फाल्गुन मास में आयुर्वेद और स्वास्थ्य रहस्य क्या है?

By अपर्णा पाटनी

कफ दोष का पिघलना, मंदाग्नि निवारण, आहार तालिका और घरेलू नुस्खे

फाल्गुन मास में आयुर्वेद: कफ निवारण और स्वास्थ्य नियम

ऋतु संधिकाल और फाल्गुन मास का त्रिदोष विश्लेषण

आयुर्वेद के आधारभूत ग्रंथों चरक संहिता और सुश्रुत संहिता के अनुसार संपूर्ण वर्ष को दो प्रमुख कालखंडों में विभाजित किया गया है, जिन्हें आदान काल और विसर्ग काल के नाम से जाना जाता है। फाल्गुन मास आदान काल के अंतर्गत आने वाली वसंत ऋतु का प्रवेश द्वार माना जाता है। शिशिर ऋतु के अत्यंत शीतल महीनों में बाह्य वातावरण के प्रभाव से शरीर के भीतर प्राकृतिक रूप से कफ दोष का संचय हो जाता है। शीतकाल में मानव देह की जठराग्नि अत्यंत तीव्र रहती है, जिससे व्यक्ति भारी, चिकनाई युक्त, मधुर और पौष्टिक आहार को भी सहजता से पचा लेता है। इस प्रक्रिया में शरीर के विभिन्न स्रोतों और फेफड़ों में घनीभूत कफ जम जाता है।

जैसे ही फाल्गुन मास का शुभारंभ होता है, भुवन भास्कर सूर्य देव दक्षिणायन से उत्तरायण की यात्रा को तीव्र करते हुए अपनी किरणों का ताप बढ़ा देते हैं। सूर्य की प्रखर रश्मियों का सीधा प्रभाव पृथ्वी और मानव शरीर दोनों पर पड़ता है। जिस प्रकार पर्वत शिखरों पर जमी हुई हिम राशि सूर्य की ऊष्मा पाते ही पिघलकर नदियों के रूप में बहने लगती है, ठीक उसी प्रकार शिशिर काल में मानव देह के सूक्ष्म स्रोतों में जमा हुआ गाढ़ा कफ पिघलना आरंभ कर देता है। कफ का यह आकस्मिक द्रवीकरण आमाशय में स्थित पाचक पित्त अर्थात जठराग्नि को मंद कर देता है।

जठराग्नि के मंद होते ही आमाशय में अपक्व आहार रस का निर्माण होता है जिसे आयुर्वेद की भाषा में आम दोष कहा जाता है। यह आम विष रक्त वाहिनियों में संचारित होकर संपूर्ण शरीर के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ देता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति को प्रतिश्याय अर्थात पुराना जुकाम, कास अर्थात खांसी, श्वास विकार, दमा, शिरोवेदना, त्वचा में खुजली, उदर रोग और लगातार आलस्य का अनुभव होने लगता है। इस संधिकाल में वात, पित्त और कफ का पारस्परिक संतुलन बनाए रखना ही दीर्घायु और निरोगी जीवन का आधार है।

ऋतु घटक शिशिर ऋतु का संचय फाल्गुन मास का प्रकोप ग्रीष्म ऋतु का पूर्वाभास
प्रधान दोष स्थिति कफ का स्वाभाविक संचय संचित कफ का द्रवीकरण व प्रकोप पित्त का संचय व कफ का शमन
जठराग्नि की क्षमता अत्यंत तीव्र व तीक्ष्ण मंदाग्नि व अत्यंत संवेदनशील मध्यम व मंद स्थिति
शारीरिक बल उत्तम व स्वाभाविक रूप से पुष्ट मध्यम व क्षरण की ओर अग्रसर अल्प व दुर्बल स्थिति
वायुमंडलीय प्रभाव शीत, शुष्क व बर्फीली पवन स्निग्ध धूप, मंद समीर व पराग कण शुष्क, तप्त व प्रखर किरणें
प्रमुख व्याधियां जोड़ों में अकड़न, वात शूल जुकाम, एलर्जी, श्वास रोग, कास निर्जलीकरण, रक्त पित्त, दाह

फाल्गुन मास में शारीरिक ऊर्जा को सुरक्षित रखने और मौसमी व्याधियों से बचने के लिए दैनिक जीवन में कुछ आधारभूत नियमों का संकल्प लेना अनिवार्य है।

  • प्रातः सूर्योदय से पूर्व शैया का त्याग करके ब्रह्म मुहूर्त की शुद्ध प्राणवायु को फेफड़ों में भरना।
  • बासी, प्रशीतित, अत्यधिक तैलीय और भारी खाद्य पदार्थों का मन, वचन और आचरण से पूर्ण त्याग करना।
  • दिन के समय सोने की प्रवृत्ति को पूरी तरह रोकना क्योंकि दिवास्वप्न कफ दोष को कई गुना बढ़ा देता है।
  • शीतल जल के स्थान पर दिनभर गुनगुने जल अथवा औषधीय क्वाथ का घूंट घूंट करके सेवन करना।
  • प्रतिदिन शरीर पर सरसों अथवा तिल के तेल से मालश करके उबटन से स्नान करना।
  • शाम के समय भारी भोजन से बचते हुए सूर्यास्त से पूर्व या उसके तुरंत बाद अल्पाहार करना।
  • मौसमी एलर्जी और पराग कणों से बचाव के लिए नाक के दोनों नथुनों में शुद्ध अणु तेल अथवा गाय के घी की बूंदें डालना।

कफ दोष के पिघलने का शरीरक्रिया विज्ञान और मंदाग्नि संकट

फाल्गुन मास में शरीर के भीतर होने वाले रासायनिक और जैविक परिवर्तनों को समझना आधुनिक जीवनशैली के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। जब सूर्य का उत्तरायण प्रभाव पृथ्वी पर बढ़ता है, तो वातावरण में उपस्थित आग्नेय तत्त्व की प्रधानता होने लगती है और सौम्य तत्त्व घटने लगता है। मानव शरीर में उपस्थित कफ दोष पृथ्वी और जल महाभूत के संयोग से बनता है। जल और पृथ्वी के गुण भारी, शीतल, स्निग्ध और स्थिर होते हैं। जब वसंत का सूर्य अपनी अग्नि से इस स्थिर कफ को पिघलाता है, तो यह तरल होकर आमाशय, फुफ्फुस अर्थात फेफड़ों और नासिका मार्ग में बहने लगता है।

कफ के इस द्रवीकरण का सबसे भयंकर आघात मनुष्य की पाचन शक्ति पर पड़ता है। आयुर्वेद में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि समस्त रोगों की मूल जननी मंदाग्नि ही है। जब आमाशय में कफ की अधिकता हो जाती है, तो पाचक पाचक रस और एंजाइम्स की सक्रियता अत्यंत शिथिल पड़ जाती है। मनुष्य जो भी आहार ग्रहण करता है, वह समुचित रूप से पचने के स्थान पर सड़ने लगता है। इस सड़न से जो विषैला तत्व उत्पन्न होता है, वह सूक्ष्म नलिकाओं अर्थात स्रोतों को अवरुद्ध कर देता है। स्रोतों के अवरोध से शरीर के ऊतकों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता जिससे व्यक्ति बिना कोई कठिन परिश्रम किए भी हर समय थकावट, भारीपन और मानसिक अवसाद का अनुभव करने लगता है।

यदि इस स्थिति को समय रहते न संभाला जाए, तो यह साधारण जुकाम आगे चलकर ब्रोंकाइटिस, साइनोसाइटिस, क्रोनिक अस्थमा और यकृत की दुर्बलता में परिवर्तित हो जाता है। इसके अतिरिक्त, वायुमंडल में उड़ने वाले पलाश, आम और विभिन्न पुष्पों के पराग कण जब श्वसन नलिका में प्रवेश करते हैं, तो पिघले हुए कफ के साथ मिलकर वे एक अत्यंत गंभीर एलर्जिक प्रतिक्रिया को जन्म देते हैं। इसलिए फाल्गुन मास का यह कालखंड केवल उत्सव मनाने का समय नहीं है, अपितु अपनी काया को अंदर से शुद्ध और कफमुक्त करने की एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला भी है।

फाल्गुन मास की आदर्श दैनिक दिनचर्या और आचार रसायन

आयुर्वेद में केवल औषधियों के सेवन को ही चिकित्सा नहीं माना गया है, बल्कि दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतुचर्या का पालन करना सर्वोत्तम चिकित्सा स्वीकार किया गया है। फाल्गुन मास में स्वास्थ्य की रक्षा के लिए एक विशिष्ट वसंतकालीन दिनचर्या का विधान शास्त्रों में प्रस्तुत किया गया है। इस दिनचर्या का निष्ठापूर्वक पालन करने से शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र अर्थात ओज धातु अत्यंत सुदृढ़ हो जाती है।

प्रातः काल का जागरण सूर्योदय से कम से कम 45 मिनट पूर्व होना चाहिए। उठते ही सर्वप्रथम अपनी दोनों हथेलियों का दर्शन करके भूमि वंदना करनी चाहिए और फिर ताम्र पात्र में रात्रिभर रखा हुआ गुनगुना जल बैठकर पीना चाहिए। इसे उषापान कहा जाता है। उषापान के पश्चात मलोत्सर्ग की क्रिया सहज हो जाती है। इसके उपरांत नीम अथवा बबूल की दातून से दांतों और जिह्वा की गहन शुद्धि करनी चाहिए। नीम का तिक्त रस मुख के भीतर जमे हुए रात्रि कालीन कफ को तुरंत बाहर निकाल फेंकता है और मसूड़ों को दृढ़ता प्रदान करता है।

दंतधावन के उपरांत नस्य कर्म का विधान है। नस्य कर्म में सिर को थोड़ा पीछे झुकाकर दोनों नासाछिद्रों में 2-2 बूंद अणु तेल, षडबिंदु तेल अथवा गाय का शुद्ध देसी घी डालना चाहिए। नस्य कर्म सिर के समस्त रोगों, नेत्रों की ज्योति, बालों के असमय पकने और नासिका मार्ग की एलर्जी का अचूक उपाय है। इसके पश्चात संपूर्ण शरीर पर सरसों के तैल अथवा तिल तैल में थोड़ा सा कपूर और सेंधा नमक मिलाकर तीव्र गति से मालिश करनी चाहिए। इसे आयुर्वेद में अभ्यंग कहा जाता है। अभ्यंग के पश्चात बेसन, जौ का आटा, हल्दी और त्रिफला के चूर्ण से बना उबटन शरीर पर रगड़ना चाहिए। इस क्रिया को उद्वर्तन कहा जाता है। उद्वर्तन शरीर के अतिरिक्त मेद और त्वचा के रोमछिद्रों में जमे हुए कफ को समूल नष्ट कर देता है।

स्नान सदैव सामान्य तापमान वाले शीतल अथवा हल्के गुनगुने जल से ही करना चाहिए। सिर पर कभी भी अत्यधिक गर्म जल नहीं डालना चाहिए क्योंकि इससे नेत्रों और मस्तिष्क के स्नायुओं को हानि पहुंचती है। स्नान के उपरांत स्वच्छ, हल्के और सूती वस्त्र धारण करने चाहिए। दिन के समय कभी भी शयन नहीं करना चाहिए। दिवास्वप्न से शरीर में कफ और मेद का संचय अत्यंत तीव्र गति से होता है, जिससे अग्नि मंद पड़ जाती है और शरीर में भारीपन छा जाता है। रात्रि में सोने से कम से कम 2 घंटे पूर्व हल्का भोजन कर लेना चाहिए और सोने से पूर्व पैरों के तलवों में गाय के घी की मालिश करनी चाहिए जिससे गहरी और शांत निद्रा प्राप्त होती है।

फाल्गुन मास के लिए संपूर्ण आयुर्वेदिक आहार सारणी

फाल्गुन मास में कफ के शमन और जठराग्नि को प्रदीप्त रखने के लिए आहार का चयन अत्यंत विचारपूर्वक करना चाहिए। इस मास में कटु अर्थात कड़वे, तिक्त अर्थात चरपरे और कषाय अर्थात कसैले रसों की प्रधानता वाले पदार्थों का सेवन करना चाहिए। मधुर, अम्ल और लवण रसों का सेवन न्यूनतम करना चाहिए क्योंकि ये रस शरीर में कफ की वृद्धि करते हैं।

समय व प्रहर अनुमोदित आहार सामग्री शास्त्रीय व औषधीय प्रयोजन पूर्णतः वर्जित खाद्य द्रव्य
प्रातः काल नीम की 4 कोपलें, सोंठ की चाय, मेथी जल कफ का छेदन और रक्त शोधन ठंडा दूध, केला, मलाई, पेस्ट्री
प्रातः कालीन नाश्ता भुने हुए चने, जौ का सत्तू, मूंग दाल चीला हलका, सुपाच्य और ऊर्जा प्रदायक पराठे, पूड़ी, ब्रेड पकोड़ा, दही
दोपहर का भोजन पुराने गेहूं अथवा जौ की रोटी, करेला, परवल जठराग्नि का संवर्धन व कफ शमन उड़द की दाल, चावल, पनीर, छाछ
अपरान्ह बेला भुनी अलसी, मखाने, तुलसी व अदरक का काढ़ा श्वसन नलिका की शुद्धि कोल्ड ड्रिंक्स, आइसक्रीम, मिठाई
रात्रि का भोजन मूंग दाल और लौकी की खिचड़ी, सोंठ युक्त सूप पाचन तंत्र को विश्राम और सुपाच्यता गरिष्ठ भोजन, मांसाहार, फास्ट फूड
शयन पूर्व हल्दी, दालचीनी व सोंठ मिश्रित गुनगुना जल कफ का शमन और गहरी निद्रा ठंडा पानी, मीठा दूध, खीर

इस आहार तालिका का पालन करने से शरीर की चयापचय दर संतुलित रहती है और अतिरिक्त कफ का संचय नहीं हो पाता।

  • नित्य भोजन में सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली अर्थात त्रिकटु चूर्ण का अल्प मात्रा में उपयोग करना चाहिए।
  • सेंधा नमक का ही प्रयोग करें और साधारण समुद्री नमक की मात्रा अत्यंत सीमित कर दें।
  • भोजन के तुरंत बाद जल पीने से बचें, भोजन के 45 मिनट पश्चात ही गुनगुना जल ग्रहण करें।
  • सप्ताह में एक दिन केवल तरल पदार्थों अथवा उबली हुई मूंग की दाल के पानी पर उपवास रखें।
  • ताजे बने भोजन का ही सेवन करें, फ्रिज में रखा हुआ बासी अन्न विष के समान कार्य करता है।

मौसमी एलर्जी और श्वास रोगों से रक्षा के अचूक घरेलू उपचार

फाल्गुन मास में जब वातावरण में पराग कणों की भरमार होती है और कफ पिघलता है, तब प्राचीन भारतीय रसोई में उपस्थित मसाले ही सर्वश्रेष्ठ औषधियों का रूप धारण कर लेते हैं। इन घरेलू नुस्खों का नियमित और विवेकपूर्ण उपयोग करके बिना किसी अंग्रेजी दवा के शरीर को पूरी तरह स्वस्थ रखा जा सकता है।

प्रथम उपाय नीम की नई कोपलों का सेवन है। वसंत ऋतु में नीम के वृक्ष पर लालिमा लिए हुए अत्यंत कोमल पत्ते फूटते हैं। प्रतिदिन प्रातः काल खाली पेट 4 से 5 नीम की ताजी कोपलों को 2 काली मिर्च के दानों के साथ चबाकर खाने से शरीर का रक्त पूरी तरह शुद्ध हो जाता है। नीम का कड़वा रस रक्त में उपस्थित कीटाणुओं को नष्ट करता है, त्वचा विकारों से रक्षा करता है और पूरे वर्ष के लिए शरीर को चर्म रोगों और रक्त विकारों से सुरक्षित कर देता है।

द्वितीय अचूक उपचार त्रिकटु चूर्ण का प्रयोग है। त्रिकटु चूर्ण सौंठ, काली मिर्च और छोटी पीपल को बराबर मात्रा में पीसकर बनाया जाता है। आधा ग्राम त्रिकटु चूर्ण को एक चम्मच शुद्ध शहद में मिलाकर प्रातः और सायं चाटने से फेफड़ों में जमा हुआ पुराना कफ पिघलकर बाहर निकल जाता है। यह योग मंद पड़ी हुई जठराग्नि को तुरंत प्रदीप्त कर देता है और श्वास नलिकाओं की सूजन को समाप्त करता है। जो लोग मधुमेह से पीड़ित हैं, वे इसे गुनगुने पानी के साथ ले सकते हैं।

तृतीय उपाय अजवाइन और कपूर की पोटली की भाप है। जब नासिका मार्ग पूरी तरह अवरुद्ध हो जाए और सिर में कफ के कारण भारीपन हो, तो एक सूती कपड़े में 2 चम्मच अजवाइन और 2 टिक्की शुद्ध भीमसेनी कपूर बांधकर पोटली बना लें। इसे बार बार सूंघने से बंद नाक खुल जाती है। इसके अतिरिक्त खौलते हुए जल में अजवाइन और पुदीने की पत्तियां डालकर उसका भाप लेना श्वसन तंत्र की गहरी शुद्धि करता है।

चतुर्थ उपाय त्रिफला रसायन का सेवन है। हरड़, बहेड़ा और आंवला के समान मिश्रण से बने त्रिफला चूर्ण को फाल्गुन मास में रात्रि के समय गुनगुने जल अथवा शहद के साथ ग्रहण करना चाहिए। त्रिफला आंतों की दीवारों पर जमे हुए विषैले कफ और आम दोष को बाहर निकालता है जिससे पेट साफ रहता है और पाचन क्रिया निर्दोष बनी रहती है।

घरेलू उपचार घटक प्रयोग की शास्त्रीय विधि लक्षित शारीरिक लाभ अनुशंसित समय
नीम कोपल व काली मिर्च चबाकर गुनगुने जल के साथ रक्त शुद्धि व चर्म रोग निवारण प्रातः काल खाली पेट
त्रिकटु व शुद्ध मधु अवलेह बनाकर चाटना कफ छेदन व जठराग्नि दीपन प्रातः व सायं भोजन से पूर्व
अजवाइन व कपूर भाप खौलते जल में डालकर वाष्प लेना बंद नासिका व श्वास नली शुद्धि दोपहर अथवा शयन पूर्व
त्रिफला चूर्ण प्रयोग गुनगुने जल के साथ 3 ग्राम कोष्ठ शुद्धि व आम दोष का नाश रात्रि को शयन से पूर्व

पंचकर्म शोधन और वसंतकालीन आध्यात्मिक कायाकल्प

आयुर्वेद के पंचकर्म विभाग में वसंत ऋतु को वमन कर्म के लिए सर्वश्रेष्ठ काल स्वीकार किया गया है। वमन कर्म का अर्थ है औषधीय द्रव्यों के माध्यम से आमाशय में स्थित दूषित कफ को मुख मार्ग से वमन कराकर बाहर निकालना। यह शोधन चिकित्सा किसी योग्य और अनुभवी आयुर्वेदिक चिकित्सक की देखरेख में ही संपन्न की जानी चाहिए। वमन कर्म कराने से शरीर के संपूर्ण कफज रोग समूल नष्ट हो जाते हैं और व्यक्ति अगले एक वर्ष के लिए एलर्जी, श्वास रोग, मधुमेह और मोटापे जैसी व्याधियों से सुरक्षित हो जाता है।

शारीरिक शुद्धि के साथ साथ मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि का भी फाल्गुन मास में विशेष महत्व है। आयुर्वेद में इसे सत्वावजय चिकित्सा कहा गया है। जब शरीर का कफ पिघलता है, तो मन में भी तमोगुण की वृद्धि होने की संभावना रहती है। तमोगुण मनुष्य को आलस्य, प्रमाद और अकर्मण्यता की ओर धकेलता है। इस तमोगुण को नष्ट करने के लिए सूर्य नमस्कार, कपालभाति प्राणायाम, भस्त्रिका प्राणायाम और ध्यान का नियमित अभ्यास करना चाहिए। सूर्य नमस्कार शरीर के भीतर सौर ऊर्जा का संचार करता है और कपालभाति फेफड़ों के कफ को सुखाकर मस्तिष्क को असीम शांति प्रदान करती है।

जब मनुष्य अपने खानपान, रहन सहन और विचारों को प्रकृति के इस चक्र के साथ जोड़ लेता है, तब फाल्गुन मास उसके लिए व्याधियों का कारण न बनकर एक दिव्य नवजीवन का स्रोत बन जाता है। इस मास में किया गया आत्मसंयम और स्वास्थ्य संवर्धन व्यक्ति को आने वाले पूरे वर्ष के लिए एक अत्यंत शक्तिशाली, रोगमुक्त और तेजस्वी काया प्रदान करता है। यही आयुर्वेद का मूल उद्देश्य है कि स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा की जाए और रोगी के रोग का समूल शमन किया जाए।

FAQ

फाल्गुन मास में कफ दोष क्यों पिघलने लगता है?
फाल्गुन मास में सूर्य की किरणों का ताप बढ़ने के कारण शीतकाल में शरीर में जमा हुआ गाढ़ा कफ स्वाभाविक रूप से पिघलने लगता है।

फाल्गुन मास में मंदाग्नि होने का मुख्य कारण क्या है?
पिघला हुआ कफ आमाशय में जाकर पाचक रसों को कमजोर कर देता है जिससे जठराग्नि मंद पड़ जाती है और पाचन क्रिया शिथिल हो जाती है।

फाल्गुन मास में नीम की नई कोपलों का सेवन क्यों किया जाता है?
नीम की ताजी कोपलों का कड़वा रस रक्त को शुद्ध करता है, त्वचा विकारों से रक्षा करता है और शरीर में जमे दूषित कफ को बाहर निकालता है।

फाल्गुन मास में कौन से भोज्य पदार्थ पूरी तरह वर्जित माने गए हैं?
इस मास में ठंडा दूध, दही, केला, उड़द की दाल, अत्यधिक तली भुनी चीजें, मिठाइयां और दिन में सोना पूरी तरह वर्जित माना गया है।

वसंत ऋतु में मौसमी एलर्जी से बचने का सबसे सरल उपाय क्या है?
नाक में गाय का शुद्ध घी या अणु तेल डालना, त्रिकटु चूर्ण का शहद के साथ सेवन और अजवाइन की भाप लेना एलर्जी से बचने का अचूक उपाय है।

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अपर्णा पाटनी

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