्मा परमात्मा के ज्ञान की राशि मीन में प्रवेश करती है, तो वह काल बाह्य दुनिया में भागने का नहीं, अपितु अपने भीतर उतरने का समय होता है। यह एक मास मनुष्य को यह स्मरण कराता है कि केवल धन कमाना, विवाह करना और मकान बनाना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं है। आत्मा की वास्तविक भूख परमात्मा का साक्षात्कार है। जो साधक इस खरमास की अवधि में प्रतिदिन भगवद्गीता, भागवत महापुराण का स्वाध्याय करते हैं और नाम जप में समय व्यतीत करते हैं, उनकी आत्मा कुंदन की भांति शुद्ध हो जाती है। यह कालखंड मनुष्य को आगामी चैत्र मास के सनातन नववर्ष और चैत्र नवरात्रि के स्वागत के लिए पूरी तरह तैयार कर देता है।
मीन संक्रांति किसे कहा जाता है?
जब भगवान सूर्य देव कुंभ राशि को छोड़कर देवगुरु बृहस्पति की मीन राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस पावन खगोलीय संक्रमण को मीन संक्रांति कहा जाता है।
मीन संक्रांति से कौन सा काल प्रारंभ होता है?
मीन संक्रांति के साथ ही वर्ष का दूसरा खरमास (मलमास) प्रारंभ हो जाता है, जो सूर्य के मेष राशि में जाने तक लगभग एक माह तक चलता है।
खरमास के दौरान कौन से कार्य वर्जित माने जाते हैं?
विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन, उपनयन, नया व्यापार आरंभ करना और अचल संपत्ति की रजिस्ट्री जैसे समस्त 16 संस्कार और मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं।
मीन संक्रांति पर किस रंग की वस्तुओं का दान सबसे श्रेष्ठ होता है?
मीन राशि देवगुरु बृहस्पति की राशि है, इसलिए इस दिन पीले वस्त्र, चने की दाल, हल्दी, गुड़, पीतल के बर्तन और सोने का दान सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
क्या खरमास में पूजा पाठ और मंत्र जप किया जा सकता है?
हाँ, खरमास केवल सांसारिक और भौतिक कार्यों के लिए वर्जित है; जप, तप, ध्यान, श्रीमद्भागवत कथा और तीर्थ स्नान के लिए यह समय सर्वोत्तम माना गया है।
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