पलाश के फूलों का क्या महत्व है?

By पं. सुव्रत शर्मा

त्वचा रोग निवारण, चंद्र-शुक्र शांति और प्राकृतिक गुलाल

पलाश के फूल: स्वास्थ्य लाभ, चंद्र शुक्र उपाय और प्राकृतिक गुलाल

पंचांग पृष्ठभूमि और पलाश का वानस्पतिक परिचय

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में जब वसंत ऋतु अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचती है तब संपूर्ण प्रकृति एक दिव्य स्वर्णिम और रक्तिम आभा से आच्छादित हो जाती है। इस पावन कालखंड में भारतीय वनों और उपवनों में पलाश के वृक्ष प्रस्फुटित होते हैं। पलाश को वनस्पति विज्ञान में ब्यूटिया मोनोस्पर्मा कहा जाता है और लोकभाषा में इसे टेसू, ढाक अथवा जंगल की ज्वाला के नाम से जाना जाता है। सनातन वैदिक पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास का यह समय केवल आध्यात्मिक पर्वों का ही नहीं, अपितु प्राकृतिक औषधियों के संग्रह और उनके प्रयोग का सर्वश्रेष्ठ संधिकाल माना गया है।

अथर्ववेद, चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में पलाश के पुष्प, छाल, बीज और पत्तों को महा-औषधि का दर्जा दिया गया है। प्राचीन काल में फाल्गुन पूर्णिमा और चैत्र प्रतिपदा के पावन रंगोत्सव पर किसी भी प्रकार के रासायनिक रंगों का अस्तित्व नहीं था। उस युग में संपूर्ण समाज पलाश के सूखे और ताजे फूलों को जल में उबालकर बने दिव्य केसरिया जल से ही होली खेलता था।

पंचांग व वानस्पतिक घटक शास्त्रीय व वैज्ञानिक विवरण
मास एवं ऋतु फाल्गुन मास और वसंत ऋतु का संधिकाल
वानस्पतिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा (पलाश अथवा टेसू)
संस्कृत नाम ब्रह्मवृक्ष, समिधा श्रेष्ठ, किंशुक, रक्तपुष्पक
अधिष्ठाता ग्रह चंद्र देव (मन कारक) और शुक्र देव (सौंदर्य कारक)
तात्विक गुण कषाय, तिक्त, शीत वीर्य और कफ पित्त शामक
प्रमुख उपयोग प्राकृतिक केसरिया गुलाल, चर्म रोग नाशक जल, शिव अभिषेक
आध्यात्मिक फल मानसिक शांति, शुक्र दोष निवारण और शारीरिक कांति

फाल्गुन मास में पलाश के फूलों का संपूर्ण औषधीय और ज्योतिषीय लाभ प्राप्त करने के लिए साधक को सूर्योदय से ही विशिष्ट शास्त्रीय नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।

  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर शीतल जल में पलाश के फूलों का उबला हुआ जल मिलाकर स्नान करना।
  • स्नान के उपरांत स्वच्छ श्वेत अथवा हल्के गुलाबी वस्त्र धारण करके पूजा वेदी को स्वच्छ करना।
  • शिवलिंग पर तांबे अथवा चांदी के पात्र से पलाश के फूलों से सुवासित शीतल जल की अखंड धार अर्पित करना।
  • भगवान शिव और माता पार्वती को पलाश के ताजे पुष्प अथवा उनसे बना प्राकृतिक केसरिया गुलाल समर्पित करना।
  • पलाश के फूलों के जल से बने अर्क का प्रयोग पूरे दिन की जाने वाली साधना में आचमन हेतु करना।
  • दिनभर सात्विक और हल्का आहार ग्रहण करना तथा अधिक मिर्च मसालेदार भोजन से पूर्णतः दूर रहना।
  • किसी भी व्यक्ति के प्रति कटु वाणी, ईर्ष्या, क्रोध और अमंगलकारी विचारों का मन में प्रवेश न होने देना।
  • सायंकाल के समय तुलसी के पौधे के समीप गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाकर चंद्र मंत्र का जप करना।

आयुर्वेदिक गुणधर्म और चर्म रोगों का समूल निवारण

आयुर्वेद के आधारभूत ग्रंथ चरक संहिता के अनुसार शिशिर ऋतु में शरीर के भीतर संचित हुआ कफ वसंत की तीखी धूप पाकर पिघलने लगता है। कफ के पिघलने से जठराग्नि मंद पड़ जाती है और रक्त में अशुद्धियां उत्पन्न होने लगती हैं। इसी समय प्रकृति में पलाश के फूल खिलते हैं जो अपने कषाय अर्थात कसैले और तिक्त अर्थात कड़वे रस के कारण कफ और पित्त दोनों दोषों को एक साथ शांत करने की अद्भुत क्षमता रखते हैं।

पलाश के फूलों में प्राकृतिक रूप से ब्यूटिन, फ्लेवोनोइड्स और शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट तत्व पाए जाते हैं जो मानव त्वचा के लिए एक अभेद्य सुरक्षा कवच का निर्माण करते हैं।

त्वचा व्याधि पलाश जल का औषधीय प्रभाव शास्त्रीय प्रयोग विधि अपेक्षित स्वास्थ्य लाभ
शीतपित्त व त्वचा एलर्जी हिस्टामाइन संतुलन व शीतलता पलाश जल से प्रातः स्नान खुजली व लाल चकत्तों का तत्काल शमन
कील मुहांसे व तैलीय त्वचा सीबम नियंत्रण व जीवाणु नाश फूलों के लेप का मुख पर प्रयोग त्वचा के छिद्रों की शुद्धि व कांति
एक्जिमा व सोरायसिस त्वचा की मृत कोशिकाओं का शोधन पलाश क्वाथ का निरंतर धावन नवीन त्वचा का निर्माण व जलन मुक्ति
ग्रीष्मकालीन घमौरियां स्वेद ग्रंथियों का प्राकृतिक संतुलन फूलों के अर्क का लेपन अत्यधिक पसीने व दुर्गंध का नाश

जब वसंत ऋतु में लोग पलाश के उबाले हुए जल से होली खेलते हैं, तो यह जल रोमछिद्रों के माध्यम से शरीर के भीतर प्रवेश करता है। यह प्राकृतिक जल न केवल त्वचा की बाहरी सतह को साफ करता है, अपितु यह रक्त वाहिकाओं में जाकर रक्त की अशुद्धियों को भी दूर करता है। इसके नियमित उपयोग से आने वाले ग्रीष्म काल में लू लगने और चेचक जैसे संक्रामक रोगों का भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है।

चंद्र और शुक्र ग्रह की शांति का ज्योतिषीय रहस्य

वैदिक ज्योतिष में पलाश के वृक्ष को अत्यंत पवित्र और देवतुल्य माना गया है। बृहत्संहिता और फलदीपिका के अनुसार पलाश के पुष्पों का सीधा संबंध नवग्रहों में जल तत्त्व के अधिष्ठाता चंद्र देव और सौंदर्य व ऐश्वर्य के कारक दैत्यगुरु शुक्र देव से है। यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में चंद्रमा क्षीण हो, राहु या केतु से पीड़ित होकर ग्रहण दोष बना रहा हो, अथवा षष्ठ, अष्टम भाव में बैठकर मानसिक अवसाद और अनिद्रा दे रहा हो, तो पलाश के फूलों का प्रयोग एक रामबाण उपाय सिद्ध होता है।

इसी प्रकार यदि शुक्र ग्रह कुंडली में नीच राशि कन्या में स्थित हो, सूर्य के अत्यधिक निकट होकर अस्त हो गया हो, अथवा वैवाहिक जीवन में निरंतर क्लेश और शारीरिक आकर्षण की कमी उत्पन्न कर रहा हो, तो पलाश के पुष्प शुक्र को बलवान बनाने का सबसे सात्विक साधन हैं।

  • चंद्र शांति के लिए फाल्गुन मास के प्रत्येक सोमवार को एक तांबे अथवा चांदी के लोटे में कच्चा गाय का दूध, थोड़ा सा गंगाजल और पलाश के 7 फूल डालकर शिवलिंग पर अभिषेक करें।
  • अभिषेक करते समय ॐ नमः शिवाय अथवा चंद्र गायत्री मंत्र ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्त्वाय धीमहि तन्नो सोमः प्रचोदयात् का निरंतर जप करते रहें।
  • शुक्र दोष निवारण के लिए शुक्रवार के दिन पलाश के ताजे फूलों को जल में उबालकर उस जल से स्नान करें और माता महालक्ष्मी को गुलाबी अबीर के साथ पलाश पुष्प अर्पित करें।
  • जिन दंपतियों के वैवाहिक जीवन में आकर्षण समाप्त हो गया हो, वे अपने शयनकक्ष में पलाश के सूखे फूलों की पंखुड़ियों को एक कांच के पात्र में सुगंधित इत्र छिड़क कर रखें।
  • पलाश की समिधा से किया गया शुक्र शांति हवन जातक के जीवन से दरिद्रता और अपयश को दूर करके भौतिक सुख साधनों की वर्षा कर देता है।

प्राकृतिक केसरिया गुलाल और रंग बनाने की वैज्ञानिक विधि

आजकल बाजारों में मिलने वाले अधिकांश रासायनिक रंगों में लेड, क्रोमियम, मरकरी और कांच का चूर्ण मिला होता है जो त्वचा को जला देता है और आंखों को अंधा तक कर सकता है। हमारे पूर्वजों ने इस समस्या का समाधान सहस्रों वर्ष पूर्व पलाश के फूलों से प्राकृतिक रंग बनाकर कर दिया था। घर पर ही विशुद्ध, औषधीय और सुगंधित गुलाल बनाने की वैदिक विधि अत्यंत सरल है।

  • सबसे पहले पलाश के ताजे अथवा छाया में सुखाए गए फूलों को एकत्र करें। ध्यान रहे कि फूलों को कभी भी सीधी तेज धूप में न सुखाएं ताकि उनका औषधीय तेल सुरक्षित रहे।
  • तरल केसरिया रंग बनाने के लिए लगभग 250 ग्राम सूखे पलाश के फूलों को 5 लीटर शुद्ध जल में डालकर रातभर मिट्टी अथवा तांबे के पात्र में भिगो दें।
  • प्रातः काल इस जल को धीमी आंच पर तब तक उबालें जब तक कि जल का रंग गहरा नारंगी अथवा सिंदूरी न हो जाए।
  • इस जल को ठंडा करके कपड़े से छान लें। इसमें सुगंध के लिए थोड़ा सा गुलाब जल, भीमसेनी कपूर और पिसा हुआ चंदन मिला लें। यह अमृतमयी केसरिया रंग तैयार है।
  • सूखा गुलाल बनाने के लिए पलाश के सूखे फूलों को अत्यंत बारीक पीसकर महीन चूर्ण बना लें।
  • इस चूर्ण में बराबर मात्रा में शुद्ध अरारोट का आटा अथवा मक्के का आटा मिलाएं।
  • इसमें एक चुटकी हल्दी और थोड़ी सी पिसी हुई मुल्तानी मिट्टी मिला देने से यह गुलाल अत्यंत मुलायम, त्वचा के लिए लाभकारी और रेशमी बन जाता है।
  • इस प्राकृतिक गुलाल को चेहरे पर लगाने से त्वचा में किसी भी प्रकार की जलन नहीं होती, अपितु चेहरा खिल उठता है।

भगवान शिव और पलाश समिधा का तांत्रिक अनुष्ठान

सनातन तंत्र और यज्ञ विज्ञान में पलाश को समिधा श्रेष्ठ अर्थात यज्ञ की लकड़ियों में सर्वश्रेष्ठ स्वीकार किया गया है। पलाश के वृक्ष को साक्षात ब्रह्मा, विष्णु और महेश का संयुक्त स्वरूप माना जाता है। महाभारत के अनुशासन पर्व में उल्लेख आता है कि पलाश की समिधा से प्रज्वलित अग्नि में दी गई आहुतियां सीधे देवताओं तक पहुंचती हैं और पर्यावरण से समस्त नकारात्मक जीवाणुओं को तत्काल नष्ट कर देती हैं।

फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि में अथवा महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर पलाश के फूलों से भगवान शिव का किया गया विशेष अनुष्ठान साधक के सभी मनोरथ पूर्ण करता है। एक ताम्र पात्र में गाय का कच्चा दूध लेकर उसमें पलाश के 108 फूलों को डुबो दें। इसके पश्चात महामृत्युंजय मंत्र का उच्चारण करते हुए एक एक फूल शिवलिंग पर अर्पित करते जाएं।

यह अनुष्ठान असाध्य रोगों से जूझ रहे रोगियों के लिए जीवनदायिनी संजीवनी सिद्ध होता है। इसके साथ ही पलाश की सूखी टहनियों से यज्ञ कुंड में अग्नि प्रज्वलित करके गाय के शुद्ध घी और काले तिल की 108 आहुतियां देने से घर के समस्त वास्तु दोष, प्रेत बाधाएं और नजर दोष जलकर भस्म हो जाते हैं। पलाश की लकड़ी से उत्पन्न धुआं वायुमंडल में उपस्थित हानिकारक रेडिएशन को सोखने की अद्भुत क्षमता रखता है।

पलाश का दार्शनिक संदेश और आत्मिक सौंदर्य

पलाश का खिलना केवल एक ऋतु चक्र का परिवर्तन नहीं है, अपितु यह मानव जीवन के लिए एक परम गहन आध्यात्मिक संदेश है। पलाश का वृक्ष पूरे वर्ष अत्यंत सामान्य, कांतिहीन और पत्तों से विहीन दिखाई देता है। ग्रीष्म ऋतु के आगमन से पूर्व जब अन्य वृक्ष सूखने लगते हैं तब पलाश बिना किसी पत्ते के केवल अपनी शाखाओं पर लाल और केसरिया फूलों की चादर ओढ़कर खिल उठता है।

यह दृश्य मनुष्य को सिखाता है कि बाह्य सुख साधनों और सांसारिक परिधानों के अभाव में भी यदि मनुष्य का अंतर्मन तपोमय हो, तो वह विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी खिल सकता है। पलाश का लाल रंग वैराग्य और त्याग का रंग है। जब साधक संसार के समस्त प्रलोभनों को त्यागकर अपनी आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है तब उसके जीवन में भी पलाश की भांति दिव्यता का प्रस्फुटन होता है। पलाश हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपने जीवन को प्राकृतिक, सात्विक और परोपकारी बनाएं ताकि हमारा प्रत्येक कर्म समाज और प्रकृति के लिए कल्याणकारी बन सके।

FAQ

पलाश के फूलों को किस अन्य नाम से जाना जाता है?
पलाश के फूलों को सामान्य लोकभाषा में टेसू, ढाक और जंगल की ज्वाला के नाम से जाना जाता है।

पलाश के जल से स्नान करने से किन रोगों में लाभ होता है?
पलाश के जल से स्नान करने से त्वचा की खुजली, एक्जिमा, घमौरियां, शीतपित्त और रक्त की अशुद्धियां पूरी तरह शांत हो जाती हैं।

ज्योतिष शास्त्र में पलाश का संबंध किन ग्रहों से है?
पलाश के फूलों का सीधा संबंध जल तत्त्वीय चंद्र ग्रह और सौंदर्य के कारक शुक्र ग्रह से माना गया है।

घर पर पलाश के फूलों से प्राकृतिक रंग कैसे बनाया जाता है?
सूखे पलाश के फूलों को रातभर पानी में भिगोकर उबालने से गहरा केसरिया तरल रंग बनता है और इसके चूर्ण को अरारोट में मिलाकर सूखा गुलाल बनाया जाता है।

भगवान शिव को पलाश के फूल अर्पित करने से क्या फल मिलता है?
भगवान शिव को पलाश के फूल अर्पित करने से मानसिक तनाव दूर होता है, गंभीर रोगों से मुक्ति मिलती है और कुंडली का चंद्र दोष शांत होता है।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

पं. सुव्रत शर्मा (63)


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इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

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