फाग साधना से अनाहत चक्र जागरण कैसे होता है?

By पं. सुव्रत शर्मा

'होरी' गीतों से अनाहत (हृदय) चक्र का जागरण और संगीत चिकित्सा

फाग साधना: अनाहत चक्र जागरण, संगीत चिकित्सा और होरी

पंचांग पृष्ठभूमि और ब्रज अवध की फाग गायन परंपरा

सनातन वैदिक पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास संपूर्ण वर्ष का सर्वाधिक संगीतमय, रससिक्त और भावात्मक कालखंड माना जाता है। वसंत पंचमी से प्रारंभ होकर चैत्र कृष्ण प्रतिपदा तक चलने वाले इस चालीस दिवसीय उत्सव में उत्तर भारत की पावन तीर्थ भूमियों-विशेष रूप से ब्रज मंडल (मथुरा, वृंदावन, बरसाना, नंदगांव), अवध धाम (अयोध्या) और मिथिला क्षेत्र (जनकपुर)-में पारंपरिक फाग, धमार और होरी गीतों की अविरल धारा प्रवाहित होती है। वैदिक पंचांग के अनुसार यह कालखंड केवल ऋतु परिवर्तन का सूचक नहीं है, अपितु यह नाद ब्रह्म की वह गुप्त तांत्रिक वेदी है जहां शास्त्रीय संगीत, लोक गायन और अनन्य भक्ति एक साथ मिलकर मानव चेतना को भौतिक बंधनों से मुक्त कर देते हैं।

सामवेद में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि गीतों और छंदों के माध्यम से की गई ईश्वर की आराधना समस्त तपस्याओं में शिरोमणि होती है। फाग गायन केवल मनोरंजन अथवा लोक संस्कृति का अंग नहीं है, अपितु यह भक्ति योग की एक अत्यंत उच्च, सूक्ष्म और वैज्ञानिक साधना है। जब कोई साधक ब्रज के पारंपरिक पदों का सस्वर गायन करता है, तो उसके कंठ से निकलने वाली ध्वनियां ब्रह्मांडीय स्पंदनों के साथ एकाकार हो जाती हैं।

पंचांग व संगीत घटक शास्त्रीय विवरण
मास एवं कालखंड फाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष व कृष्ण पक्ष संधिकाल
प्रधान संगीत विधा धमार ताल, राग काफी, राग पीलू, राग खमाज व होरी पद
अधिष्ठाता युगल सत्ता भगवान श्री राधा कृष्ण एवं प्रभु श्री सीताराम
प्रमुख वाद्य यंत्र पखावज, मृदंग, ढोलक, झांझ, मंजीरा, करताल और डफ
सक्रिय होने वाला चक्र अनाहत चक्र (हृदय प्रदेश में स्थित द्वादश दल कमल)
मुख्य आध्यात्मिक रस माधुर्य रस, सख्य रस और वात्सल्य रस
अंतिम आध्यात्मिक फल हृदय ग्रंथियों का भेदन, अवसाद मुक्ति और पराभक्ति

फाग साधना का संपूर्ण आध्यात्मिक और यौगिक लाभ प्राप्त करने के लिए प्रत्येक साधक को सूर्योदय से ही विशिष्ट शास्त्रीय नियमों और संगीत मर्यादाओं का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।

  • प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में उठकर शीतल जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करना और श्वेत अथवा बसंती वस्त्र धारण करना।
  • गृह मंदिर में भगवान श्री राधा कृष्ण अथवा श्री सीताराम के विग्रह के सम्मुख गाय के शुद्ध घी का अखंड दीपक प्रज्वलित करना।
  • विग्रह के चरणों में शुद्ध प्राकृतिक लाल गुलाल, अबीर और चंदन समर्पित करके फाग गायन का संकल्प लेना।
  • गायन प्रारंभ करने से पूर्व ॐ नादब्रह्मणे नमः मंत्र का 11 बार उच्चारण करके अपने स्वर यंत्र और श्वास को स्थिर करना।
  • किसी भी प्रकार के अश्लील, द्विअर्थी, अशास्त्रीय अथवा विकृत आधुनिक गीतों का पूर्ण परित्याग करना।
  • महाकवि सूरदास, रसखान, स्वामी हरिदास और मीराबाई द्वारा रचित प्रामाणिक पदों का ही शांत एवं तन्मय चित्त से गायन करना।
  • गायन के समय अपने संपूर्ण ध्यान को छाती के मध्य भाग अर्थात हृदय चक्र पर केंद्रित रखना।
  • किसी भी व्यक्ति के प्रति कटु वाणी, ईर्ष्या और कामुक विचारों को मन में न आने देना, केवल शुद्ध भगवद् प्रेम में लीन रहना।
  • सायंकाल के समय सामूहिक संकीर्तन में सम्मिलित होकर मृदंग और करताल की ताल पर नृत्य एवं कीर्तन करना।

अनाहत चक्र का तात्विक स्वरूप और नाद ब्रह्म का विज्ञान

योग शास्त्र और तंत्र विज्ञान के अनुसार मानव शरीर के भीतर सात प्रमुख ऊर्जा केंद्र अर्थात चक्र विद्यमान होते हैं। इनमें चतुर्थ चक्र को अनाहत चक्र कहा जाता है, जो छाती के मध्य में हृदय के समीप स्थित होता है। अनाहत का शाब्दिक अर्थ होता है वह ध्वनि जो बिना किसी दो वस्तुओं के आपस में टकराए निरंतर गूंज रही हो अर्थात अनाहत नाद। यह चक्र वायु तत्त्व का अधिष्ठाता है और इसका बीज मंत्र 'यं' (YAM) है। यह चक्र बारह पंखुड़ियों वाले सुनहरे कमल के रूप में जाग्रत होता है, जिसके केंद्र में जीवात्मा और परमात्मा का नित्य मिलन स्थल माना गया है।

सामान्य संसारी मनुष्य का अनाहत चक्र ईर्ष्या, द्वेष, भय, संशय, मोह, अहंकार और पुरानी कटु स्मृतियों के कारण पूरी तरह संकुचित और बंधा हुआ रहता है। जब हृदय चक्र बंद होता है, तो व्यक्ति निरंतर मानसिक अवसाद, अकेलेपन, अविश्वास और हृदय रोगों से पीड़ित रहता है।

अनाहत चक्र के घटक शास्त्रीय व तांत्रिक विवरण मानव शरीर में क्रियात्मक प्रभाव
चक्र की स्थिति वक्ष स्थल के मध्य भाग में (हृदय प्रदेश) रक्त परिसंचरण, श्वसन तंत्र व थाइमस ग्रंथि का नियंत्रण
पंखुड़ियों की संख्या 12 दल (द्वादश दल कमल) 12 मनोवृत्तियों (आशा, चिंता, मोह आदि) का नियमन
तात्विक बीज मंत्र 'यं' (वायु तत्त्व का संवाहक) श्वास की गति और सूक्ष्म प्राण ऊर्जा का संतुलन
यंत्र का ज्यामितीय रूप दो त्रिकोणों का षट्कोण मिलन शिव (ऊर्ध्व मुखी) और शक्ति (निम्न मुखी) का सामंजस्य
अधिष्ठाता शक्ति भगवान ईशान शिव और देवी काकिनी आंतरिक शांति, अभय और निस्वार्थ प्रेम का प्रस्फुटन

जब साधक फाल्गुन मास में राग काफी अथवा धमार ताल में फाग के पदों का गायन करता है, तो नाद ब्रह्म की सूक्ष्म तरंगे सीधे फेफड़ों और हृदय की गहराइयों में उतरती हैं। संगीत की यह तरंगे छाती के भीतर दबी हुई ग्रंथियों पर आघात करती हैं। जैसे ही अनाहत चक्र की पंखुड़ियां खिलने लगती हैं, साधक के भीतर से स्वार्थ और भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है और उसके हृदय में संपूर्ण सृष्टि के प्रति अगाध प्रेम और करुणा का संचार होने लगता है।

ब्रज के शास्त्रीय फाग पद और संत कवियों की समाधि अवस्था

फाग गायन कोई सामान्य लोक संगीत नहीं है, अपितु यह सिद्ध संतों की समाधि अवस्था से निकले हुए साक्षात वेद मंत्र हैं। जब अष्टछाप के महाकवि सूरदास गाते हैं: "आज बिरज में होरी रे रसिया, होरी रे रसिया बरजोरी रे रसिया", तो यह पद केवल दो व्यक्तियों के बीच का रंगोत्सव नहीं दर्शाता, अपितु यह आत्मा का उस परम चेतना के साथ प्रेमपूर्वक बंध जाने का उद्घोष करता है।

इसी प्रकार जब रसखान अपनी दिव्य वाणी में गाते हैं: "फागुन लाग्यो सखी सब मिलि खेलत फाग, अनुराग भरे मन में जागे भाग", तो वहां काम वासना का पूर्ण अभाव होता है और केवल विशुद्ध भगवद् अनुराग ही शेष रहता है। अवध में गाया जाने वाला पद: "अवध में होरी खेलत रघुबीरा, केके हाथ कनक पिचकारी केके हाथ अबीरा" साधक के मन को साकेत लोक के उस दिव्य आनंद से जोड़ देता है जहां मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम अपने अनुजों और जानकी जी के साथ निष्पाप उल्लास मनाते हैं।

जब इन पदों को पखावज और मृदंग की 14 मात्राओं वाली गंभीर धमार ताल पर गाया जाता है, तो धमार की लय सीधे मनुष्य की श्वास गति (रेस्पिरेटरी रिदम) को नियंत्रित करती है। ताल की यह शास्त्रीय गति साधक के मन को शून्य में स्थिर कर देती है, जिससे संगीत सुनते सुनते ही व्यक्ति भाव समाधि में प्रवेश कर जाता है और उसके नेत्रों से अविरल प्रेमाश्रु बहने लगते हैं।

संगीत चिकित्सा और आधुनिक न्यूरोलॉजी का दृष्टिकोण

आधुनिक संगीत चिकित्सा (Music Therapy) और तंत्रिका विज्ञान (Neurology) आज इस बात को प्रमाणिक रूप से स्वीकार कर रहे हैं कि भारतीय शास्त्रीय संगीत के विशिष्ट राग और लोक तालें मानव मस्तिष्क की तरंगों को बदलने में सक्षम हैं। फाल्गुन मास में गाए जाने वाले राग काफी, राग पीलू और राग खमाज की स्वर संरचना सीधे मानव मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम और हाइपोथैलेमस को प्रभावित करती है।

जब मनुष्य तनाव, चिंता अथवा अवसाद में होता है, तो मस्तिष्क में उच्च आवृत्ति वाली बीटा तरंगे (Beta Waves) सक्रिय होती हैं और एड्रिनल ग्रंथियों से कोर्टिसोल नामक तनाव हार्मोन का अत्यधिक स्राव होता है।

संगीत व गायन का स्वरूप मस्तिष्क व स्नायु पर प्रभाव प्राप्त होने वाला मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य लाभ
धमार ताल व पखावज वादन हृदय की धड़कन (हार्ट रेट) का स्थिरीकरण उच्च रक्तचाप का नियंत्रण व मानसिक उत्तेजना की शांति
राग काफी व पीलू का सस्वर गायन मस्तिष्क में अल्फा तरंगों (Alpha Waves) का उदय गहन आंतरिक शांति, विश्राम व तनाव से तत्काल मुक्ति
सामूहिक कीर्तन व करताल ध्वनि एंडोर्फिन व डोपामाइन हार्मोन्स का तीव्र स्राव मानसिक अवसाद की समाप्ति व असीम उल्लास की अनुभूति
स्वर का नाभि से हृदय तक आरोहण थाइमस ग्रंथि की सक्रियता व टी सेल्स वृद्धि शारीरिक रोग प्रतिरोधक क्षमता का अभूतपूर्व विकास

सामूहिक रूप से फाग गाने पर मनुष्य का व्यक्तिगत अलगाव समाप्त हो जाता है। जब कई लोग एक ही स्वर, एक ही ताल और एक ही भाव में गाते हैं, तो उनकी व्यक्तिगत चेतना एक सामूहिक चेतना में विलीन हो जाती है। यह प्रक्रिया अवचेतन मन की दमित कुंठाओं को बाहर निकाल फेंकने की सबसे अचूक प्राकृतिक मनोचिकित्सा सिद्ध होती है।

फाग साधना की शास्त्रीय गायन विधि और यौगिक अभ्यास

फाग के माध्यम से अनाहत चक्र को जाग्रत करने के लिए शास्त्रों में एक अत्यंत सुव्यवस्थित गायन और प्राणायाम पद्धति का विधान किया गया है। इसे केवल गले से नहीं, अपितु नाभि से उठाकर हृदय तक लाया जाता है।

  • प्रातः काल अथवा सायंकाल किसी शांत एवं पवित्र कक्ष में सुखासन अथवा पद्मासन में बैठें और अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें।
  • दोनों हाथों को ज्ञान मुद्रा अथवा हृदय के समीप अंजलि मुद्रा में रखें।
  • अपनी आंखें बंद करके तीन बार गहरी श्वास लें और श्वास छोड़ते समय अपने हृदय में बारह पंखुड़ियों वाले सुनहरे कमल का ध्यान करें।
  • सर्वप्रथम नाभि से ओंकार की ध्वनि का उच्चारण करें, ताकि शरीर की सुषुम्ना नाड़ी का मार्ग प्रशस्त हो सके।
  • इसके पश्चात अत्यंत शांत और मधुर स्वर में किसी प्रामाणिक फाग पद का गायन प्रारंभ करें, जैसे: "उड़त अबीर गुलाल लाल भए बदरा, खेलत फाग कुंजन में कान्हा संग राधा।"
  • पद गाते समय प्रत्येक शब्द के भाव को अपनी कल्पना में जीवंत करें। यह अनुभव करें कि श्री राधा और श्री कृष्ण आपके हृदय मंदिर में विराजमान होकर आपके अंतर्मन पर प्रेम का रंग डाल रहे हैं।
  • यदि गाते गाते मन में अत्यधिक भावुकता उत्पन्न हो और नेत्रों से अश्रु बहने लगें, तो उन्हें रोकें नहीं; वे अश्रु अनाहत चक्र की वर्षों पुरानी मैल को धो रहे होते हैं।
  • गायन के उपरांत कम से कम 10 मिनट तक पूर्ण मौन में बैठें और अपने हृदय में गूंज रही मौन ध्वनि का श्रवण करें।

काम से राम और अनुराग से मोक्ष की यात्रा

फाग साधना का सबसे बड़ा दार्शनिक संदेश काम ऊर्जा का राम ऊर्जा में रूपांतरण है। फाल्गुन मास का वसंत काल कामदेव के जागरण का समय माना जाता है। यदि इस समय मनुष्य की ऊर्जा अनियंत्रित रह जाए, तो वह वासना, विलासिता और शारीरिक पतन का कारण बन जाती है। परंतु हमारी सनातन संस्कृति ने इस काम ऊर्जा को दबाने के स्थान पर उसे संगीत, कला और भक्ति के माध्यम से ऊर्ध्वगामी बनाने की अद्भुत विद्या खोजी।

फाग के गीतों में जो रंग, पिचकारी, हंसी और ठिठोली का वर्णन होता है, वह स्थूल संसार का वर्णन नहीं है। पिचकारी से निकलने वाला रंग ईश्वर के प्रेम की धारा है, गुलाल का उड़ना अहंकार के कण कण बिखरने का प्रतीक है और राधा कृष्ण का मिलन जीवात्मा और परमात्मा का शाश्वत अद्वैत है।

जब साधक इस रहस्य को समझकर फाग साधना करता है, तो उसके भीतर का सांसारिक काम शांत होकर निष्काम प्रेम में परिवर्तित हो जाता है। अनाहत चक्र के जाग्रत होते ही मनुष्य को इस चराचर जगत के प्रत्येक कण में केवल अपने प्रभु की छवि दिखाई देने लगती है। यह साधना साधक को सांसारिक द्वंद्वों से ऊपर उठाकर जीवन मुक्त बना देती है और अंत में उसे भगवान के नित्य गोलोक अथवा साकेत धाम में शाश्वत सेवा का अधिकार प्रदान करती है।

FAQ

फाग गायन परंपरा का मुख्य केंद्र कौन से क्षेत्र माने जाते हैं?
फाग गायन का मुख्य केंद्र ब्रज मंडल (मथुरा, वृंदावन, बरसाना), अवध धाम (अयोध्या) और मिथिला क्षेत्र माना जाता है।

फाग साधना से किस चक्र का जागरण होता है?
फाग के पारंपरिक भक्ति पदों और शास्त्रीय रागों के गायन से छाती के मध्य में स्थित अनाहत चक्र (हृदय केंद्र) जाग्रत होता है।

फाग गायन में मुख्य रूप से किन रागों और तालों का प्रयोग किया जाता है?
इसमें मुख्य रूप से राग काफी, राग पीलू, राग खमाज तथा 14 मात्राओं वाली शास्त्रीय धमार ताल और दीपचंदी ताल का प्रयोग किया जाता है।

संगीत चिकित्सा के अनुसार फाग गायन से क्या स्वास्थ्य लाभ मिलता है?
यह मस्तिष्क के तनाव हार्मोन कोर्टिसोल को घटाता है, उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करता है और गंभीर मानसिक अवसाद को समाप्त करता है।

फाग गायन का मूल आध्यात्मिक संदेश क्या है?
इसका मूल संदेश सांसारिक वासना और काम ऊर्जा को संगीत व भक्ति के माध्यम से परमात्मा के निष्काम प्रेम और मोक्ष में रूपांतरित करना है।

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पं. सुव्रत शर्मा

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