By पं. अभिषेक शर्मा
प्रातः सूर्य अर्घ्य से लेकर संध्या आरती तक का संपूर्ण क्रम

सनातन वैदिक काल गणना में फाल्गुन मास संवत्सर का द्वादश और अंतिम मास होता है, जो शिशिर ऋतु के समापन और वसंत ऋतु के चरमोत्कर्ष का संधिकाल माना जाता है। इस मास में सूर्य देव मकर राशि की यात्रा पूर्ण करके कुंभ राशि में संचरण करते हैं और मास के उत्तरार्ध में मीन संक्रांति के साथ बृहस्पति की जल तत्त्वीय राशि में प्रवेश करते हैं। इस संधिकाल में वातावरण के ताप, वायु के प्रवाह और संपूर्ण जैव ऊर्जा में तीव्र परिवर्तन आता है।
वैदिक पंचांग के अनुसार यह कालखंड साधना, उपासना और नित्य आचार शुद्धि के लिए वर्ष का सबसे अनुकूल और संवेदनशील समय माना गया है। फाल्गुन मास का प्रत्येक दिन त्रिगुणों-सत्व, रज और तम-के परिष्कार का अवसर होता है। जहाँ एक ओर प्रातः काल भुवन भास्कर सूर्य देव की स्वर्ण रश्मियां आत्मा को ओजस्वी बनाती हैं, वहीं मध्याह्न और सायंकाल में देवाधिदेव महादेव शिव और भगवान श्री राधा कृष्ण की आराधना अंतःकरण को भक्ति रस से परिपूर्ण करती है।
| पंचांग व साधना घटक | शास्त्रीय विवरण |
|---|---|
| मास एवं पक्ष | फाल्गुन मास, कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष (संपूर्ण तीस दिन) |
| दैनिक पूजा का मुख्य केंद्र | त्रि-देव उपासना: सूर्य देव, देवाधिदेव महादेव, श्री राधा कृष्ण |
| प्रधान साधना काल | प्रातः संध्या (ब्रह्म मुहूर्त), मध्याह्न और सायं प्रदोष वेला |
| प्रमुख द्रव्य | ताम्र पात्र का जल, श्वेत तिल, अक्षत, कच्चा गोदुग्ध, बेलपत्र, गुलाल |
| तात्विक प्रकृति | आग्नेय ऊर्जा (सूर्य) और जलीय शीतलता (शिव व कृष्ण) का समन्वय |
| नित्य पाठ्य ग्रंथ | आदित्य हृदय स्तोत्र, शिव महिम्न स्तोत्र, विष्णु सहस्रनाम |
| मुख्य आध्यात्मिक फल | संचित कर्मों का शोधन, मानसिक शांति, निरोग काया और आत्म साक्षात्कार |
फाल्गुन मास के संपूर्ण तीस दिनों में नित्य पूजा का पूर्ण शास्त्रीय फल प्राप्त करने के लिए साधक को सूर्योदय से पूर्व से लेकर शयन काल तक एक सुव्यवस्थित दिनचर्या का पालन करना चाहिए।
ऋग्वेद के अनुसार प्रातः कालीन उषा काल समस्त दैवीय ऊर्जाओं का भंडार होता है। फाल्गुन मास में जब वायु में न तो अत्यधिक शीतलता होती है और न ही ग्रीष्म की तपन तब ब्रह्म मुहूर्त में जागरण करना स्नायु तंत्र और मस्तिष्क की कोशिकाओं को पुनर्जीवित कर देता है।
स्नान के पश्चात सूर्य देव को अर्घ्य देना फाल्गुन मास की नित्य पूजा का प्रथम और अनिवार्य सोपान है। सूर्य आत्मा के कारक और प्रत्यक्ष देवता हैं। इस मास में उत्तरायण सूर्य की रश्मियां अत्यंत कल्याणकारी होती हैं।
ॐ सूर्याय नमः, ॐ घृणि सूर्याय नमः, ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणाय मनोवांछित फलं देहि देहि स्वाहा॥
अर्घ्य पूर्ण होने के पश्चात उस तांबे की थाली में एकत्रित जल को अपनी अनामिका उंगली से स्पर्श करके अपने दोनों नेत्रों, मस्तक और कंठ पर लगाएं। इसके बाद वहीं खड़े होकर तीन बार दक्षिणावर्त (घड़ी की सुई की दिशा में) परिक्रमा करें और सूर्य देव को साष्टांग प्रणाम करें। यह क्रिया नेत्र ज्योति को तीव्र करती है, रक्त चाप को संतुलित रखती है और जातक के भीतर अद्भुत आत्मविश्वास का संचार करती है।
| सूर्य अर्घ्य द्रव्य | तात्विक ऊर्जा | शारीरिक प्रभाव | ज्योतिषीय फल |
|---|---|---|---|
| शुद्ध जल | वरुण तत्त्व (शीतलता) | शरीर का तापमान संतुलन | चंद्र दोष शांति व मन की स्थिरता |
| लाल चंदन व कुमकुम | मंगल तत्त्व (अग्नि) | रक्त प्रवाह का शोधन | पराक्रम व आत्मबल की वृद्धि |
| साबुत अक्षत | चंद्र तत्त्व (शुद्धता) | मानसिक शांति का विस्तार | आर्थिक स्थिरता व सुख शांति |
| गुड़ की डली | सूर्य तत्त्व (ऊर्जा) | जठराग्नि व पित्त का नियमन | मान प्रतिष्ठा व राजकृपा की प्राप्ति |
| लाल कनेर पुष्प | तेज तत्त्व (सौंदर्य) | आज्ञा चक्र का जागरण | सूर्य की महादशा के कष्टों से मुक्ति |
सूर्य अर्घ्य के पश्चात साधक को अपने गृह मंदिर अथवा देवालय में भगवान शिव की नित्य आराधना करनी चाहिए। फाल्गुन मास भगवान शिव की आराधना के लिए वर्ष का सबसे महान मास माना गया है क्योंकि इसी मास में महाशिवरात्रि और फाल्गुन प्रदोष व्रत आते हैं।
नित्य पूजा में शिवलिंग का अभिषेक केवल जल से नहीं, अपितु ऋतु अनुकूल औषधीय द्रव्यों से करना चाहिए। फाल्गुन मास में पलाश के फूलों का जल शिवलिंग पर अर्पित करना साक्षात अमृत वर्षा के समान माना गया है।
भगवान शिव के पूजन के उपरांत साधक को भगवान श्री राधा कृष्ण और उनके बाल स्वरूप लड्डू गोपाल जी की सेवा करनी चाहिए। फाल्गुन मास का वसंत काल भगवान श्री कृष्ण की महारास लीला और ब्रज की होरी का समय है। इस मास में लड्डू गोपाल जी की सेवा में वात्सल्य और माधुर्य रस की प्रधानता होती है।
| दैनिक पूजन प्रहर | अधिष्ठाता देवता | मुख्य पूजन विधि | समर्पित किए जाने वाले प्रमुख द्रव्य |
|---|---|---|---|
| प्रथम प्रहर (प्रातः 6 से 8) | भगवान सूर्य देव | तांबे के पात्र से तीन बार अर्घ्य व ध्यान | जल, अक्षत, रोली, लाल पुष्प, गुड़ |
| द्वितीय प्रहर (प्रातः 8 से 10) | देवाधिदेव महादेव शिव | पंचामृत अभिषेक व त्रिपुंड लेपन | कच्चा गोदुग्ध, पलाश जल, बेलपत्र, भस्म |
| तृतीय प्रहर (पूर्वाह्न 10 से 11) | लड्डू गोपाल व राधा कृष्ण | बाल सेवा, वसंत श्रृंगार व भोग | बसंती वस्त्र, मक्खन मिश्री, गुलाल, तुलसी |
| चतुर्थ प्रहर (मध्याह्न 12 से 1) | पितृ गण व पंच महाभूत | नित्य वैश्वदेव बलि व गौ ग्रास | पहली रोटी, गुड़, जल, चींटियों को आटा |
| पंचम प्रहर (सायं 6 से 7) | तुलसी महारानी व कुलदेवी | संध्या दीप प्रज्वलन व कर्पूर आरती | गाय का घी, धूप, सिंदूर, पुष्प, नैवेद्य |
| षष्ठ प्रहर (रात्रि 8 से 9) | इष्ट देव व योग निद्रा | मानसिक नाम जप व आत्म समर्पण | रुद्राक्ष अथवा तुलसी माला, मौन ध्यान |
सनातन धर्म केवल मंदिर में बैठकर घंटा बजाने का नाम नहीं है, अपितु यह संपूर्ण चराचर जगत के साथ एकात्म स्थापित करने की जीवन शैली है। वैदिक शास्त्रों में प्रत्येक गृहस्थ के लिए प्रतिदिन मध्याह्न भोजन से पूर्व 'पंच महायज्ञ' का विधान किया गया है। फाल्गुन मास के संधिकाल में संचित पापों के क्षय हेतु इसका पालन अनिवार्य माना गया है।
गृह की रसोई में भोजन बनने के पश्चात सर्वप्रथम अग्नि देव को भोजन की तीन छोटी आहुतियां (घी, गुड़ और अन्न की) समर्पित करें। इसके पश्चात भोजन की थाली से पांच ग्रास अलग निकालें:
इन पांचों जीवों को भोजन अर्पित करने के पश्चात ही परिवार के सदस्यों को भोजन ग्रहण करना चाहिए। यह नित्य क्रिया घर के समस्त वास्तु दोषों और अन्न दोषों को समाप्त करके घर में अक्षय अन्नपूर्णा का वास स्थापित करती है।
दिन ढलने के समय जब दिन और रात का मिलन होता है, उस संधिकाल को 'प्रदोष काल' अथवा 'गोधूलि वेला' कहा जाता है। फाल्गुन मास में यह समय ऊर्जा के संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
फाल्गुन मास की यह व्यवस्थित नित्य पूजा पद्धति मनुष्य के स्थूल शरीर, सूक्ष्म प्राण और कारण शरीर तीनों का एक साथ कायाकल्प कर देती है। जो साधक इस प्रकार 30 दिनों तक अखंड रूप से प्रभु की सेवा करता है, उसके घर में वर्षभर किसी भी प्रकार का अमंगल, रोग अथवा दरिद्रता प्रवेश नहीं कर सकती।
फाल्गुन मास में नित्य पूजा किस देवता को समर्पित होनी चाहिए?
फाल्गुन मास में प्रातः काल सूर्य देव, पूर्वाह्न में देवाधिदेव महादेव शिव और भगवान श्री राधा कृष्ण तथा संध्या वेला में तुलसी जी की नित्य पूजा का विधान है।
सूर्य देव को अर्घ्य देते समय जल में क्या मिलाना अनिवार्य है?
तांबे के लोटे में शुद्ध जल के साथ रोली (कुमकुम), अक्षत, लाल पुष्प और थोड़ा सा गुड़ मिलाना सर्वोत्तम माना गया है।
फाल्गुन मास में शिवलिंग पर किस विशेष जल से अभिषेक करना चाहिए?
फाल्गुन मास में रातभर जल में भिगोए गए पलाश (टेसू) के फूलों के केसरिया जल से शिवलिंग का अभिषेक करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है।
लड्डू गोपाल जी को फाल्गुन में कौन से वस्त्र पहनाने चाहिए?
वसंत ऋतु के प्रभाव के कारण लड्डू गोपाल जी को हल्के पीले, बसंती अथवा गुलाबी रंग के सूती या रेशमी वस्त्र पहनाकर गुलाल अर्पित करना चाहिए।
संध्या वेला में तुलसी पूजा के समय किस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए?
सूर्यास्त के समय तुलसी के पौधे के निकट शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए, परंतु उस समय तुलसी के पत्तों को तोड़ना अथवा पौधे का स्पर्श करना सर्वथा वर्जित है।
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